श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - चतुर्थस्कन्धः
अङ्गवंशवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः
सूत उवाच
निशम्य कौषारविणोपवर्णितं
ध्रुवस्य वैकुण्ठपदाधिरोहणम् ।
प्ररूढभावो भगवत्यधोक्षजे
प्रष्टुं पुनस्तं विदुरः प्रचक्रमे ॥ १ ॥
भावार्थ: सूत जी ने कहा — महर्षि मैत्रेय (कौषारवि) द्वारा ध्रुव जी के वैकुंठ लोक जाने की यह कथा सुनकर, विदुर जी के हृदय में भगवान् अधोक्षज (श्रीहरि) के प्रति प्रेम और भी गहरा हो गया। तब उन्होंने मैत्रेय जी से पुनः पूछना आरंभ किया।
विदुर उवाच
के ते प्रचेतसो नाम कस्यापत्यानि सुव्रत ।
कस्यान्ववाये प्रख्याताः कुत्र वा सत्रमासत ॥ २ ॥
भावार्थ: विदुर जी ने पूछा — हे उत्तम व्रत वाले! प्रचेताओं के नाम से जो प्रसिद्ध हैं, वे कौन थे और किनकी संतान थे? वे किस वंश (कुल) में उत्पन्न हुए थे और उन्होंने कहाँ पर अपना यज्ञ (सत्र) किया था?
मन्ये महाभागवतं नारदं देवदर्शनम् ।
येन प्रोक्तः क्रियायोगः परिचर्याविधिर्हरेः ॥ ३ ॥
भावार्थ: मैं देवर्षि नारद को बहुत बड़ा भगवद्भक्त मानता हूँ, जिन्हें साक्षात भगवान के दर्शन प्राप्त हैं। उन्होंने ही ध्रुव जी को श्रीहरि की सेवा (भक्ति) करने की विधि और क्रिया-योग (ध्यान और पूजा का तरीका) सिखाया था।
स्वधर्मशीलैः पुरुषैः भगवान् यज्ञपूरुषः ।
इज्यमानो भक्तिमता नारदेनेरितः किल ॥ ४ ॥
भावार्थ: (यह सुना गया है कि) जब अपने धर्म का पालन करने वाले प्रचेताओं ने यज्ञपुरुष भगवान की आराधना की थी, तब वहाँ परम भक्त नारद जी ने ही उन्हें भगवान की महिमा का उपदेश दिया था।
यास्ता देवर्षिणा तत्र वर्णिता भगवत्कथाः ।
मह्यं शुश्रूषवे ब्रह्मन् कार्त्स्न्येनाचष्टुमर्हसि ॥ ५ ॥
भावार्थ: हे ब्रह्मन्! देवर्षि नारद ने उस यज्ञ में जो-जो भगवत कथाएँ सुनाई थीं, मैं उन्हें सुनने के लिए अत्यंत उत्सुक हूँ। कृपया आप मुझे वे सारी कथाएँ विस्तार से सुनाएँ।
मैत्रेय उवाच
ध्रुवस्य चोत्कलः पुत्रः पितरि प्रस्थिते वनम् ।
सार्वभौमश्रियं नैच्छद् अधिराजासनं पितुः ॥ ६ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — ध्रुव जी के वन चले जाने पर, उनके बड़े पुत्र 'उत्कल' ने संपूर्ण पृथ्वी के उस महान राज्य (सार्वभौम ऐश्वर्य) और पिता के सिंहासन को स्वीकार नहीं किया।
स जन्मनोपशान्तात्मा निःसङ्गः समदर्शनः ।
ददर्श लोके विततं आत्मानं लोकमात्मनि ॥ ७ ॥
भावार्थ: वह उत्कल जन्म से ही अत्यंत शांत स्वभाव वाला, संसार की आसक्तियों से मुक्त और सबको एक समान दृष्टि से देखने वाला था। वह स्वयं (आत्मा) को सारे संसार में फैला हुआ और सारे संसार को अपनी आत्मा में ही देखता था।
आत्मानं ब्रह्म निर्वाणं प्रत्यस्तमितविग्रहम् ।
अवबोधरसैकात्म्यं आनन्दं अनुसन्ततम् ॥ ८ ॥
भावार्थ: वह अपनी आत्मा को ही वह परब्रह्म मानता था जो परम शांति (निर्वाण) स्वरूप है, जिसमें देह-अभिमान (विग्रह) पूरी तरह नष्ट हो चुका है, जो केवल ज्ञान-रस से भरा हुआ है और निरंतर अखंड आनंद के रूप में स्थित है।
अव्यवच्छिन्नयोगाग्नि दग्धकर्ममलाशयः ।
स्वरूपमवरुन्धानो नात्मनोऽन्यं तदैक्षत ॥ ९ ॥
भावार्थ: उसने निरंतर चलने वाले योग रूपी अग्नि से अपने कर्मों और वासनाओं (मलाशय) को पूरी तरह जला दिया था। वह अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) में इस प्रकार लीन था कि उसे अपने सिवा (आत्मा के सिवा) संसार में कोई दूसरी वस्तु दिखाई ही नहीं देती थी।
जडान्धबधिरोन्मत्त मूकाकृतिरतन्मतिः ।
लक्षितः पथि बालानां प्रशान्तार्चिः इवानलः ॥ १० ॥
भावार्थ: क्योंकि उसका मन संसार (शरीर) में नहीं था, इसलिए अज्ञानी (बालक/साधारण) लोगों को वह मूर्ख (जड़), अंधा, बहरा, पागल और गूंगा सा लगता था, ठीक वैसे ही जैसे आग बुझ जाने के बाद बिना लपटों वाला शांत कोयला दिखता है (जिसके भीतर आग छिपी रहती है)।
मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समंत्रिणः ।
वत्सरं भूपतिं चक्रुः यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११ ॥
भावार्थ: उसे मूर्ख और पागल समझकर, कुल के बड़े-बूढ़ों और मंत्रियों ने मिलकर ध्रुव जी की दूसरी पत्नी 'भ्रमि' के छोटे पुत्र 'वत्सर' को राजा बना दिया।
स्वर्वीथिर्वत्सरस्येष्टा भार्यासूत षडात्मजान् ।
पुष्पार्णं तिग्मकेतुं च इषमूर्जं वसुं जयम् ॥ १२ ॥
भावार्थ: राजा वत्सर की प्रिय पत्नी 'स्वर्वीथि' ने छह पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम थे — पुष्पार्ण, तिग्मकेतु, इष, ऊर्ज, वसु और जय।
पुष्पार्णस्य प्रभा भार्या दोषा च द्वे बभूवतुः ।
प्रातर्मध्यन्दिनं सायं इति ह्यासन् प्रभासुताः ॥ १३ ॥
भावार्थ: पुष्पार्ण की दो पत्नियाँ थीं — प्रभा और दोषा। प्रभा के गर्भ से तीन पुत्र हुए — प्रातः, मध्यंदिन (दोपहर) और सायं।
प्रदोषो निशिथो व्युष्ट इति दोषासुतास्त्रयः ।
व्युष्टः सुतं पुष्करिण्यां सर्वतेजसमादधे ॥ १४ ॥
भावार्थ: और दोषा के भी तीन पुत्र हुए — प्रदोष, निशीथ (आधी रात) और व्युष्ट (भोर)। व्युष्ट ने अपनी पत्नी 'पुष्करिणी' के गर्भ से 'सर्वतेजा' नामक एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र उत्पन्न किया।
स चक्षुः सुतमाकूत्यां पत्न्यां मनुं अवाप ह ।
मनोरसूत महिषी विरजान्नड्वला सुतान् ॥ १५ ॥
भावार्थ: सर्वतेजा ने अपनी पत्नी 'आकूति' से 'चाक्षुष मनु' (छठे मनु) नामक पुत्र प्राप्त किया। मनु की महारानी 'नड्वला' के गर्भ से कई पाप-रहित (विरज) पुत्र उत्पन्न हुए...
पुरुं कुत्सं त्रितं द्युम्नं सत्यवन्तमृतं व्रतम् ।
अग्निष्टोममतीरात्रं प्रद्युम्नं शिबिमुल्मुकम् ॥ १६ ॥
भावार्थ: ...जिनके नाम थे — पुरु, कुत्स, त्रित, द्युम्न, सत्यवान, ऋत, व्रत, अग्निष्टोम, अतीरात्र, प्रद्युम्न, शिबि और उल्मुक।
उल्मुकोऽजनयत् पुत्रान् पुष्करिण्यां षडुत्तमान् ।
अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुं अङ्गिरसं गयम् ॥ १७ ॥
भावार्थ: उल्मुक ने अपनी पत्नी 'पुष्करिणी' (यह नाम पहले भी आ चुका है) के गर्भ से छह उत्तम पुत्र उत्पन्न किए — अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और गय।
सुनीथाङ्गस्य या पत्नी सुषुवे वेनमुल्बणम् ।
यद्दौःशील्यात्स राजर्षिः निर्विण्णो निरगात्पुरात् ॥ १८ ॥
भावार्थ: इनमें से राजा अंग की पत्नी 'सुनीथा' ने 'वेन' नामक एक अत्यंत क्रूर (उल्बण) पुत्र को जन्म दिया। उस पुत्र के दुष्ट स्वभाव (दुराचार) से दुःखी और विरक्त होकर राजर्षि अंग ने अपना नगर छोड़ दिया (और वन चले गए)।
यमङ्ग शेपुः कुपिता वाग्वज्रा मुनयः किल ।
गतासोस्तस्य भूयस्ते ममन्थुर्दक्षिणं करम् ॥ ९९ ॥
भावार्थ: हे विदुर जी! उसी वेन को जब मुनियों ने, जिनकी वाणी ही वज्र के समान है, क्रोधित होकर शाप दे दिया तो वह मर गया। बाद में उन्हीं मुनियों ने मरे हुए वेन के दाहिने हाथ को मथा (रगड़ा)...
अराजके तदा लोके दस्युभिः पीडिताः प्रजाः ।
जातो नारायणांशेन पृथुराद्यः क्षितीश्वरः ॥ २० ॥
भावार्थ: ...क्योंकि राजा के बिना उस समय धरती पर अराजकता फैल गई थी और लुटेरों (चोर-डाकुओं) ने प्रजा को सताना शुरू कर दिया था। उस दाहिने हाथ के मंथन से साक्षात भगवान नारायण के अंश से 'पृथु' प्रकट हुए, जो पृथ्वी के पहले शासक (आदि क्षितीश्वर) कहलाए।
विदुर उवाच
तस्य शीलनिधेः साधोः ब्रह्मण्यस्य महात्मनः ।
राज्ञः कथमभूद् दुष्टा प्रजा यद्विमना ययौ ॥ २१ ॥
भावार्थ: विदुर जी ने पूछा — राजा अंग तो शील (अच्छे स्वभाव) के भंडार, साधु पुरुष, ब्राह्मणों के भक्त और महान आत्मा वाले थे। फिर ऐसे श्रेष्ठ राजा के यहाँ इतना दुष्ट पुत्र (वेन) कैसे पैदा हो गया, जिसके दुःख से वे राज्य छोड़कर चले गए?
किं वांहो वेन उद्दिश्य ब्रह्मदण्डं अयूयुजन् ।
दण्डव्रतधरे राज्ञि मुनयो धर्मकोविदाः ॥ २२ ॥
भावार्थ: और धर्म के ज्ञाता (तत्त्वज्ञानी) मुनियों ने उस वेन में ऐसा कौन सा भारी पाप देखा, जिसके कारण उन्होंने एक राज्याधिकारी (दंड धारण करने वाले राजा) पर अपने ब्रह्मदंड (शाप) का प्रयोग किया?
नावध्येयः प्रजापालः प्रजाभिरघवानपि ।
यदसौ लोकपालानां बिभर्त्योजः स्वतेजसा ॥ २३ ॥
भावार्थ: क्योंकि यदि प्रजा का पालन करने वाला राजा पापी भी हो, तब भी प्रजा (या मुनियों) को उसका अपमान (या वध) नहीं करना चाहिए, क्योंकि राजा अपने तेज से सभी लोकपालों (इंद्र आदि देवताओं) की शक्ति को धारण करता है।
एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् सुनीथात्मज चेष्टितम् ।
श्रद्दधानाय भक्ताय त्वं परावरवित्तमः ॥ २४ ॥
भावार्थ: हे ब्रह्मन्! आप तो परम ज्ञानी (छोटी-बड़ी सभी बातों को जानने वाले) हैं। मैं आपका बड़ा श्रद्धालु और भक्त हूँ। कृपया मुझे सुनीथा के पुत्र (वेन) के इन सभी कार्यों (चरित्र) के बारे में विस्तार से बताइए।
मैत्रेय उवाच
अङ्गोऽश्वमेधं राजर्षिः आजहार महाक्रतुम् ।
नाजग्मुर्देवतास्तस्मिन् आहूता ब्रह्मवादिभिः ॥ २५ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — एक बार राजर्षि अंग ने अश्वमेध नामक एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में ब्रह्मवाचियों (ऋत्विजों) द्वारा बुलाए जाने पर भी कोई भी देवता वहां हवि ग्रहण करने नहीं आया।
तं ऊचुः विस्मितास्तत्र यजमानमथर्त्विजः ।
हवींषि हूयमानानि न ते गृह्णन्ति देवताः ॥ २६ ॥
भावार्थ: यह देखकर वहां उपस्थित ऋत्विजों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने यजमान (राजा अंग) से कहा — "हे राजन्! हम अग्नि में जो आहुतियां (हवि) डाल रहे हैं, देवता उसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं।"
राजन्हवींष्यदुष्टानि श्रद्धयाऽऽसादितानि ते ।
छन्दांस्ययातयामानि योजितानि धृतव्रतैः ॥ २७ ॥
भावार्थ: "हे राजन्! यज्ञ की सामग्री (हवि) बिल्कुल शुद्ध है और आपने इसे पूरी श्रद्धा से जुटाया है। हम व्रतधारी ब्राह्मणों ने जिन वेद-मंत्रों (छन्दों) का उच्चारण किया है, वे भी बिल्कुल शुद्ध और शक्तिपूर्ण (अयातयाम) हैं।"
न विदामेह देवानां हेलनं वयमण्वपि ।
यन्न गृह्णन्ति भागान् स्वान् ये देवाः कर्मसाक्षिणः ॥ २८ ॥
भावार्थ: "हम नहीं जानते कि हमसे देवताओं का तनिक भी कोई अपमान (हेलन) कैसे हो गया, जिसके कारण कर्मों के गवाह (कर्मसाक्षी) देवता अपने-अपने यज्ञ-भाग (हवि) को लेने नहीं आ रहे हैं।"
अङ्गो द्विजवचः श्रुत्वा यजमानः सुदुर्मनाः ।
तत्प्रष्टुं व्यसृजद् वाचं सदस्यान् तदनुज्ञया ॥ २९ ॥
भावार्थ: ब्राह्मणों की यह बात सुनकर यजमान राजा अंग बहुत दुःखी (सुदुर्मना) हुए। उन्होंने ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर वहां बैठे सभासदों (सदस्यों) से इसका कारण पूछने के लिए यह बात कही।
नागच्छन्त्याहुता देवा न गृह्णन्ति ग्रहानिह ।
सदसस्पतयो ब्रूत किमवद्यं मया कृतम् ॥ ३० ॥
भावार्थ: राजा अंग ने कहा — "हे सभासदों! बुलाने पर भी देवता यज्ञ में क्यों नहीं आ रहे हैं और अपना भाग क्यों नहीं ले रहे हैं? कृपया मुझे बताएँ कि मुझसे ऐसा कौन सा पाप (अवद्य) या भूल हो गई है?"
सदसस्पतय ऊचुः
नरदेवेह भवतो नाघं तावन् मनाक् स्थितम् ।
अस्त्येकं प्राक्तनमघं यदिहेदृक् त्वमप्रजः ॥ ३१ ॥
भावार्थ: सभासदों ने उत्तर दिया — "हे राजन् (नरदेव)! आपके इस जन्म में तो लेशमात्र भी कोई पाप नहीं है। लेकिन आपके पिछले जन्म (प्राक्तन) का एक पाप अवश्य है, जिसके कारण आप इस जीवन में अब तक निःसंतान (अपुत्र) हैं।"
तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सुप्रजं नृप ।
इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२ ॥
भावार्थ: "इसलिए हे राजन्, आपका कल्याण हो! आप एक श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति के लिए प्रयास (यज्ञ) करें। यदि आप पुत्र की कामना से यज्ञ करेंगे, तो यज्ञ के भोक्ता भगवान श्रीहरि आपको अवश्य एक पुत्र प्रदान करेंगे।"
तथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः ।
यद् यज्ञपुरुषः साक्षाद् अपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३ ॥
भावार्थ: "और जब आप संतान प्राप्ति के लिए साक्षात यज्ञपुरुष भगवान श्रीहरि को आमंत्रित (वृत) करेंगे, तब उनके साथ अन्य देवता भी आकर अपने-अपने भाग अवश्य ग्रहण करेंगे।"
तांस्तान् कामान् हरिर्दद्याद्यान् यान् कामयते जनः ।
आराधितो यथैवैष तथा पुंसां फलोदयः ॥ ३४ ॥
भावार्थ: "मनुष्य भगवान श्रीहरि से जिस-जिस कामना की इच्छा करता है, भगवान उसकी वे सभी इच्छाएं पूरी कर देते हैं। मनुष्य जिस भाव से उनकी आराधना करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।"
इति व्यवसिता विप्राः तस्य राज्ञः प्रजातये ।
पुरोडाशं निरवपन् शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ ३५ ॥
भावार्थ: ऐसा निश्चय करके, उन ब्राह्मणों ने राजा अंग को पुत्र की प्राप्ति कराने के लिए, यज्ञ में स्थित भगवान विष्णु (शिपिविष्ट) के नाम से पुरोडाश (यज्ञ की आहुति) अर्पण किया।
तस्मात्पुरुष उत्तस्थौ हेममाल्यमलाम्बरः ।
हिरण्मयेन पात्रेण सिद्धमादाय पायसम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: आहुति देते ही उस यज्ञकुण्ड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। वह सोने की माला और श्वेत वस्त्र (अमलाम्बर) पहने हुए था, और उसके हाथों में सोने के एक बर्तन में पकी हुई खीर (पायस) थी।
स विप्रानुमतो राजा गृहीत्वाञ्जलिनौदनम् ।
अवघ्राय मुदा युक्तः प्रादात्पत्न्या उदारधीः ॥ ३७ ॥
भावार्थ: ब्राह्मणों की अनुमति (आज्ञा) पाकर उदार हृदय वाले राजा अंग ने अपनी अंजलि में वह खीर ग्रहण की। उसे सूंघकर वे बहुत प्रसन्न हुए और फिर उसे खाने के लिए अपनी पत्नी (सुनीथा) को दे दिया।
सा तत्पुंसवनं राज्ञी प्राश्य वै पत्युरादधे ।
गर्भं काल उपावृत्ते कुमारं सुषुवेऽप्रजा ॥ ३८ ॥
भावार्थ: रानी सुनीथा ने पुत्र उत्पन्न करने वाली (पुंसवन) उस खीर को खा लिया, जिससे उसने अपने पति से गर्भ धारण किया। समय आने पर, उस संतानहीन रानी ने एक पुत्र (कुमार) को जन्म दिया।
स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः ।
अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवद् अधार्मिकः ॥ ३९ ॥
भावार्थ: वह बालक बचपन से ही अपने नाना 'मृत्यु' (जो अधर्म के अंश से उत्पन्न हुआ था) के स्वभाव पर गया। अपने उस क्रूर नाना का अनुसरण करने के कारण वह बड़ा ही अधर्मी (दुष्ट) बन गया।
स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः ।
हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४० ॥
भावार्थ: वह दुष्ट (असाधु) बालक धनुष-बाण लेकर शिकारी के रूप में जंगलों में घूमने लगा और बेकसूर, बेचारे जानवरों को बेदर्दी से मारने लगा। उसे देखते ही लोग डरकर चिल्ला उठते थे कि "अरे, वह (क्रूर) वेन आ गया!"
आक्रीडे क्रीडतो बालान् वयस्यान् अतिदारुणः ।
प्रसह्य निरनुक्रोशः पशुमारममारयत् ॥ ४१ ॥
भावार्थ: वह इतना भयंकर और निर्दयी (निरनुक्रोश) था कि खेल के मैदान (आक्रीड) में खेलते हुए अपने हमउम्र बच्चों (साथियों) को भी पकड़कर जानवरों की तरह मार डालता था।
तं विचक्ष्य खलं पुत्रं शासनैः विविधैर्नृपः ।
यदा न शासितुं कल्पो भृशं आसीत् सुदुर्मनाः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: राजा अंग ने जब अपने पुत्र को इतना दुष्ट (खल) देखा, तो उन्होंने उसे सुधारने के लिए तरह-तरह के दंड और उपदेश दिए। परन्तु जब वे उसे सुधारने में पूरी तरह असमर्थ (विफल) हो गए, तो वे बहुत ही दुःखी और निराश हो गए।
प्रायेणाभ्यर्चितो देवो येऽप्रजा गृहमेधिनः ।
कदपत्यभृतं दुःखं ये न विन्दन्ति दुर्भरम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ: राजा सोचने लगे — "निश्चय ही उन निःसंतान गृहस्थों ने भगवान की बड़ी अच्छी पूजा (आराधना) की होगी, जिन्हें मेरी तरह कुपुत्र (बुरी संतान) होने का यह असहनीय दुःख नहीं उठाना पड़ता।"
यतः पापीयसी कीर्तिः अधर्मश्च महान् नृणाम् ।
यतो विरोधः सर्वेषां यत आधिरनन्तकः ॥ ४४ ॥
भावार्थ: "ऐसे कुपुत्र से क्या लाभ, जिससे मनुष्य को केवल अपकीर्ति (बदनामी) मिले, घोर अधर्म (पाप) बढ़े, सबके साथ बैर-विरोध हो और जिसके कारण मन में कभी न खत्म होने वाली चिंता (आधि) लगी रहे?"
कस्तं प्रजापदेशं वै मोहबन्धनमात्मनः ।
पण्डितो बहु मन्येत यदर्थाः क्लेशदा गृहाः ॥ ४५ ॥
भावार्थ: "ऐसा कौन बुद्धिमान (पंडित) व्यक्ति होगा जो संतान के रूप में पैदा हुए इस मोह के बंधन (कुपुत्र) को महत्व देगा, जिसके कारण घर का सारा वातावरण केवल दुःख और क्लेश देने वाला बन जाता है?"
कदपत्यं वरं मन्ये सदपत्याच्छुचां पदात् ।
निर्विद्येत गृहान्मर्त्यो यत्क्लेशनिवहा गृहाः ॥ ४६ ॥
भावार्थ: "मैं तो मानता हूँ कि अच्छे (सज्जन) पुत्र से एक बुरा (कुपुत्र) ही अच्छा है। क्योंकि अच्छे पुत्र के मोह में पड़कर मनुष्य घर में ही बँधा रहता है, जबकि बुरे पुत्र से मिलने वाले क्लेशों के कारण मनुष्य को जल्द ही घर से विरक्ति (वैराग्य) हो जाती है।"
एवं स निर्विण्णमना नृपो गृहात्
निशीथ उत्थाय महोदयोदयात् ।
अलब्धनिद्रोऽनुपलक्षितो नृभिः
हित्वा गतो वेनसुवं प्रसुप्ताम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ: इस प्रकार अत्यंत विरक्त और निराश मन वाले राजा अंग को रात भर नींद नहीं आई। आधी रात (निशीथ) के समय वे उठे और अपनी सोती हुई पत्नी (वेन की माता सुनीथा) और उस अत्यंत ऐश्वर्यशाली महल को चुपचाप छोड़कर, किसी को बिना बताए वहाँ से चले गए।
विज्ञाय निर्विद्य गतं पतिं प्रजाः
पुरोहितामात्यसुहृद्गणादयः ।
विचिक्युरुर्व्यामतिशोककातरा
यथा निगूढं पुरुषं कुयोगिनः ॥ ४८ ॥
भावार्थ: जब सुबह प्रजा, पुरोहितों, मंत्रियों और मित्रों को पता चला कि राजा वैराग्य धारण करके कहीं चले गए हैं, तो वे सब दुःख से व्याकुल हो उठे। वे पूरी धरती पर उन्हें ऐसे ढूँढने लगे, जैसे कच्चे (कु) योगी अपने भीतर छिपे परमात्मा (पुरुष) को ढूंढते हैं (पर पा नहीं सकते)।
अलक्षयन्तः पदवीं प्रजापतेः
हतोद्यमाः प्रत्युपसृत्य ते पुरीम् ।
ऋषीन् समेतान् अभिवन्द्य साश्रवो
न्यवेदयन् पौरव भर्तृविप्लवम् ॥ ४९ ॥
भावार्थ: हे पौरव (विदुर)! जब उन्हें अपने राजा के जाने का कोई सुराग (पदवी) नहीं मिला, तो वे सब निराश होकर राजधानी लौट आए। वहाँ एकत्रित मुनियों को प्रणाम करके, आँखों में आँसू भरकर उन्होंने अपने स्वामी (राजा) के लापता होने का दुःखद समाचार सुनाया।

