Class 8 Hindi Malhar Shabdakosh | मल्हार कक्षा 8 सम्पूर्ण शब्दकोश (कठिन शब्दार्थ)

Sooraj Krishna Shastri
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शब्दकोश (सम्पूर्ण)

मल्हार — कक्षा ८ (हिंदी)

यहाँ आपके लिए एक छोटा-सा शब्दकोश दिया गया है। इस शब्दकोश में वे शब्द हैं, जो विभिन्न पाठों में आए हैं और आपके लिए नए हो सकते हैं। किसी-किसी शब्द के कई अर्थ भी हो सकते हैं। पाठ के संदर्भ से जोड़कर आप यह अनुमान स्वयं लगाएँ कि कौन-सा अर्थ पाठ के लिए अधिक उपयुक्त है।

कहीं-कहीं शब्दों के अनेक समानार्थी भी दिए गए हैं। इससे आप प्रसंग के अनुसार अनुकूल शब्द का चयन करना सीख सकेंगे। यह शब्दकोश आपको शब्दों के न केवल सही अर्थ जानने में सहायता करेगा अपितु शब्दों की सही वर्तनी भी सिखाएगा।

शब्द का अर्थ देने से पहले मूल शब्द के बाद कोष्ठक में एक संकेताक्षर दिया गया है। इन संकेतों से हमें शब्दों की भाषा और व्याकरण संबंधी जानकारी मिलती है।

संकेताक्षर (Abbreviations)

अं. – अंग्रेज़ी
अ. – अव्यय
(अ.) – अरबी
अ.क्रि. – अकर्मक क्रिया
पु. – पुँलिंग
फा. – फारसी
वि. – विशेषण
सं. – संस्कृत
स.क्रि. – सकर्मक क्रिया
सर्व. – सर्वनाम
स्त्री. – स्त्रीलिंग

शब्दावली (अ - औ)

अटी [वि.सं. स्त्री.] − धोती की कमर के ऊपर की लपेट, गाँठ
अकर्मण्य [वि.सं.] – कर्म के अयोग्य, आलसी, निकम्मा, न करने के योग्य
अखण्ड [वि.सं.] – जिसका सिलसिला न टूटे, अविकल, संपूर्ण, पूरा, अटूट, बाधारहित
अग्नि [स्त्री.सं.] − आग, उष्णता, प्रकाश, गरमी, जलाने की क्रिया, सोना
अति [सं.] – अधिकता, सीमोल्लंघन
अतिथि [पु.सं.] – अचानक आया हुआ मेहमान, वह संन्यासी जो कहीं एक रात से अधिक न ठहरे
अनगिन [वि.] – अगणित, बेहिसाब, अनगिनत
अनुपात [पु.सं.] – सापेक्षिक संबंध, अनुसरण, तीन ज्ञात संख्याओं के आधार पर चौथी को निकालना
अपराध [पु.सं.] – दोष, गलती, पाप, जुर्म, दंड योग्य कर्म
अप्राप्य [वि.सं.] – न मिलने वाला, अलभ्य
अर्थी [वि.सं.] – चाह या गरज रखने वाला, धनी, प्रार्थी, वादी, सेवा करने वाला
अवरोहण [पु.सं.] – उतरना, नीचे आने की क्रिया
अवाक [वि.सं.] – स्तब्ध, मौन, चुप, दक्षिण की ओर, अधोमुख
अविश्वास [पु.सं.] – विश्वास का न होना, शंका, संदेह
अह [पु.] − गर्व, घमंड, 'अहम' का समासगत रूप
अहाता [पु.(अ.)] – घेरा, चहारदीवारी से घेरी हुई जगह, सूबा, प्रेसिडेंसी
आँगन [पु.] – चौक, घर के भीतर का सहन
आंतरिक [वि.सं.] – भीतरी, जिसका संबंध भीतरी बातों से हो, हार्दिक
आगंतुक [वि.सं.] – बिना बुलाए आने वाला, अचानक आने या होने वाला, अजनबी
आदर्श [पु.सं.] – नमूना, असल, व्याख्या, आईना, शीशा, मूल लेख
आपा [पु.] – सुध-बुध, अहंकार, अपना स्वरूप, गर्व, सत्ता
आरोहण [पु.सं.] – चढ़ना, सवार होना, ऊपर को जाना, सीढ़ी, अँखुआ फूटना, नृत्य आदि के लिए बना हुआ मंच
ईर्ष्या [स्त्री.सं.] – जलन, डाह, दूसरों की बढ़ती न देख सकना
उत्तराधिकारी [वि.सं.] – किसी के बाद उसकी संपत्ति पाने का हकदार, वारिस
उत्स [पु.सं.] – सोता, स्रोत, जलमय स्थान
उद्धार [पु.सं.] – मुक्ति, बाहर निकालना (विपत्ति, दुर्दशा आदि से), ऊपर उठाना, छुटकारा
उपभोग [पु.सं.] – भोगना, फलभोग, सुख, स्वाद लेना, व्यवहार
औरन / और [अ.वि.] – दूसरा, अधिक

शब्दावली (क - घ)

कदाचित [अ.सं.] – कभी, शायद
कन [पु.] – कण, बूँद, संक्षिप्त रूप
कल्लोल [पु.सं.] – कुछ ऊँची और आवाज करने वाली लहर, मौज, आनंद, क्रीड़ा
कसरत [स्त्री.(अ.)] – शरीर को पुष्ट एवं बलवान बनाने वाली क्रियाएँ, व्यायाम, वर्जिश, बहुलता
कालीन [पु.(अ.)] – गलीचा, सूत या ऊन के धागे से बना हुआ बिछौना
किरण [स्त्री.सं.] – रश्मि, ज्योति से प्रवाह रूप में निकलने वाली रेखा, अंशु, धूलिकण, सूर्य
कुटी [स्त्री.सं.] – झोपड़ी, कुटिया, मोड़, घुमाव
कुशा [स्त्री.सं.] – रस्सी, कड़ी और नुकीली पत्तियों वाली एक घास जो यज्ञ, पूजन आदि धर्म कृत्यों की आवश्यक सामग्री है।
खजाना [पु.फा.] – भंडार, कोश, राजस्व, रूपया, सोना-चाँदी रखने का स्थान
ख़ाक [स्त्री.फा.] − धूल, मिट्टी, कुछ नहीं, तुच्छ, छोटा
खाट [स्त्री.] − चारपाई, खटिया
खानि [स्त्री.सं.] − खान, स्रोत, भंडार, वह जगह जहाँ से धातु कोयला आदि खोदकर या पत्थर की सिलें तोड़कर निकाली जाए
खीझ [स्त्री.] − खीझने का भाव, झुंझलाहट, कुढ़न, गुस्सा
खोय (खोना) [स.क्रि.] − गँवाना, अपनी चीज कहीं भूल या छोड़ आना
गज [पु.फा.] − लंबाई का एक मान, 36 इंच
गण्य [वि.सं.] – गणनीय – गिनने लायक, मान्य, लिहाज करने योग्य
गति [स्त्री.सं.] – चाल, गमन, रफ्तार, हरकत, प्रवेश, जाना, दशा, हालत
गर्वित [वि.सं.] – गर्वयुक्त, घमंडी
गुमसुम [वि.] – चुप और निश्चेष्ट, स्तब्ध होना
गोविंद [पु.सं.] – गोपालक, कृष्ण, बृहस्पति
घाटी [स्त्री.] – दो पहाड़ों के बीच की नीची जमीन, पहाड़ का ढाल, मैदान, दर्रा
घृणा [स्त्री.सं.] – घिन, नफरत, दया, करुणा

शब्दावली (च - ड)

चर्राना [अ.क्रि.] – खाल में खुश्की से तनाव या हलका दर्द होना, चर-चर करके टूटना, प्रबल इच्छा होना
चुग्गा [पु.] – चिड़ियों के चुगने के लिए डाली गई चीज, वह चारा जो चिड़िया चोंच से उठाकर बच्चे के मुँह में दे
चुटीला [वि.] – जो चोट खाए हो, चोट करने वाला, जख्मी, चोटी का या सबसे बढ़िया
छज्जा [पु.] – छत का दीवार के बाहर निकला हुआ भाग, बारजा, धूप से बचने के लिए
छावनी [स्त्री.] – वह स्थान जहाँ सेना रखी जाए, शिविर, पड़ाव
ज़माना [पु.(अ.)] – काल, युग, अरसा, अवधि, बहुत समय, दुनिया, संसार
ज़मींदार [पु.फा.] – जमीन का मालिक, किसान, काश्तकार
जावित्री [स्त्री.] – जायफल का छिलका जो मसाले और दवा के रूप में काम में लाया जाता है।
जोश [पु.फा.] – उत्साह, आवेश, उबाल, उफान, गरमी
झलना [स.क्रि.] – पंखा आदि हिलाकर हवा करना, हवा करने के लिए हिलाना
झालर [स्त्री.] – लटकने वाला हासिया, किनारा, एक तरह का घंटा या घड़ियाल
टोकरी [स्त्री.] – घास, फल, तरकारी आदि रखने का बाँस या झाऊ आदि का बना गोला, गहरा पात्र, खँचिया
ठिठक [अ.क्रि.] – चलते-चलते सहसा रुक जाना, बिल्कुल स्थिर हो जाना
ठूँसना [स.क्रि.] – दबा-दबाकर भरना, कसकर रखना
डेरा [पु.] – टिकाव, पड़ाव, ठहरने के लिए, फैलाया हुआ सामान, रहने की जगह, घर, मकान
डैना [पु.] – पंख, पर, नाव खेने का डंडा

शब्दावली (त - फ)

तकलीफ [स्त्री.(अ.)] – दुःख, कष्ट, क्लेश
तज − दारचीनी की जाति का एक वृक्ष जिसकी छाल दवा के काम आती है (इसके पत्ते को तेजपत्ता कहते हैं)
तप [पु.सं.] – तपस्या, ताप, दाह, सूर्य, ग्रीष्म ऋतु
तर [वि.फा.] – ठंढा, ठंढक पैदा करने वाला, आर्द्र, अत्यंत सिक्त
तरुण [वि.सं.] – युवा, सोलह वर्ष से ऊपर की अवस्था वाला
तहवाँ [अ.] – वहाँ
तार [पु.] – वह तार जिसके द्वारा बिजली की शक्ति से समाचार भेजे जाते हैं, तार द्वारा भेजी हुई खबर
तिनककर / तुनकना [अ.क्रि.] – छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाना
त्रिभुवन [पु.सं.] – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल – इन तीनों भुवनों का समाहार
थिगली [स्त्री.] – छेद बंद करने के लिए टाँका गया कपड़े, पैबंद, चमड़े आदि का टुकड़ा, चकती
थोथा [वि.] – भीतर से खाली, खोखला, निकम्मा, निःसार
दक्ष [वि.सं.] – दक्ष संहिता के निर्माता मुनि, सती के पिता, निपुण, कुशल, माहिर, जिसमें किसी विषय को तत्काल समझने तथा कोई कार्य शीघ्र करने की शक्ति हो
दालचीनी [स्त्री.] – दारचीनी, एक प्रकार का तज जिसका छिलका दवा और मसाले के काम आता है।
दीप्ति [स्त्री.सं.] – चमक, कांति, प्रभा, ज्ञान का प्रकाश, छटा, ज्ञान की अभिव्यक्ति
दोऊ [वि.] – दोनों
धन-मद [वि.पु.] – धन का गर्व
धमा-चौकड़ी [स्त्री.] – उछल-कूद, कूद-फाँद, ऊधम
धर्मशाला [स्त्री.सं.] – वह स्थान जहाँ धर्मार्थ अन्नादि बँटता हो, यात्रियों के लिए निःशुल्क ठहरने के लिए बनवाया हुआ स्थान
धूम [पु.सं.] – धुआँ, कुहरा, बादल, मकान बनाने के लिए तैयार किया गया स्थान
नकद [पु.(अ.)] – वह धन जो सिक्कों के रूप में हो, वह रकम जो फौरन अदा की जाए
नक्षत्र [पु.सं.] – तारा, अश्वनी, रोहिणी, चित्रा, स्वाती, विशाखा
नगर [पु.सं.] – शहर, कस्बे से बड़ी और समृद्ध बस्ती जिसमें अनेक जातियों और पेशों के लोग बसते हों
नभ [पु.सं.] – आकाश, सावन का महीना
निंदक [वि.सं.] – निंदा, बदगोई करने वाला, किसी के दोष का वर्णन करने वाला
नियरे [अ.] – निकट, पास
निरीक्षण [पु.सं.] – गौर से देखना, जाँच करना, देखरेख करना, आशा
निर्झर [पु.सं.] – झरना, प्रपात, हाथी, भूसे की आग
निर्दयी [वि.सं.] – दयारहित, निष्ठुर, कठोर हृदय वाला, प्रचंड, उग्र
निर्मल [वि.सं.] – स्वच्छ, शुद्ध, पवित्र, दोषों से रहित
निष्फल [वि.सं.] – जिससे कुछ अर्थ न सिद्ध हो, बेकार, जिसका कुछ फल ना हो
नुक्कड़ [पु.] – मोड़, छोर, निकला हुआ कोना, नाका, नोंक
नेपथ्य [पु.सं.] – रंगमंच के परदे के पीछे की वह जगह जहाँ कलाकार की वेश रचना की जाती है, वेश-भूषा
पंडे / पंडा [पु.] – तीर्थ, मंदिर या घाट पर धर्मकृत्य कराने वाला, तीर्थ का पुजारी, रसोइया
पंथी [पु.] – यात्री, बटोही, किसी मत को मानने वाला
पना [पु.] – पन्ना, अपने से पके या आग में पकाए हुए आम, इमली आदि के रस या गूदे से तैयार किया जाने वाला एक प्रकार का पेय पदार्थ
परमानंद [पु.सं.] – उत्तम आनंद, उत्तम आनंदरूप परमात्मा
परवाना [पु.फा.] – पतिंगा, पंखी, आज्ञापत्र, नियुक्ति पत्र
परिधि [स्त्री.सं.] – लकड़ी आदि का घेरा या बाड़ा, परिवेश, वृत्त बनाने वाली गोल रेखा, पहिये का घेरा
पलंग [पु.] – बड़ी और बढ़िया चारपाई, अधिक लंबी-चौड़ी और सुंदर चारपाई
पश्चाताप [अ.सं.] – पछतावा, कोई अनुचित कार्य करने के बाद में उसके लिए दुःखी होना
पसीजा–पसीजना [अ.क्रि.] – दया से आर्द्र होना, खिन्न होना
पाँय [पु.] – पैर, चरण
पाट [पु.सं.] – विस्तार, फैलाव, चौड़ाई, रेशम, वस्त्र, सिंहासन, पत्थर की पटिया, पीढ़ा, चक्की के दो भागों में से कोई एक
पारायण [पु.सं.] – किसी ग्रंथ का आदि से अंत [आद्यंत] पाठ, संपूर्णता, पार जाना
पावन [वि.सं.] − पवित्र, शुद्ध, शुद्ध करने वाला
प्रबंध [पु.सं.] − व्यवस्था, आयोजन, ग्रंथ, कथा आदि की रचना
प्रेरणा [स्त्री.सं.] – किसी को किसी कार्य में प्रकृत करने की क्रिया, उकसाने की क्रिया, फेंकना, भेजना
फाहा [पु.] − घी आदि में तर की हुई रुई या कपड़ा, मरहम चुपड़ी हुई पट्टी, इत्र

शब्दावली (ब - व)

बंधु [पु.] − भाई, मित्र, स्वजन, आत्मीय
बखेड़ा [पु.] − झंझट, झगड़ा, परेशानी, टंटा, कठिनाई
बधिक [पु.] − बहेलिया, व्याध, वध करने वाला, जल्लाद
बर्रे [पु.] − ततैया, भिड़, सरसों के आकार का एक काँटेदार पौधा जिसमें केसरिया रंग के फूल लगते हैं और बीज तेलहन के काम आता है
बलिहारी [स्त्री.] − निछावर होना, कुर्बान जाना
बहुतेरा [वि.] − बहुत-सा, अनेक
बानी-वाणी [स्त्री.सं.] − वचन, सार्थक शब्द, स्वर, जीभ, प्रशंसा
बिछायत [स्त्री.] − बिछाने की चीज, बिछावन, बिछौना
ब्रह्मांड [पु.सं.] − विश्व गोलक, सम्पूर्ण विश्व, खोपड़ी
भट्टी [स्त्री.] − खास कामों के लिए बना हुआ बड़ा चूल्हा
भाड़ [पु.] − भड़भूँजे की भट्टी जिसमें बालू गरम कर वह दाना भूनता है
भावना [स्त्री.सं.] − चिंतन, खयाल, कल्पना, इच्छा, ध्यान, स्मरण, उत्पादन
भावै [अ.] − मन में आए, जी চাইলে तो
भू [स्त्री.सं.] − भूमि, धरती, जमीन, स्थान, पदार्थ, एक का संकेत
भोगी [वि.सं.] − भोग करने वाला, भोग-विलास में रत, कुंडलीयक्त
मचलना [अ.क्रि.] − किसी चीज को लेने या देने का हठ पकड़ लेना, किसी चीज के लिए रोना-धोना
मठ [पु.सं.] − साधु-संन्यासियों के रहने का स्थान, आश्रम, देवालय
मनोरथ [पु.सं.] − मन की कामना, अभिलाषा
मर्यादा [स्त्री.सं.] – सीमा, परंपरा आदि द्वारा निर्धारित सीमा, अवधि, नदी, समुद्र का किनारा, सदाचार, प्रतिष्ठा
मलमल [स्त्री.] − भारत का एक बारीक, सफेद सूती कपड़ा जो बहुत पुराने जमाने से प्रसिद्ध था
मिष्ट [वि.सं.] − मीठा, स्वादिष्ट, तर, मिठास, मिठाई
मुक्त [वि.सं.] − बंधन रहित, खुला हुआ, मोक्ष प्राप्त, छूटा हुआ, फेंका हुआ
मेघ [पु.सं.] − बादल, बरसने वाला बादल, समूह, छः मुख्य रागों में से एक, मोथा
रूठना [अ.क्रि.] − नाराज होना, अप्रसन्न
लज्जित [वि.सं.] − शर्मिंदा, लज्जायुक्त, लजाया हुआ
लासानी [स्त्री. वि.] − बेजोड़, जिसका सानी न हो
लीन [वि.सं.] − विलीन, ध्यानमग्न, तन्मय, तत्पर, छिपा हुआ, पिघला हुआ
वल्ली [स्त्री.सं.] − लता, बेल, जमीन या किसी आधार पर फैलने वाला पौधा
विचरण [पु.सं.] − घूमना-फिरना, भ्रमण करना, पर्यटन, चलना
विजातीय [वि.सं.] – भिन्न जाति, दूसरी जाति का, वर्ग का
विदित [पु.सं.] − अवगत, जाना हुआ, स्वीकृत, सूचना, विद्वान, कवि, प्रसिद्धि, लाभ, प्राप्ति
विमुख [वि.सं.] − वंचित, हताश, मुखहीन, विरत, उदासीन, बहिर्मुख
विराट [वि.सं.] − बहुत बड़ा, विश्व, ब्रह्मा, मत्स्य देश का राजा
विलक्षण [वि.सं.] − असाधारण, अलौकिक, भिन्न चिह्नों वाला
वृद्धाकाल [पु.वि.सं.] − बुढ़ापा
वैद्य [वि.सं.] − आयुर्वेद का ज्ञाता, चिकित्सक, विद्वान, वेद-संबंधी
वैराग्य [पु.सं.] − विषयवासना और संसारिक संबंधों से मन उचट जाना, उदासीनता, रंग बदलना

शब्दावली (श - ह)

शंख [पु.वि.] − सौ पद्म की संख्या, सौ पद्म, समुद्र में पैदा होने वाले एक जंतु का खोल या घर जो पत्थर-सा कड़ा और सफेद होता है
शिखर [पु.सं.] – पर्वताग्र, पहाड़ का सबसे ऊँचा भाग, मकान का सबसे ऊँचा हिस्सा, मुंडेर, कलश, गुंबद, वृक्षों का सबसे ऊँचा हिस्सा
शिल्प [पु.सं.] − कारीगरी, दक्षता, हुनर, हस्तकर्म, रूप, आकृति, निर्माण, सृष्टि, अनुष्ठान
संख्यातीत [वि.सं.] − अगणित, बेशुमार
संग [पु.सं.] − साथ, साथ होना, योग, मिलन
संगति [स्त्री.सं.] − मिलन, योग सभा, समाज, साथ, मोक्ष
संदूक [पु.(अ.)] − लकड़ी या लोहे का बकस जो कपड़े आदि रखने के काम आता है
संस्कृति [स्त्री.] − आचरणगत परंपरा, सभ्यता का वह स्वरूप जो आध्यात्मिक एवं मानसिक वैशिष्टय का द्योतक होता है, सजावट
सकपकाकर [स्त्री.] − हिचककर, घबराकर
सराय [स्त्री.फा.] − धर्मशाला, मुसाफिरखाना, घर, जमीन के नीचे का तल
सर्वांगीण [वि.सं.] – सब वेदांगों से संबंध रखने वाला, सब अंगों में व्याप्त होने वाला
सर्वोपरि [अ.सं.] – सबसे ऊपर या बढ़कर
सलवट [स्त्री.] − सिलवट, शिकन, सिकुड़न
साँच [वि.] − सच्ची बात, सत्य, ठीक
साधु [पु.वि.सं.] − सच्चा या नेक आदमी, संत, मुनि, सदाचारी
सार [पु.वि.सं.] − सारांश, यथार्थ बात, मूल भाग
सीतल / शीतल [वि.सं.] − ठंढा, शांत, संतुष्ट, आनंदित, मृदु, सौम्य
सुकुमार [वि.सं.] − कोमल, बहुत नाजुक, साँवा, ईख का एक भेद
सुभाय [पु.] − स्वभाव, आदत, अपनी अवस्था, मिजाज, सहज प्रकृति
सूप [पु.] − अनाज पछोरने का बाँस के छिलके या सींक आदि का बना हुआ पात्र, छाज
सृष्टि [स्त्री.सं.] − जगत, संसार, परित्याग, निर्माण, निर्मित
सौरभ [पु.वि.सं.] − खुशबूदार, सुगंधित, आम, धनिया, केसर
स्वप्न [पु.सं.] − सपना, ख्वाब, ऊँची कल्पना, निद्रा, कोई महत्वपूर्ण कार्य करने का विचार
स्वाधीन [वि.सं.] – स्वतंत्र, स्वच्छंद, जो अपने ही अधीन हो, दूसरे के नहीं, आजाद
स्वार्थ [पु.सं.] − अपना मतलब, अपना धन, अपना लाभ, गरज, प्रयोजन
हर्ज [पु.(अ.)] − हरज, हानि, क्षति, काम में होने वाली रुकावट, देर, समय-नाश

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