तरुण के स्वप्न (सम्पूर्ण अभ्यास-कार्य)
- १. पाठ का सारांश & लेखक-परिचय (नेताजी सुभाषचंद्र बोस का ओजस्वी भाषण)
- २. मेरी समझ से & मिलान करें (MCQs, पंक्तियों एवं स्वतंत्रता सेनानियों का मिलान)
- ३. सोच-विचार & पंक्तियों पर चर्चा (विस्तृत वैचारिक प्रश्नोत्तर)
- ४. अनुमान और कल्पना (संपूर्ण) (युवाओं व समाज से जुड़े सभी उत्तर)
- ५. भाषा की बात (विशेषण-विशेष्य एवं विपरीतार्थक शब्द)
- ६. नारी सशक्तिकरण, नारे & झरोखे से (निराला जी की कविता सहित)
पाठ का सारांश एवं लेखक-परिचय
✦ पाठ का सारांश ('तरुण के स्वप्न')
प्रस्तुत पाठ 'तरुण के स्वप्न' २९ दिसंबर १९२९ को मिदनापुर जिला युवक-सम्मेलन में नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा युवाओं (तरुणों) को संबोधित किया गया एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक भाषण है। इसमें नेताजी एक सर्वांगीण स्वाधीन और संपन्न समाज का स्वप्न देखते हैं। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ व्यक्ति हर प्रकार के दबाव से मुक्त हो, जातिभेद न हो, स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार मिलें, और शिक्षा व उन्नति के समान अवसर उपलब्ध हों। इस आदर्श समाज में आलसी और अकर्मण्य व्यक्तियों के लिए कोई स्थान नहीं होगा, बल्कि श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी। नेताजी युवाओं का आह्वान करते हैं कि वे इस अखंड सत्य और महान स्वप्न को अपनाएँ तथा इसके लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहें।
✦ लेखक-परिचय (नेताजी सुभाषचंद्र बोस)
सुभाषचंद्र बोस (१८९७-१९४५): भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी का जन्म कटक (ओड़िशा) में हुआ था। उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त कराना था। उन्होंने 'आजाद हिंद फौज' का नेतृत्व कर अंग्रेज़ों को कड़ी चुनौती दी और 'दिल्ली चलो' तथा 'जय हिंद' जैसे अमर नारे दिए। उनका नारा "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा" आज भी युवाओं में जोश भर देता है। उनकी चर्चित पुस्तक का नाम 'द इंडियन स्ट्रगल' है।
मेरी समझ से एवं पंक्तियों का मिलान
✦ मिलकर करें मिलान (वाक्य और उनका भाव)
| पाठ की पंक्तियाँ (स्तंभ 1) | भाव / विचार (स्तंभ 2) |
|---|---|
| १. "इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं..." | हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं। |
| २. "जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।" | जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा। |
| ३. "उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।" | समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो। |
पंक्तियों पर चर्चा एवं सोच-विचार
✦ पंक्तियों पर चर्चा
(क) "उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।"
अर्थ: नेताजी एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ अमीरी और गरीबी की गहरी खाई न हो। सभी को आर्थिक रूप से समान और न्यायपूर्ण जीवन जीने का अधिकार हो।
(ख) "वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।"
अर्थ: देशबंधु चित्तरंजन दास जी ने जो एक स्वाधीन भारत का सपना देखा था, वही सपना उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत और खुशी (आनंद) का स्रोत बन गया था।
(ग) "उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।"
अर्थ: व्यक्ति को मानसिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक—हर प्रकार की रूढ़ियों और बेड़ियों से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए, ताकि वह अपना सर्वांगीण विकास कर सके।
✦ सोच-विचार के लिए
(क) नेताजी ने किस प्रकार के राष्ट्र निर्माण का स्वप्न देखा था?
उत्तर: नेताजी ने एक सर्वांगीण स्वाधीन और संपन्न राष्ट्र का स्वप्न देखा था, जिसमें जातिभेद न हो, स्त्रियों को समान अधिकार मिलें, और सभी को शिक्षा व उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों।
(ख) नेताजी ने किस लक्ष्य की प्राप्ति को अपने जीवन की सार्थकता माना?
उत्तर: इस अखंड सत्य (स्वतंत्रता और आदर्श समाज) की प्रतिष्ठा के लिए अपना सर्वस्व त्याग करने और प्राणों की आहुति देने को ही उन्होंने जीवन की सच्ची सार्थकता माना।
(ग) "आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा" ऐसा क्यों कहा?
उत्तर: क्योंकि एक आदर्श और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण केवल कठोर परिश्रम से ही संभव है। आलसी लोग न तो स्वयं का विकास कर सकते हैं और न ही राष्ट्र के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
(घ) नेताजी के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आज की युवा पीढ़ी क्या कर सकती है?
उत्तर: आज की युवा पीढ़ी जाति-धर्म के भेदभाव को मिटाकर, नारी-सम्मान सुनिश्चित करके, और भ्रष्टाचार-मुक्त समाज बनाकर देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
अनुमान और कल्पना से (विस्तृत प्रश्नोत्तर)
भाषा की बात एवं स्वतंत्रता सेनानियों का मिलान
✦ भाषा की बात: विशेषण और विशेष्य (विपरीतार्थक)
(क) भाषण से ढूँढकर विशेषता (Adjectives) लिखिए:
• सत्य ➔ अखंड सत्य
• समाज ➔ स्वदेशी समाज / सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज
• राष्ट्र ➔ स्वाधीन राष्ट्र / आदर्श राष्ट्र
• जीवन ➔ क्षुद्र जीवन
• शक्ति ➔ असीम शक्ति
• आनंद ➔ अपार आनंद
(ख) विपरीतार्थक (विलोम) शब्दों का सही मिलान:
१. स्वीकार ➔ अस्वीकार
२. सार्थक ➔ निरर्थक
३. विषमता ➔ समानता
४. क्षुद्र ➔ विशाल / वृहत / विराट / महान
५. संपन्न ➔ विपन्न
६. अकर्मण्य ➔ कर्मण्य / कर्मठ
७. मरण ➔ जीवन
✦ स्वतंत्रता सेनानियों के तथ्यों का सही मिलान
| स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित तथ्य (स्तंभ 1) | सेनानी का नाम (स्तंभ 2) |
|---|---|
| १. 8 अप्रैल, 1929 को 'सेंट्रल असेंबली' में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी, 'शहीद-ए-आज़म'। | भगत सिंह |
| २. 'स्वराज पार्टी' के संस्थापकों में से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु। | चित्तरंजन दास |
| ३. जेल में 63वें दिन भूख हड़ताल से देहांत। | जतिन दास |
| ४. इनके जन्मदिवस पर 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' मनाया जाता है। | महात्मा गांधी |
| ५. नर्मदा नदी के तट पर इनकी 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' स्थापित है। | सरदार वल्लभभाई पटेल |
| ६. "मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।" | चंद्रशेखर आजाद |
नारे, स्त्री सशक्तिकरण एवं झरोखे से
✦ प्रसिद्ध नारे और स्वतंत्रता सेनानी
• "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।" ➔ नेताजी सुभाषचंद्र बोस
• "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।" ➔ बाल गंगाधर तिलक
• "करो या मरो।" ➔ महात्मा गांधी
• "मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा।" ➔ चंद्रशेखर आजाद
• "इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।" ➔ भगत सिंह
• "पूर्ण स्वराज।" ➔ जवाहरलाल नेहरू
✦ स्त्री सशक्तिकरण
(क) वर्तमान में स्त्रियों को मिले विशेषाधिकार: आज भारत में महिलाओं को पंचायती राज और स्थानीय निकायों में आरक्षण, नौकरियों में विशेष छूट, मुफ्त शिक्षा योजनाएँ (जैसे 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'), और संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त हैं।
(ख) आजाद हिंद फौज की महिला टुकड़ी: नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा बनाई गई आजाद हिंद फौज की महिला टुकड़ी का नाम 'रानी झाँसी रेजिमेंट' (Rani of Jhansi Regiment) था। इसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया था। इस टुकड़ी की भूमिका युद्ध के मोर्चे पर लड़ना और घायलों की चिकित्सा करना था।
✦ झरोखे से: गृह-उद्योग पर नेताजी का पत्र
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने मांडले जेल से श्री अनिलचंद्र विश्वास को पत्र लिखकर गृह और कुटीर उद्योगों (जैसे- मिट्टी के खिलौने और सीप के बटन बनाना) का समर्थन किया था। उनका मानना था कि इन कम खर्च वाले उद्योगों से गाँव की गरीब महिलाएँ और पुरुष अपने खाली समय में काम करके अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं और देश आत्मनिर्भर बन सकता है।
पढ़ने के लिए — भारति, जय, विजय करे!
कनक-शस्य-कमल धरे!
लंका पदतल शतदल
गर्जितोर्मि सागर-जल,
धोता-शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे।
तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!

