श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - चतुर्थस्कन्धः
निषादोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच
भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः ।
गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम् ॥ १ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — भृगु आदि मुनिगण, जो सदैव संसार का कल्याण (भलाई) चाहने वाले हैं, उन्होंने जब देखा कि राजा अंग के चले जाने से पृथ्वी का कोई रक्षक (गोप्ता) नहीं रहा और मनुष्य पशुओं के समान आचरण करने लगे हैं (अराजकता फैल गई है)।
वीरमातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मवादिनः ।
प्रकृत्यसम्मतं वेनं अभ्यषिञ्चन् पतिं भुवः ॥ २ ॥
भावार्थ: तब उन ब्रह्मज्ञानी मुनियों ने उस वीर वेन की माता सुनीथा को बुलाकर, मंत्रियों (प्रकृतियों) की असहमति के बावजूद भी, वेन को ही पृथ्वी का राजा बना दिया (क्योंकि कोई और उत्तराधिकारी नहीं था)।
श्रुत्वा नृपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम् ।
निलिल्युर्दस्यवः सद्यः सर्पत्रस्ता इवाखवः ॥ ३ ॥
भावार्थ: जब चोर-डाकुओं को पता चला कि अत्यंत क्रूर (उग्र) शासन करने वाला वेन राजा बन गया है, तो वे तुरंत डरकर ऐसे छिप गए जैसे साँप को देखकर चूहे छिप जाते हैं।
स आरूढनृपस्थान उन्नद्धोऽष्टविभूतिभिः ।
अवमेने महाभागान्स्तब्धः सम्भावितः स्वतः ॥ ४ ॥
भावार्थ: परन्तु वह वेन राजसिंहासन पर बैठते ही आठों लोकपालों की शक्तियों (अष्टविभूतियों) को पाकर घमंड से भर गया। वह स्वयं को सबसे महान समझने लगा और बड़े-बड़े महापुरुषों का अपमान करने लगा।
एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्कुश इव द्विपः ।
पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन् इव रोदसी ॥ ५ ॥
भावार्थ: घमंड में अंधा होकर वह निरंकुश (बिना महावत के) पागल हाथी की तरह हो गया। वह अपने रथ पर सवार होकर, आकाश और पृथ्वी को कँपाते हुए (चारों ओर अत्याचार करते हुए) घूमने लगा।
न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्वचित् ।
इति न्यवारयद् धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः ॥ ६ ॥
भावार्थ: उसने नगाड़े (भेरी) बजवाकर पूरे राज्य में घोषणा करवा दी कि — "हे ब्राह्मणों! अब से कहीं भी कोई यज्ञ (यष्टव्य) नहीं होगा, कोई दान नहीं दिया जाएगा और अग्नि में कोई आहुति (हवन) नहीं डाली जाएगी।" इस प्रकार उसने सभी धार्मिक कार्यों पर रोक लगा दी।
वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम् ।
विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः ॥ ७ ॥
भावार्थ: उस दुष्ट वेन के ऐसे पापपूर्ण कार्यों को देखकर और इससे संसार पर आने वाले भारी संकट (व्यसन) पर विचार करके, यज्ञ करने वाले मुनियों ने दयापूर्वक आपस में कहा।
अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत् ।
दारुणि उभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः ॥ ८ ॥
भावार्थ: मुनियों ने कहा — "अरे! इस समय प्रजा पर दोनों ओर से बड़ा भारी संकट आ पड़ा है। एक ओर चोर-लुटेरों का डर है और दूसरी ओर इस अत्याचारी राजा का। यह तो दोनों सिरों से जलती हुई लकड़ी के बीच में फँसने (चींटियों) जैसी स्थिति हो गई है।"
अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः ।
ततोऽप्यासीद्भयं त्वद्य कथं स्यात् स्वस्ति देहिनाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ: "अराजकता (बिना राजा के अव्यवस्था) के डर से ही हमने इसे राजा बनाया था, यद्यपि यह इसके योग्य नहीं था। लेकिन अब तो इसी राजा से भारी भय पैदा हो गया है, तो फिर अब प्रजा का कल्याण कैसे होगा?"
अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत् ।
वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः ॥ १० ॥
भावार्थ: "जैसे साँप को दूध पिलाने से वह पिलाने वाले को ही डसता है (नुकसान करता है), वैसे ही सुनीथा (मृत्यु की पुत्री) के गर्भ से पैदा हुआ यह वेन तो स्वभाव से ही दुष्ट (खल) है।"
निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः ।
तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मान् तत्पातकं स्पृशेत् ॥ ११ ॥
भावार्थ: "हमने इसे प्रजा की रक्षा करने के लिए नियुक्त किया था, और यह स्वयं प्रजा को ही मारना चाहता है। फिर भी, हम एक बार जाकर इसे समझाएँगे (चेतावनी देंगे), ताकि इसे राजा बनाने का पाप हमें न लगे।"
तद् विद्वद्भिः असद्वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः ।
सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत् ॥ १२ ॥
भावार्थ: "हमने सब कुछ जानते हुए भी इस दुष्ट वेन को राजा बनाया था। अब यदि समझाने पर भी यह पापी (अधर्मकृत्) हमारी बात नहीं मानेगा..."
लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा ।
एवं अध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः ।
उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः ॥ १३ ॥
भावार्थ: "...तो लोगों की निंदा से पहले ही जल चुके इस दुष्ट को हम अपने तेज (शाप) से भस्म कर देंगे।" ऐसा निश्चय करके, अपने क्रोध को छिपाए हुए (गूढमन्यवः) वे मुनि वेन के पास गए और उसे मीठे वचनों (सामनीति) से समझाते हुए बोले।
मुनय ऊचुः
नृपवर्य निबोधैतद् यत्ते विज्ञापयाम भोः ।
आयुःश्रीबलकीर्तीनां तव तात विवर्धनम् ॥ १४ ॥
भावार्थ: मुनियों ने कहा — "हे राजाओं में श्रेष्ठ! हम आपसे जो विनती कर रहे हैं, उसे ध्यान से सुनिए। हे तात! हमारी यह बात आपकी आयु, संपत्ति (श्री), बल और यश को बढ़ाने वाली है।"
धर्म आचरितः पुंसां वाङ्मनःकायबुद्धिभिः ।
लोकान् विशोकान् वितरति अथ अनन्त्यमसङ्गिनाम् ॥ १५ ॥
भावार्थ: "जो व्यक्ति अपने मन, वचन, शरीर और बुद्धि से धर्म का आचरण करता है, उसे वे लोक प्राप्त होते हैं जहाँ कोई शोक (दुःख) नहीं होता (स्वर्ग आदि)। और जो निष्काम भाव (बिना आसक्ति के) से धर्म का पालन करता है, उसे अनंत मोक्ष (अनन्त्यम्) प्राप्त होता है।"
स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः ।
यस्मिन् विनष्टे नृपतिः ऐश्वर्यादवरोहति ॥ १६ ॥
भावार्थ: "हे वीर! इसलिए प्रजा का कल्याण करने वाला वह धर्म आपके यहाँ नष्ट नहीं होना चाहिए। क्योंकि जिस राजा के राज्य में धर्म नष्ट हो जाता है, वह राजा अपने ऐश्वर्य (सिंहासन) से नीचे गिर जाता है (नष्ट हो जाता है)।"
राजन् असाध्वमात्येभ्यः चोरादिभ्यः प्रजा नृपः ।
रक्षन् यथा बलिं गृह्णन् इह प्रेत्य च मोदते ॥ १७ ॥
भावार्थ: "हे राजन्! जो राजा दुष्ट मंत्रियों और चोर-डाकुओं से अपनी प्रजा की रक्षा करता है और न्यायपूर्वक कर (टैक्स/बलि) लेता है, वह इस लोक (पृथ्वी) और परलोक (स्वर्ग) दोनों जगह आनंद भोगता है।"
यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः ।
इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ॥ १८ ॥
भावार्थ: "जिस राजा के देश (राष्ट्र) और नगरों में वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने वाले लोग अपने धर्म के अनुसार यज्ञ-पुरुष भगवान (विष्णु) की पूजा-आराधना करते हैं..."
तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः ।
परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥ १९ ॥
भावार्थ: "...हे महाभाग! जो राजा भगवान की ऐसी आज्ञा (धर्म-शासन) में स्थित रहता है, उस पर सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाले सर्वात्मा भगवान श्रीहरि स्वयं ही अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं।"
तस्मिन् तुष्टे किमप्राप्यं जगतां ईश्वरेश्वरे ।
लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः ॥ २० ॥
भावार्थ: "उन ईश्वरों के भी ईश्वर (विष्णु) के प्रसन्न होने पर इस संसार में ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो राजा को प्राप्त न हो सके? उनके प्रसन्न होने पर सभी लोकपाल (इंद्र आदि देवता) भी आदरपूर्वक उस राजा को भेंट (कर) लाकर देते हैं।"
तं सर्वलोकामरयज्ञसङ्ग्रहं
त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् ।
यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते
राजन् स्वदेशान् अनुरोद्धुमर्हसि ॥ २१ ॥
भावार्थ: "वे भगवान ही सभी लोकों, देवताओं और यज्ञों के स्वामी हैं। वे ही वेद (त्रयी), यज्ञ-सामग्री (द्रव्य) और तपस्या के रूप हैं। अतः हे राजन्! आपको अपने राज्य के लोगों को उन भगवान की विभिन्न यज्ञों द्वारा आराधना करने की अनुमति दे देनी चाहिए, इसी में आपका कल्याण (भवाय) है।"
यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभिः
वितायमानेन सुराः कला हरेः ।
स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं
तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम् ॥ २२ ॥
भावार्थ: "जब आपके राज्य में ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ किए जाएंगे, तो श्रीहरि के अंश स्वरूप सभी देवता (सुराः) प्रसन्न होकर आपको मनचाहा फल देंगे। इसलिए हे वीर! आपको उन देवताओं का तिरस्कार (यज्ञों को रोकना) नहीं करना चाहिए।"
वेन उवाच
बालिशा बत यूयं वा अधर्मे धर्ममानिनः ।
ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जारं पतिमुपासते ॥ २३ ॥
भावार्थ: वेन ने कहा — "अरे मूर्खों (बालिशा)! तुम लोग अधर्म को ही धर्म मान बैठे हो। जो लोग अपने अन्नदाता (वृत्ति देने वाले) असली पति (राजा) को छोड़कर किसी दूसरे पर-पुरुष (ईश्वर) की उपासना करते हैं, वे उस बुरी औरत की तरह हैं जो अपने पति को छोड़कर जार (प्रेमी) के पास जाती है।"
अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् ।
नानुविन्दन्ति ते भद्रं इह लोके परत्र च ॥ २४ ॥
भावार्थ: "जो मूर्ख (मूढ़) लोग राजा के रूप में साक्षात ईश्वर (अर्थात मेरा) अपमान करते हैं, उनका न तो इस लोक में कोई कल्याण होता है और न ही परलोक में।"
को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी ।
भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ: "कौन है वह यज्ञपुरुष, जिसके प्रति तुम लोगों की इतनी अधिक भक्ति है? तुम्हारी यह भक्ति तो वैसी ही है, जैसे अपने पति के प्रेम से दूर होकर कुलटा स्त्रियां किसी दूसरे पुरुष (जार) से प्रेम करती हैं।"
विष्णुर्विरिञ्चो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रविः ।
पर्जन्यो धनदः सोमः क्षितिरग्निरपाम्पतिः ॥ २६ ॥
भावार्थ: "विष्णु, ब्रह्मा (विरिञ्च), शिव (गिरिश), इंद्र, वायु, यमराज, सूर्य, बादल (पर्जन्य), कुबेर (धनद), चंद्रमा (सोम), पृथ्वी, अग्नि और वरुण (अपाम्पति)..."
एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः ।
देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २७ ॥
भावार्थ: "...ये सभी और इनके अलावा वरदान और शाप देने वाले अन्य जितने भी देवता हैं, वे सब राजा के ही शरीर में निवास करते हैं। इसलिए राजा सर्वदेवमय (सभी देवताओं का स्वरूप) है।"
तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः ।
बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान् ॥ २८ ॥
भावार्थ: "इसलिए हे ब्राह्मणों! अपने ईर्ष्या-द्वेष को छोड़कर अपने सभी कर्मों (यज्ञों) द्वारा केवल मेरी ही पूजा करो और मुझे ही सारी भेंट (बलि) अर्पण करो। मेरे सिवा ऐसा कौन है जो यज्ञ का पहला भाग (अग्रभाग) खाने का अधिकारी हो?"
मैत्रेय उवाच
इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः ।
अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टमङ्गलः ॥ २९ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — इस प्रकार जिसकी बुद्धि उल्टी हो गई थी (विपर्ययमति), गलत रास्ते पर चलने वाले उस महापापी और अमंगलकारी वेन ने मुनियों के समझाने (प्रार्थना करने) पर भी उनकी बात नहीं मानी।
इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना ।
भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः ॥ ३० ॥
भावार्थ: हे विदुर! स्वयं को बड़ा ज्ञानी मानने वाले उस वेन के द्वारा इस प्रकार अपमानित होने पर, और लोककल्याण के लिए की गई अपनी प्रार्थना को ठुकराए जाने पर, उन मुनियों को बहुत भयानक क्रोध आ गया।
हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः ।
जीवन् जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: वे मुनि चिल्ला उठे — "मार डालो! मार डालो इस पापी को! यह स्वभाव से ही अत्यंत क्रूर (दारुण) है। यदि यह जीवित रहा, तो निश्चय ही बहुत जल्दी पूरी दुनिया को जलाकर राख (भस्म) कर देगा।"
नायमर्हत्यसद्वृत्तो नरदेववरासनम् ।
योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रपः ॥ ३२ ॥
भावार्थ: "यह दुराचारी वेन राजाओं के इस श्रेष्ठ सिंहासन पर बैठने के लायक नहीं है। यह इतना निर्लज्ज (बेशरम) है कि स्वयं यज्ञों के स्वामी भगवान विष्णु की निंदा कर रहा है।"
को वैनं परिचक्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम् ।
प्राप्त ईदृशमैश्वर्यं यदनुग्रहभाजनः ॥ ३३ ॥
भावार्थ: "जिन भगवान् की कृपा से इसे ऐसा महान राज-ऐश्वर्य मिला है, उस अमंगलकारी (अशुभ) वेन को छोड़कर और कौन होगा जो उन भगवान की निंदा करेगा?"
इत्थं व्यवसिता हन्तुं हृषयो रूढमन्यवः ।
निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया ॥ ३४ ॥
भावार्थ: इस प्रकार उसे मारने का निश्चय करके, उन क्रोधित मुनियों ने भगवान (अच्युत) की निंदा के कारण पहले से ही मरे हुए (पाप के कारण) उस वेन को, केवल अपनी हुंकार (शाप) से ही मार डाला (इसके लिए उन्हें किसी हथियार की आवश्यकता नहीं पड़ी)।
ऋषिभिः स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम् ।
सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती ॥ ३५ ॥
भावार्थ: ऋषियों के अपने-अपने आश्रम लौट जाने के बाद, वेन की माता सुनीथा ने दुःख में डूबकर, योग-विद्या (मंत्रों/लेपों) के द्वारा अपने पुत्र के उस मृत शरीर (कलेवर) को सड़ाने से बचाकर सुरक्षित रखा।
एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत् सलिलाप्लुताः ।
हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्चक्रुः उपविष्टाः सरित्तटे ॥ ३६ ॥
भावार्थ: एक बार वे ही मुनिगण सरस्वती नदी के जल में स्नान करके और अग्नि में आहुति (हवन) देकर, उसी नदी के किनारे बैठकर भगवान की कथाएँ कर रहे थे।
वीक्ष्योत्थितान् तदोत्पातान् आहुर्लोक भयङ्करान् ।
अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्भुवः ॥ ३७ ॥
भावार्थ: तभी उन्होंने लोगों को डराने वाले भयंकर उत्पात (अशुभ शकुन / आंधियां) उठते हुए देखे, और वे कहने लगे — "राजा के न होने से यह पृथ्वी अनाथ हो गई है, कहीं चोर-डाकुओं (दस्युओं) के कारण इसका कोई बड़ा अमंगल (विनाश) तो नहीं होने वाला है?"
एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम् ।
पांसुः समुत्थितो भूरिः चोराणामभिलुम्पताम् ॥ ३८ ॥
भावार्थ: जब वे ऋषि इस प्रकार सोच (विचार) ही रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि चारों दिशाओं में लूटपाट करते हुए और दौड़ते हुए चोर-डाकुओं के कारण बहुत भारी धूल उड़ रही है।
तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम् ।
भर्तर्युपरते तस्मिन् अन्योन्यं च जिघांसताम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ: उन्हें समझ आ गया कि राजा (वेन) के मरने के बाद लोगों का धन लूटने वाले लुटेरों और एक-दूसरे को मारने के लिए उतारू लोगों (अराजकता) के कारण ही यह भारी उपद्रव मचा हुआ है।
चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम् ।
लोकान्नावारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः ॥ ४० ॥
भावार्थ: यद्यपि वे मुनि अपनी शक्ति से उस उपद्रव को रोकने में पूरी तरह समर्थ थे, फिर भी उन्होंने उस चोरों से भरे हुए, बिना राजा के कमज़ोर राज्य में हो रही उस लूटपाट को नहीं रोका, क्योंकि वे जानते थे कि (बिना राजा के बल का प्रयोग करना मुनियों का काम नहीं है)।
ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः ।
स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्नभाण्डात्पयो यथा ॥ ४१ ॥
भावार्थ: (उन्होंने विचार किया कि) यदि समदर्शी और शांत स्वभाव वाला ब्राह्मण भी दीन-दुखियों की उपेक्षा (अनदेखी) करे, तो उसका ब्रह्मतेज (पुण्य) वैसे ही बहकर नष्ट हो जाता है, जैसे फूटे हुए बर्तन से पानी बह जाता है।
नाङ्गस्य वंशो राजर्षेः एष संस्थातुमर्हति ।
अमोघवीर्या हि नृपा वंशेऽस्मिन् केशवाश्रयाः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: "राजर्षि अंग का यह महान वंश (ध्रुव वंश) इस प्रकार समाप्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस वंश में उत्पन्न होने वाले सभी राजा अमोघ शक्ति वाले (अजेय) और भगवान केशव के परम भक्त होते हैं।"
विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः ।
ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्बाहुको नरः ॥ ४३ ॥
भावार्थ: ऐसा निश्चय करके उन ऋषियों ने मृत राजा वेन की जांघ (ऊरु) को बलपूर्वक मथा (रगड़ा)। उस मंथन से वहां एक बाहुक (बौना/भद्दा) आदमी पैदा हुआ।
काककृष्णोऽतिह्रस्वाङ्गो ह्रस्वबाहुर्महाहनुः ।
ह्रस्वपान् निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताम्रमूर्धजः ॥ ४४ ॥
भावार्थ: उसका रंग कौवे के समान काला था। उसके अंग, भुजाएँ और पैर बहुत छोटे (ह्रस्व) थे। उसका जबड़ा बहुत बड़ा (महाहनु) था, नाक चपटी थी, आँखें लाल थीं और सिर के बाल तांबे के रंग के (भूरे/लाल) थे।
तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम् ।
निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥ ४५ ॥
भावार्थ: जब उस बौने ने झुककर और दीनतापूर्वक मुनियों से पूछा — "मैं क्या करूँ?", तो मुनियों ने कहा, "निषीद!" (अर्थात 'बैठ जा')। हे तात! इसीलिए उस आदमी का नाम 'निषाद' पड़ गया।
तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः ।
येनाहरत् जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ: उसी के वंशज 'निषाद' (भील/कोल) कहलाए, जो आज भी पहाड़ों और जंगलों में निवास करते हैं। पैदा होते ही उस निषाद ने राजा वेन के भयंकर पापों (कल्मष) को अपने भीतर खींच लिया था, जिससे वेन का शरीर पापमुक्त हो गया।

