Class 9 Sanskrit Chapter 11 Aryabhata | हिन्दी अनुवाद एवं प्रश्नोत्तर (इरावती)

Sooraj Krishna Shastri
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आर्यभटः

(एकादशः पाठः) — इरावती (कक्षा ९)
  • १. पाठ-परिचयः एवं सारः (महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री आर्यभट का योगदान)
  • २. मूल-पाठः एवं हिन्दी अनुवादः (पैराग्राफ अनुसार)
  • ३. शब्द-कोषः (संस्कृत, हिन्दी एवं English शब्दार्थ)
  • ४. व्याकरण-बोधः एवं विशेष-तथ्यानि (पाई मान, वेधशाला एवं ग्रन्थ)
  • ५. अभ्यास-कार्यम् (पूर्णवाक्येन उत्तरत, रिक्तस्थानम्, सन्धिः, विलोमपदानि)

पाठ-परिचयः एवं सारः

हिन्दी सार: भारतवर्ष की अमूल्य निधि है ज्ञान-विज्ञान की सुदीर्घ परंपरा। इस परंपरा को संपोषित किया प्रबुद्ध मनीषियों ने। इन्हीं मनीषियों में अग्रगण्य थे आर्यभट। दशमलव पद्धति आदि के प्रारम्भिक प्रयोक्ता आर्यभट ने गणित को नई दिशा दी। इन्हें एवं इनके प्रवर्तित सिद्धांतों को तत्कालीन रूढ़िवादियों का विरोध झेलना पड़ा। वस्तुतः गणित को विज्ञान बनाने वाले तथा गणितीय गणना पद्धति के द्वारा आकाशीय पिंडों की गति का प्रवर्तन करने वाले ये प्रथम आचार्य थे। प्रस्तुत पाठ में आचार्य आर्यभट के इसी वैदुष्य का उद्घाटन किया गया है।
English Summary: India has an invaluable treasure of a long tradition of knowledge and science. Foremost among the enlightened scholars was Aryabhata. An early user of the decimal system, he gave a new direction to mathematics. He was the first scholar to establish mathematics as a formal science and calculate the movement of celestial bodies through mathematical methods. This lesson highlights his profound scholarship and scientific achievements.

मूल-पाठः सानुवादः (भाग १)

[१] पूर्वदिशायाम् उदेति सूर्यः पश्चिमदिशायां च अस्तं गच्छति इति दृश्यते हि लोके। परं न अनेन अवबोध्यमस्ति यत्सूर्यो गतिशील इति। सूर्योऽचलः पृथिवी तु चला या स्वकीये अक्षे घूर्णति इति साम्प्रतं सुस्थापितः सिद्धान्तः । सिद्धान्तोऽयं प्राथम्येन येन प्रवर्तितः, स आसीत् महान् गणितज्ञः ज्योतिर्विच्च आर्यभटः। पृथिवी स्थिरा वर्तते इति परम्परया प्रचलिता रूढिः तेन प्रत्यादिष्टा।
हिन्दी अनुवाद: संसार में यह देखा ही जाता है कि सूर्य पूर्व दिशा में उगता है और पश्चिम दिशा में अस्त होता है। परंतु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि सूर्य गतिशील है। 'सूर्य स्थिर है और पृथ्वी चलायमान है, जो अपनी धुरी पर घूमती है'— यह इस समय भली-भांति स्थापित सिद्धांत है। इस सिद्धांत को सर्वप्रथम जिसने प्रतिपादित किया, वे महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट थे। 'पृथ्वी स्थिर है'— परंपरा से चली आ रही इस रूढ़िवादी धारणा का उन्होंने खंडन किया।
[२] तेन उदाहृतं यद् गतिशीलायां नौकायाम् उपविष्टः मानवः नौकां स्थिरामनुभवति, अन्यान् च पदार्थान् गतिशीलान् अवगच्छति। एवमेव गतिशीलायां पृथिव्याम् अवस्थितः मानवः पृथिवीं स्थिरामनुभवति सूर्यादिग्रहान् च गतिशीलान् वेत्ति।
हिन्दी अनुवाद: उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस प्रकार चलती हुई नाव में बैठा हुआ मनुष्य नाव को स्थिर अनुभव करता है और अन्य पदार्थों (किनारे की वस्तुओं) को गतिशील समझता है; ठीक उसी प्रकार गतिशील पृथ्वी पर स्थित मनुष्य पृथ्वी को स्थिर अनुभव करता है और सूर्य आदि ग्रहों को गतिशील समझता है।

मूल-पाठः सानुवादः (भाग २)

[३] ४७६ तमे ख्रिस्ताब्दे (षट्सप्तत्यधिकचतुःशततमे वर्षे) आर्यभटः जन्म लब्धवानिति तेनैव विरचिते 'आर्यभटीयम्' इत्यस्मिन् ग्रन्थे उल्लिखितम्। ग्रन्थोऽयं तेन त्रयोविंशतितमे वयसि विरचितः। ऐतिहासिकस्रोतोभिः ज्ञायते यत् पाटलिपुत्रं निकषा आर्यभटस्य वेधशाला आसीत्। अनेन इदम् अनुमीयते यत् तस्य कर्मभूमिः पाटलिपुत्रमेव आसीत्।
हिन्दी अनुवाद: सन् 476 ईस्वी (476वें वर्ष) में आर्यभट ने जन्म लिया था— यह उन्हीं के द्वारा रचित 'आर्यभटीयम्' नामक ग्रंथ में उल्लिखित है। यह ग्रंथ उन्होंने 23 वर्ष की आयु में लिखा था। ऐतिहासिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि पाटलिपुत्र (पटना) के पास आर्यभट की वेधशाला (प्रयोगशाला) थी। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि उनकी कर्मभूमि पाटलिपुत्र ही थी।
[४] आर्यभटस्य योगदानं गणितज्योतिषेण सम्बद्धं वर्तते यत्र संख्यानाम् आकलनं महत्त्वम् आदधाति। आर्यभटः फलितज्योतिषशास्त्रे न विश्वसिति स्म। गणितीयपद्धत्या कृतम् आकलनमाधृत्य एव तेन प्रतिपादितं यद् ग्रहणे राहु-केतुनामकौ दानवौ न स्तः कारणम्। तत्र तु सूर्यचन्द्रपृथिवी इति त्रीणि एव कारणानि। सूर्य परितः भ्रमन्त्याः पृथिव्याः, चन्द्रस्य परिक्रमापथेन संयोगाद् ग्रहणं भवति। यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते तदा चन्द्रग्रहणं भवति। तथैव पृथ्वीसूर्ययोः मध्ये समागतस्य चन्द्रस्य छायापातेन सूर्यग्रहणं दृश्यते।
हिन्दी अनुवाद: आर्यभट का योगदान गणित और खगोलशास्त्र से संबद्ध है जहाँ संख्याओं की गणना विशेष महत्त्व रखती है। आर्यभट फलित ज्योतिष में विश्वास नहीं करते थे। गणितीय पद्धति से की गई गणना के आधार पर ही उन्होंने प्रतिपादित किया कि ग्रहण में राहु और केतु नामक राक्षस कारण नहीं हैं। वहाँ तो सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी— ये तीन ही कारण हैं। सूर्य के चारों ओर घूमती हुई पृथ्वी का चंद्रमा के परिक्रमा पथ से संयोग होने के कारण ग्रहण होता है। जब पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्रमा का प्रकाश रुक जाता है, तब चंद्रग्रहण होता है; वैसे ही पृथ्वी और सूर्य के बीच आए हुए चंद्रमा की छाया पड़ने से सूर्यग्रहण दिखाई देता है।
[५] समाजे नूतनानां विचाराणां स्वीकरणे प्रायः सामान्यजनाः काठिन्यमनुभवन्ति। भारतीयज्योतिःशास्त्रे तथैव आर्यभटस्यापि विरोधः अभवत्। तस्य सिद्धान्ताः उपेक्षिताः। स पण्डितम्मन्यानाम् उपहासपात्रं जातः। पुनरपि तस्य दृष्टिः कालातिगामिनी दृष्टा। आधुनिकैः वैज्ञानिकैः तस्मिन्, तस्य च सिद्धान्ते समादरः प्रकटितः। अस्मादेव कारणाद् अस्माकं प्रथमोपग्रहस्य नाम 'आर्यभट' इति कृतम्। वस्तुतः भारतीयायाः गणितपरम्परायाः अथ च विज्ञानपरम्परायाः असौ एकः शिखरपुरुषः आसीत्।
हिन्दी अनुवाद: समाज में नए विचारों को स्वीकार करने में प्रायः सामान्य लोग कठिनाई महसूस करते हैं। भारतीय ज्योतिषशास्त्र में उसी प्रकार आर्यभट का भी विरोध हुआ। उनके सिद्धांतों की उपेक्षा की गई। वे स्वयं को पंडित (विद्वान) मानने वालों के उपहास का पात्र बने। फिर भी उनकी दृष्टि समय को लांघने वाली (दूरदर्शी) सिद्ध हुई। आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा उनमें तथा उनके सिद्धांतों में आदर प्रकट किया गया। इसी कारण हमारे प्रथम उपग्रह का नाम 'आर्यभट' रखा गया। वास्तव में वे भारतीय गणित परंपरा और विज्ञान परंपरा के एक शिखर पुरुष (महान वैज्ञानिक) थे।

शब्द-कोषः (शब्दार्थाः)

संस्कृत शब्दः संस्कृत अर्थः हिन्दी अर्थः English
लोके संसारे / जगति संसार में In the world
अवबोध्यम् ज्ञातव्यम् / बोधनीयम् समझने योग्य / जानने योग्य Worth knowing
अचलः गतिहीनः / स्थिरः स्थिर / गतिहीन Immovable / Constant
चला गतिशीला / अस्थिरा गतिशील / चलायमान Moving / Unstable
अक्षे धूर्य्याम् / कीलके धुरी पर (अक्ष पर) On its axis
घूर्णति भ्रमति / चक्राकारेण गच्छति घूमती है Rotates / Spins
सुस्थापितः सम्यक् प्रकारेण स्थापितः भली-भांति स्थापित Well-established
प्राथम्येन सर्वप्रथमम् सर्वप्रथम / सबसे पहले Firstly / For the first time
ज्योतिर्विद् दैवज्ञः / खगोलशास्त्री ज्योतिषी / खगोलविद् Astronomer / Astrologer
रूढिः प्रसिद्धा परम्परा / प्रथा प्रचलित प्रथा / परंपरा Custom / Tradition
प्रत्यादिष्टा खण्डिता / निराकृता खंडन किया / निरस्त किया Refuted / Rejected
वयसि आयुषि / अवस्थायाम् आयु में / अवस्था में At the age of
वेधशाला नक्षत्र-ग्रह-परीक्षण-शाला ग्रह-नक्षत्रों को जानने की प्रयोगशाला Astronomical Observatory
आदधाति स्थापयति / धारयति रखता है / धारण करता है Places / Holds
भ्रमन्त्याः घूर्णमानायाः घूमती हुई की Of the rotating one
छायापातेन छायाकरणेन छाया पड़ने से By casting of shadow
अवरुध्यते रुद्धः भवति / बाधते रुक जाता है / बाधित होता है Is obstructed / blocked
विश्वसिति स्म विश्वासं करोति स्म विश्वास करता था Used to believe
विरोधः प्रतिरोधः / रोधनम् विरोध / रुकावट Opposition / Resistance
कालातिगामिनी समयम् अतिक्रान्ता समय को लांघने वाली (दूरदर्शी) Ahead of time / Visionary

व्याकरण-बोधः एवं विशेष-तथ्यानि

अत्र इदम् अवधेयम् (विशेष ज्ञान):

अश्मकाचार्यः: आर्यभटः 'अश्मकाचार्य' इति नाम्ना अपि प्रसिद्धः अस्ति।

पाई (π) मानम्: अनेन दशमलव-पद्धत्याः प्रयोगं कुर्वता दशमलव इत्यस्यानन्तरं चतुर्णाम् अङ्कान् यावत् (३.१४१६) पाई (π) इत्यस्य मानं निर्धारितम्।

आर्यभटीयम्: आर्यभटेन नवनवत्युत्तरचतुःशततमे (४९९ ख्रिष्टाब्दे) अस्य ग्रन्थस्य रचना कृता।

वेधशाला: ग्रहनक्षत्रादीनां गति-स्थितिविज्ञानाय यान्त्रिकविधिना यत्र गणना क्रियते सा वेधशाला कथ्यते (यथा- जन्तर मन्तर)।

प्रमुख भारतीय गणितज्ञाः ग्रन्थाश्च:

गणितज्ञाः: आचार्य लगधः, आर्यभटः, वराहमिहिरः, ब्रह्मगुप्तः, भास्कराचार्यः, रामानुजन् इत्यादयः।

प्रमुखाः ग्रन्थाः: आर्यभटीयम्, सौरसिद्धान्तः, बृहत्संहिता, लीलावती, पञ्चसिद्धान्तिका इत्यादयः।

अभ्यास-कार्यम् : पूर्णवाक्येन उत्तरत

क. कः सुस्थापितः सिद्धान्तः ?
उत्तरः सूर्यः अचलः, पृथिवी तु चला या स्वकीये अक्षे घूर्णति इति साम्प्रतं सुस्थापितः सिद्धान्तः अस्ति।
ख. चन्द्रग्रहणं कथं भवति ?
उत्तरः यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते तदा चन्द्रग्रहणं भवति।
ग. सूर्यग्रहणं कथं दृश्यते ?
उत्तरः पृथ्वीसूर्ययोः मध्ये समागतस्य चन्द्रस्य छायापातेन सूर्यग्रहणं दृश्यते।
घ. आर्यभटस्य विरोधः किमर्थमभवत् ?
उत्तरः समाजे नूतनानां विचाराणां स्वीकरणे सामान्यजनाः काठिन्यम् अनुभवन्ति, अतः रूढिवादीनां कारणात् आर्यभटस्य विरोधः अभवत्।
ङ. प्रथमोपग्रहस्य नाम 'आर्यभटः' इति कथं कृतम् ?
उत्तरः आधुनिकैः वैज्ञानिकैः आर्यभटे तस्य च सिद्धान्ते समादरः प्रकटितः, तस्य सम्मानार्थमेव प्रथमोपग्रहस्य नाम 'आर्यभटः' इति कृतम्।

अभ्यास-कार्यम् : रिक्तस्थानानि पूरयत

मञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत:

[तदा, पृथिवी, नौकाम्, चला, अस्तम्]

क. सूर्यः पूर्वदिशायाम् उदेति पश्चिमदिशायां च अस्तम् गच्छति।

ख. सूर्यः अचलः पृथिवी तु चला

ग. पृथिवी स्वकीये अक्षे घूर्णति।

घ. यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते तदा चन्द्रग्रहणं भवति।

ङ. नौकायाम् उपविष्टः मानवः नौकाम् स्थिरामनुभवति।

अभ्यास-कार्यम् : सन्धि-विच्छेदः एवं विलोमपदानि

१. सन्धिविच्छेदं कुरुत:

ग्रन्थोऽयम् = ग्रन्थः + अयम्

सूर्याचलः = सूर्यः + अचलः

तथैव = तथा + एव

कालातिगामिनी = काल + अतिगामिनी

प्रथमोपग्रहस्य = प्रथम + उपग्रहस्य

२. विपरीतार्थकपदानि (विलोमपदानि) लिखत:

क. उदयः → अस्तः

ख. अचलः → चलः

ग. अन्धकारः → प्रकाशः

घ. स्थिरः → गतिशीलः / अस्थिरः

ङ. समादरः → अनादरः / उपेक्षा

च. आकाशस्य → पातालस्य / पृथिव्याः

पाठस्य मुख्यसन्देशः

संदेशः — वैज्ञानिकदृष्टिकोणः सत्यस्य अन्वेषणाय अनिवार्यः अस्ति। प्राचीनरीतीनां कुरीतीनां च अन्धानुकरणं त्यक्त्वा वैज्ञानिकगणनानां आधारेण सत्यं स्वीकृत्य एव समाजः राष्ट्रं च उन्नतिं कर्तुं शक्नोति।

(सत्य की खोज के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अनिवार्य है। प्राचीन अंधविश्वासों और रूढ़ियों को त्यागकर वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सत्य को स्वीकार करने से ही समाज व राष्ट्र की प्रगति संभव है।)

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