श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - तृतीयस्कन्धः
कर्मविपाक-निरूपणं नाम त्रिंशोऽध्यायः
कपिल उवाच
तस्यैतस्य जनो नूनं नायं वेदोरुविक्रमम् ।
काल्यमानोऽपि बलिनो वायोरिव घनावलिः ॥ १ ॥
भावार्थ: भगवान कपिल कहते हैं — जैसे बादलों का समूह अत्यंत बलवान वायु के द्वारा (इधर-उधर) हाँका जाता है, फिर भी वह वायु के बल को नहीं जानता; वैसे ही यह मनुष्य सर्वशक्तिमान काल (ईश्वर) के द्वारा मृत्यु की ओर हाँके जाने पर भी उसके अपार पराक्रम को नहीं जानता।
यं यं अर्थमुपादत्ते दुःखेन सुखहेतवे ।
तं तं धुनोति भगवान् पुमान्छोचति यत्कृते ॥ २ ॥
भावार्थ: मनुष्य सुख पाने के लिए बड़े दुःख (परिश्रम) से जिन-जिन वस्तुओं (धन-सम्पत्ति आदि) को इकट्ठा करता है, भगवान (कालरूप से) उन सभी वस्तुओं को नष्ट कर देते हैं। तब वह मनुष्य उनके लिए (नष्ट होने पर) घोर शोक करता है।
यदध्रुवस्य देहस्य सानुबन्धस्य दुर्मतिः ।
ध्रुवाणि मन्यते मोहाद् गृहक्षेत्रवसूनि च ॥ ३ ॥
भावार्थ: वह मूर्ख (दुर्मति) मनुष्य इस अनित्य (विनाशशील) शरीर और उससे जुड़े हुए सगे-संबंधियों के लिए घर, खेत (ज़मीन) और धन-सम्पत्ति को अज्ञानवश नित्य (हमेशा रहने वाला) मान बैठता है।
जन्तुर्वै भव एतस्मिन् यां यां योनिमनुव्रजेत् ।
तस्यां तस्यां स लभते निर्वृतिं न विरज्यते ॥ ४ ॥
भावार्थ: जीव इस संसार में अपने कर्मों के अनुसार जिस-जिस योनि (पशु, पक्षी, कीड़े आदि) में जन्म लेता है, उसी-उसी योनि में उसे सुख मिलने लगता है और वह कभी भी उस योनि से विरक्त (उदास) नहीं होता।
नरकस्थोऽपि देहं वै न पुमान् त्यक्तुमिच्छति ।
नारक्यां निर्वृतौ सत्यां देवमायाविमोहितः ॥ ५ ॥
भावार्थ: भगवान की माया से मोहित होकर जीव नरक (मल-मूत्र आदि) में रहते हुए भी (सूअर-कीड़े आदि की योनि में) वहां के तुच्छ सुखों में मग्न रहता है और उस गंदे शरीर को भी छोड़ना नहीं चाहता।
आत्मजायासुतागार पशुद्रविण बन्धुषु ।
निरूढमूलहृदय आत्मानं बहु मन्यते ॥ ६ ॥
भावार्थ: वह शरीर, पत्नी, पुत्र, घर, पशु, धन और सगे-संबंधियों में इतनी गहराई से अपना हृदय (आसक्ति) गड़ा लेता है कि वह इन सबके कारण स्वयं को बहुत बड़ा (महान) मानने लगता है।
सन्दह्यमानसर्वाङ्ग एषां उद्वहनाधिना ।
करोति अविरतं मूढो दुरितानि दुराशयः ॥ ७ ॥
भावार्थ: उन (स्त्री-पुत्र आदि) के भरण-पोषण की चिंता में उसके सारे अंग हमेशा जलते (कष्ट पाते) रहते हैं। फिर भी वह मूर्ख और दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य उनके लिए निरंतर पाप कर्म करता रहता है।
आक्षिप्तात्मेन्द्रियः स्त्रीणां असतीनां च मायया ।
रहो रचितयालापैः शिशूनां कलभाषिणाम् ॥ ८ ॥
भावार्थ: एकांत में स्त्रियों द्वारा रची गई (दिखावटी) माया से और तोतली बोली बोलने वाले छोटे बच्चों की मीठी बातों से उसकी आत्मा और इन्द्रियां पूरी तरह आकर्षित (मोहित) हो जाती हैं।
गृहेषु कूटधर्मेषु दुःखतन्त्रेष्वतन्द्रितः ।
कुर्वन् दुखप्रतीकारं सुखवन्मन्यते गृही ॥ ९ ॥
भावार्थ: वह आसक्त गृहस्थ उन घरों में, जहाँ केवल कपट-धर्म और दुःखों का ही ताना-बाना बुना हुआ है, दिन-रात सावधान (अतन्द्रित) रहकर केवल दुःखों का प्रतिकार (इलाज) करता है (जैसे भूख लगने पर खाना, ठंड लगने पर कपड़े पहनना), और उसी प्रतिकार को वह 'सुख' मान बैठता है।
अर्थैरापादितैर्गुर्व्या हिंसयेतः ततश्च तान् ।
पुष्णाति येषां पोषेण शेषभुग्यात्यधः स्वयम् ॥ १० ॥
भावार्थ: वह इधर-उधर से भारी हिंसा (पाप) करके कमाए हुए धन से उन परिजनों का पालन-पोषण करता है, और उनके खाने के बाद बचे हुए अन्न को खाकर (शेषभुक्) स्वयं तो अधोगति (नरक) में ही जाता है।
वार्तायां लुप्यमानायां आरब्धायां पुनः पुनः ।
लोभाभिभूतो निःसत्त्वः परार्थे कुरुते स्पृहाम् ॥ ११ ॥
भावार्थ: जब उसके व्यापार (आजीविका) बार-बार शुरू करने पर भी नष्ट हो जाते हैं, तब वह बलहीन (निःसत्त्व) व्यक्ति लोभ में अंधा होकर दूसरों के धन को हड़पने की इच्छा करने लगता है।
कुटुम्बभरणाकल्पो मन्दभाग्यो वृथोद्यमः ।
श्रिया विहीनः कृपणो ध्यायन् श्वसिति मूढधीः ॥ १२ ॥
भावार्थ: जब वह अभागा परिवार का पेट पालने में असमर्थ हो जाता है और उसके सारे प्रयास (मेहनत) बेकार हो जाते हैं, तब धन (श्री) से हीन होकर वह मूर्ख दीन-हीन अवस्था में लंबी-लंबी सांसें भरता हुआ चिंता में डूब जाता है।
एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तथा ।
नाद्रियन्ते यथा पूर्वं कीनाशा इव गोजरम् ॥ १३ ॥
भावार्थ: इस प्रकार उसे अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ देखकर उसकी पत्नी और बच्चे आदि उसका वैसा आदर नहीं करते जैसा पहले करते थे; ठीक वैसे ही जैसे कंजूस और स्वार्थी किसान बूढ़े बैल का आदर नहीं करते।
तत्राप्यजातनिर्वेदो भ्रियमाणः स्वयम्भृतैः ।
जरयोपात्तवैरूप्यो मरणाभिमुखो गृहे ॥ १४ ॥
भावार्थ: इतना अपमान सहने पर भी उसे वैराग्य नहीं होता। जिन लोगों को उसने पाला था, वे ही अब उसे किसी तरह पालते हैं। वृद्धावस्था के कारण उसका शरीर कुरूप (भद्दा) हो जाता है और वह घर में मृत्यु की बाट जोहता रहता है।
आस्तेऽवमत्योपन्यस्तं गृहपाल इवाहरन् ।
आमयाव्यप्रदीप्ताग्निः अल्पाहारोऽल्पचेष्टितः ॥ १५ ॥
भावार्थ: वह घर के पालतू कुत्ते की तरह अपमान सहते हुए, जो कुछ रूखा-सूखा मिल जाए उसी को खाता हुआ पड़ा रहता है। उसे तरह-तरह की बीमारियां घेर लेती हैं, उसकी जठराग्नि (पाचन शक्ति) मंद हो जाती है, वह बहुत कम खाता है और हिलने-डुलने में भी लाचार हो जाता है।
वायुनोत्क्रमतोत्तारः कफसंरुद्धनाडिकः ।
कासश्वासकृतायासः कण्ठे घुरघुरायते ॥ १६ ॥
भावार्थ: जब मृत्यु के समय प्राणवायु शरीर से निकलने लगती है, तो उसकी आँखें ऊपर चढ़ जाती हैं। कफ (बलगम) के कारण सांस की नलियां (नाड़ियां) रुक जाती हैं। वह खांसने और सांस लेने में भारी कष्ट पाता है और उसके गले से 'घुर-घुर' की आवाज निकलने लगती है।
शयानः परिशोचद्भिः परिवीतः स्वबन्धुभिः ।
वाच्यमानोऽपि न ब्रूते कालपाशवशं गतः ॥ १७ ॥
भावार्थ: वह खाट पर पड़ा रहता है। उसके सगे-संबंधी (स्त्री-पुत्र आदि) उसके चारों ओर खड़े होकर रोते-कलपते हैं। काल (मृत्यु) के पाश में बंध जाने के कारण, उनके बार-बार पुकारने पर भी वह कुछ बोल नहीं पाता।
एवं कुटुम्बभरणे व्यापृतात्माजितेन्द्रियः ।
म्रियते रुदतां स्वानां उरुवेदनयास्तधीः ॥ १८ ॥
भावार्थ: इस प्रकार जीवन भर केवल अपने परिवार का पेट पालने में लगा हुआ और इन्द्रियों का गुलाम (अजितेन्द्रिय) वह व्यक्ति, अपने सगे-संबंधियों के रोते रहने पर भी, मृत्यु की भयानक पीड़ा सहता हुआ बेहोशी (अस्तधीः) की हालत में मर जाता है।
यमदूतौ तदा प्राप्तौ भीमौ सरभसेक्षणौ ।
स दृष्ट्वा त्रस्तहृदयः शकृन् मूत्रं विमुञ्चति ॥ १९ ॥
भावार्थ: उस समय भयानक रूप वाले और क्रोध से लाल आंखों वाले दो यमदूत वहाँ आ पहुँचते हैं। उन्हें देखते ही वह डर के मारे थर-थर कांपने लगता है और भयभीत होकर मल-मूत्र त्याग देता है।
यातनादेह आवृत्य पाशैर्बद्ध्वा गले बलात् ।
नयतो दीर्घमध्वानं दण्ड्यं राजभटा यथा ॥ २० ॥
भावार्थ: वे यमदूत उसके उस जीव को (यातना सहने वाले सूक्ष्म शरीर में डालकर) उसके गले में फांसी का फंदा डालकर बलपूर्वक ऐसे घसीटते हुए लंबे रास्ते (यमलोक) पर ले जाते हैं, जैसे राजा के सिपाही किसी अपराधी को ले जाते हैं।
तयोर्निर्भिन्नहृदयः तर्जनैर्जातवेपथुः ।
पथि श्वभिर्भक्ष्यमाण आर्तोऽघं स्वमनुस्मरन् ॥ २१ ॥
भावार्थ: यमदूतों की डरावनी डांट-डपट से उसका हृदय कांपने लगता है और वह रास्ते में कुत्तों द्वारा नोचे जाने पर (भयंकर दुःख सहते हुए) अत्यंत दुखी होकर अपने किए हुए पापों को याद करता है।
क्षुत्तृट्परीतोऽर्कदवानलानिलैः
सन्तप्यमानः पथि तप्तवालुके ।
कृच्छ्रेण पृष्ठे कशया च ताडितः
चलत्यशक्तोऽपि निराश्रमोदके ॥ २२ ॥
भावार्थ: वह रास्ते में भूख-प्यास से तड़पता है, तपते हुए सूर्य, दावानल (जंगल की आग) और गर्म हवाओं से झुलसता है। वहां न तो कोई छाया (आश्रम) होती है और न ही पानी। पैरों के नीचे तपती हुई बालू (रेत) होती है और यमदूत पीठ पर कोड़े मारते हैं, जिससे वह चलने में असमर्थ होने पर भी बड़ी मुश्किल से घिसटता हुआ चलता है।
तत्र तत्र पतन्छ्रान्तो मूर्च्छितः पुनरुत्थितः ।
पथा पापीयसा नीतस्तरसा यमसादनम् ॥ २३ ॥
भावार्थ: वह थक कर बार-बार रास्ते में गिर पड़ता है, बेहोश हो जाता है और फिर उठ खड़ा होता है। इस प्रकार उस पापी को घोर कष्टदायक रास्ते से घसीटते हुए शीघ्र ही यमलोक (यमराज के भवन) पहुँचा दिया जाता है।
योजनानां सहस्राणि नवतिं नव चाध्वनः ।
त्रिभिर्मुहूर्तैर्द्वाभ्यां वा नीतः प्राप्नोति यातनाः ॥ २४ ॥
भावार्थ: वह रास्ता निन्यानवे हजार (99,000) योजन (लगभग 12 लाख किलोमीटर) लंबा है, जिसे वह पापी केवल दो-तीन मुहूर्त (लगभग 2 घंटे) में ही पार करा दिया जाता है, और फिर वह वहां भयंकर नरक-यातनाएं भोगता है।
आदीपनं स्वगात्राणां वेष्टयित्वोल्मुकादिभिः ।
आत्ममांसादनं क्वापि स्वकृत्तं परतोऽपि वा ॥ २५ ॥
भावार्थ: नरक में कहीं उसके शरीर को जलती हुई लकड़ियों (उल्मुक) से लपेटकर जलाया जाता है, और कहीं यमदूतों द्वारा काटे गए उसके अपने ही मांस को उसे जबरदस्ती खिलाया जाता है या कुत्ते आदि उसका मांस खाते हैं।
जीवतश्चान्त्राभ्युद्धारः श्वगृध्रैर्यमसादने ।
सर्पवृश्चिक दंशाद्यैः दशद्भिश्चात्मवैशसम् ॥ २६ ॥
भावार्थ: यमलोक में जीते-जी (होश में रहते हुए) कुत्तों और गिद्धों द्वारा उसकी आंतें बाहर खींच ली जाती हैं। कहीं उसे सांप, बिच्छू और डाँस (जहरीले कीड़े) काटते हैं और वह भयंकर पीड़ा (वैशस) भोगता है।
कृन्तनं चावयवशो गजादिभ्यो भिदापनम् ।
पातनं गिरिशृङ्गेभ्यो रोधनं चाम्बुगर्तयोः ॥ २७ ॥
भावार्थ: कहीं उसके अंगों को कुल्हाड़ी से एक-एक करके काटा जाता है; कहीं पागल हाथियों के पैरों तले रौंदवाया जाता है; कहीं ऊंचे पहाड़ों की चोटियों से नीचे फेंका जाता है; और कहीं उसे अंधेरे गड़्ढों या जल में डुबोकर (रोधन) रखा जाता है।
यास्तामिस्रान्धतामिस्रा रौरवाद्याश्च यातनाः ।
भुङ्क्ते नरो वा नारी वा मिथः सङ्गेन निर्मिताः ॥ २८ ॥
भावार्थ: मनुष्य (नर हो या नारी) स्त्री-पुरुष के आपस के गैर-कानूनी (अवैध) संबंधों (व्यभिचार) से उत्पन्न हुए पापों के कारण तामिस्र, अन्धतामिस्र और रौरव आदि भयंकर नरकों की ये यातनाएं भोगता है।
अत्रैव नरकः स्वर्ग इति मातः प्रचक्षते ।
या यातना वै नारक्यः ता इहाप्युपलक्षिताः ॥ २९ ॥
भावार्थ: हे माता! विद्वान लोग कहते हैं कि स्वर्ग और नरक इसी पृथ्वी पर भी हैं; क्योंकि नरक में मिलने वाली जो घोर यातनाएं (कष्ट) हैं, वे यहाँ (पृथ्वी पर भयंकर रोगों या कष्टों के रूप में) भी देखी जाती हैं।
एवं कुटुम्बं बिभ्राण उदरम्भर एव वा ।
विसृज्येहोभयं प्रेत्य भुङ्क्ते तत्फलमीदृशम् ॥ ३० ॥
भावार्थ: इस प्रकार जो व्यक्ति पाप कर्मों के द्वारा केवल अपने परिवार का पालन-पोषण करता है या केवल अपना पेट भरता है, वह अपने उस परिवार और इस शरीर—दोनों को यहीं छोड़कर परलोक में इस प्रकार के भयंकर फल (नरक) भोगता है।
एकः प्रपद्यते ध्वान्तं हित्वेदं स्वकलेवरम् ।
कुशलेतरपाथेयो भूतद्रोहेण यद् भृतम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: जिन परिजनों को उसने दूसरों के साथ द्रोह (पाप) करके पाला था, वे परिजन तो यहीं रह जाते हैं और वह इस शरीर को छोड़कर अपने पाप-रूपी गठरी (पाथेय) को साथ लेकर अकेला ही घोर अन्धकारमय नरक में गिरता है।
दैवेनासादितं तस्य शमलं निरये पुमान् ।
भुङ्क्ते कुटुम्बपोषस्य हृतवित्त इवातुरः ॥ ३२ ॥
भावार्थ: दैव (ईश्वर) की आज्ञा से नरक में पड़ा हुआ वह पापी पुरुष, अपने परिवार के पालन के लिए किए गए पापों (शमल) का भयंकर फल वैसे ही व्याकुल होकर भोगता है, जैसे कोई व्यक्ति अपना सब कुछ (धन) लुट जाने पर तड़पता है।
केवलेन हि अधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुकः ।
याति जीवोऽन्धतामिस्रं चरमं तमसः पदम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ: जो जीव केवल अधर्म (पाप, चोरी, बेईमानी) के द्वारा ही अपने परिवार का भरण-पोषण करने में लगा रहता है, वह 'अन्धतामिस्र' नामक सबसे भयंकर और घोर अंधकार वाले नरक में जाता है।
अधस्तात् नरलोकस्य यावतीर्यातनादयः ।
क्रमशः समनुक्रम्य पुनरत्राव्रजेच्छुचिः ॥ ३४ ॥
भावार्थ: मृत्युलोक के नीचे (नरकों में) जितनी भी प्रकार की यातनाएं (कष्ट) हैं, उन सबको अपने कर्मों के अनुसार बारी-बारी से भोगकर, जब वह जीव पापों से शुद्ध (छुट्ट) हो जाता है, तब वह पुनः इस पृथ्वीलोक पर जन्म लेता है।

