श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - तृतीयस्कन्धः
प्रकृति-पुरुष-विवेको नाम सप्तविंशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
प्रकृतिस्थोऽपि पुरुषो नाज्यते प्राकृतैर्गुणैः ।
अविकारात् अकर्तृत्वात् निर्गुणत्वाज्जलार्कवत् ॥ १ ॥
भावार्थ: श्रीभगवान कपिल कहते हैं - यद्यपि पुरुष (जीवात्मा) प्रकृति (शरीर) में स्थित रहता है, फिर भी वह प्रकृति के गुणों (सुख-दुःख आदि) से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह निर्विकार, अकर्ता और निर्गुण है; ठीक उसी तरह जैसे जल में दिखने वाला सूर्य का प्रतिबिंब जल के हिलने-डुलने या गंदा होने से प्रभावित नहीं होता।
स एष यर्हि प्रकृतेः गुणेष्वभिविषज्जते ।
अहङ्क्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीति अभिमन्यते ॥ २ ॥
भावार्थ: परन्तु जब वही पुरुष (जीवात्मा) प्रकृति के गुणों (विषयों) में आसक्त हो जाता है, तब वह अहंकार से विमूढ़ (भ्रमित) होकर ऐसा मानने लगता है कि 'मैं ही कर्ता हूँ'।
तेन संसारपदवीं अवशोऽभ्येत्यनिर्वृतः ।
प्रासङ्गिकैः कर्मदोषैः सदसन् मिश्रयोनिषु ॥ ३ ॥
भावार्थ: इस कर्तापन के अभिमान और आसक्ति से उत्पन्न होने वाले कर्मों के दोष के कारण, वह परतंत्र (विवश) होकर देव, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि (सत्, असत् और मिश्रित) योनियों में जन्म-मृत्यु रूपी संसार के चक्कर में पड़ता है और कभी शांति नहीं पाता।
अर्थे हि अविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ४ ॥
भावार्थ: यद्यपि इस संसार (दृश्य प्रपंच) का वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है, फिर भी जो मन विषयों का ही चिंतन करता रहता है, उसका यह जन्म-मरण का चक्कर कभी नहीं छूटता; ठीक वैसे ही जैसे स्वप्न में (बिना किसी वास्तविक कारण के भी) दुःख और भय का अनुभव होता रहता है।
अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तं असतां पथि ।
भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम् ॥ ५ ॥
भावार्थ: इसलिए मनुष्य को चाहिए कि विषय-भोगों के असत् (मिथ्या) मार्ग में फँसे हुए अपने इस चित्त (मन) को, तीव्र भक्तियोग और वैराग्य के द्वारा धीरे-धीरे अपने वश में करे।
यमादिभिः योगपथैः अभ्यसन् श्रद्धयान्वितः ।
मयि भावेन सत्येन मत्कथाश्रवणेन च ॥ ६ ॥
भावार्थ: श्रद्धापूर्वक यम-नियम आदि अष्टांग योग के मार्ग का अभ्यास करके, मुझमें सच्चा भाव (सत्य-प्रेम) रखकर, मेरी कथाओं के श्रवण द्वारा...
सर्वभूतसमत्वेन निर्वैरेणाप्रसङ्गतः ।
ब्रह्मचर्येण मौनेन स्वधर्मेण बलीयसा ॥ ७ ॥
भावार्थ: ...सभी प्राणियों में समदृष्टि रखकर, किसी से बैर न करके (निर्वैर), संसार से आसक्ति हटाकर, ब्रह्मचर्य का पालन करके, मौन रहकर और निष्काम भाव से अपने स्वधर्म का दृढ़ता से पालन करके...
यदृच्छयोपलब्धेन सन्तुष्टो मितभुङ् मुनिः ।
विविक्तशरणः शान्तो मैत्रः करुण आत्मवान् ॥ ८ ॥
भावार्थ: ...जो कुछ भी प्रारब्ध (यदृच्छा) से मिल जाए उसी में संतुष्ट रहकर, कम भोजन करने वाला (मितभुक्), एकांत का सेवन करने वाला, शांत, सबका मित्र, दयालु और जितेन्द्रिय (आत्मवान्) मुनि होकर...
सानुबन्धे च देहेऽस्मिन् अकुर्वन् असदाग्रहम् ।
ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥ ९ ॥
भावार्थ: ...इस शरीर और इसके संबंधियों (स्त्री, पुत्र आदि) में 'मैं और मेरा' का मिथ्या आग्रह (अहंकार) न रखकर, तथा प्रकृति और पुरुष के भेद को प्रत्यक्ष दिखाने वाले ज्ञान के द्वारा...
निवृत्तबुद्ध्यवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः ।
उपलभ्यात्मनात्मानं चक्षुषेवार्कमात्मदृक् ॥ १० ॥
भावार्थ: ...बुद्धि की जाग्रत आदि अवस्थाओं से परे होकर और 'मैं शरीर हूँ' इस भेद-बुद्धि को दूर करके, आत्मज्ञानी पुरुष अपने शुद्ध अंतःकरण से अपनी आत्मा का साक्षात् दर्शन उसी प्रकार कर लेता है जैसे आँखों से सूर्य का दर्शन किया जाता है।
मुक्तलिङ्गं सदाभासं असति प्रतिपद्यते ।
सतो बन्धुमसच्चक्षुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥ ११ ॥
भावार्थ: तब वह उस आत्मा को जान लेता है जो लिङ्ग-शरीर (अहंकार) से मुक्त है, जो अहंकार आदि जड़ (असत्) पदार्थों को भी सत्ता (आभास) प्रदान करने वाला है, जो अद्वैत (एक) है, सबमें व्याप्त है, सत् (कारण) का आधार है और असत् (कार्य) को प्रकाशित करने वाला (चक्षु) है।
यथा जलस्थ आभासः स्थलस्थेनावदृश्यते ।
स्वाभासेन तथा सूर्यो जलस्थेन दिवि स्थितः ॥ १२ ॥
भावार्थ: जैसे दीवार (स्थल) पर पड़े हुए जल के प्रतिबिंब (चमक) से, उस जल का और जल में दिखने वाले सूर्य के प्रतिबिंब का पता चलता है; और फिर उस जल में स्थित प्रतिबिंब के द्वारा आकाश में स्थित वास्तविक सूर्य का ज्ञान हो जाता है...
एवं त्रिवृद् अहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोमयैः ।
स्वाभासैः लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यदृक् ॥ १३ ॥
भावार्थ: ...उसी प्रकार (पाँच महाभूत, इन्द्रियाँ और मन वाले) इस देह से, देह में स्थित जीव (अहंकार) का ज्ञान होता है, और उस सत्य-स्वरूपा भासमान जीव के द्वारा उस परम सत्य (परमात्मा) का साक्षात् दर्शन हो जाता है।
भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनो बुद्ध्यादिष्विह निद्रया ।
लीनेष्वसति यस्तत्र विनिद्रो निरहङ्क्रियः ॥ १४ ॥
भावार्थ: जब गहरी नींद (सुषुप्ति) में स्थूल भूत, सूक्ष्म तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि आदि सब अज्ञान (असत्) में लीन हो जाते हैं, तब भी जो तत्त्व जागता रहता है (विनिद्र) और अहंकार से रहित होकर साक्षी रूप में स्थित रहता है (वही परमात्मा है)।
मन्यमानस्तदात्मानं अनष्टो नष्टवन्मृषा ।
नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः ॥ १५ ॥
भावार्थ: उस सुषुप्ति अवस्था में अहंकार के लीन (नष्ट) हो जाने पर, यद्यपि आत्मा नष्ट नहीं होता, फिर भी वह साक्षी आत्मा (जीव) भ्रमवश अपने आप को नष्ट हुआ-सा मानकर वैसे ही व्याकुल हो उठता है जैसे धन नष्ट हो जाने पर कोई धनी व्यक्ति स्वयं को नष्ट (कंगाल) मान लेता है।
एवं प्रत्यवमृश्यासौ आत्मानं प्रतिपद्यते ।
साहङ्कारस्य द्रव्यस्य योऽवस्थानमनुग्रहः ॥ १६ ॥
भावार्थ: इस प्रकार भलीभांति विचार (मनन) करके मनुष्य उस आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, जो अहंकार सहित सम्पूर्ण भौतिक प्रपंच (द्रव्य) का आधार और उसे प्रकाशित करने वाला (अनुग्रह) है।
देवहूतिरुवाच
पुरुषं प्रकृतिर्ब्रह्मन् न विमुञ्चति कर्हिचित् ।
अन्योन्यापाश्रयत्वाच्च नित्यत्वाद् अनयोः प्रभो ॥ १७ ॥
भावार्थ: देवहूति ने पूछा - हे ब्रह्मन्! हे प्रभो! प्रकृति और पुरुष—दोनों ही नित्य हैं और दोनों का एक-दूसरे के साथ आश्रय (संबंध) है। इसलिए प्रकृति पुरुष को कभी नहीं छोड़ती (अर्थात जन्म-मरण का चक्कर कैसे मिटेगा)?
यथा गन्धस्य भूमेश्च न भावो व्यतिरेकतः ।
अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धेः परस्य च ॥ १८ ॥
भावार्थ: जिस प्रकार गंध और पृथ्वी को, या रस और जल को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार बुद्धि (प्रकृति) और परब्रह्म (पुरुष) को एक-दूसरे से कैसे अलग किया जा सकता है?
अकर्तुः कर्मबन्धोऽयं पुरुषस्य यदाश्रयः ।
गुणेषु सत्सु प्रकृतेः कैवल्यं तेष्वतः कथम् ॥ १९ ॥
भावार्थ: यद्यपि पुरुष अकर्ता है, फिर भी प्रकृति के आश्रय के कारण ही उसे यह कर्म-बंधन प्राप्त हुआ है। अतः जब तक प्रकृति के गुण (सत्त्व, रज, तम) मौजूद हैं, तब तक पुरुष को उनसे मोक्ष (कैवल्य) कैसे मिल सकता है?
क्वचित् तत्त्वावमर्शेन निवृत्तं भयमुल्बणम् ।
अनिवृत्तनिमित्तत्वात् पुनः प्रत्यवतिष्ठते ॥ २० ॥
भावार्थ: यदि तत्त्वज्ञान के विचार से कभी यह घोर भय (संसार-बंधन) निवृत्त (दूर) हो भी जाए, तो भी उसका कारण (प्रकृति) तो नष्ट नहीं हुआ है, इसलिए वह भय पुनः प्रकट हो सकता है।
श्रीभगवानुवाच
अनिमित्तनिमित्तेन स्वधर्मेणामलात्मना ।
तीव्रया मयि भक्त्या च श्रुतसम्भृतया चिरम् ॥ २१ ॥
भावार्थ: श्रीभगवान ने कहा - माताजी! निष्काम भाव (अनिमित्त) से और शुद्ध अंतःकरण से अपने स्वधर्म का पालन करने से, दीर्घकाल तक भगवान की कथा सुनने से पुष्ट हुई मेरी तीव्र भक्ति के द्वारा...
ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा ।
तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ॥ २२ ॥
भावार्थ: ...तत्त्व का साक्षात् दर्शन कराने वाले ज्ञान के द्वारा, प्रबल वैराग्य के द्वारा, तपस्या सहित किए गए योग के द्वारा, और तीक्ष्ण आत्म-समाधि के द्वारा...
प्रकृतिः पुरुषस्येह दह्यमाना त्वहर्निशम् ।
तिरोभवित्री शनकैः अग्नेर्योनिरिवारणिः ॥ २३ ॥
भावार्थ: ...इस पुरुष की वह अज्ञानमयी प्रकृति दिन-रात जलती (भस्म होती) हुई धीरे-धीरे वैसे ही अदृश्य (नष्ट) हो जाती है, जैसे आग को पैदा करने वाली अरणि (लकड़ी) स्वयं उसी आग से जलकर खाक हो जाती है।
भुक्तभोगा परित्यक्ता दृष्टदोषा च नित्यशः ।
नेश्वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्य च ॥ २४ ॥
भावार्थ: जब पुरुष प्रकृति के सारे भोग भोग चुका होता है, उसके दोषों को देखकर उसे त्याग देता है, और अपने स्वरूप (महिमा) में स्थित हो जाता है; तब वह प्रकृति उस मुक्त और ईश्वर-रूप पुरुष का कोई अनिष्ट (अशुभ) नहीं कर सकती।
यथा हि अप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत् ।
स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ २५ ॥
भावार्थ: जैसे सोते हुए अज्ञानी मनुष्य को स्वप्न में अनेक प्रकार के दुःख (अनर्थ) भुगतने पड़ते हैं, परन्तु जाग जाने पर वही स्वप्न उसे जरा भी मोह में (भय में) नहीं डाल सकता...
एवं विदिततत्त्वस्य प्रकृतिर्मयि मानसम् ।
युञ्जतो नापकुरुत आत्मारामस्य कर्हिचित् ॥ २६ ॥
भावार्थ: ...उसी प्रकार जो तत्त्वज्ञानी हो गया है, जिसका मन मुझमें लगा हुआ है और जो अपनी ही आत्मा में रमण कर रहा है (आत्माराम है), उसका यह प्रकृति कभी कोई बाल भी बांका नहीं कर सकती।
यदैवमध्यात्मरतः कालेन बहुजन्मना ।
सर्वत्र जातवैराग्य आब्रह्मभुवनान्मुनिः ॥ २७ ॥
भावार्थ: जब कोई मुनि इस प्रकार अध्यात्म-विचार में रत रहकर, अनेक जन्मों के समय के बाद, ब्रह्मलोक तक के सभी भोगों से पूरी तरह विरक्त (वैराग्यवान) हो जाता है...
मद्भक्तः प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा ।
निःश्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम् ॥ २८ ॥
भावार्थ: ...तब वह मेरा भक्त, सत्य को जान लेने के कारण, मेरी अपार कृपा से अपने परम कल्याणमय और कैवल्य-रूप (मोक्ष) मेरे परम धाम को प्राप्त कर लेता है।
प्राप्नोतीहाञ्जसा धीरः स्वदृशा च्छिन्नसंशयः ।
यद्गत्वा न निवर्तेत योगी लिङ्गाद् विनिर्गमे ॥ २९ ॥
भावार्थ: वह धीर योगी आत्मज्ञान द्वारा अपने सभी संशयों को काटकर इस लिंग शरीर (अहंकार) के छूटने पर बड़ी आसानी से उस परम पद को प्राप्त कर लेता है, जहाँ से फिर लौटकर नहीं आना पड़ता।
यदा न योगोपचितासु चेतो
मायासु सिद्धस्य विषज्जतेऽङ्ग ।
अनन्यहेतुष्वथ मे गतिः स्याद्
आत्यन्तिकी यत्र न मृत्युहासः ॥ ३० ॥
भावार्थ: हे माता! जब किसी सिद्ध योगी का चित्त योग के प्रभाव से प्राप्त होने वाली अष्ट सिद्धियों (मायाओं) में भी आसक्त नहीं होता, तब उसे मेरी वह आत्यन्तिक (सर्वोच्च) गति प्राप्त होती है जिसका कोई अन्य कारण नहीं है, और जहाँ मृत्यु भी मुस्करा (हंस) नहीं सकती (अर्थात काल का कोई प्रभाव नहीं रहता)।

