श्रावण मास विशेषांक: पौराणिक माहात्म्य, कृत्य, रुद्राभिषेक और व्रत के प्रामाणिक नियम
सनातन धर्म के पंचांग में 'श्रावण' (सावन) मास का स्थान अत्यंत पवित्र और सर्वोच्च माना गया है। यह मास पूर्ण रूप से देवाधिदेव महादेव शिव और माता पार्वती की आराधना को समर्पित है। 'श्रवण' नक्षत्र से युक्त होने के कारण इस महीने का नाम 'श्रावण' पड़ा। चातुर्मास के अंतर्गत आने वाला यह प्रथम मास है, जब भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि के संचालन का सम्पूर्ण भार भगवान शिव के हाथों में आ जाता है। इसीलिए श्रावण मास में की गई शिव पूजा, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप का फल अनंत गुना हो जाता है। आइए, स्कन्द पुराण, शिव महापुराण और अन्य आगम ग्रंथों के सन्दर्भों के साथ श्रावण मास के कृत्य, नियम और माहात्म्य का विस्तृत दर्शन करें।
१. मंगलाचरण और शिव ध्यान्
श्रावण मास के किसी भी कृत्य या व्रत का आरंभ भगवान सदाशिव के ध्यान से करना चाहिए। शिव पुराण में वर्णित यह ध्यान मंत्र साधक के अंतःकरण को शुद्ध कर देता है:
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं,
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं,
विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं,
विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
भावार्थ:
जो चाँदी के पर्वत (कैलाश) के समान श्वेत कांति वाले हैं, जिनके मस्तक पर सुंदर चंद्रमा आभूषण रूप में सुशोभित है, जिनके अंग रत्नों के आभूषणों से उज्ज्वल हैं, जिनके हाथों में परशु, मृगमुद्रा, वरद और अभय मुद्राएँ हैं, जो प्रसन्न मुख हैं, कमल के आसन पर विराजमान हैं, देवता जिनके चारों ओर स्तुति कर रहे हैं, जो बाघ की खाल पहने हैं, जो विश्व के आदि कारण हैं, विश्व वंदनीय हैं, सभी भयों को हरने वाले हैं, ऐसे पांच मुखों और तीन नेत्रों वाले भगवान महेश्वर का मैं नित्य ध्यान करता हूँ।
२. श्रावण मास का पौराणिक माहात्म्य (समुद्र मंथन का रहस्य)
श्रावण मास में शिव पूजा का विशेष माहात्म्य क्यों है? इसका सबसे बड़ा प्रामाणिक कारण 'समुद्र मंथन' की कथा में निहित है। स्कन्द पुराण के अनुसार, श्रावण मास में ही देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया था। इस मंथन से १४ रत्नों की प्राप्ति हुई थी, जिनमें सबसे पहले 'हलाहल' (कालकूट) नामक भयंकर विष निकला।
यह विष इतना उग्र था कि इसके ताप से तीनों लोक जलने लगे। सृष्टि को भस्म होने से बचाने के लिए भगवान शिव ने उस कालकूट विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के भयंकर प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। विष की प्रचंड उष्णता (गर्मी) के कारण शिवजी के शरीर का ताप अत्यधिक बढ़ गया।
उस ताप को शांत करने के लिए, समस्त देवी-देवताओं ने श्रावण मास में शीतल जल, गंगाजल, और दूध से भगवान शिव का निरंतर अभिषेक किया। उसी समय से श्रावण मास में शिवलिंग पर जलार्पण (जलाभिषेक) करने की यह पावन परंपरा प्रारंभ हुई।
३. श्रावण मास के कृत्य और प्रमुख व्रत
शास्त्रों में श्रावण मास को 'व्रतों का मास' कहा गया है। इस महीने में मन, कर्म और वचन की शुद्धि के लिए कई नियम बताए गए हैं:
(क) श्रावण सोमवार व्रत:
श्रावण मास में आने वाले प्रत्येक सोमवार का व्रत अत्यंत फलदायी है। सोमवार भगवान चंद्र का दिन है और चंद्र भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। जो कन्याएँ श्रावण सोमवार का व्रत करती हैं, उन्हें मनचाहा और सुयोग्य वर प्राप्त होता है (सोलह सोमवार व्रत का आरंभ भी सावन से ही होता है)। विवाहित स्त्रियाँ इसे अखंड सौभाग्य के लिए और पुरुष धन, विद्या एवं आरोग्य प्राप्ति के लिए करते हैं।
(ख) मंगला गौरी व्रत:
श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को माता पार्वती (गौरी) का व्रत किया जाता है, जिसे 'मंगला गौरी व्रत' कहते हैं। यह व्रत नव-विवाहित स्त्रियां अपने सुखी वैवाहिक जीवन और संतान प्राप्ति के लिए करती हैं।
(ग) श्रावण मास के नियम और वर्जित कर्म (क्या न खाएं):
आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों की दृष्टि से श्रावण में कुछ विशेष नियम हैं:
- हरी पत्तेदार सब्जियां (साग) वर्जित: श्रावण में वात दोष कुपित होता है और वर्षा के कारण साग (हरी सब्जियों) में कीड़े और विषाक्त कीट पनपते हैं। अतः श्रावण में साग खाना पूर्णतः निषिद्ध है।
- मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन: यह चातुर्मास का समय है, अतः सात्विकता बनाए रखने के लिए तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करना चाहिए।
- दिन में शयन वर्जित: श्रावण मास में दिन के समय सोना (दिवा-स्वप्न) शास्त्रों में निषिद्ध माना गया है। इससे आलस्य और शारीरिक व्याधियां उत्पन्न होती हैं।
- ब्रह्मचर्य का पालन: इस पूरे मास में साधक को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भूमि पर शयन (यदि संभव हो) और नित्य शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करना चाहिए।
४. रुद्राभिषेक का माहात्म्य और भिन्न-भिन्न द्रव्यों का फल
श्रावण मास में रुद्राभिषेक करना परम कल्याणकारी है। शिव महापुराण के अनुसार, अलग-अलग द्रव्यों (सामग्रियों) से अभिषेक करने पर अलग-अलग फलों की प्राप्ति होती है:
जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकैः।
दध्ना पशुकामोऽभिषिंचेच्छ्रिया इक्षुरसेन वै॥
मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।
पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात्॥
दध्ना पशुकामोऽभिषिंचेच्छ्रिया इक्षुरसेन वै॥
मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा।
पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात्॥
विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक का फल:
- शुद्ध जल (गंगाजल): वर्षा की प्राप्ति, मानसिक शांति और मोक्ष के लिए।
- कुशोदक (कुशा मिश्रित जल): असाध्य रोगों और भयंकर व्याधियों (बीमारियों) की शांति के लिए।
- दही (दधि): पशुधन, वाहन सुख और भवन की प्राप्ति के लिए।
- गन्ने का रस (इक्षु रस): अपार लक्ष्मी, दरिद्रता नाश और व्यापार में वृद्धि के लिए।
- मधु (शहद): धन प्राप्ति, कर्ज मुक्ति और मधुर वाणी के लिए।
- घी (घृत): दीर्घायु, शारीरिक बल और वंश विस्तार के लिए।
- गौ दुग्ध (गाय का दूध): सुयोग्य पुत्र/संतान की प्राप्ति और मानसिक शांति के लिए।
- सरसों का तेल: गुप्त शत्रुओं के नाश और मुकदमों में विजय प्राप्ति के लिए।
५. बिल्वपत्र (बेलपत्र) की महिमा: शिव का सबसे प्रिय पत्र
श्रावण में शिवजी को बिल्वपत्र (Bel Patra) अर्पित किए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार, एक बिल्वपत्र चढ़ाना करोड़ों कन्यादान और अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है। आदि शंकराचार्य विरचित 'बिल्वाष्टकम्' में इसकी अपार महिमा गाई गई है:
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुधम्।
त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥
अखण्डै बिल्वपत्रैश्च पूजये शिव शङ्करम्।
कोटिकन्या महादानं बिल्व पत्रं शिवार्पणम्॥
त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥
अखण्डै बिल्वपत्रैश्च पूजये शिव शङ्करम्।
कोटिकन्या महादानं बिल्व पत्रं शिवार्पणम्॥
भावार्थ:
तीन पत्तियों वाला यह बिल्वपत्र तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम), भगवान शिव के तीन नेत्रों (सूर्य, चंद्र, अग्नि) और तीन आयुधों (शस्त्रों) का प्रतीक है। यह तीन जन्मों (पिछले, वर्तमान और भविष्य) के पापों का संहार करने वाला है। ऐसा एक पवित्र बिल्वपत्र मैं भगवान शिव को अर्पित करता हूँ। जो अखंड (बिना कटा-फटा) बिल्वपत्र शिव को चढ़ाता है, उसे करोड़ों कन्यादान का महापुण्य प्राप्त होता है।
बिल्वपत्र अर्पण का नियम:
बिल्वपत्र को हमेशा उल्टा (चिकना भाग शिवलिंग की ओर) करके चढ़ाना चाहिए। बिल्वपत्र कभी बासी नहीं होता। यदि नया बेलपत्र न मिले, तो चढ़ाए हुए बेलपत्र को ही धोकर पुनः चढ़ाया जा सकता है। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, और सोमवार के दिन बेलपत्र वृक्ष से तोड़ना निषिद्ध है, अतः इसे एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लेना चाहिए।
६. कांवड़ यात्रा का आध्यात्मिक और दार्शनिक स्वरूप
श्रावण मास में 'कांवड़ यात्रा' (Kanwar Yatra) का एक विशेष ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है। लाखों शिवभक्त (कांवड़िए) पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हुए अपने आराध्य शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं।
कांवड़ यात्रा का इतिहास:
कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान परशुराम जी ने की थी। उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर (गंगा) से जल भरकर 'पुरा महादेव' (बागपत) में शिवलिंग पर जलाभिषेक किया था। इसके अतिरिक्त, त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने श्रावण मास में ही सुल्तानपुर (श्रृंगवेरपुर) से गंगाजल लेकर झारखण्ड स्थित 'बाबा बैद्यनाथ' (देवघर) का अभिषेक किया था। रावण ने भी शिव को प्रसन्न करने के लिए कांवड़ यात्रा की थी।
कांवड़ का आध्यात्मिक दर्शन:
कांवड़ केवल एक बांस की लकड़ी नहीं है, यह जीवन का संतुलन (Balance of Life) है। बांस के दोनों सिरों पर बंधे जल के कलश मनुष्य के जीवन के दो पलड़े हैं— 'कर्म' और 'भक्ति'। साधक अपने जीवन में इन दोनों का संतुलन बनाकर, तमाम शारीरिक कष्ट (पैदल यात्रा के छाले, बारिश, धूप) सहते हुए अहंकार को त्यागता है और शिव के चरणों में सब कुछ समर्पित कर देता है। यह काया (शरीर) को तपाकर कुंदन बनाने की प्रक्रिया है।
७. श्रावण मास में जपने योग्य सिद्ध मन्त्र
श्रावण मास में चलते-फिरते, उठते-बैठते शिव मन्त्रों का मानसिक जाप साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच बना देता है। आप इनमें से किसी भी मंत्र का चयन कर सकते हैं:
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१. शिव पंचाक्षर मन्त्र (सर्वोत्तम एवं सर्वसुलभ):
॥ ॐ नमः शिवाय ॥लाभ: यह षडाक्षर/पंचाक्षर मन्त्र चारों वेदों का हृदय है। इसके नित्य जाप से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और अंतःकरण शुद्ध होता है।
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२. महामृत्युंजय मन्त्र (रोग नाश और आयु वृद्धि हेतु):
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥लाभ: भयंकर व्याधियों, ग्रह दोष, और अकाल मृत्यु को टालने के लिए रुद्राक्ष की माला से इसका अनुष्ठान करना चाहिए। -
३. रुद्र गायत्री मन्त्र (ज्ञान और शांति हेतु):
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥लाभ: मन की एकाग्रता, बौद्धिक विकास और आत्मिक शांति के लिए।
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४. शिव शरणागति मन्त्र (संकट निवारण हेतु):
ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ॥
८. निष्कर्ष: शिवत्व की प्राप्ति का मार्ग
श्रावण मास केवल जल चढ़ाने और उपवास रखने का कर्मकांड मात्र नहीं है। 'शिव' का अर्थ ही है— 'कल्याण'। यह महीना हमें सिखाता है कि जिस प्रकार शिव ने संसार को बचाने के लिए हलाहल विष पी लिया, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार रूपी विष को पीकर (नियंत्रित करके) समाज को प्रेम और करुणा का अमृत बांटना चाहिए।
जो मनुष्य श्रावण मास में निष्काम भाव से एक लोटा जल और एक बिल्वपत्र भगवान शिव को अर्पण करता है, उसके लिए इस ब्रह्मांड में कुछ भी अप्राप्य नहीं है। अतः पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और शुद्ध आचरण के साथ श्रावण मास के व्रतों और नियमों का पालन करना चाहिए।
॥ हर हर महादेव ॥
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
॥ ॐ नमः शिवाय ॥

