शास्त्रीय संदर्भ-संरचना और तात्त्विक भूमिका
भारतीय दार्शनिक परंपरा में जीव के वास्तविक स्वरूप, जगत् के कारणभूत तत्त्व (माया एवं अविद्या) और परमात्मा की प्राप्ति के साधनों का विवेचन अत्यंत वैज्ञानिक एवं बहुआयामी पद्धति से किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन में गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, उपनिषद् साहित्य (प्रश्नोपनिषद्, छान्दोग्योपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्), महर्षि बादरायण (वेदव्यास) प्रणीत ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भगवद्गीता, अद्वैत वेदांत के प्रकरण ग्रंथों (वेदान्तसार एवं पंचदशी), संस्कृत नीति-सुभाषित तथा जैन परंपरा के देवदर्शन स्तोत्र में निहित दार्शनिक सूत्रों को एक सुव्यवस्थित और तार्किक ढाँचे में पिरोया गया है।
विभिन्न दार्शनिक धाराओं के इन उद्धरणों का एकत्र संकलन यह सिद्ध करता है कि चाहे मार्ग अद्वैत ज्ञान का हो, वैष्णव शरणागति का हो, अथवा श्रमण वीतराग-भक्ति का—अंतिम लक्ष्य अज्ञान या अविद्या की ग्रंथि का भेदन कर आत्मा के सहज, निर्मल और आनंदमय स्वरूप में प्रतिष्ठित होना ही है। अध्ययन में प्रयुक्त समस्त मूल श्लोकों, चौपाइयों और सूत्रों का प्रामाणिक शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में व्यवस्थित किया गया है।
| क्रम | उद्धृत मूल पाठ (शुद्ध शास्त्रीय रूप) | मूल ग्रंथ एवं संदर्भ | रचयिता / परंपरा | मुख्य दार्शनिक प्रतिपाद्य |
|---|---|---|---|---|
| 1 | सुनहु तात यह अकथ कहानी... सहज सुख रासी॥ | श्रीरामचरितमानस (उत्तरकाण्ड, दोहा 116 ख के पश्चात् चौपाई 1) | गोस्वामी तुलसीदास (रामावत/भक्ति वेदांत) | जीव का ईश्वर-अंशत्व, अनिर्वचनीय आत्मानुभूति तथा जीव के पाँच मूलभूत लक्षण |
| 2 | धर्मस्य दुर्लभो ज्ञाता, सम्यक् वक्ता ततोऽपि च... | सुभाषित रत्नभाण्डागार / नीति-काव्य परंपरा | संस्कृत सुभाषित परंपरा | धर्म के ज्ञाता, वक्ता, श्रद्धावान श्रोता और आचरणकर्ता (सुधी) की क्रमिक दुर्लभता |
| 3 | हृदि ह्येष आत्मा | प्रश्नोपनिषद् (प्रश्न 3, मंत्र 6) | अथर्ववेदीय उपनिषद् परंपरा | सूक्ष्म प्राण-नाड़ियों के केंद्र स्वरूप हृदय-देश में जीवात्मा का निवास स्थान |
| 4 | स वा एष आत्मा हृदि | छान्दोग्योपनिषद् (अध्याय 8, खण्ड 3, मंत्र 3) | सामवेदीय उपनिषद् परंपरा | हृदय-गुहा (दहराकाश) में आत्मा की स्थिति का निरूपण |
| 5 | अविरोधश्चन्दनवत् | ब्रह्मसूत्र (अध्याय 2, पाद 3, सूत्र 23/24) | महर्षि बादरायण (वेदव्यास) | चंदन के दृष्टांत द्वारा आत्मा की एकदेशीय स्थिति और सर्वदेहव्यापी अनुभव का समन्वय |
| 6 | व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति | ब्रह्मसूत्र (अध्याय 2, पाद 3, सूत्र 26/27) | महर्षि बादरायण (वेदव्यास) | पुष्प-सुगंध के दृष्टांत द्वारा आत्मा के चैतन्य गुण का जड़ शरीर में विस्तार |
| 7 | ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः... | श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 15, श्लोक 7) | महर्षि वेदव्यास (श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद) | सनातन जीवात्मा का भगवद्-अंश होना तथा प्रकृतिस्थ मन और पाँच इंद्रियों का कर्षण |
| 8 | अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्... | श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 17) | महर्षि वेदव्यास (श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद) | संपूर्ण देह में व्याप्त आत्म-तत्त्व की अविनाशिता और अव्यय स्वरूप का बोध |
| 9 | अवस्थात्रय (विश्व, तैजस, प्राज्ञ / विराट, हिरण्यगर्भ, ईश्वर), मूल एवं तूल अज्ञान | माण्डूक्योपनिषद्, वेदान्तसार एवं पंचदशी (चित्रदीप प्रकरण, 6.130) | गौडपादाचार्य, सदानन्द योगिन्द्र, स्वामी विद्यारण्य | व्यष्टि-समष्टि का कारण शरीर, माया के तीन दृष्टिकोण (वास्तवी, अनिर्वचनीया, तुच्छा) और अज्ञान के भेद |
| 10 | अद्याभवत्सफलता नयन-द्वयस्य... चुलुक-प्रमाणम्॥ | देवदर्शन स्तोत्र / दर्शन पाठ (श्लोक 13) | दिगम्बर जैन स्तोत्र परंपरा | प्रभु के चरण-कमलों के दर्शन से नेत्रों की सार्थकता और भवसागर का चुल्लू भर जल के समान प्रतीत होना |
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जीव का तात्त्विक स्वरूप और जड़-चेतन ग्रंथि का मनोविज्ञान
अध्यात्म-दर्शन का प्रथम और सर्वाधिक मौलिक प्रश्न यह है कि मनुष्य का वास्तविक परिचय क्या है और वह अनंत दुःखों के चक्र में क्यों भटक रहा है। श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि जी पक्षीराज गरुड़ के समक्ष ज्ञान और भक्ति के गूढ़ रहस्य का प्रतिपादन करते हुए जीव के स्वरूप की व्याख्या करते हैं:
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सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी॥
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
गोस्वामी तुलसीदास इस आत्म-तत्त्व की वार्ता को 'अकथ कहानी' (अकथनीय रहस्य) की संज्ञा देते हैं, क्योंकि यह वाणी और इंद्रियों का स्थूल विषय नहीं है; इसे केवल अंतःकरण की सूक्ष्म प्रज्ञा द्वारा अनुभव किया जा सकता है, शब्दों में पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता (समुझत बनइ न जाइ बखानी)।
जीव के पाँच तात्त्विक लक्षण और भगवद्-अंशत्व
उपरोक्त चौपाई की द्वितीय पंक्ति में जीव के पाँच तात्त्विक विशेषण निर्धारित किए गए हैं जो उसके पारमार्थिक अस्तित्व को परिभाषित करते हैं। सर्वप्रथम, जीव 'ईश्वर अंश' है, अर्थात् वह किसी जड़ पदार्थ का आकस्मिक विकास नहीं अपितु स्वयं परमात्मा का सनातन अंश है। परमात्मा का अंश होने के कारण ही उसका द्वितीय लक्षण 'अविनाशी' होना है, जिसका अर्थ है कि जीव काल-चक्र से अतीत और जन्म-मृत्यु से रहित शाश्वत तत्त्व है। तृतीय लक्षण के रूप में वह 'चेतन' है, जो जड़ देह से भिन्न, स्वयंप्रकाशी और ज्ञानस्वरूप चैतन्य सत्ता को दर्शाता है। चतुर्थ विशेषण 'अमल' यह स्पष्ट करता है कि जीव के मूल स्वरूप में अविद्या, काम, क्रोध या पाप का कोई मल अथवा दोष विद्यमान नहीं है, वह परम पवित्र और निर्मल है। पंचम लक्षण 'सहज सुख रासी' यह स्थापित करता है कि जीव को सुख बाह्य भौतिक विषयों से उधार नहीं लेना पड़ता; आनंद उसका स्वाभाविक धर्म है और वह स्वयं अनंत सुख का भंडार है।
तुलसीदास जी का यह सिद्धांत श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तमयोग (अध्याय 15, श्लोक 7) के वचन का ही लोकभाषा में किया गया तात्त्विक विस्तार है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट उद्घोषणा करते हैं:
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ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
यहाँ मूल श्लोक में प्रयुक्त शुद्ध पद 'मनःषष्ठानीन्द्रियाणि' है, जिसका आशय मन सहित छह इंद्रियाँ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और छठा मन—हैं। भगवान कहते हैं कि इस देहधारी जगत में जीव उनका ही सनातन अंश है, किंतु भौतिक प्रकृति के संसर्ग में बँधने के कारण वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इंद्रियों को अपनी ओर खींचता हुआ अहंकार और ममता के वशीभूत होकर सांसारिक संघर्ष करता रहता है।
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देह और देही का विवेक तथा सद्गुरु की अनिवार्यता
शास्त्रीय विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य स्थूल 'देह' नहीं, अपितु उस देह को धारण करने वाला 'देही' (आत्मा) है, जिसे शास्त्रों के व्यवहार में 'जीव' कहा जाता है। चूँकि कारण के गुण ही कार्य या अंश में संक्रमित होते हैं, इसलिए सच्चिदानंद परमात्मा का अंश होने के नाते प्रत्येक जीव परम आनंद, विशुद्ध प्रेम, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करने का जन्मसिद्ध अधिकारी है। जब साधक इस आत्म-चेतना के दिव्य स्तर पर आरूढ़ होता है, तब यह संपूर्ण बाह्य प्रकृति भी उसके लिए शत्रु न रहकर परम सुखदायी बन जाती है।
तथापि, एक गंभीर दार्शनिक विरोधाभास यह उत्पन्न होता है कि यदि जीव स्वभाव से ही 'अमल' और 'सहज सुख रासी' है, तो वह संसार में दीन, मलिन और दुःखी क्यों दिखाई देता है? श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में ही अगली चौपाइयों में इसका मनोवैज्ञानिक और तात्त्विक कारण स्पष्ट किया गया है:
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सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥
जीव माया के वशीभूत होकर तोते (कीर) और वानर (मरकट) की भाँति अपने ही राग और अज्ञान से बँध गया है। इस प्रक्रिया में 'जड़' (शरीर, इंद्रियाँ, मन) और 'चेतन' (आत्मा) के मध्य एक ग्रंथि (गाँठ) पड़ गई है, जिसे वेदांत में 'अध्यास' या 'चिदाभास-ग्रंथि' कहा जाता है। यद्यपि तात्त्विक दृष्टि से यह ग्रंथि 'मृषा' (मिथ्या) है—क्योंकि असंग चेतन आत्मा का जड़ पदार्थ से वास्तविक संयोग कभी हो ही नहीं सकता—तथापि जीव के हृदय में अज्ञानरूपी अंधकार विशेष रूप से छाए रहने के कारण यह गाँठ दिखाई नहीं देती और इसके छूटने में अत्यधिक कठिनाई होती है। इस अति-सूक्ष्म आत्म-तत्त्व की अनुभूति और जड़-चेतन की ग्रंथि का भेदन केवल बौद्धिक तर्क से संभव नहीं है। इसके लिए किसी तत्त्वदर्शी 'सद्गुरु' का मार्गदर्शन अनिवार्य है, जो साधक को देहाध्यास से मुक्त कर सर्वभाव से सच्चिदानंद परमात्मा की शरण में जाने की प्रामाणिक विधि सिखाता है।
देह में आत्मा का अधिष्ठान और चेतना के प्रसार की वेदांतिक मीमांसा
भारतीय दर्शन में शरीर और आत्मा के संबंध को लेकर एक अत्यंत सूक्ष्म दार्शनिक प्रश्न उठाया जाता है कि यदि आत्मा अभौतिक और शरीर के किसी विशेष स्थान में स्थित (एकदेशीय) है, तो उसकी चेतना नख से शिख पर्यंत संपूर्ण शरीर में कैसे अनुभव की जाती है?
श्रीमद्भगवद्गीता के सांख्ययोग (अध्याय 2, श्लोक 17) में आत्मा की सर्वव्यापकता और अनश्वरता को स्थापित करते हुए कहा गया है:
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अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥
कतिपय अशुद्ध लोक-पाठों में प्रथम पाद को भ्रमवश 'अज्ञानि तु तद्विद्धि' लिख दिया जाता है, किंतु प्रामाणिक व्यास-पाठ 'अविनाशि तु तद्विद्धि' ही है। इसका तात्पर्य है कि जिससे यह संपूर्ण शरीर और चराचर जगत व्याप्त है, उसे अविनाशी जानना चाहिए; इस अव्यय आत्मा का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
उपनिषदों में आत्मा का स्थान और ब्रह्मसूत्र का समाधान
जब भगवद्गीता कहती है कि आत्मा संपूर्ण शरीर में व्याप्त है, तो इसका अभिप्राय यह है कि पंचमहाभूतों से निर्मित यह भौतिक शरीर अपने-आप में जड़ और चेतना-रहित होता है, जबकि आत्मा अपनी चेतन-शक्ति को शरीर में संचारित कर पूरे शरीर को सचेतन बनाती है। किंतु वैदिक श्रुतियाँ आत्मा का निवास स्थान शरीर के 'हृदय-क्षेत्र' को बताती हैं। अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् (3.6) में "हृदि ह्येष आत्मा" कहकर यह प्रतिपादित किया गया है कि यह आत्मा निश्चय ही हृदय में स्थित है, जहाँ से एक सौ एक मुख्य नाड़ियाँ और उनकी हजारों शाखा-प्रशाखाएँ संपूर्ण शरीर में फैलती हैं। इसी प्रकार सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद् (8.3.3) में "स वा एष आत्मा हृदि" के माध्यम से हृदय-गुहा में ही आत्मा की स्थिति का निरूपण किया गया है।
यहाँ पूर्वपक्ष द्वारा यह तार्किक प्रश्न उठाया जाता है कि यदि आत्मा हृदय-प्रदेश में स्थित है, तो फिर सिर से पैर तक पूरे शरीर में सुख-दुःख और स्पर्श आदि की चेतना का प्रसार कैसे होता है? महर्षि बादरायण (वेदव्यास) ने ब्रह्मसूत्र के द्वितीय अध्याय के तृतीय पाद में दो अत्यंत सटीक लौकिक दृष्टांतों के माध्यम से इस दार्शनिक गुत्थी का निराकरण किया है। प्रथम सूत्र 'अविरोधश्चन्दनवत्' (ब्रह्मसूत्र 2.3.23/24) के माध्यम से महर्षि व्यास स्पष्ट करते हैं कि आत्मा के हृदय में स्थित होने और संपूर्ण शरीर में चैतन्य का अनुभव होने में कोई विरोध नहीं है; जिस प्रकार शरीर के केवल एक स्थान (मस्तक) पर चंदन का लेप करने से उसकी शीतलता का अनुभव संपूर्ण शरीर में होता है, ठीक उसी प्रकार आत्मा हृदय-केंद्र में निवास करते हुए भी पूरे शरीर में अपनी चेतन-शक्ति को प्रसारित करती रहती है।
इस समाधान पर पुनः यह सूक्ष्म दार्शनिक प्रश्न उठता है कि चंदन तो एक भौतिक द्रव्य है, किंतु 'चेतना' आत्मा का अभिलक्षण या गुण है; भला कोई गुण अपने गुणी (आधार वस्तु) को छोड़कर बाहर कैसे फैल सकता है, क्योंकि पट (कपड़े) का शुक्ल (सफेद) रंग कपड़े से अलग होकर अन्यत्र नहीं फैलता? इस शंका का उत्तर देते हुए वेदव्यास जी द्वितीय सूत्र 'व्यतिरेको गन्धवत् तथा च दर्शयति' (ब्रह्मसूत्र 2.3.26/27) प्रस्तुत करते हैं। जिस प्रकार सुगंध पुष्प का एक गुण है, किंतु जिस उद्यान में पुष्प खिलते हैं वहाँ पुष्प के भौतिक आकार से बाहर पूरे उद्यान में उसकी सुगंध फैल जाती है, ठीक उसी प्रकार चैतन्य-स्वरूप आत्मा हृदय में स्थित होकर भी जड़ शरीर के मृत पदार्थ को अपनी चेतना से व्याप्त करके उसे सचेतन बना देती है।
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अद्वैत वेदांत का तत्त्वज्ञान: अवस्थात्रय, माया और अज्ञान के विविध आयाम
उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र में जीव के देह-संबंध के विश्लेषण के पश्चात् अद्वैत वेदांत (विशेषतः गौडपादाचार्य कृत माण्डूक्यकारिका, सदानन्द योगिन्द्र कृत वेदान्तसार और स्वामी विद्यारण्य कृत पंचदशी) में जीव, ईश्वर और जगत् के पारस्परिक संबंधों का अत्यंत सूक्ष्म तात्त्विक विवेचन किया गया है।
व्यष्टि एवं समष्टि का कारण शरीर और अवस्थात्रय का समीकरण
वेदांत दर्शन के अनुसार एक ही विशुद्ध चैतन्य (ब्रह्म) जब उपाधि से युक्त होता है, तो वह 'जीव' और 'ईश्वर' के रूप में प्रतिभासित होता है। व्यक्तिगत आत्मा (व्यष्टि/जीव) और परमात्मा (समष्टि/ईश्वर) का 'कारण शरीर' (Causal Body) तात्त्विक दृष्टि से एक ही अज्ञान-तत्त्व है, किंतु उपाधि की व्यापकता और शुद्धता के आधार पर उनके नाम भिन्न हो जाते हैं। व्यष्टि स्तर पर जीव के कारण शरीर को 'अविद्या' कहा जाता है, जो मलिन-सत्त्वप्रधान या अज्ञान-बहुल होती है और जीव को अल्पज्ञ तथा बंधनग्रस्त बनाती है। इसके विपरीत, समष्टि स्तर पर ईश्वर का कारण शरीर लौकिक या समष्टिगत (Cosmic) होता है और विशुद्ध-सत्त्वप्रधान होने के कारण उसे 'माया' कहा जाता है; ईश्वर इस माया के वश में नहीं होता, अपितु माया का नियंत्रक (मायापति) होता है।
चेतना की तीन अनुभूतिपरक अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—के आधार पर व्यष्टि (जीव) और समष्टि (ब्रह्माण्डीय सिद्धांत) के मध्य सीधा समानांतर संबंध स्थापित किया गया है, जिसे निम्नलिखित तालिका द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है:
| चेतना की अवस्था | उपाधि / शरीर | व्यष्टि (जीव) का शास्त्रीय नाम | समष्टि (ब्रह्माण्डीय) सिद्धांत का नाम | अवस्था का मुख्य लक्षण एवं अनुभव-क्षेत्र |
|---|---|---|---|---|
| 1. जाग्रत अवस्था | स्थूल शरीर (अन्नमय कोष प्रधान) | विश्व | विराट (अथवा वैश्वानर) | बाह्य इंद्रियों द्वारा स्थूल भौतिक विषयों का अनुभव एवं व्यवहार |
| 2. स्वप्न अवस्था | सूक्ष्म/लिंग शरीर (मनोमय-विज्ञानमय कोष) | तैजस | हिरण्यगर्भ (अथवा सूत्रात्मा) | जाग्रत के संस्कारों से निर्मित आंतरिक मानसिक जगत् का सूक्ष्म अनुभव |
| 3. सुषुप्ति अवस्था | कारण शरीर (आनंदमय कोष / अज्ञान) | प्राज्ञ | ईश्वर (अंतर्यामी अव्यक्त) | समस्त द्वैत-कल्पनाओं का लय, अज्ञान और सुख का अव्यक्त अनुभव |
| 4. तुरीय (चतुर्थ) | निरुपाधिक (तीनों शरीरों से अतीत) | कूटस्थ-आत्मा (प्रत्यगात्मा) | परब्रह्म (सच्चिदानंद निरपेक्ष) | तीनों अवस्थाओं का साक्षी, देश-काल-निमित्त से परे विशुद्ध अद्वैत चैतन्य |
वेदांत का सर्वोच्च सिद्धांत ('तत्त्वमसि' और 'अहं ब्रह्मास्मि') यह प्रतिपादित करता है कि जब जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तीनों औपाधिक अवस्थाओं का निराकरण कर दिया जाता है, तब जीव के भीतर स्थित साक्षी 'कूटस्थ-आत्मा' ही निरपेक्ष 'परब्रह्म' के साथ पूर्णतः अभिन्न सिद्ध होता है।
माया का त्रिगुणात्मक स्वरूप और प्रेक्षक-सापेक्ष दृष्टिकोण
समष्टि प्रकृति या माया स्वभावतः त्रिगुणात्मिका है—अर्थात् यह सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणों की साम्यावस्था और उनके विषम परिणामों का ही नाम है। इनमें तमोगुण अंधकार, प्रमाद, मोह और जड़ता का प्रतीक है, जो वस्तु के यथार्थ स्वरूप को ढक लेता है। रजोगुण राग, तृष्णा, जुनून, चंचलता और निरंतर गतिविधि का जनक है, जो जीव को बहिर्मुखी कर्मों में बाँधता है। सत्त्वगुण दिव्य प्रकाश, विवेक, शांति और पवित्रता का द्योतक है, जिसमें आत्म-चैतन्य का स्पष्ट प्रतिबिंब पड़ता है।
व्यष्टि स्तर पर जब यह माया 'अविद्या' के रूप में कार्य करती है, तो इसका सबसे घातक मनोवैज्ञानिक प्रभाव मनुष्य के आत्म-मूल्यांकन पर पड़ता है। अविद्या की आवरण-शक्ति के कारण मनुष्य अपने अंतःकरण के दोषों (काम, क्रोध, कपट, अहंकार) का पता नहीं लगा पाता। अज्ञान से ग्रस्त व्यक्ति सदैव इस भ्रम में जीता है कि वह समस्त दोषों से मुक्त है, सद्गुणों से परिपूर्ण है और दुनिया का सबसे उत्तम व्यक्ति है। यह आत्म-मुग्धता और मिथ्या दंभ ही व्यक्तिगत माया अथवा अविद्या का सबसे प्रबल पाश है।
स्वामी विद्यारण्य ने अद्वैत वेदांत के प्रसिद्ध ग्रंथ पंचदशी (चित्रदीप प्रकरण, श्लोक 130—"तुच्छानिर्वचनीया च वास्तवी चेत्यसौ त्रिधा। ज्ञेया माया त्रिभिर्बोधैः श्रौतयौक्तिकलौकिकैः॥") में प्रेक्षक की प्रज्ञा के स्तर के अनुसार माया की सत्ता को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। लौकिक दृष्टि से, अर्थात् सांसारिक सोच वाले देहाभिमानी व्यक्ति के लिए, यह माया और उसका प्रपंच ही पूर्णतः 'सत्य' (वास्तवी) है। यौक्तिक दृष्टि से, अर्थात् नित्य-अनित्य वस्तु विवेक से संपन्न विवेकी पुरुष के तार्किक विश्लेषण के समक्ष, यह माया 'अनिर्वचनीय' या अवर्णनीय सिद्ध होती है (यहाँ अंग्रेजी के 'man of discrimination' का शुद्ध दार्शनिक अर्थ विवेकसंपन्न पुरुष है); वह न तो 'सत्' है क्योंकि ब्रह्मज्ञान होने पर इसका बाध हो जाता है, और न ही 'असत्' है क्योंकि अज्ञान काल में यह प्रत्यक्ष दिखाई देती है। अंततः श्रौत या अपरोक्षानुभूति की दृष्टि से, जो जीवन्मुक्त ऋषि स्वयं को सच्चिदानंद ब्रह्म के साथ अभिन्न रूप में पहचान चुका है, उसके लिए यह माया 'तुच्छ' या अस्तित्वहीन (कुछ भी नहीं) रह जाती है।
मूल-अज्ञान बनाम तूल-अज्ञान और वासना-क्षय की प्रक्रिया
वेदांत दर्शन में 'अज्ञान' का अर्थ केवल बाह्य जानकारी का अभाव नहीं, अपितु ब्रह्म-ज्ञान का अभाव है। यह अज्ञान अपने ही आधारभूत चैतन्य को कैसे आच्छादित करता है, इसे समझाने के लिए आचार्यों ने दो अत्यंत सटीक प्राकृतिक दृष्टांत दिए हैं। जिस प्रकार पर्वत की अपनी ही मिट्टी पर उत्पन्न हुए सघन वृक्ष उस विशाल पर्वत को ही छिपा देते हैं, और जिस प्रकार सूर्य की अपनी ही किरणों से उत्पन्न हुए बादल सूर्य के प्रकाश को ढक लेते हैं, ठीक उसी प्रकार ब्रह्म की आश्रित शक्ति से उत्पन्न हुआ अज्ञान उस स्वयंप्रकाशी चैतन्य या ब्रह्म को ही जीव की दृष्टि से छुपा देता है।
अद्वैत वेदांत के प्रकरण ग्रंथों (विशेषतः वेदान्तसार) में अज्ञान के दो सूक्ष्म तकनीकी भेद किए गए हैं—'मूल-अज्ञान' (Mula-Ajnana) और 'तूल-अज्ञान' (Tula-Ajnana)। अंग्रेजी लिप्यंतरण में संस्कृत शब्द 'तूल' को 'Tula' लिखा जाता है, जिसे कभी-कभी यांत्रिक अनुवाद में भ्रमवश 'Tool' या 'उपकरण-अज्ञान' पढ़ लिया जाता है, जबकि शुद्ध दार्शनिक शब्द 'तूल-अज्ञान' ही है। इनमें 'मूल-अज्ञान' (कारणात्मिका अविद्या) वह अनादि और प्राथमिक अज्ञान है जो जीव के भीतर उसके अपने वास्तविक आत्म-स्वरूप को ढक कर रखता है और संपूर्ण संसार-चक्र का मूल कारण बनता है। इसके विपरीत, 'तूल-अज्ञान' (कार्यात्मिका अविद्या) बाहरी व्यावहारिक वस्तुओं के संबंध में होने वाला आंशिक अज्ञान है। व्यावहारिक ज्ञान से बाह्य वस्तुओं का तूल-अज्ञान तो मिट सकता है, किंतु आत्मा को ढकने वाला मूल-अज्ञान केवल ब्रह्म-साक्षात्कार से ही नष्ट होता है।
मानव जीवन के समस्त क्लेशों—वासना, तृष्णा, इच्छाओं, लालसाओं तथा राग और द्वेष—का उद्गम स्रोत यही मूल-अविद्या है। राग (आसक्ति) और द्वेष (घृणा) वास्तव में अविद्या या अज्ञान के ही संशोधन (विकार) अथवा प्रभाव हैं। इस संसार-वृक्ष को नष्ट करने का नियम ठीक वैसा ही है जैसा किसी भौतिक वृक्ष को नष्ट करने का होता है; यदि किसी पेड़ की केवल ऊपरी शाखाएँ काट दी जाएँ तो वे पुनः उग आती हैं, अतः पेड़ को पूरी तरह नष्ट करने के लिए उसकी जड़ को ही उखाड़ना पड़ता है। इसी प्रकार इंद्रियों के अंधाधुंध और हठपूर्ण दमन से वासनाएँ समूल नष्ट नहीं होतीं; संसार के स्रोत रूपी अविद्या (जड़) को केवल अविनाशी ब्रह्म के ज्ञान और भक्ति से ही नष्ट किया减जा सकता है, और अविद्या के नाश से ही राग-द्वेष का स्थायी नाश संभव है।
सृष्टि की व्यक्त-अव्यक्त गतिशीलता और पंचमहाभूतों का विकास-क्रम
यह दृश्यमान भौतिक जगत् शून्य से उत्पन्न नहीं हुआ है, अपितु यह 'अव्यक्त' (बीजावस्था) से 'व्यक्त' (स्थूल कार्य-अवस्था) में आने और पुनः अव्यक्त में लीन होने की एक चक्रीय प्रक्रिया है। इसे ऋतु-चक्र के दृष्टांत से समझा जा सकता है कि ग्रीष्म ऋतु में सारी पृथ्वी सूख कर वनस्पति-विहीन हो जाती है, किंतु जैसे ही वर्षा होती है, भूमि में सुषुप्त पड़े बीज अंकुरित हो जाते हैं और पौधे बाहर निकल आते हैं। वर्षा से पूर्व भी वे पौधे नष्ट नहीं हुए थे, अपितु 'अव्यक्त' अवस्था में विद्यमान थे। इसी प्रकार यह जगत् जो अभी 'व्यक्त' अवस्था में दिखाई दे रहा है, सृष्टि से पूर्व ईश्वर के कारण शरीर—'माया'—में अव्यक्त अवस्था में था, उसी से बाहर निकला है और प्रलय काल में अंततः पुनः उसी अव्यक्त माया में लौट जाएगा।
ईश्वर की इसी माया-शक्ति से पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की क्रमिक उत्पत्ति होती है। सांख्य और वेदांत के सृष्टि-क्रम के अनुसार, जो तत्त्व जितना कारण के निकट होता है, उसकी सूक्ष्मता और व्यापकता उतनी ही अधिक होती है। पृथ्वी पंचमहाभूतों में सबसे स्थूल तत्त्व है; जल पृथ्वी का कारण होने से पृथ्वी से अधिक सूक्ष्म एवं व्यापक है; अग्नि जल से भी अधिक सूक्ष्म एवं व्यापक है; वायु अग्नि से भी अधिक सूक्ष्म एवं व्यापक है; और आकाश वायु का भी कारण होने से अन्य समस्त महाभूतों की अपेक्षा सर्वाधिक सूक्ष्म एवं व्यापक तत्त्व है।
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धर्म का आचरण, भक्ति का मनोविज्ञान और भगवद्-दर्शन की परिणति
तात्त्विक सिद्धांतों का निरूपण जितना उत्कृष्ट है, मानव जीवन में उनका व्यावहारिक अवतरण उतना ही चुनौतीपूर्ण है। शास्त्रीय ज्ञान और वास्तविक जीवन-रूपांतरण के मध्य की इसी खाई को संस्कृत वाङ्मय और भक्ति आंदोलन के संतों ने अत्यंत मार्मिक ढंग से उजागर किया है।
धर्म-साधना में ज्ञान और आचरण का अंतराल
संस्कृत नीति-साहित्य में धर्म के सैद्धांतिक बोध से लेकर उसके व्यावहारिक अनुष्ठान तक की यात्रा को चार स्तरों में बाँटते हुए एक प्रसिद्ध सुभाषित कहा गया है:
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धर्मस्य दुर्लभो ज्ञाता सम्यग् वक्ता ततोऽपि च।
श्रोता ततोऽपि श्रद्धावान् कर्ता कोऽपि ततः सुधीः॥
इस श्लोक का समाजशास्त्रीय और आध्यात्मिक विश्लेषण यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक पतन का कारण शास्त्रों का अभाव नहीं, अपितु आचरण की दुर्लभता है। इस संसार में धर्म के यथार्थ स्वरूप को जानने वाला 'ज्ञाता' दुर्लभ होता है, और धर्म को जानने के पश्चात् भी उसे बिना किसी स्वार्थ या दंभ के श्रेष्ठ तरीके से बताने वाला 'सम्यक् वक्ता' उससे भी अधिक दुर्लभ होता है। उत्तम वक्ता मिल जाने पर भी पूर्ण श्रद्धा के साथ सुनने वाला 'श्रद्धावान् श्रोता' उससे भी दुर्लभ है, और इन तीनों की अपेक्षा धर्म का अपने जीवन में वास्तविक आचरण करने वाला सुबुद्धिमान् ('कर्ता सुधीः') सबसे अधिक दुर्लभ है।
आचरण की यह दुर्लभता इसलिए है क्योंकि कोरा बौद्धिक ज्ञान-मार्ग 'कृपाण की धार' (दुधारी तलवार) के समान है, जहाँ से साधक के गिरने में क्षण भर भी देर नहीं लगती। श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि जी स्पष्ट करते हैं कि जब साधक सात्त्विक श्रद्धा रूपी गौ से धर्म रूपी दूध दुहकर, वैराग्य का मक्खन और ज्ञान का घी निकालकर तथा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की तीनों अवस्थाओं एवं तीनों गुणों की कपास से 'तुरीयावस्था' की बत्ती बनाकर विज्ञानमय दीपक जलाता भी है, तब भी माया की 'ऋद्धि-सिद्धियाँ' और 'विषय-वासनाओं' के झोंके उस ज्ञान-दीपक को बुझा देते हैं।
व्यवस्था बनाम अवस्था: सूरदास का दृष्टांत और शरणागति का मर्म
जब साधक अपनी साधना-शक्ति के अहंकार को त्याग कर भक्ति के पथ पर आता है, तो वहाँ एक नया आध्यात्मिक नियम कार्य करता है कि भगवान बाह्य 'व्यवस्था' (साधन-संपन्नता या कर्मकांडीय दक्षता) नहीं देखते, अपितु जीव के जीवन की 'अवस्था' और उसके हृदय की व्याकुलता देखते हैं।
भक्ति साहित्य में प्रचलित एक प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) भक्त सूरदास का मंदिर-प्रसंग इस दार्शनिक सत्य को अत्यंत प्रखरता से प्रमाणित करता है। जब वे नेत्रहीन भक्त भगवान के मंदिर में पहुँचे, तो वहाँ उपस्थित लोगों ने सांसारिक तर्कबुद्धि से प्रश्न किया कि जब उनके पास आँखें ही नहीं हैं, तो वे मंदिर में आकर भगवान का दर्शन किससे करेंगे? इस पर उस भक्त ने जो उत्तर दिया, वह संपूर्ण भक्ति-दर्शन का सार है। उन्होंने कहा कि दर्शन के लिए यदि मेरे पास नेत्र नहीं हैं, तो क्या ठाकुरजी के भी नेत्र नहीं हैं? वे तो मुझे देख ही लेंगे, और यदि वे मुझे देखकर प्रसन्न हो जाएँगे, तो बस हमारा काम सिद्ध हो गया।
इस दृष्टांत का गहरा दार्शनिक निहितार्थ यह है कि ज्ञान और योग के मार्ग में केंद्र में 'जीव का पुरुषार्थ' रहता है जहाँ इंद्रियों या बुद्धि की अक्षमता एक बाधा बन जाती है, किंतु शरणागति और भक्ति के मार्ग में केंद्र में 'भगवान की कृपा-दृष्टि' होती है। जीव अविद्या के कारण अंधा हो सकता है, किंतु सर्वद्रष्टा ईश्वर अविद्या से रहित है। जैसे ही जीव अपनी दीनता और व्याकुलता के साथ प्रभु के सम्मुख उपस्थित होता है, प्रभु की कृपा-दृष्टि पड़ते ही जीव की अविद्या-ग्रंथि बिना किसी कठोर यंत्र और परिश्रम के ठीक वैसे ही स्वतः नष्ट हो जाती है, जैसे तृप्ति के लिए भोजन करने पर जठराग्नि उसे अपने-आप पचा देती है (भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥ संसृति मूल अबिद्या नासा॥ — रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड 118)।
प्रभु-दर्शन से भवसागर का चुल्लूकरण: श्रमण एवं भक्ति परंपरा का संगम
जब साधक के हृदय में इस प्रकार की अनन्य शरणागति और प्रभु-दर्शन की व्याकुलता फलीभूत होती है, तब उसके जीवन में वह सर्वोच्च आध्यात्मिक रूपांतरण घटित होता है जिसका वर्णन जैन परंपरा के सुप्रसिद्ध 'देवदर्शन स्तोत्र' (दर्शन पाठ) के तेरहवें श्लोक में किया गया है:
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अद्याभवत्सफलता नयन-द्वयस्य, देव! त्वदीय चरणाम्बुज-वीक्षणेन।
अद्य त्रिलोकतिलक! प्रतिभासते मे, संसार-वारिधिरयं चुलुक-प्रमाणम्॥
इस श्लोक का भावार्थ यह है कि हे देव, आपके चरण-कमलों का दर्शन करने से आज मेरे दोनों नेत्रों की वास्तविक सफलता सिद्ध हुई है; हे तीनों लोकों के तिलक (मुकुटमणि), आज आपके दर्शन के प्रभाव से यह अथाह संसार-सागर मुझे चुल्लू भर जल के समान अत्यंत लघु प्रतीत हो रहा है।
यह श्लोक भारतीय अध्यात्म की वैदिक और श्रमण—दोनों धाराओं के अद्भुत संगम को रेखांकित करता है। जब तक जीव की दृष्टि बाह्य त्रिगुणात्मक माया में उलझी रहती है, तब तक वह जन्म-मृत्यु के बंधन को ही दृढ़ करती है; नेत्र-इंद्रिय और अंतःप्रज्ञा की वास्तविक सार्थकता (सफलता नयन-द्वयस्य) तभी सिद्ध होती है जब वह परमात्मा के वीतराग, चिदानंदमय स्वरूप और उनके चरण-कमलों का साक्षात्कार (चरणाम्बुज-वीक्षणेन) कर लेती है। जो जन्म-मृत्यु और राग-द्वेष रूपी संसार-सागर (संसार-वारिधि) अज्ञानी जीव को अनंत और दुस्तर प्रतीत होता था, प्रभु के चरणों का आश्रय और आत्म-स्वरूप का दर्शन होते ही वह अथाह महासागर एक अंजलि अर्थात् चुल्लू भर पानी (चुलुक-प्रमाणम्) के समान नगण्य हो जाता है।
निष्कर्ष एवं तात्त्विक संश्लेषण
प्रस्तुत शास्त्रीय और दार्शनिक विवेचन के समग्र संश्लेषण से यह स्थापित होता है कि जीव स्वभावतः नश्वर देह नहीं, अपितु सच्चिदानंद ईश्वर का अविनाशी, चेतन, निर्मल और सहज सुखमय अंश है। हृदय-देश में अधिष्ठित होते हुए भी यह आत्मा चंदन की शीतलता और पुष्प की सुगंध की भाँति संपूर्ण जड़ देह को अपनी चेतना से आलोकित करती है। जीव का सांसारिक दुःख किसी बाह्य दैवीय दंड का परिणाम नहीं, अपितु उसकी अपनी ही अविद्या (मूल-अज्ञान) द्वारा निर्मित जड़-चेतन की मिथ्या ग्रंथि है, जो मनुष्य को अपने दोष देखने से रोकती है और उसमें राग-द्वेष तथा तृष्णा की शाखाओं को जन्म देती है।
इस बंधन से मुक्ति के लिए केवल बाह्य इंद्रियों का दमन पर्याप्त नहीं है, अपितु अविद्या रूपी जड़ का समूल उच्छेदन अनिवार्य है। जहाँ अद्वैत वेदांत जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की उपाधियों के पार जाकर कूटस्थ-आत्मा और परब्रह्म की एकता के ज्ञान से माया को 'तुच्छ' सिद्ध करता है, वहीं भक्ति-दर्शन सद्गुरु की शरण और हृदय की सच्ची व्याकुलता (सूरदास के दृष्टांत के समान) द्वारा प्रभु की कृपा का आह्वान करता है। अंततः आध्यात्मिक साधना की सर्वोच्च कसौटी केवल धर्म का ज्ञाता, वक्ता या श्रोता बनने में नहीं, अपितु उसका आचरण करने वाला 'सुधी कर्ता' बनने में है। जब साधक इस सम्यक् आचरण और अनन्य शरणागति के माध्यम से प्रभु के चरण-कमलों का साक्षात्कार करता है, तब उसके लिए अनंत जन्मों का दुस्तर भवसागर चुल्लू भर जल के समान सुगम हो जाता है और वह अपने सहज आनंदमय स्वरूप में नित्य प्रतिष्ठित हो जाता है।
