वृत् धातु रूप - १० लकार, अर्थ एवं व्याकरण | Vrut (Vrt) Dhatu Roop in Sanskrit
By -Sooraj Krishna Shastri
अगस्त 02, 2026
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वृत् धातु रूप - १० लकार, अर्थ एवं व्याकरण | Vrut (Vrt) Dhatu Roop in Sanskrit
आत्मनेपदी 'वृत्' धातु (होना / रहना / वर्ताव करना)
भ्वादि गण की यह धातु संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली धातुओं में से एक है। इसके भविष्यत् काल (लृट्/लुट्) के रूपों में पाणिनि का एक विशेष नियम लागू होता है, जिसे समझना अत्यंत आवश्यक है।
💡 "वृद्भ्यः स्यसनोः" का रहस्य (V.V.Imp Rule)
पाणिनीय सूत्र 'वृद्भ्यः स्यसनोः' (१.३.९२) के अनुसार वृत्, वृध्, शृध् और स्यन्द् धातुओं से भविष्यत् काल (लृट्, लुट्, लृङ्) में विकल्प से परस्मैपद भी होता है।
• अतः लृट् लकार में 'वर्तिष्यते' (आत्मनेपद) के साथ-साथ 'वर्त्स्यति' (परस्मैपद) रूप भी शुद्ध माना जाता है। यहाँ तालिकाओं में सरलता के लिए मुख्य आत्मनेपदी रूप दिए गए हैं।
१. लट् लकार (वर्तमान काल / Present Tense)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
वर्तते
वर्तेते
वर्तन्ते
मध्यम पुरुष
वर्तसे
वर्तेथे
वर्तध्वे
उत्तम पुरुष
वर्ते
वर्तावहे
वर्तामहे
२. लृट् लकार (सामान्य भविष्यत् / Future Tense)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
वर्तिष्यते
वर्तिष्येते
वर्तिष्यन्ते
मध्यम पुरुष
वर्तिष्यसे
वर्तिष्येथे
वर्तिष्यध्वे
उत्तम पुरुष
वर्तिष्ये
वर्तिष्यावहे
वर्तिष्यामहे
💡 विशेष (लृट्): उपर्युक्त सूत्र 'वृद्भ्यः स्यसनोः' के कारण परस्मैपद में इसके रूप अनिट् होकर वर्त्स्यति, वर्त्स्यतः, वर्त्स्यन्ति (पठिष्यति के समान) भी बनते हैं। साहित्य में 'वर्त्स्यति' का प्रयोग बहुत होता है।
३. लोट् लकार (आज्ञा या प्रार्थना / Imperative Mood)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
वर्तताम्
वर्तेताम्
वर्तन्ताम्
मध्यम पुरुष
वर्तस्व
वर्तेथाम्
वर्तध्वम्
उत्तम पुरुष
वर्तै
वर्तावहै
वर्तामहै
४. लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल / Past Tense)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
अवर्तत
अवर्तेताम्
अवर्तन्त
मध्यम पुरुष
अवर्तथाः
अवर्तेथाम्
अवर्तध्वम्
उत्तम पुरुष
अवर्ते
अवर्तावहि
अवर्तामहि
५. विधिलिङ् लकार (चाहिए अर्थ में / Potential Mood)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
वर्तेत
वर्तेयाताम्
वर्तेरन्
मध्यम पुरुष
वर्तेथाः
वर्तेयाथाम्
वर्तेध्वम्
उत्तम पुरुष
वर्तेय
वर्तेवहि
वर्तेमहि
६. लिट् लकार (परोक्ष भूतकाल / Unseen Past)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
ववृते
ववृताते
ववृतिरे
मध्यम पुरुष
ववृतिषे
ववृताथे
ववृतिध्वे / ववृतिढ्वे
उत्तम पुरुष
ववृते
ववृतिवहे
ववृतिमहे
💡 विशेष (लिट्): द्विर्वचन (अभ्यास) होकर 'वृत्' का 'ववृत्' हो जाता है और गुण आदि कार्य होकर प्रथम एवं उत्तम पुरुष एकवचन में 'ववृते' रूप निष्पन्न होता है।
७. लुट् लकार (अनद्यतन भविष्यत् / First Future)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
वर्तिता
वर्तितारौ
वर्तितारः
मध्यम पुरुष
वर्तितासे
वर्तितासाथे
वर्तिताध्वे
उत्तम पुरुष
वर्तिताहे
वर्तितास्वहे
वर्तितास्महे
८. आशीर्लिङ् लकार (आशीर्वाद अर्थ में / Benedictive)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
वर्तिषीष्ट
वर्तिषीयास्ताम्
वर्तिषीरन्
मध्यम पुरुष
वर्तिषीष्ठाः
वर्तिषीयाथाम्
वर्तिषीध्वम्
उत्तम पुरुष
वर्तिषीय
वर्तिषीवहि
वर्तिषीमहि
९. लुङ् लकार (सामान्य भूतकाल / Aorist Past)
पुरुष
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथम पुरुष
अवर्तिष्ट
अवर्तिषाताम्
अवर्तिषत
मध्यम पुरुष
अवर्तिष्ठाः
अवर्तिषाथाम्
अवर्तिध्वम् / अवर्तिढ्वम्
उत्तम पुरुष
अवर्तिषि
अवर्तिष्वहि
अवर्तिष्महि
💡 विशेष (लुङ्): अडागम और 'सिच्' प्रत्यय इडागम (इ) के साथ जुड़ने पर आत्मनेपद में 'अवर्तिष्ट' रूप बनता है। (परस्मैपद में सूत्र 'द्युद्भ्यो लुङि' से अङ् होकर 'अवृत्त' / 'अवृतत्' भी बनते हैं)।