Moksha Ki Talash: Kashi Mukti Bhawan Emotional Story of a Father and Son

Sooraj Krishna Shastri
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मोक्ष की तलाश: काशी के 'मुक्ति भवन' की एक हृदयविदारक सत्यकथा
सनातन धर्म में माता-पिता को साक्षात् तीर्थ कहा गया है। शास्त्रों का वचन है कि जिस घर में वृद्ध माता-पिता का सम्मान होता है, वहाँ स्वयं देवता निवास करते हैं। किंतु आज के इस भागदौड़ भरे युग में, भौतिकवाद और स्वार्थ ने मनुष्य की संवेदनाओं को इतना कुंद कर दिया है कि वह अपने जन्मदाताओं को ही बोझ समझने लगा है। यह लेख केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि आज के समाज का वह कड़वा सत्य है जो हर उस संतान की आत्मा को झकझोर देगा जो मोक्ष की तलाश तो तीर्थों में करता है, किंतु अपने घर के साक्षात् भगवान (माता-पिता) को वृद्धाश्रम या मृत्यु के मुख में छोड़ आता है। काशी के मुक्ति भवन की यह मार्मिक कथा हमें सिखाती है कि सच्चा मोक्ष कहाँ है।
१. मंगलाचरण: माता-पिता का ईश्वरीय स्वरूप
इस कथा को आरंभ करने से पूर्व महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित उस श्लोक का स्मरण करना आवश्यक है, जो माता-पिता की महिमा का बखान करता है:
पिता धर्मः पिता कर्म पिता हि परमं तपः ।
पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः ॥
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।
भावार्थ:
पिता ही धर्म है, पिता ही कर्म है और पिता ही सबसे बड़ा तप है। पिता के प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। माता को देवता के समान मानो, पिता को देवता के समान मानो। (किंतु जब यही देवतुल्य पिता वृद्ध और बीमार हो जाते हैं, तो संतान का मन कैसे बदल जाता है, यही इस कथा का मूल है।)
२. स्वार्थ का अंधकार और लाचारी की पराकाष्ठा
मैं अपने बीमार और वृद्ध पिता को काशी के 'मुक्ति भवन' ले जा रहा था। मेरे मन में उस समय कोई श्रद्धा या भक्ति नहीं थी, बल्कि एक ही उम्मीद और स्वार्थ छिपा था— शायद वहाँ जाकर उनका जल्दी देहांत हो जाए।
ऐसा नहीं था कि मैं कोई पैदाइशी बुरा इंसान था या मैं जानबूझकर वहाँ जाना चाहता था। लेकिन पिता की लगातार लंबी बीमारी, उनका बिस्तर पर पड़े रहना, उनकी बढ़ती कमज़ोरी और दवाइयों तथा इलाज का अंतहीन खर्च मुझे भीतर तक तोड़ चुका था। उनकी देखभाल में मैं अपनी सामर्थ्य और जमापूँजी से कहीं अधिक खर्च कर चुका था। रातों की नींद उड़ चुकी थी और अब मुझे लगने लगा था कि मैं यह सब और नहीं झेल पाऊँगा।
उसी समय मेरे एक घनिष्ठ मित्र ने मुझे काशी के 'मुक्ति भवन' (Mukti Bhawan) के बारे में बताया। उसने सलाह देते हुए कहा, “हिंदू मान्यता के अनुसार काशी में मृत्यु होने से मोक्ष प्राप्त होता है। मुक्ति भवन उन सबसे प्रसिद्ध और पवित्र स्थानों में से एक है, जहाँ लोग अपने जीवन के अंतिम दिन बिताने आते हैं। अगर तुम अपने पिता को वहाँ ले जाओगे, तो उनके कष्ट कटेंगे। तुम्हें भी इस रोज़-रोज़ की परेशानी से शांति मिलेगी और तुम्हारे पिता को भी मोक्ष प्राप्त होगा।”
३. काशी की वह अंतिम यात्रा और पिता का वात्सल्य
मित्र की वह बात मेरे स्वार्थी मन को जंच गई। और एक दिन, मैं अपने बूढ़े और असहाय पिता को लेकर ट्रेन में बैठ गया। ट्रेन की खिड़की के पास बैठे पिता बाहर देख रहे थे। उनके चेहरे पर बीमारी की थकान साफ़ झलक रही थी, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब-सी शांति और चमक थी।
उन्होंने अपनी कांपती आवाज़ में मुस्कुराकर पूछा, “बेटा, हम कहाँ जा रहे हैं?”
मैंने नज़रें चुराते हुए संक्षिप्त उत्तर दिया, “काशी।”
“काशी? अरे, मेरे महादेव! इस यात्रा की इच्छा तो मुझे न जाने कितने वर्षों से थी।” उनके चेहरे पर फैलती उस निश्छल खुशी ने मेरे पापी हृदय को चीर दिया। लेकिन मैंने अपने मन को पत्थर बनाए रखा और खिड़की के बाहर देखने लगा।
पूरे सफ़र में पिता बीते दिनों की यादों में खोए रहे। वे मुझे मेरे बचपन की कहानियाँ सुनाते रहे:
  • उन्होंने बताया कि बचपन में जब मुझे तेज़ टाइफाइड बुखार आया था, तो वे कई रातें अस्पताल में मेरे सिरहाने बिना सोए बैठे रहे थे।
  • उन्होंने याद दिलाया कि कैसे मेरी माँ ने मेरी स्कूल की फीस भरने के लिए अपने सुहाग के कंगन तक बेच दिए थे, पर मेरी पढ़ाई नहीं रुकने दी।
  • उन्होंने यह भी बताया कि मेरे बाल-हठ पर मुझे नई साइकिल दिलाने के लिए वे कैसे रात-रात भर ओवर-टाइम ऑटो-रिक्शा चलाते रहे थे।
मैं सब चुपचाप सुनता रहा। मेरा गला रुंधा हुआ था, और मेरे पास कहने के लिए बहुत कम शब्द थे। मेरे मन में यह ग्लानि उठ रही थी कि जिन पिता ने मेरी एक मुस्कान के लिए अपना जीवन गला दिया, मैं उन्हीं को मरने के लिए छोड़ने जा रहा हूँ।
४. 'मुक्ति भवन' का सन्नाटा और मौत का इंतज़ार
एक लंबी और बोझिल यात्रा के बाद हम वाराणसी (बनारस) पहुँचे और अंततः मुक्ति भवन के द्वार पर जा खड़े हुए। मैंने सोचा था कि वहाँ मौत जैसी भयावह खामोशी होगी, लोग रो रहे होंगे। लेकिन वहाँ जो मैंने देखा, वह बिल्कुल अलग था।
छोटे-छोटे कमरे, सफेद और उदास दीवारें, धीरे-धीरे घूमते पुराने पंखे। गलियारों में साधु-संत उन लोगों के लिए निरंतर राम-नाम और गीता का मंत्रोच्चार कर रहे थे, जो अपनी अंतिम घड़ियों की प्रतीक्षा कर रहे थे। वहाँ का वातावरण आध्यात्मिक तो था, किंतु उसमें एक गहरा विषाद (Melancholy) घुला था।
मैंने पिता को उनके कमरे में आराम से बिस्तर पर लिटा दिया। वे बहुत थक चुके थे। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “मैं बहुत थक गया हूँ, बेटा। थोड़ी देर सोने दो।” मैंने सिर हिला दिया। जैसे ही वे गहरी नींद में सो गए, मेरा स्वार्थ फिर जाग उठा। मैंने अपना बैग उठाया और दबे पाँव, चुपचाप उस कमरे से बाहर निकल पड़ा।
५. आत्मा को झकझोरने वाला वह दृश्य
बिना पीछे मुड़े तेज़ी से बाहर की ओर चलते हुए, अचानक मेरी नज़र एक आधे खुले कमरे पर पड़ी। अंदर एक वृद्ध व्यक्ति खिड़की के पास बैठा था। उसके कांपते हाथों में एक पुरानी, धुंधली सी तस्वीर थी—शायद उसकी दिवंगत पत्नी या उन बच्चों की जो उसे यहाँ छोड़ गए थे। वह बार-बार उस तस्वीर को चूमता और शून्य में देखकर हल्की मुस्कान बिखेर देता।
दूसरे कमरे में एक बुज़ुर्ग महिला आँखें बंद किए, हाथ में रुद्राक्ष की माला लिए भगवान का नाम जप रही थी। उसके पास कोई अपना नहीं था। लेकिन वह अकेली भी नहीं थी, उसकी अतीत की यादें उसके साथ थीं।
गलियारे के अंत में एक और दृश्य ने मेरे कदम रोक दिए। एक वृद्ध पिता बिस्तर पर लेटे थे और उनके पास एक युवक (उनका बेटा) उनका हाथ पकड़े बैठा था। वह बार-बार रोते हुए कह रहा था, “पिताजी… मैं यहीं हूँ। मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा, डरिए मत।” मुझे नहीं पता कि वे वृद्ध पिता उसकी आवाज़ सुन पा रहे थे या नहीं, लेकिन बेटे की आवाज़ में जो अगाध प्रेम था, वह साफ़ महसूस हो रहा था।
वहाँ मौजूद हर व्यक्ति अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। लेकिन मुझे गहराई से अहसास हुआ कि उनमें से अधिकांश मौत की नहीं, बल्कि किसी और चीज़ की प्रतीक्षा कर रहे थे:
  • किसी अपने के आने की प्रतीक्षा।
  • एक आख़िरी फ़ोन कॉल की।
  • बेटे के मुँह से निकले दो सांत्वना भरे शब्दों की।
  • या बेटी की उस मधुर पुकार की— “पिताजी…”
६. कर्मचारी के वे शब्द, जिन्होंने मेरा हृदय चीर दिया
तभी वहाँ काम करने वाले एक पुराने कर्मचारी ने मुझे वहाँ खड़ा देख लिया। वह मेरे पास आया और एक अत्यंत गहरी बात कह दी:
“साहब, यहाँ आने वाले ज़्यादातर लोग मौत से नहीं डरते। उन्हें सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की होती है कि उनके अपने, उनके खून के रिश्ते उन्हें भूल चुके हैं। दुनिया कहती है कि यहाँ मरने से मोक्ष मिलता है, लेकिन अपने बच्चों के बीच, उनके प्रेम और सम्मान के साथ घर पर मृत्यु पाने में... और यहाँ अकेले, लावारिसों की तरह मरने में बहुत बड़ा अंतर है।”
वह एक गहरी साँस लेकर आगे बोला, “यहाँ आने वाले कई लोग अपनी बीमारी से कम, और इस हृदयविदारक एहसास से ज़्यादा मर जाते हैं कि उनके बच्चों ने उन्हें यहाँ मरने के लिए छोड़ दिया है।”
उसकी ये बातें मेरे कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरीं। मैं भीतर तक हिल गया। मैंने चारों ओर देखा— कुछ आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं, मानो किसी के आने का इंतज़ार हो। कुछ आँखें आसमान की ओर थीं, मानो ईश्वर से पुकार रही हों। और कुछ आँखों में अब कोई उम्मीद नहीं बची थी, सिर्फ़ एक खोखला इंतज़ार था।
७. आत्मग्लानि और पिता की अंतिम इच्छा
अचानक मुझे अपने पिता का ख़याल आया। एक सिहरन मेरे शरीर में दौड़ गई। मैं अपना बैग वहीं छोड़कर दौड़ता हुआ वापस उनके कमरे में पहुँचा। वे पसीने से भीगे हुए बिस्तर पर बैठे थे। बहुत कमज़ोर और लाचार दिखाई दे रहे थे। और वे भी... वे भी उसी खुले दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे, जैसे कोई खोया हुआ बच्चा अपनी माँ को खोजता है।
जैसे ही उन्होंने मुझे हाँफते हुए दरवाज़े पर देखा, उन्होंने राहत की एक लंबी साँस ली। उनके सूखे होठों पर एक मुस्कान तैर गई। उसी क्षण मेरे मन में एक बिजली सी कौंधी— अगर मैं आज चला जाता, तो क्या कल मेरे पिता भी उसी दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए किसी का इंतज़ार करने वाले एक और चेहरे में नहीं बदल जाते?
उस पल, काशी का वह 'मुक्ति भवन' मुझे केवल एक ईंट-पत्थर की इमारत नहीं लगा। वह उन अभागे लोगों की मौन दुनिया लगी, जिन्होंने पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जी, अपना सब कुछ लुटा दिया, और अंत में केवल एक अंतिम स्पर्श, थोड़े-से प्रेम और अपनेपन के इंतज़ार में तड़पते रह गए।
मैं इन्हीं विचारों में खोया था कि पिता ने कांपते स्वर में पुकारा— “बेटा…” “जी, पिताजी?” “तुम… गए नहीं?” “मैं कहाँ जाता?” मेरे आँसू छलकने को बेताब थे।
उन्होंने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, “मुझे पता है… तुम मुझे यहाँ छोड़ने ही लाए थे। लेकिन मैं तुम्हें दोष नहीं देता। जब माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, तो कभी-कभी अपनी ही संतानों पर बोझ बन जाते हैं। शायद मैं भी तुम्हारे लिए बोझ बन गया हूँ।”
फिर उन्होंने आगे बढ़कर मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और बोले: “लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, बेटा… माता-पिता का सबसे बड़ा मोक्ष काशी में मरना नहीं है… उनके बच्चों के दिल से कभी न निकलना ही उनका सच्चा मोक्ष है। मुझसे नफ़रत मत करना, बेटा। मेरे जाने के बाद मेरे अंतिम संस्कार और सारे कर्मकांड विधिवत कर देना।”
उनकी हर एक बात मेरे हृदय को आरी की तरह चीर रही थी। फिर उन्होंने रुंधे गले से कहा, “ज़्यादा देर मत रुकना, बेटा। अगर जाना हो तो चले जाना… लेकिन जाने से पहले अपने पिता को एक बार गले लगा लेना… और एक प्यार दे देना। तुम्हें बचपन की तरह एक बार फिर बाँहों में भर लेने का मन कर रहा है।”
यह उनकी अंतिम इच्छा थी।
८. सच्चा मोक्ष: पश्चात्ताप के आँसू और नई शुरुआत
“पिताजी…” इतना कहकर मैं उनके सीने से लगकर फूट-फूटकर रो पड़ा। मेरी वर्षों की स्वार्थपरता, मेरे सारे हिसाब-किताब, मेरा सारा अहंकार उन आँसुओं में बह गया।
उस रात मैं मुक्ति भवन के उसी कमरे में, फ़र्श पर अपने पिता के बिस्तर के पास सोया। उनके सोते हुए, झुर्रियों भरे चेहरे को देखते-देखते मुझे जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई समझ में आई— मेरे जीवन की सबसे सुरक्षित जगह कभी इन्हीं के कंधे थे। बचपन में जब मुझे डर लगता था, तो यही मुझे अपनी बाँहों में उठा लेते थे। जब मैं गिर जाता था, तो यही संभालते थे। जब हार जाता था, तो यही मेरा हाथ पकड़कर मुझे दुनिया के सामने खड़ा कर देते थे। फिर आज मैं इन्हें इनके जीवन की अंतिम घड़ियों में अकेला कैसे छोड़ सकता था?
अगली सुबह होते ही मैंने घर लौटने के टिकट बुक कर लिए। जब हम जाने लगे, तो मुक्ति भवन के कर्मचारियों ने पिता की शांतिपूर्ण मृत्यु की कामना के लिए साधुओं को बुला लिया। मैंने उन्हें हाथ जोड़कर रोक दिया।
मैंने दृढ़ता से कहा, “अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। मोक्ष मेरे पिता को नहीं मिला है… मोक्ष तो मुझे मिला है।”
पिता ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा। “क्या मतलब है तुम्हारा, बेटा?”
मैंने उनका कांपता हुआ हाथ थाम लिया और कंधे पर बैग रखते हुए कहा, “चलिए, पिताजी… हम अपने घर चलते हैं। लेकिन पहले हम गंगा स्नान करेंगे और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करेंगे।”
उन्होंने मासूमियत से, एक बच्चे की तरह पूछा, “तो… मुझे यहाँ नहीं रहना पड़ेगा?”
मैं मुस्कुरा दिया। “आप क्यों रहेंगे? जिसे मुक्ति की ज़रूरत थी, वह आप नहीं थे… वह मेरा पापी मन था… जिसने अपने ही पिता को बोझ समझ लिया था। आज मेरा मन इस पाप से मुक्त हो गया है।”
पिता की आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उस क्षण, काशी के समस्त मंदिरों में बजने वाली घंटियों से भी अधिक पवित्र वह मौन आँसू था, जो उस वृद्ध पिता के चेहरे पर लुढ़क आया था। वह आँसू प्रेम, क्षमा और वात्सल्य का सर्वोच्च प्रतीक था।
निष्कर्ष: हर संतान के लिए एक संदेश
यह कहानी एक आईना है। मोक्ष किसी इमारत, शहर या नदी में नहीं है। माता-पिता का सच्चा मोक्ष उनके बच्चों के प्रेम, उनके स्पर्श और बुढ़ापे में उनके दिए गए सम्मान में छिपा है। जब तक आपके माता-पिता जीवित हैं, उनकी सेवा करें। क्योंकि जब वे चले जाते हैं, तो दुनिया का कोई भी 'मुक्ति भवन' या कोई भी तीर्थ उस खालीपन को नहीं भर सकता।
“मोक्ष की तलाश” सभी बच्चों और सभी माता-पिताओं को सादर समर्पित।
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