श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - तृतीयस्कन्धः
अष्टाङ्गयोग-निरूपणं नामाष्टाविंशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे ।
मनो येनैव विधिना प्रसन्नं याति सत्पथम् ॥ १ ॥
भावार्थ: श्रीभगवान कपिल कहते हैं - हे राजपुत्री (देवहूति)! अब मैं तुम्हें उस सगुण (सबीज) योग का लक्षण बताऊँगा, जिस विधि का आचरण करने से चित्त प्रसन्न होकर परम कल्याण (मोक्ष) के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।
स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम् ।
दैवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मवित् चरणार्चनम् ॥ २ ॥
भावार्थ: अपनी शक्ति के अनुसार अपने धर्म का पालन करना, अधर्म से दूर रहना, दैवयोग (प्रारब्ध) से जो कुछ भी मिल जाए उसी में संतुष्ट रहना, और आत्मज्ञानी महापुरुषों के चरणों की पूजा (सेवा) करना चाहिए।
ग्राम्यधर्मनिवृत्तिश्च मोक्षधर्मरतिस्तथा ।
मितमेध्यादनं शश्वद् विविक्तक्षेमसेवनम् ॥ ३ ॥
भावार्थ: सांसारिक भोगों (ग्राम्यधर्म) से निवृत्त होना, मोक्ष के साधनों में प्रेम रखना, सात्त्विक (मेध्य) और सीमित भोजन करना, तथा निरंतर एकांत और शांत स्थानों का सेवन करना चाहिए।
अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रहः ।
ब्रह्मचर्यं तपः शौचं स्वाध्यायः पुरुषार्चनम् ॥ ४ ॥
भावार्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), आवश्यकतानुसार ही वस्तुओं का संग्रह करना (अपरिग्रह), ब्रह्मचर्य का पालन, तप, शारीरिक और मानसिक पवित्रता (शौच), शास्त्रों का अध्ययन (स्वाध्याय) और परम पुरुष (भगवान) की पूजा करनी चाहिए।
मौनं सदाऽऽसनजयः स्थैर्यं प्राणजयः शनैः ।
प्रत्याहारश्चेन्द्रियाणां विषयान्मनसा हृदि ॥ ५ ॥
भावार्थ: सदा मौन रहना, आसन जीतना (स्थिर होकर बैठना), धीरे-धीरे प्राणायाम के द्वारा प्राणों को जीतना, और इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर मन के द्वारा हृदय में समेट लेना (प्रत्याहार) चाहिए।
स्वधिष्ण्यानां एकदेशे मनसा प्राणधारणम् ।
वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथात्मनः ॥ ६ ॥
भावार्थ: प्राणों को मूलाधार आदि किसी एक चक्र (धिष्ण्य) में मन के साथ स्थिर करना (धारणा), भगवान विष्णु (वैकुण्ठ) की लीलाओं का चिंतन करना (ध्यान), और अपने चित्त को उसी में पूरी तरह लीन कर देना (समाधि) चाहिए।
एतैः अन्यैश्च पथिभिः मनो दुष्टमसत्पथम् ।
बुद्ध्या युञ्जीत शनकैः जितप्राणो ह्यतन्द्रितः ॥ ७ ॥
भावार्थ: प्राणों को जीतने वाले योगी को चाहिए कि वह आलस्य त्यागकर इन (यम-नियम आदि) तथा अन्य योग-साधनों द्वारा कुमार्ग पर जाने वाले दुष्ट मन को बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे वश में करे।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य विजितासन आसनम् ।
तस्मिन् स्वस्ति समासीन ऋजुकायः समभ्यसेत् ॥ ८ ॥
भावार्थ: किसी पवित्र स्थान पर कुशा आदि का आसन बिछाकर, उस पर सिद्धासन आदि से सुखपूर्वक और शरीर को सीधा रखकर बैठे, और फिर प्राणायाम का अभ्यास करे।
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः ।
प्रतिकूलेन वा चित्तं यथा स्थिरं अचञ्चलम् ॥ ९ ॥
भावार्थ: पूरक (श्वास लेना), कुम्भक (श्वास रोकना) और रेचक (श्वास छोड़ना) — इन विधियों के द्वारा, या इसके विपरीत क्रम से प्राणवायु के मार्ग (नाड़ियों) को शुद्ध करे, जिससे चित्त स्थिर और चंचलता-रहित हो जाए।
मनोऽचिरात्स्याद् विरजं जितश्वासस्य योगिनः ।
वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम् ॥ १० ॥
भावार्थ: जिस प्रकार वायु और अग्नि से तपाया हुआ सोना (या लोहा) अपने सारे मल (दोष) को त्याग देता है, उसी प्रकार प्राणायाम द्वारा श्वास को जीतने वाले योगी का मन भी शीघ्र ही सभी विकारों से शुद्ध हो जाता है।
प्राणायामैः दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषान् ।
प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ ११ ॥
भावार्थ: प्राणायाम से वात-पित्त-कफ आदि शरीर के दोषों को जलाना चाहिए; धारणा से पापों को नष्ट करना चाहिए; प्रत्याहार से विषयों की आसक्ति को, और ध्यान से अनीश्वर (भगवद-विमुख) गुणों को नष्ट करना चाहिए।
यदा मनः स्वं विरजं योगेन सुसमाहितम् ।
काष्ठां भगवतो ध्यायेत् स्वनासाग्रावलोकनः ॥ १२ ॥
भावार्थ: जब योग के अभ्यास से मन निर्मल और पूर्णतः एकाग्र हो जाए, तब योगी अपनी नासिका (नाक) के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाकर भगवान के स्वरूप का ध्यान करे।
प्रसन्नवदनाम्भोजं पद्मगर्भारुणेक्षणम् ।
नीलोत्पलदलश्यामं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ १३ ॥
भावार्थ: भगवान का मुख-कमल अत्यंत प्रसन्न है, उनके नेत्र कमल के गर्भ के समान अरुण (लाल) हैं, शरीर नीले कमल-दल के समान श्याम है, और वे शंख, चक्र तथा गदा धारण किए हुए हैं।
लसत्पङ्कज किञ्जल्क पीतकौशेयवाससम् ।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत् कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ॥ १४ ॥
भावार्थ: वे खिले हुए कमल के पराग के समान पीले रंग का रेशमी वस्त्र (पीताम्बर) पहने हैं। उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न है और गले में जगमगाती हुई कौस्तुभ मणि सुशोभित है।
मत्तद्विरेफकलया परीतं वनमालया ।
परार्ध्यहारवलय किरीटाङ्गदनूपुरम् ॥ १५ ॥
भावार्थ: वे एक सुंदर वनमाला पहने हुए हैं, जिस पर मतवाले भंवरे मधुर गुंजार कर रहे हैं। उनके शरीर पर बहुमूल्य हार, कंगन, मुकुट, बाजूबंद (अंगद) और नूपुर आदि आभूषण सजे हुए हैं।
काञ्चीगुणोल्लसत् श्रोणिं हृदयाम्भोजविष्टरम् ।
दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयन वर्धनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ: उनकी कमर में चमकती हुई करधनी है। वे योगी के हृदय-कमल रूपी आसन पर विराजमान हैं। वे परम दर्शनीय, अत्यंत शांत और मन तथा नेत्रों को आनंद प्रदान करने वाले हैं।
अपीच्यदर्शनं शश्वत् सर्वलोकनमस्कृतम् ।
सन्तं वयसि कैशोरे भृत्यानुग्रहकातरम् ॥ १७ ॥
भावार्थ: उनका दर्शन अत्यंत मनोहर है। वे सब लोकों द्वारा वंदनीय हैं, नित्य कैशोर (किशोरावस्था) अवस्था में रहते हैं, और अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए सदा आतुर (उत्सुक) रहते हैं।
कीर्तन्यतीर्थयशसं पुण्यश्लोकयशस्करम् ।
ध्यायेद्देवं समग्राङ्गं यावन्न च्यवते मनः ॥ १८ ॥
भावार्थ: उनका यश पवित्र तीर्थों के समान है और वे अपने भक्तों (पुण्यश्लोकों) का भी यश बढ़ाने वाले हैं। योगी को भगवान के इस सर्वांग सुंदर रूप का तब तक ध्यान करना चाहिए, जब तक मन वहाँ से हटे नहीं (स्थिर हो जाए)।
स्थितं व्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशयम् ।
प्रेक्षणीयेहितं ध्यायेत् शुद्धभावेन चेतसा ॥ १९ ॥
भावार्थ: चाहे भगवान खड़े हों, चल रहे हों, बैठे हों, या लेटे हों—हृदय की गुफा में निवास करने वाले उन प्रभु की परम सुंदर लीलाओं का शुद्ध भाव से चिंतन (ध्यान) करना चाहिए।
तस्मिन्लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।
विलक्ष्यैकत्र संयुज्याद् अङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥
भावार्थ: जब चित्त भगवान के सर्वांग स्वरूप पर स्थिर हो जाए, तब मुनि को उस चित्त को भगवान के एक-एक अंग (पार्ट) पर एकाग्र करना चाहिए।
सञ्चिन्तयेद् भगवतश्चरणारविन्दं
वज्राङ्कुशध्वज सरोरुह लाञ्छनाढ्यम् ।
उत्तुङ्गरक्तविलसन् नखचक्रवाल
ज्योत्स्नाभिराहतमहद् हृदयान्धकारम् ॥ २१ ॥
भावार्थ: सबसे पहले भगवान के चरण-कमलों का ध्यान करना चाहिए, जो वज्र, अंकुश, ध्वजा और कमल के चिह्नों से युक्त हैं; और जिनके ऊँचे, लाल और चमकते हुए नखों की चाँदनी हृदय के घोर अंधकार को नष्ट कर देती है।
यच्छौचनिःसृतसरित् प्रवरोदकेन ।
तीर्थेन मूर्ध्न्यधिकृतेन शिवः शिवोऽभूत् ।
ध्यातुर्मनःशमलशैलनिसृष्टवज्रं
ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम् ॥ २२ ॥
भावार्थ: जिन चरणों को धोने से श्रेष्ठ नदी (गंगा) का जल प्रकट हुआ, जिसे अपने सिर पर धारण करके स्वयं भगवान शिव 'कल्याणस्वरूप' (शिव) हो गए; और जो ध्यान करने वाले के मन के पाप रूपी पहाड़ों को नष्ट करने के लिए वज्र के समान हैं—भगवान के उन चरण-कमलों का देर तक ध्यान करना चाहिए।
जानुद्वयं जलजलोचनया जनन्या
लक्ष्म्याखिलस्य सुरवन्दितया विधातुः ।
ऊर्वोर्निधाय करपल्लवरोचिषा यत्
संलालितं हृदि विभोरभवस्य कुर्यात् ॥ २३ ॥
भावार्थ: इसके बाद भगवान के उन दोनों घुटनों का हृदय में ध्यान करना चाहिए, जिन्हें सम्पूर्ण विश्व की माता, कमल-नयनी और देवताओं द्वारा वंदित लक्ष्मीजी अपनी जांघों पर रखकर अपने पल्लव-समान कोमल हाथों से सहलाती (दबाती) रहती हैं।
ऊरू सुपर्णभुजयोरधि शोभमानौ
ओजोनिधी अतसिकाकुसुमावभासौ ।
व्यालम्बिपीतवरवाससि वर्तमान
काञ्चीकलापपरिरम्भि नितम्बबिम्बम् ॥ २४ ॥
भावार्थ: गरुड़ जी के कंधों पर सुशोभित भगवान की उन जांघों (ऊरू) का ध्यान करें, जो बल (ओज) की भंडार हैं और अलसी के फूल के समान श्याम वर्ण की हैं। फिर उनके नितंब-बिंब का ध्यान करें, जिस पर लटकता हुआ पीताम्बर और उसे बांधने वाली स्वर्ण-करधनी सुशोभित है।
नाभिह्रदं भुवनकोशगुहोदरस्थं
यत्रात्मयोनिधिषणाखिललोकपद्मम् ।
व्यूढं हरिन्मणिवृषस्तनयोरमुष्य
ध्यायेद् द्वयं विशदहारमयूखगौरम् ॥ २५ ॥
भावार्थ: भगवान के उस उदर (पेट) का ध्यान करें जो ब्रह्मांड-कोश का आधार है, और उस नाभि-रूपी सरोवर का ध्यान करें जहाँ से ब्रह्मा जी का आश्रय रूपी कमल उत्पन्न हुआ है। फिर भगवान के दोनों सुंदर और श्रेष्ठ स्तनों का ध्यान करें, जो पन्ने (हरिन्मणि) के समान श्याम हैं और मोतियों के हार की किरणों से गोरे प्रतीत हो रहे हैं।
वक्षोऽधिवासमृषभस्य महाविभूतेः
पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम् ।
कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं
कुर्यान्मनस्यखिल लोकनमस्कृतस्य ॥ २६ ॥
भावार्थ: सम्पूर्ण लोकों द्वारा नमस्कृत भगवान के उस वक्षस्थल (छाती) का ध्यान करें, जो महाविभूति (महालक्ष्मी) का निवास स्थान है तथा मनुष्यों के मन और नेत्रों को आनंद देने वाला है। फिर उस सुंदर कण्ठ (गले) का ध्यान करें, जो कौस्तुभ मणि की शोभा बढ़ाने वाला है।
बाहूंश्च मन्दरगिरेः परिवर्तनेन
निर्णिक्तबाहुवलयान् अधिलोकपालान् ।
सञ्चिन्तयेद् दशशतारमसह्यतेजः
शङ्खं च तत्करसरोरुहराजहंसम् ॥ २७ ॥
भावार्थ: उन भुजाओं का ध्यान करें, जिनके बाजूबंद मंदराचल पर्वत को मथने से रगड़ खाकर अधिक चमक उठे हैं और जो लोकपालों की भी रक्षक हैं। फिर असह्य तेज वाले हजार अरों (चक्र के तीलियों) वाले सुदर्शन चक्र और भगवान के हाथ रूपी कमल में राजहंस के समान सुशोभित पाञ्चजन्य शंख का चिंतन करें।
कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत
दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।
मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां
चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥ २८ ॥
भावार्थ: भगवान की प्यारी कौमोदकी गदा का स्मरण करें, जो शत्रु-योद्धाओं के खून के कीचड़ से सनी हुई है। फिर भंवरों की गूँज से मुखरित वनमाला और भगवान के कंठ में जगमगाती निर्मल कौस्तुभ मणि (जो जीव-तत्त्व का प्रतीक है) का ध्यान करें।
भृत्यानुकम्पितधियेह गृहीतमूर्तेः
सञ्चिन्तयेद् भगवतो वदनारविन्दम् ।
यद्विस्फुरन् मकरकुण्डलवल्गितेन ।
विद्योतितामलकपोलमुदारनासम् ॥ २९ ॥
भावार्थ: भक्तों पर कृपा करने के लिए ही जिन्होंने यह रूप धारण किया है, उन भगवान के मुख-कमल का चिंतन करें। उनकी नासिका सुंदर और ऊंची है, तथा चमकते हुए मकर-कुण्डलों के हिलने से उनके निर्मल गाल (कपोल) प्रकाशित हो रहे हैं।
यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानं
भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् ।
मीनद्वयाश्रयमधिक्षिपदब्जनेत्रं
ध्यायेन् मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ ३० ॥
भावार्थ: जो लक्ष्मी (सौंदर्य) का निवास-स्थान है, जो घुंघराले बालों से घिरा है (मानो भंवरे उसकी परिक्रमा कर रहे हों), और जो अपनी सुंदरता से दो मछलियों वाले कमल (नेत्रों) को भी लजा रहा है; भगवान के उस चंचल भौंहों वाले मुख का आलस्य त्यागकर मन ही मन ध्यान करना चाहिए।
तस्यावलोकमधिकं कृपयातिघोर
तापत्रयोपशमनाय निसृष्टमक्ष्णोः ।
स्निग्धस्मितानुगुणितं विपुलप्रसादं
ध्यायेच्चिरं विपुलभावनया गुहायाम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: भगवान के नेत्रों की उस अत्यंत कृपामयी चितवन (दृष्टि) का हृदय-गुफा में बहुत देर तक और गहरे भाव से ध्यान करें, जो अत्यंत घोर तीनों तापों (कष्टों) को शांत करने के लिए ही प्रकट हुई है और जो प्रेमभरी मुस्कान तथा अपार कृपा से युक्त है।
हासं हरेरवनताखिललोकतीव्र
शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम् ।
सम्मोहनाय रचितं निजमाययास्य
भ्रूमण्डलं मुनिकृते मकरध्वजस्य ॥ ३२ ॥
भावार्थ: भगवान की उस अत्यंत उदार मुस्कान का ध्यान करें, जो शरणागत हुए संपूर्ण लोकों के तीव्र शोक रूपी आँसुओं के सागर को सुखा देती है। और कामदेव (मकरध्वज) को भी मुग्ध करने के लिए अपनी माया से रची गई भगवान की उस भौंह (भ्रूमण्डल) का ध्यान करें।
ध्यानायनं प्रहसितं बहुलाधरोष्ठ
भासारुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति ।
ध्यायेत्स्वदेहकुहरेऽवसितस्य विष्णोः
भक्त्यार्द्रयार्द्रितमना न पृथग्दिदृक्षेत् ॥ ३३ ॥
भावार्थ: अपने हृदय-गुफा में विराजमान भगवान विष्णु के उस ध्यान करने योग्य (खुलकर) हास्य का चिंतन करें, जिसमें उनके अरुण होंठों की लालिमा से उनके छोटे-छोटे दाँत कुन्दकली की तरह चमकते हैं। प्रेम से भीगे मन वाले योगी को उस हास्य का ऐसा ध्यान करना चाहिए कि फिर वह किसी अन्य वस्तु को देखने की इच्छा ही न करे।
एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो
भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात् ।
औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः
तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ ३४ ॥
भावार्थ: इस प्रकार भगवान श्रीहरि में शुद्ध प्रेम प्राप्त कर लेने पर, भक्ति के कारण उस योगी का हृदय पिघल जाता है, आनंद से शरीर में रोमांच हो आता है और प्रेम की अधिकता से बार-बार आँखों से आँसू छलकने लगते हैं। उस समय वह योगी ध्यान में लगे हुए अपने चित्त रूपी कांटे (बडिश) को भी धीरे-धीरे विषयों से अलग कर लेता है।
मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं विरक्तं
निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः ।
आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेकम्
अन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः ॥ ३५ ॥
भावार्थ: जब मन सभी आश्रयों और विषयों से मुक्त होकर विरक्त हो जाता है, तब वह उसी प्रकार तुरंत शांत (निर्वाण) हो जाता है, जैसे बिना ईंधन के अग्नि शांत हो जाती है। उस अवस्था में प्रकृति के गुणों का प्रवाह रुक जाता है और पुरुष अपनी अद्वैत (एक) आत्मा का साक्षात् (बिना किसी बाधा के) दर्शन कर लेता है।
सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या
तस्मिन् महिम्न्यवसितः सुखदुःखबाह्ये ।
हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्यत्
स्वात्मन्विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठः ॥ ३६ ॥
भावार्थ: मन की उस अंतिम निवृत्ति (समाधि) के द्वारा, जब जीव अपने उस महान स्वरूप (परमात्मा) में स्थित हो जाता है जो सुख-दुःख से परे है; तब उसे यह अनुभव होता है कि सुख और दुःख का कारण तो अज्ञानवश अहंकार (असत् कर्ता) को आत्मा में मान लेना ही था। अब उसे परमतत्त्व की प्राप्ति हो चुकी है।
देहं च तं न चरमः स्थितमुत्थितं वा
सिद्धो विपश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम् ।
दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥ ३७ ॥
भावार्थ: जिस प्रकार मदिरा (शराब) के नशे में धुत व्यक्ति यह नहीं जान पाता कि उसके शरीर पर कपड़े हैं या गिर गए हैं, उसी प्रकार जो सिद्ध योगी अपने स्वरूप को प्राप्त कर चुका है (चरम अवस्था में है), वह इस शरीर को नहीं देखता कि यह प्रारब्धवश बैठा है, खड़ा है, या नष्ट हो गया है।
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत्
स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः ।
तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः
स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ ३८ ॥
भावार्थ: यद्यपि प्राणों के साथ यह शरीर प्रारब्ध के अधीन रहकर तब तक जीवित रहता है जब तक इसके आरम्भक कर्म शेष रहते हैं; परन्तु समाधियोग की चरम सीमा पर पहुँचकर आत्मतत्त्व को जगाने वाला (ज्ञानी) व्यक्ति इस शरीर और इसके प्रपंच को स्वप्न के समान मिथ्या जानकर फिर कभी स्वीकार नहीं करता।
यथा पुत्राच्च वित्ताच्च पृथङ्मर्त्यः प्रतीयते ।
अप्यात्मत्वेनाभिमताद् देहादेः पुरुषस्तथा ॥ ३९ ॥
भावार्थ: जिस प्रकार पुत्र और धन से मनुष्य (आत्मा) स्पष्टतः अलग समझा जाता है, उसी प्रकार अत्यंत प्रिय (आत्मा के समान माने जाने वाले) इस शरीर आदि से भी पुरुष (आत्मा) सर्वथा अलग ही है।
यथोल्मुकाद् विस्फुलिङ्गाद् धूमाद्वापि स्वसम्भवात् ।
अप्यात्मत्वेनाभिमताद् यथाग्निः पृथगुल्मुकात् ॥ ४० ॥
भावार्थ: जैसे जलती हुई लकड़ी, चिंगारी और अपने से ही उत्पन्न धुएं से अग्नि अलग होती है; वैसे ही आत्मा भी अपने द्वारा ही प्रकाशित किए गए इस शरीर आदि से बिल्कुल अलग है।
भूतेन्द्रियान्तःकरणात् प्रधानात् जीवसंज्ञितात् ।
आत्मा तथा पृथग्द्रष्टा भगवान् ब्रह्मसंज्ञितः ॥ ४१ ॥
भावार्थ: पंचभूत, इन्द्रिय, अन्तःकरण (मन-बुद्धि), प्रधान (प्रकृति) और जीव (अहंकार) कहलाने वाले इन सबसे आत्मा (परमात्मा) सर्वथा अलग है। वह इन सबका साक्षी (द्रष्टा), सर्वशक्तिमान (भगवान) और साक्षात 'ब्रह्म' है।
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षेतान् अन्यभावेन भूतेष्विव तदात्मताम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ: योगी को चाहिए कि वह सभी प्राणियों में अपनी आत्मा को और अपनी आत्मा में सभी प्राणियों को देखे। उसे अनन्य भाव से सर्वत्र उसी प्रकार एक ही आत्मा को देखना चाहिए, जैसे सभी भौतिक वस्तुओं में एक ही तत्त्व (मिट्टी या जल आदि) व्याप्त रहता है।
स्वयोनिषु यथा ज्योतिः एकं नाना प्रतीयते ।
योनीनां गुणवैषम्यात् तथात्मा प्रकृतौ स्थितः ॥ ४३ ॥
भावार्थ: जिस प्रकार एक ही अग्नि अपने प्रकट होने के स्थानों (लकड़ियों के आकार-प्रकार) की भिन्नता के कारण अलग-अलग रूप में दिखाई देती है, उसी प्रकार एक ही आत्मा विभिन्न शरीरों (प्रकृति) में स्थित होने पर अलग-अलग जीवों के रूप में प्रतीत होता है।
तस्माद् इमां स्वां प्रकृतिं दैवीं सदसदात्मिकाम् ।
दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४४ ॥
भावार्थ: इसलिए योगी को चाहिए कि वह कार्य-कारण रूप (सदसदात्मिका), अत्यंत दुर्जेय और भगवान की इस दैवी प्रकृति (माया) को अपने ज्ञान से जीतकर (पराभाव्य) अपने वास्तविक स्वरूप (ब्रह्मभाव) में स्थित हो जाए।

