गंगा में धोए गए पाप कहाँ जाते हैं? 'जैसा अन्न वैसा मन' और भीष्म पितामह का प्रसंग | Bhagwat Darshan

Sooraj Krishna Shastri
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पाप कहाँ जाते हैं माँ गंगा में? "जैसा अन्न, वैसा मन" का गूढ़ रहस्य और भीष्म पितामह का प्रसंग
सनातन धर्म में पतितपावनी माँ गंगा का स्थान सर्वोपरि है। मान्यता है कि गंगा स्नान मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। लाखों-करोड़ों श्रद्धालु प्रतिदिन गंगा में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति की कामना करते हैं। परन्तु, क्या आपने कभी यह विचार किया है कि यदि सारे संसार के पापी अपने पाप गंगा में छोड़ आते हैं, तो उन पापों का क्या होता है? क्या इतने पापों को समाहित करके स्वयं गंगा अपवित्र नहीं हो जातीं? कर्मों का यह चक्र कैसे कार्य करता है और यह हमारे दैनिक जीवन, विशेषकर हमारे 'भोजन' (अन्न) से कैसे जुड़ा है? आइए, इस आध्यात्मिक रहस्य और महाभारत के भीष्म-द्रौपदी संवाद के माध्यम से कर्म और अन्न की शुद्धि के सिद्धांत को विस्तार से समझते हैं।
१. एक ऋषि की जिज्ञासा: पाप कहाँ जाता है?
प्राचीन काल की बात है, एक सिद्ध ऋषि नदी किनारे ध्यानमग्न बैठे थे। उन्होंने देखा कि सहस्रों लोग आ रहे हैं और गंगा में स्नान कर रहे हैं। उनके मन में एक गूढ़ प्रश्न उत्पन्न हुआ— "लोग गंगा में अपने पाप धोने आते हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि संसार भर के सारे पाप गंगा में समा गए। यदि ऐसा है, तो पापों का बोझ ढोते-ढोते तो गंगा भी पापी और मलिन हो गई होंगी! आखिर यह धुला हुआ पाप जाता कहाँ है?"
अपनी इस शंका के निवारण हेतु ऋषि ने कठोर तपस्या आरंभ की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर साक्षात् भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए। ऋषि ने उन्हें प्रणाम किया और पूछा— "हे भगवन्! जो पाप गंगा में धोये जाते हैं, वे पाप अंततः कहाँ जाते हैं?" भगवान मुस्कुराए और बोले— "मुनिवर! इसका उत्तर तो स्वयं गंगा ही दे सकती हैं। चलो, गंगा से ही पूछते हैं।"
२. पापों का चक्र: गंगा, समुद्र और बादल का संवाद
माँ गंगा का उत्तर
भगवान विष्णु और ऋषि दोनों माँ गंगा के पास पहुँचे और भगवान ने पूछा, "हे गंगे! जो लोग तुम्हारे जल में अपने पाप धोते हैं, तो क्या उन पापों से तुम भी पापी हो जाती हो?" माँ गंगा ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया— "प्रभु! मैं क्यों पापी होने लगी? मैं तो इन सभी पापों को अपने पास नहीं रखती, बल्कि उन्हें ले जाकर अथाह समुद्र को अर्पित कर देती हूँ। मैं तो मात्र एक माध्यम हूँ।"
समुद्र का उत्तर
अब भगवान और ऋषि समुद्र के पास गए और पूछा, "हे सागर! गंगा जो संसार भर के पाप तुम्हें अर्पित कर देती है, तो इसका अर्थ है कि समस्त पापों का भण्डार होने के कारण तुम पापी हुए?" समुद्र ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया— "नारायण! मैं क्यों पापी हुआ? मैं भी इन पापों को अपने भीतर सहेज कर नहीं रखता। सूर्य की तपन से मैं अपने जल के साथ-साथ उन सारे पापों को वाष्प (भाप) बना देता हूँ और बादलों को सौंप देता हूँ।"
बादलों का उत्तर और अंतिम सत्य
तत्पश्चात, भगवान और ऋषि आकाश में घिरे बादलों के पास पहुँचे। भगवान ने पूछा, "हे बादलों! समुद्र जो पाप वाष्प बनाकर तुम्हें सौंप देता है, तो क्या तुम पापी हुए?"
बादलों ने जो उत्तर दिया, वही मानव जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। बादलों ने कहा— "हे प्रभु! मैं क्यों पापी हुआ? मैं तो उन सारे पापों को जल की बूँदों (वर्षा) के रूप में वापस उसी धरती पर बरसा देता हूँ।"
"वर्षा के इस जल से धरती पर अन्न उपजता है। उस अन्न को मानव खाता है। जिस वृत्ति (ईमानदारी या बेईमानी) से वह अन्न उगाया या खरीदा जाता है, जिस मानसिक अवस्था में उसे पकाया जाता है, और जिस भाव से उसे खाया जाता है... उसी के अनुसार मानव की मानसिकता और उसके विचार बनते हैं। पाप पुनः दूषित अन्न के रूप में मानव के मन में प्रवेश कर जाते हैं!"
३. आहार शुद्धि का दर्शन: "जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन"
बादलों के इस उत्तर ने कर्मों के अटूट चक्र (Cycle of Karma) को स्पष्ट कर दिया। जल-चक्र की भाँति ही पाप का भी एक चक्र है। जो पाप मनुष्य बाहर नदी में धोकर आता है, वह किसी न किसी रूप में, विशेषकर उसके भोजन के माध्यम से, वापस उसकी चेतना में प्रवेश करने का मार्ग खोज लेता है। इसलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है— "आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" (अर्थात, आहार के शुद्ध होने पर ही अंतःकरण शुद्ध होता है)।
अन्न के संस्कार को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कारक:
  • कमाई की वृत्ति (Source of Wealth): अन्न जिस धन से खरीदा गया है, वह धन यदि किसी का हक मारकर, भ्रष्टाचार, झूठ, चोरी या किसी को पीड़ा पहुँचाकर कमाया गया है, तो वह अन्न साक्षात् विष और पाप का रूप ले लेता है।
  • बनाने वाले की भावना (State of Cook): भोजन पकाने वाले के मन में यदि क्रोध, ईर्ष्या या दुःख है, तो वे नकारात्मक तरंगें भोजन में प्रवेश कर जाती हैं। इसलिए रसोई में ईश्वर का स्मरण करते हुए भोजन पकाने का विधान है।
  • खाने वाले की अवस्था (Mindset of Eater): भोजन करते समय यदि व्यक्ति टीवी पर हिंसा देख रहा है, क्रोध कर रहा है या निंदा कर रहा है, तो अमृत भी शरीर में जाकर तामसिक प्रभाव ही देता है।
४. महाभारत का प्रासंगिक दृष्टांत: भीष्म पितामह और द्रौपदी
अन्न का मनुष्य की बुद्धि और विवेक पर कैसा प्रभाव पड़ता है, इसका सबसे ज्वलंत और प्रामाणिक उदाहरण महाभारत के 'शांति पर्व' में मिलता है। यह वह समय था जब कुरुक्षेत्र का महायुद्ध समाप्त हो चुका था।
गंगापुत्र भीष्म पितामह शरशय्या (तीरों की शय्या) पर लेटे हुए थे। उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था, इसलिए वे अपने प्राण त्यागने हेतु सूर्य के उत्तरायण होने (शुक्ल पक्ष) की प्रतीक्षा कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर, धर्मराज युधिष्ठिर प्रतिदिन अपने भाइयों के साथ पितामह से राजनीति, राजधर्म और नीति का ज्ञान लेने जाते थे। किंतु उन ज्ञान-सभाओं में महारानी द्रौपदी कभी नहीं जाती थीं।
पितामह भीष्म के मन में इस बात की गहरी पीड़ा थी। अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने भीष्म की यह व्यथा भाँप ली। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा— "हे धर्मराज! अंतकाल की प्रतीक्षा में साधनारत अपने वयोवृद्ध पूर्वज से सपरिवार मिलना चाहिए। पत्नी के बिना परिवार पूर्ण नहीं माना जाता।" श्रीकृष्ण का संकेत समझकर, युधिष्ठिर ज़िद करके द्रौपदी को भी अपने साथ ले गए।
द्रौपदी का उपहास और भीष्म की पीड़ा
शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह अत्यंत गंभीर होकर युधिष्ठिर को राजधर्म, स्त्री-सम्मान, न्याय और नीति की शिक्षा दे रहे थे। द्रौपदी यह सब कुछ कुंठित मन से, चुपचाप सुन रही थीं। अचानक, द्रौपदी से रहा न गया और वे ज़ोर से हँस पड़ीं।
एक मरणसन्न वृद्ध के समक्ष इस प्रकार हँसना अत्यंत अनुचित था। पांडव अवाक् रह गए। भीष्म ने अत्यंत शांत भाव से कहा— "पुत्री पांचाली! तुम्हारे इस प्रकार हँसने का कारण मैं भली-भांति जानता हूँ।" जब द्रौपदी सकुचा गईं और उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ, तो भीष्म ने कहा— "पुत्री! तुम निःसंकोच अपने मन की दुविधा और आक्रोश को शब्दों में प्रकट कर दो, इसी से मेरे मन को शांति मिलेगी।"
द्रौपदी का तीखा प्रश्न: "पितामह! स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भीष्म के समान नीति और धर्म का ज्ञाता इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है। किंतु हे गंगापुत्र! आपका यह महान नीति-ज्ञान, यह धर्म और यह न्याय उस दिन कहाँ लुप्त हो गया था, जब भरी राजसभा में आपकी कुलवधू को निर्वस्त्र किया जा रहा था? तब आपने मौन क्यों साधा?"
भीष्म का ऐतिहासिक और मार्मिक उत्तर
यह प्रश्न बाण से भी अधिक तीखा था। भीष्म पितामह ने गहरी साँस ली और कहा— "पुत्री! मुझे तुम्हारे इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी। शास्त्रों का अकाट्य सत्य है— 'जैसा अन्न, वैसा मन'
मैं कौरवों के राज्याश्रय में था। मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी, पापी और अत्याचारी का अन्न खा रहा था। उस पाप की कमाई के अन्न ने मेरे शरीर में जो रक्त बनाया, उसने मेरी बुद्धि को जड़ कर दिया था। मेरी आत्मा पर उस अधर्मी अन्न का ऐसा आवरण छा गया था कि सत्य और असत्य का भेद करने की, और सही निर्णय लेने की मेरी क्षमता पूरी तरह नष्ट हो गई थी।"
भीष्म ने आगे कहा— "मनुष्य का अन्न ही उसके रक्त और चेतना का कारक है। अर्जुन के तीरों ने मेरे शरीर को छलनी कर दिया है। दुर्योधन के पाप के अन्न से बना हुआ सारा दूषित रक्त मेरे शरीर से धीरे-धीरे बहकर निकल चुका है। अब इस देह में कौरवों का कुछ भी शेष नहीं है। अब इस शरीर में सिर्फ 'गंगापुत्र भीष्म' शेष है। मेरे भीतर अब केवल मेरी माता गंगा का पवित्र अंश बचा है जो सबको निर्मल करता है, इसीलिए आज मेरा अंतःकरण शुद्ध हो गया है और मैं धर्म तथा नीति की ये बातें कर पा रहा हूँ।"
५. निष्कर्ष: अधर्म के धन का अंतिम परिणाम
भीष्म पितामह की यह बात कोई साधारण कथा नहीं, बल्कि मानव जाति के लिए अटल सत्य है। यदि आप दुराचार से, बेईमानी से, भ्रष्टाचार से, किसी को सताकर, या किसी गरीब की मजबूरी का फायदा उठाकर कमाए गए धन से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं, तो स्मरण रहे— वह अन्न आपके परिवार, आपकी संतानों की बुद्धि को भ्रष्ट ही करेगा।
पाप की कमाई से प्राप्त सुख अत्यंत क्षणिक होता है। कुछ समय के लिए ऐसा लग सकता है कि अधर्म करने वाला फल-फूल रहा है, परंतु वह वस्तुतः अपने पूर्वजन्म के संचित पुण्यों को तेज़ी से निगल रहा होता है। जैसे ही वे पुण्य समाप्त होते हैं, पाप के अन्न से दूषित हुए विचार परिवार में गृहक्लेश, भयंकर रोग, व्यसन और पतन के रूप में सामने आते हैं। लंबे समय में वह धन भीषण दुःख और विनाश का ही कारण बनता है।
इसलिए, अन्न सदैव ईमानदारी, श्रम और सात्विक वृत्ति से अर्जित धन का ही होना चाहिए। भोजन करते समय मौन रहें, प्रभु का सिमरन करें, और जो कुछ प्राप्त है उसके लिए उस परमपिता परमात्मा का धन्यवाद करें। शुद्ध अन्न ही शुद्ध विचारों को जन्म देता है, और शुद्ध विचार ही मनुष्य को ईश्वर तक ले जाते हैं।
॥ जय जय श्री राधे कृष्णा ॥
गंगा में धोए गए पाप कहाँ जाते हैं? 'जैसा अन्न वैसा मन' और भीष्म पितामह का प्रसंग | Bhagwat Darshan

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