श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - तृतीयस्कन्धः
भक्तियोग-कालमहिमा-निरूपणं नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः
देवहूतिरुवाच
लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च ।
स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत्पारमार्थिकम् ॥ १ ॥
भावार्थ: देवहूति ने कहा — हे प्रभो! आपने महतत्त्व आदि तत्वों का, प्रकृति का और पुरुष का जो पारमार्थिक स्वरूप (लक्षण) बताया है, उसे मैंने समझ लिया है, जिससे उनका वास्तविक स्वरूप स्पष्ट होता है।
यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत्प्रचक्षते ।
भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥ २ ॥
भावार्थ: हे प्रभो! आपने सांख्य शास्त्र में जिसका निरूपण किया है और जिसे इन सब तत्त्वों का मूल (आधार) कहा जाता है, उस भक्तियोग के मार्ग का अब मुझे विस्तारपूर्वक वर्णन करके सुनाइए।
विरागो येन पुरुषो भगवन् सर्वतो भवेत् ।
आचक्ष्व जीवलोकस्य विविधा मम संसृतीः ॥ ३ ॥
भावार्थ: हे भगवन्! जीव (मनुष्य) को जिस प्रकार सब ओर से वैराग्य हो जाए, उसके लिए आप जीवों के इस संसार-चक्र की विभिन्न योनियों (जन्म-मरण के कष्टों) का भी वर्णन कीजिए।
कालस्येश्वररूपस्य परेषां च परस्य ते ।
स्वरूपं बत कुर्वन्ति यद्धेतोः कुशलं जनाः ॥ ४ ॥
भावार्थ: हे प्रभो! जो स्वयं साक्षात् ईश्वर का रूप है और जो सबसे परे (महान) है, उस काल का भी स्वरूप बताइए; जिसके डर (कारण) से लोग पुण्य-कर्म (कुशल) करते हैं।
लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुषः
चिरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये ।
श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धिया
त्वमाविरासीः किल योगभास्करः ॥ ५ ॥
भावार्थ: यह सारा संसार मिथ्या (झूठे) अभिमान में पड़ा है, अज्ञान के कारण नेत्रहीन (अचक्षु) हो गया है, और बिना किसी आश्रय के लंबे समय से घोर अंधकार में सोया हुआ है। कर्मों में फंसी हुई बुद्धि के कारण यह थक गया है। ऐसे अज्ञानी जीवों को जगाने के लिए ही आप 'योग-रूपी सूर्य' (योगभास्कर) बनकर प्रकट हुए हैं।
मैत्रेय उवाच
इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं प्रतिनन्द्य महामुनिः ।
आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दितः ॥ ६ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी कहते हैं — हे कुरुश्रेष्ठ (विदुर)! अपनी माता के इन मधुर वचनों का अभिनंदन करके, करुणा से भरे हुए महामुनि भगवान कपिल जी ने प्रसन्न होकर उनसे इस प्रकार कहा।
श्रीभगवानुवाच
भक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते ।
स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते ॥ ७ ॥
भावार्थ: श्रीभगवान कपिल ने कहा — हे भामिनि (माता)! लोगों के स्वभाव और गुणों (सत्त्व, रज, तम) के अनुसार उनके भाव (विचार) अलग-अलग होते हैं; इसी कारण से भक्तियोग का मार्ग भी कई प्रकार का (बहुविध) माना जाता है।
अभिसन्धाय यो हिंसां दम्भं मात्सर्यमेव वा ।
संरम्भी भिन्नदृग्भावं मयि कुर्यात्स तामसः ॥ ८ ॥
भावार्थ: जो व्यक्ति हिंसा, दम्भ (दिखावा), या डाह (ईर्ष्या) को मन में रखकर, क्रोधित स्वभाव (संरम्भी) से और भेद-बुद्धि रखकर मेरी भक्ति (पूजा-पाठ) करता है, वह 'तामस भक्त' है।
विषयान् अभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव वा ।
अर्चादौ अर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः ॥ ९ ॥
भावार्थ: जो व्यक्ति सांसारिक विषयों, यश (कीर्ति) या धन-ऐश्वर्य की कामना से, भेद-भाव (मुझसे अलग मानकर) रखते हुए मूर्तियों आदि में मेरी पूजा करता है, वह 'राजस भक्त' है।
कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् ।
यजेद् यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ १० ॥
भावार्थ: जो व्यक्ति अपने पाप-कर्मों का नाश करने के लिए, या भगवान को ही सब कुछ अर्पण करने के भाव से, अथवा 'ईश्वर की पूजा करना मेरा कर्तव्य है' ऐसा मानकर भेद-भाव से ही मेरी पूजा करता है, वह 'सात्त्विक भक्त' है।
मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये ।
मनोगतिः अविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ ११ ॥
भावार्थ: जिस प्रकार गंगा का जल बिना रुके निरंतर समुद्र की ओर बहता है, उसी प्रकार मेरे गुणों का श्रवण करते ही, सबके हृदय की गुफा में रहने वाले मुझ परमात्मा में जब मन की गति (वृत्ति) अखंड रूप से (बिना किसी रुकावट के) प्रवाहित होने लगती है...
लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम् ।
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥ १२ ॥
भावार्थ: ...तो यही 'निर्गुण भक्तियोग' का लक्षण कहा गया है। यह परम पुरुष (पुरुषोत्तम) में की जाने वाली अहैतुकी (बिना किसी फल की इच्छा के) और अव्यवहिता (बिना किसी अन्य आड़ के/निरंतर) भक्ति है।
सालोक्यसार्ष्टिसामीप्य सारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥ १३ ॥
भावार्थ: ऐसे निष्काम भक्त मेरी सेवा को छोड़कर सालोक्य (मेरे लोक में रहना), सार्ष्टि (मेरे समान ऐश्वर्य), सामीप्य (मेरे पास रहना), सारूप्य (मेरे समान रूप) और एकत्व (मुझमें लीन हो जाना - सायुज्य) मुक्ति दिए जाने पर भी उन्हें स्वीकार नहीं करते।
स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः ।
येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते ॥ १४ ॥
भावार्थ: यही आत्यन्तिक (सर्वोच्च) भक्तियोग कहलाता है, जिसके द्वारा भक्त प्रकृति के तीनों गुणों को पार करके मेरे भाव (भगवत्स्वरूप/दिव्य प्रेम) को प्राप्त कर लेता है।
निषेवितेनानिमित्तेन स्वधर्मेण महीयसा ।
क्रियायोगेन शस्तेन नातिहिंस्रेण नित्यशः ॥ १५ ॥
भावार्थ: निष्काम भाव से (अनित्तेन) अपने महान स्वधर्म का नित्य पालन करने से, शास्त्रों में बताए गए क्रियायोग (पूजा-पाठ) द्वारा, और जिस कर्म में तनिक भी हिंसा न हो उसे करने से...
मद्धिष्ण्य दर्शनस्पर्श पूजास्तुति अभिवन्दनैः ।
भूतेषु मद्भावनया सत्त्वेनासङ्गमेन च ॥ १६ ॥
भावार्थ: ...मेरी मूर्ति के दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वंदन करने से; सभी प्राणियों में मेरा ही दर्शन करने से (मद्भावनया); धैर्य-सत्त्वगुण धारण करने से, और विषयों से आसक्ति छोड़ने (असंग) से...
महतां बहुमानेन दीनानां अनुकम्पया ।
मैत्र्या चैवात्मतुल्येषु यमेन नियमेन च ॥ १७ ॥
भावार्थ: ...महान लोगों (संतों) का बहुत आदर करने से, दीनों (दुखियों) पर दया करने से, अपने समान वालों से मित्रता करने से, तथा यम (अहिंसा, सत्य आदि) और नियम (शौच, संतोष आदि) का पालन करने से...
आध्यात्मिकानुश्रवणात् नामसङ्कीर्तनाच्च मे ।
आर्जवेनार्यसङ्गेन निरहङ्क्रियया तथा ॥ १८ ॥
भावार्थ: ...आध्यात्मिक शास्त्रों को सुनने से, मेरे नामों का संकीर्तन (कीर्तन) करने से, मन की सरलता (आर्जव) से, श्रेष्ठ पुरुषों (आर्यों) की संगति करने से, और अहंकार का त्याग करने से...
मद् धर्मणो गुणैः एतैः परिसंशुद्ध आशयः ।
पुरुषस्याञ्जसाभ्येति श्रुतमात्रगुणं हि माम् ॥ १९ ॥
भावार्थ: ...इन भगवद्धर्म रूपी गुणों का पालन करने से जिस पुरुष का अंतःकरण (आशय) पूरी तरह शुद्ध हो जाता है, वह मेरे गुणों को सुनते ही सहज रूप से (अञ्जसा) मेरी ओर खिंच आता है (मुझे प्राप्त कर लेता है)।
यथा वातरथो घ्राणं आवृङ्क्ते गन्ध आशयात् ।
एवं योगरतं चेत आत्मानं अविकारि यत् ॥ २० ॥
भावार्थ: जिस प्रकार वायु रूपी रथ पर बैठकर गंध अपने स्थान (पुष्प आदि) से उड़कर नासिका (नाक) तक पहुँच जाती है, उसी प्रकार विकाररहित (निर्मल) और भक्तियोग में लगा हुआ चित्त (मन) परमात्मा तक पहुँच जाता है।
अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा ।
तं अवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम् ॥ २१ ॥
भावार्थ: मैं सभी प्राणियों में उनकी आत्मा (भूतात्मा) के रूप में सदा विराजमान हूँ। मुझ अंतर्यामी का अपमान करके (मुझे जीवों में न देखकर) जो मनुष्य केवल मूर्ति की पूजा करता है, वह मात्र पाखंड (विडंबना) ही करता है।
यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् ।
हित्वार्चां भजते मौढ्याद् भस्मन्येव जुहोति सः ॥ २२ ॥
भावार्थ: जो मनुष्य सभी प्राणियों में स्थित मुझ परमेश्वर (आत्मा) को छोड़कर मूर्खतावश केवल मूर्ति की पूजा करता है, वह मानो राख (भस्म) में ही हवन कर रहा है (अर्थात उसका सारा प्रयास व्यर्थ है)।
द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिनः ।
भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति ॥ २३ ॥
भावार्थ: जो अभिमानी व्यक्ति दूसरों के शरीर में रहने वाले मुझसे द्वेष करता है और सबमें भेद देखता है, तथा अन्य प्राणियों से बैर बांधे रहता है, उसके मन को कभी भी शांति नहीं मिल सकती।
अहमुच्चावचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्नयानघे ।
नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिनः ॥ २४ ॥
भावार्थ: हे निष्पाप माता! जो मनुष्य अन्य प्राणियों का अपमान करता है, वह चाहे मेरी मूर्ति की कितनी भी महंगी-महंगी वस्तुओं और उत्तम विधियों (क्रियाओं) से पूजा कर ले, मैं उससे कभी प्रसन्न नहीं होता।
अर्चादौ अर्चयेत्तावद् ईश्वरं मां स्वकर्मकृत् ।
यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥
भावार्थ: मनुष्य को अपने धर्म का पालन करते हुए तब तक मूर्ति आदि में मुझ ईश्वर की पूजा करनी चाहिए, जब तक उसे यह ज्ञान न हो जाए कि मैं उसके अपने हृदय में और समस्त प्राणियों में विराजमान हूँ।
आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् ।
तस्य भिन्नदृशो मृत्युः विदधे भयमुल्बणम् ॥ २६ ॥
भावार्थ: जो मनुष्य अपने और दूसरों के बीच तनिक सा भी भेद (अंतर) मानता है, उस भेद-दृष्टि वाले मनुष्य के लिए मैं (परमात्मा ही) 'मृत्यु' बनकर भयंकर भय उत्पन्न करता हूँ।
अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम् ।
अर्हयेद् दानमानाभ्यां मैत्र्याभिन्नेन चक्षुषा ॥ २७ ॥
भावार्थ: इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सभी प्राणियों में मुझे ही अंतर्यामी रूप से स्थित माने और दान, सम्मान, मित्रता तथा अभेद (सम) दृष्टि से उन सब प्राणियों के रूप में मेरी ही पूजा करे।
जीवाः श्रेष्ठा हि अजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे ।
ततः सचित्ताः प्रवराः ततश्चेन्द्रियवृत्तयः ॥ २८ ॥
भावार्थ: हे शुभे! जड़ (निर्जीव) पदार्थों से सजीव (प्राणी) श्रेष्ठ हैं; सजीवों में श्वास लेने वाले (वृक्ष आदि) श्रेष्ठ हैं; उनसे जिनमें चेतना (चित्त) है, वे श्रेष्ठ हैं; और उनसे भी वे श्रेष्ठ हैं जिनमें इन्द्रियों की वृत्तियां हैं।
तत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः ।
तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठाः ततः शब्दविदो वराः ॥ २९ ॥
भावार्थ: इन्द्रिय वालों में भी केवल स्पर्श जानने वालों से रस जानने वाले (मछली आदि) श्रेष्ठ हैं; रस जानने वालों से गंध जानने वाले (भंवरे आदि) श्रेष्ठ हैं; और गंध जानने वालों से शब्द सुनने वाले (सांप आदि) श्रेष्ठ हैं।
रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः ।
तेषां बहुपदाः श्रेष्ठाः चतुष्पादस्ततो द्विपात् ॥ ३० ॥
भावार्थ: शब्द सुनने वालों से रूप देखने वाले (कौवा आदि) श्रेष्ठ हैं; उनसे दोनों ओर दांतों वाले (पशु) श्रेष्ठ हैं; उनमें से भी बहुत पैरों वाले (गोजर आदि) श्रेष्ठ हैं; उनसे चार पैरों वाले (पशु) श्रेष्ठ हैं; और उनसे भी दो पैरों वाले (मनुष्य) श्रेष्ठ हैं।
ततो वर्णाश्च चत्वारः तेषां ब्राह्मण उत्तमः ।
ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो हि, अर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः ॥ ३१ ॥
भावार्थ: मनुष्यों में चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) श्रेष्ठ हैं। उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ है। ब्राह्मणों में जो वेद को जानता है वह श्रेष्ठ है, और वेद जानने वालों में जो वेदों का अर्थ (तात्पर्य) जानता है, वह अधिक श्रेष्ठ है।
अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वकर्मकृत् ।
मुक्तसङ्गस्ततो भूयात् अदोग्धा धर्ममात्मनः ॥ ३२ ॥
भावार्थ: वेदों का अर्थ जानने वाले से भी वह श्रेष्ठ है जो संशयों (संदेहों) को काट सके; उससे भी वह श्रेष्ठ है जो अपने धर्म (कर्म) का पालन करता है; और उससे भी श्रेष्ठ वह है जो आसक्तिरहित होकर (मुक्तसंग) निष्काम भाव से अपने धर्म का पालन करता है।
तस्मान्मय्यर्पिताशेष क्रियार्थात्मा निरन्तरः ।
मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि सन्न्यस्तकर्मणः ।
न पश्यामि परं भूतं अकर्तुः समदर्शनात् ॥ ३३ ॥
भावार्थ: परन्तु इन सबसे श्रेष्ठ वह है जिसने अपने समस्त कर्म, उनके फल और अपना शरीर (आत्मा) मुझे अर्पित कर दिया है, जो निरंतर मुझमें लगा है और समदर्शी (सबमें मुझे देखने वाला) है। ऐसे निष्काम भक्त से बढ़कर मैं किसी अन्य प्राणी को श्रेष्ठ नहीं मानता।
मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहुमानयन् ।
ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ ३४ ॥
भावार्थ: इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सभी प्राणियों को मन ही मन अत्यंत सम्मान देते हुए यह मानकर प्रणाम करे कि साक्षात भगवान ही जीव-रूप (कण) में इन सबमें प्रविष्ट (विद्यमान) हैं।
भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः ।
ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत् ॥ ३५ ॥
भावार्थ: हे मानवी (मनुपुत्री देवहूति)! मैंने तुम्हें 'भक्तियोग' और 'अष्टांग योग' दोनों का उपदेश दिया है। इन दोनों में से किसी एक का भी आश्रय लेकर मनुष्य परम पुरुष (भगवान) को प्राप्त कर सकता है।
एतद्भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः ।
परं प्रधानं पुरुषं दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: वही परब्रह्म परमात्मा अपने सगुण रूप में भगवान है। वही प्रकृति (प्रधान), पुरुष (जीवात्मा) और दैव (काल/कर्म) के रूप में यह सारा प्रपंच (संसार) रचता है।
रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते ।
भूतानां महदादीनां यतो भिन्नदृशां भयम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ: जो विभिन्न रूपों (वस्तुओं) में भेद (परिवर्तन) उत्पन्न करता है, उसी दिव्य शक्ति को 'काल' कहा जाता है। महतत्त्व आदि से लेकर सभी प्राणियों में जो भेद-बुद्धि रखते हैं, उन्हें इसी काल से भय लगता है।
योऽन्तः प्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रयः ।
स विष्ण्वाख्योऽधियज्ञोऽसौ कालः कलयतां प्रभुः ॥ ३८ ॥
भावार्थ: जो सबके आश्रय रूप भगवान विष्णु हैं, वे ही प्राणियों के भीतर प्रविष्ट होकर एक प्राणी के द्वारा दूसरे प्राणी का संहार करते हैं; वे ही यज्ञों के स्वामी (अधियज्ञ) और सबका नाश करने वालों के भी महाप्रभु (काल) हैं।
न चास्य कश्चिद् दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः ।
आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९ ॥
भावार्थ: इस काल का न तो कोई प्यारा है, न कोई शत्रु है, और न ही कोई सगा-संबंधी है। यह सदा सावधान (अप्रमत्त) रहता है और जो लोग मोह-माया में असावधान (प्रमत्त) पड़े हैं, यह उनका अंत (विनाश) कर देता है।
यद्भयाद् वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति यद्भयात् ।
यद्भयाद् वर्षते देवो भगणो भाति यद्भयात् ॥ ४० ॥
भावार्थ: इसी काल (ईश्वर) के भय से पवन (हवा) बहता है; इसी के भय से सूर्य तपता है; इसी के भय से इन्द्र (देव) वर्षा करते हैं, और इसी के भय से तारों का समूह (भगण) चमकता है।
यद् वनस्पतयो भीता लताश्चौषधिभिः सह ।
स्वे स्वे कालेऽभिगृह्णन्ति पुष्पाणि च फलानि च ॥ ४१ ॥
भावार्थ: इसी के भय से सारी वनस्पतियाँ, लताएं और ओषधियां अपने-अपने निश्चित समय पर फूल और फल धारण करती हैं।
स्रवन्ति सरितो भीता नोत्सर्पत्युदधिर्यतः ।
अग्निरिन्धे सगिरिभिः भूर्न मज्जति यद्भयात् ॥ ४२ ॥
भावार्थ: इसी के डर से नदियां निरंतर बहती हैं; समुद्र अपनी मर्यादा नहीं लांघता; अग्नि प्रज्वलित होती है; और पर्वतों सहित यह पृथ्वी जल में नहीं डूबती।
नभो ददाति श्वसतां पदं यन्नियमाददः ।
लोकं स्वदेहं तनुते महान् सप्तभिरावृतम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ: इसी काल के नियम के कारण आकाश सभी श्वास लेने वाले प्राणियों को अवकाश (जगह) देता है, और महतत्त्व अपने सात आवरणों (अहंकार, पंचतन्मात्राओं) से युक्त इस ब्रह्मांड रूपी शरीर का विस्तार करता है।
गुणाभिमानिनो देवाः सर्गादिष्वस्य यद्भयात् ।
वर्तन्तेऽनुयुगं येषां वश एतच्चराचरम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: यह चराचर जगत जिन देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि) के अधीन है, वे गुणों के अभिमानी देवता भी इसी काल के भय से युग-युग में सृष्टि की रचना आदि अपने-अपने कार्यों में लगे रहते हैं।
सोऽनन्तोऽन्तकरः कालो अनादिरादिकृदव्ययः ।
जनं जनेन जनयन् मारयन् मृत्युनान्तकम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ: वह काल अनंत (जिसका कोई पार नहीं) है, स्वयं आदि-रहित (अनादि) होकर भी सबका आदि-कारण है, और वह अव्यय (अविनाशी) है। वह पिता के द्वारा पुत्र को जन्म देता है (जनयन्) और फिर अंत में मृत्यु के द्वारा स्वयं मृत्यु (यमराज) को भी मार देता है (अर्थात प्रलयकाल में सब उसी में लीन हो जाते हैं)।

