श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - चतुर्थस्कन्धः
पृथुचरिते एकविंशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच
मौक्तिकैः कुसुमस्रग्भिः दुकूलैः स्वर्णतोरणैः ।
महासुरभिभिर्धूपैः मण्डितं तत्र तत्र वै ॥ १ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — महाराज पृथु की राजधानी को जगह-जगह मोतियों की झालरों, फूलों की मालाओं, रेशमी वस्त्रों, सोने के तोरण-द्वारों और अत्यंत सुगंधित धूप से सजाया गया था।
चन्दनागुरुतोयार्द्र-रथ्याचत्वरमार्गवत् ।
पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैः लाजैरर्चिर्भिरर्चितम् ॥ २ ॥
भावार्थ: नगर की सभी गलियों, चौराहों और मुख्य मार्गों पर चंदन और अगरु (सुगंधित लकड़ी) मिले हुए जल का छिड़काव किया गया था। हर जगह फूल, चावल (अक्षत), फल, जौ के अंकुर, खील (लाजा) और धूप-दीप सजाए गए थे।
सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैः परिष्कृतम् ।
तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलङ्कृतम् ॥ ३ ॥
भावार्थ: रास्तों के दोनों ओर फलों के गुच्छों (वृन्द) वाले केले के खंभे और सुपारी के छोटे-छोटे पेड़ लगाए गए थे। चारों ओर पेड़ों के पत्तों (पल्लवों) की वंदनवारें (मालाएँ) बाँधकर नगर को सुंदर बनाया गया था।
प्रजास्तं दीपबलिभिः संभृताशेषमङ्गलैः ।
अभीयुर्मृष्टकन्याश्च मृष्टकुण्डलमण्डिताः ॥ ४ ॥
भावार्थ: सुंदर कुंडल पहने हुए और सज-धज कर आई हुई कुँवारी कन्याएँ तथा प्रजा के अन्य लोग हाथों में दीपक, भेंट की सामग्रियाँ (बलि) और सभी प्रकार की मंगल-वस्तुएँ लेकर महाराज पृथु के स्वागत के लिए आगे आए।
शङ्खदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्त्विजाम् ।
विवेश भवनं वीरः स्तूयमानो गतस्मयः ॥ ५ ॥
भावार्थ: शंख और दुंदुभि बाजों की ध्वनि, ऋत्विजों के वेद-मंत्रों (ब्रह्मघोष) और स्तुति-गान के बीच, वे महान वीर (महाराज पृथु) बिना किसी घमंड (गतस्मय) के अपने राजमहल में प्रविष्ट हुए।
पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः ।
पौराञ्जानपदान् तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः ॥ ६ ॥
भावार्थ: महायशस्वी महाराज पृथु ने नगरवासियों और गाँव वालों द्वारा जगह-जगह पूजे (सत्कार किए) जाने पर, स्वयं भी प्रसन्न होकर उन सबका यथायोग्य सत्कार किया और उन्हें उनकी मनचाही वस्तुएँ प्रदान कीं।
स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः
कर्माणि भूयांसि महान्महत्तमः ।
कुर्वन्शशासावनिमण्डलं यशः
स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम् ॥ ७ ॥
भावार्थ: निर्दोष (पवित्र) चरित्र वाले और महापुरुषों में श्रेष्ठ (महत्तम) महाराज पृथु, ऐसे ही बहुत से महान कार्य करते हुए इस पृथ्वी (अवनिमंडल) पर शासन करते रहे। अंत में अपना महान यश यहाँ छोड़कर वे भगवान के परम धाम को चले गए।
सूत उवाच
तदादिराजस्य यशो विजृम्भितं
गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् ।
क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते
कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन् ॥ ८ ॥
भावार्थ: सूत जी ने कहा — हे सभापति (शौनक)! आदिराज पृथु के अनंत गुणों से फैले हुए उस महान यश का, जिसका सम्मान (सभाजित) सभी गुणवान पुरुष करते हैं, गान करते हुए महर्षि मैत्रेय (कौषारवि) से परम भगवद्भक्त विदुर जी ने उनका सत्कार करते हुए पूछा।
विदुर उवाच
सोऽभिषिक्तः पृथुर्विप्रैः लब्धाशेषसुरार्हणः ।
बिभ्रत् स वैष्णवं तेजो बाह्वोर्याभ्यां दुदोह गाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ: विदुर जी ने कहा — ब्राह्मणों द्वारा राज्याभिषेक होने के बाद, महाराज पृथु ने सभी देवताओं से अनेक उपहार (अर्हण) प्राप्त किए। उन्होंने अपनी जिन भुजाओं से भगवान विष्णु का तेज धारण करके पृथ्वी (गौ) को दुहा था...
को न्वस्य कीर्तिं न शृणोत्यभिज्ञो
यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः ।
लोकाः सपाला उपजीवन्ति कामं
अद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम् ॥ १० ॥
भावार्थ: "...ऐसा कौन सा समझदार व्यक्ति होगा, जो उनकी वह पवित्र कीर्ति (कथा) नहीं सुनना चाहेगा? जिनके पराक्रम से दुहे हुए अन्न (उच्छिष्ट) पर ही आज भी सभी राजा, लोकपाल और सारी दुनिया अपना जीवन बिता रही है। इसलिए कृपया मुझे उनके उन पवित्र कर्मों के बारे में और बताइए।"
मैत्रेय उवाच
गङ्गायमुनयोर्नद्योः अन्तरा क्षेत्रमावसन् ।
आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया ॥ ११ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — महाराज पृथु गंगा और यमुना नदियों के बीच (ब्रह्मावर्त) क्षेत्र में निवास करते थे। वे अपने पुण्यों को क्षीण करने (जिहासा) की इच्छा से ही, प्रारब्ध (भाग्य) से मिले हुए राजसी भोगों को भोगते थे।
सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैकदण्डधृक् ।
अन्यत्र ब्राह्मणकुलाद् अन्यत्राच्युतगोत्रतः ॥ १२ ॥
भावार्थ: ब्राह्मणों के कुल (वंश) और भगवान अच्युत के भक्तों (वैष्णवों) को छोड़कर, सातों द्वीपों वाली पूरी पृथ्वी पर एकमात्र महाराज पृथु का ही शासन (दंड) था और उनकी आज्ञा को कोई टाल (अस्खलित) नहीं सकता था।
एकदासीन् महासत्र दीक्षा तत्र दिवौकसाम् ।
समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम ॥ १३ ॥
भावार्थ: हे सत्तम (विदुर)! एक बार उन्होंने एक विशाल यज्ञ (महासत्र) की दीक्षा ली। उस यज्ञ में देवताओं (दिवौकसों), ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों का बहुत बड़ा समाज (सभा) एकत्रित हुआ।
तस्मिन् अर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः ।
उत्थितः सदसो मध्ये ताराणां उडुराडिव ॥ १४ ॥
भावार्थ: जब सभी पूजनीय अतिथियों का उनकी योग्यता के अनुसार भलीभांति सत्कार कर दिया गया, तब महाराज पृथु उस सभा (सदस) के बीच में ऐसे खड़े हुए जैसे तारों के बीच चंद्रमा (उडुराट्) उदित होता है।
प्रांशुः पीनायतभुजो गौरः कञ्जारुणेक्षणः ।
सुनासः सुमुखः सौम्यः पीनांसः सुद्विजस्मितः ॥ १५ ॥
भावार्थ: उनका शरीर लंबा (प्रांशु) था, भुजाएँ पुष्ट और लंबी थीं, रंग गोरा (गौर) था और आँखें लाल कमल के समान थीं। उनकी नाक सुंदर थी, मुख अत्यंत मनमोहक, सौम्य और कंधे पुष्ट (पीनांस) थे। उनके सुंदर दाँत (द्विज) मुस्कान के साथ चमक रहे थे।
व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिः वलिवल्गुदलोदरः ।
आवर्तनाभिरोजस्वी काञ्चनोरुरुदग्रपात् ॥ १६ ॥
भावार्थ: उनका वक्षस्थल चौड़ा (व्यूढवक्ष) और कमर (श्रोणि) विशाल थी। उनके पेट पर पीपल के पत्ते के समान सुंदर रेखाएँ (वलियां) थीं। उनकी नाभि भँवर के समान गहरी थी, जाँघें सोने जैसी चमकती थीं और पैरों का ऊपरी भाग उठा हुआ था।
सूक्ष्मवक्रासितस्निग्ध मूर्धजः कम्बुकन्धरः ।
महाधने दुकूलाग्र्ये परिधायोपवीय च ॥ १७ ॥
भावार्थ: उनके सिर के बाल काले, घुंघराले, कोमल (सूक्ष्म) और चिकने थे, और उनकी गर्दन शंख (कम्बु) के समान थी। वे बहुत कीमती दो उत्तम रेशमी (दुकूल) वस्त्रों को धोती और उत्तरीय (दुपट्टे) के रूप में पहने हुए थे।
व्यञ्जिताशेषगात्रश्रीः नियमे न्यस्तभूषणः ।
कृष्णाजिनधरः श्रीमान् कुशपाणिः कृतोचितः ॥ १८ ॥
भावार्थ: यज्ञ के नियमों के कारण उन्होंने अपने शरीर के आभूषण उतार दिए थे, जिससे उनके अंगों का स्वाभाविक सौंदर्य (गात्रश्री) साफ झलक रहा था। उन्होंने काले हिरण की छाल (कृष्णाजिन) पहनी हुई थी और उनके हाथ में कुशा थी।
शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः ।
ऊचिवान् इदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्निव ॥ १९ ॥
भावार्थ: पृथ्वी के स्वामी (उर्वीश) महाराज पृथु ने अपनी शीतल और प्रेम से भरी आँखों (शिशिरस्निग्धताराक्ष) से चारों ओर सभा की तरफ देखा और सबको आनंदित करते हुए ये वचन कहे।
चारु चित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम् ।
सर्वेषां उपकारार्थं तदा अनुवदन्निव ॥ २० ॥
भावार्थ: उनकी वाणी बहुत सुंदर, अच्छे शब्दों वाली (चित्रपद), मधुर (श्लक्ष्ण), शुद्ध, गहरे अर्थ वाली और बिना किसी हिचकिचाहट (अविक्लव) के थी। ऐसा लग रहा था मानो वे सबके उपकार के लिए ही अपने मन के भाव प्रकट कर रहे हों।
राजोवाच
सभ्याः श्रृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः ।
सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्मं आवेद्यं स्वमनीषितम् ॥ २१ ॥
भावार्थ: राजा पृथु ने कहा — "हे सभासदों! हे यहाँ पधारे हुए साधु पुरुषों! आप सब मेरी बात सुनें, आपका कल्याण हो। जो लोग धर्म को जानने की इच्छा (जिज्ञासा) रखते हैं, उन्हें अपने मन की बात श्रेष्ठ पुरुषों (सत्सु) के सामने अवश्य रखनी चाहिए।"
अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः ।
रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ॥ २२ ॥
भावार्थ: "मुझे यहाँ प्रजा पर शासन (दंड) करने वाला राजा नियुक्त किया गया है, ताकि मैं उनकी रक्षा करूँ, उन्हें आजीविका (वृत्ति) दूँ, और उन सबको अलग-अलग उनके धर्म की मर्यादाओं (सेतुओं) में स्थापित करूँ।"
तस्य मे तदनुष्ठानाद् यानाहुर्ब्रह्मवादिनः ।
लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक् ॥ २३ ॥
भावार्थ: "ब्रह्मवेत्ता (ऋषि-मुनि) कहते हैं कि जो राजा अपने इन कर्तव्यों का पालन करता है, और जिसके कामों से कर्मों के साक्षी भगवान (दिष्टदृक्) प्रसन्न होते हैं, उसे मृत्यु के बाद वे लोक प्राप्त होते हैं जहाँ सारी इच्छाएँ (काम) पूरी हो जाती हैं।"
य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् ।
प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः ॥ २४ ॥
भावार्थ: "जो राजा अपनी प्रजा को धर्म की शिक्षा नहीं देता, परन्तु उनसे कर (टैक्स) वसूलता है, वह राजा अपनी प्रजा के सारे पापों (शमल) को भोगता है और अपने स्वयं के ऐश्वर्य (पुण्य) को खो देता है।"
तत्प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः ।
कुरुताधोक्षजधियः तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः ॥ २५ ॥
भावार्थ: "इसलिए हे मेरी प्यारी प्रजा! तुम अपने राजा (मेरे) परलोक के लिए, और अपने स्वयं के स्वार्थ (कल्याण) के लिए भी, बिना ईर्ष्या किए भगवान अधोक्षज (श्रीहरि) का ध्यान करते हुए अपने-अपने धर्म का पालन करो। ऐसा करने पर तुम मुझ पर बहुत बड़ा उपकार (अनुग्रह) करोगे।"
यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः ।
कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुः तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम् ॥ २६ ॥
भावार्थ: "हे पवित्र पितरो, देवताओ और ऋषियो! आप सब भी मेरे इस संकल्प (सुझाव) का अनुमोदन (समर्थन) करें। क्योंकि परलोक में किसी भी कर्म का फल उसे करने वाले (कर्ता), उसे उपदेश देने वाले (शास्ता) और उसका अनुमोदन करने वाले को बराबर मिलता है।"
अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः ।
इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद्भुवः ॥ २७ ॥
भावार्थ: "हे परम पूजनीय महानुभावों! कुछ लोगों (नास्तिकों) को छोड़कर बाकी सभी मानते हैं कि 'यज्ञपति' (ईश्वर) नाम की कोई सत्ता अवश्य है। क्योंकि हम देखते हैं कि इस लोक में और परलोक में कुछ स्थान (शरीर/जीवन) चाँदनी (ज्योत्स्ना) की तरह उज्ज्वल (सुखमय) होते हैं (जो ईश्वर की कृपा और कर्मों के फल का प्रमाण है)।"
मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः ।
प्रियव्रतस्य राजर्षेः अङ्गस्यास्मत्पितुः पितुः ॥ २८ ॥
भावार्थ: "मनु, उत्तानपाद, राजा ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत और मेरे दादा राजा अंग..."
ईदृशानां अथान्येषां अजस्य च भवस्य च ।
प्रह्लादस्य बलेश्चापि कृत्यमस्ति गदाभृता ॥ २९ ॥
भावार्थ: "...इनके जैसे अन्य महापुरुषों का, तथा ब्रह्मा (अज), शिव (भव), प्रह्लाद और बलि का भी गदाधारी भगवान (विष्णु) के साथ निश्चित रूप से संबंध (भक्ति) है।"
दौहित्रादीन् ऋते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् ।
वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना ॥ ३० ॥
भावार्थ: "केवल मृत्यु के नाती (मेरे पिता वेन) जैसे कुछ शोक करने योग्य और धर्म से भटके हुए लोगों को छोड़कर, बाकी सभी मानते हैं कि धर्म, अर्थ, काम, स्वर्ग और मोक्ष (अपवर्ग) इन सबका एकमात्र कारण वह सर्वात्मा (ईश्वर) ही है।"
यत्पादसेवाभिरुचिः तपस्विनां
अशेषजन्मोपचितं मलं धियः ।
सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती
यथा पदाङ्गुष्ठविनिःसृता सरित् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: "जिन भगवान के चरणों की सेवा में यदि (तपस्वियों की) रुचि हर दिन बढ़ती जाए, तो वह उनके अनेक जन्मों में इकट्ठे हुए मन के सारे पापों (मैल) को उसी तरह तुरंत धो डालती है, जैसे भगवान के पैर के अंगूठे से निकली हुई गंगा नदी सारे पापों को धो देती है।"
विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमान्
असङ्गविज्ञानविशेषवीर्यवान् ।
यदङ्घ्रिमूले कृतकेतनः पुनः
न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ॥ ३२ ॥
भावार्थ: "जिस मनुष्य के मन का सारा मैल धुल गया है और जो वैराग्य (असंग) और विशेष ज्ञान की शक्ति से युक्त है, वह भगवान के चरणों में आश्रय (केतन) लेकर फिर कभी दुःख देने वाले इस जन्म-मरण के चक्र (संसार) में वापस नहीं आता।"
तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभिः
मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः ।
अमायिनः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजं
यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥ ३३ ॥
भावार्थ: "इसलिए आप सभी लोग निष्कपट होकर, अपने मन, वचन, शरीर के गुणों और अपने-अपने स्वभाव के अनुसार (आत्मवृत्ति), उन्हीं भगवान के उन चरण-कमलों का भजन करें जो सारी इच्छाएँ पूरी (कामदुघ) करने वाले हैं। ऐसा करने से आपकी योग्यता (अधिकार) के अनुसार आपके सभी कार्य सिद्ध हो जाएंगे।"
असौ इहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः
पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः ।
सम्पद्यतेऽर्थाशयलिङ्गनामभिः
विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः ॥ ३४ ॥
भावार्थ: "यद्यपि भगवान स्वभाव से विशुद्ध ज्ञानस्वरूप और निर्गुण हैं, फिर भी वे ही यज्ञ (अध्वर) का रूप धारण करके अलग-अलग प्रकार की सामग्री, इन्द्रियों, कर्मों, मंत्रों, इच्छाओं और नामों के द्वारा अनेक गुणों वाले (सगुण) होकर फल प्रदान करते हैं।"
प्रधानकालाशयधर्मसङ्ग्रहे
शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम् ।
क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते
यथानलो दारुषु तद्गुणात्मकः ॥ ३५ ॥
भावार्थ: "जैसे आग लकड़ी के आकार के अनुसार ही (छोटी-बड़ी) दिखाई देती है, वैसे ही सर्वव्यापक भगवान प्रकृति (प्रधान), काल, वासना (आशय) और कर्म (धर्म) से बने इस शरीर में चेतना के रूप में स्थित होकर, कर्मों के फल के अनुसार अलग-अलग रूपों में दिखाई देते हैं।"
अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं
हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्वरम् ।
स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका
निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः ॥ ३६ ॥
भावार्थ: "अहो! यह मेरी प्रजा मुझ पर कितना बड़ा उपकार (अनुग्रह) कर रही है कि वे सभी इस पृथ्वी पर दृढ़ व्रत धारण करके, अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए निरंतर गुरु, श्रीहरि और यज्ञों के स्वामी की आराधना कर रहे हैं।"
मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभिः
तितिक्षया तपसा विद्यया च ।
देदीप्यमानेऽजितदेवतानां
कुले स्वयं राजकुलाद् द्विजानाम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ: "मैं प्रार्थना करता हूँ कि राजकुल (क्षत्रियों) का तेज (अहंकार) कभी भी उन ब्राह्मणों के कुल पर हावी न हो, जो महान ऐश्वर्य, सहनशीलता, तपस्या और ज्ञान से चमक रहे हैं, और भगवान (अजित) ही जिनके एकमात्र आराध्य देव हैं।"
ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो
नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् ।
अवाप लक्ष्मीं अनपायिनीं यशो
जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः ॥ ३८ ॥
भावार्थ: "महापुरुषों में सबसे श्रेष्ठ, ब्राह्मणों के भक्त (ब्रह्मण्यदेव), सनातन परम पुरुष भगवान श्रीहरि ने भी नित्य ब्राह्मणों के चरणों की वंदना करने के कारण ही, कभी न छोड़ने वाली लक्ष्मी जी को और पूरे संसार को पवित्र करने वाले यश को प्राप्त किया है।"
यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड्
विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्वरः ।
तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः
सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ: "जिन ब्राह्मणों की सेवा करने से सबके हृदय में रहने वाले स्वतंत्र ईश्वर (श्रीहरि) बहुत प्रसन्न हो जाते हैं, क्योंकि वे विप्रप्रिय (ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले) हैं। इसलिए, जो लोग भगवान के धर्म का पालन करते हैं, उन्हें पूरी विनम्रता और सच्चे मन से उस ब्राह्मण-कुल की सेवा करनी चाहिए।"
पुमान् लभेतान् अतिवेलमात्मनः
प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् ।
यन्नित्यसंबन्धनिषेवया ततः
परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥ ४० ॥
भावार्थ: "ब्राह्मणों की नित्य सेवा करने से मनुष्य का मन बहुत प्रसन्न हो जाता है, और उसे अपने आप ही परम शांति (शम) प्राप्त हो जाती है। अग्नि आदि देवताओं को हवि (यज्ञ का अन्न) पहुँचाने के लिए ब्राह्मणों के मुख से बढ़कर और क्या हो सकता है?"
अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः
श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः ।
न वै तथा चेतनया बहिष्कृते
हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः ॥ ४१ ॥
भावार्थ: "तत्वज्ञानी लोग देवताओं के नाम से श्रद्धापूर्वक जो कुछ ब्राह्मणों के मुख में खिलाते हैं, उसे अनंत भगवान जितने प्रेम से खाते हैं, उतने प्रेम से वे निर्जीव (चेतनारहित) अग्नि में डाली गई आहुति (हवन) को ग्रहण नहीं करते, क्योंकि ब्राह्मण तो परमहंसों (संतों) का भी आश्रय हैं।"
यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं
श्रद्धातपोमङ्गलमौनसंयमैः ।
समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये
यत्रेदमादर्श इवावभासते ॥ ४२ ॥
भावार्थ: "वे ब्राह्मण अपनी श्रद्धा, तपस्या, मांगलिक आचरण, मौन, संयम और समाधि के द्वारा उस नित्य, पवित्र और सनातन वेदों (ब्रह्म) को धारण करते हैं, ताकि वे परमार्थ (भगवान) का दर्शन कर सकें, जिसमें यह सारा संसार दर्पण की तरह स्पष्ट दिखाई देता है।"
तेषामहं पादसरोजरेणुं
आर्या वहेयाधिकिरीटमाऽऽयुः ।
यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं
नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति ॥ ४३ ॥
भावार्थ: "हे श्रेष्ठ पुरुषो! मैं चाहता हूँ कि मैं जीवन भर (आऽऽयुः) उन ब्राह्मणों के चरण-कमलों की धूल को अपने मुकुट पर धारण करूँ। जो व्यक्ति हमेशा इस धूल को धारण करता है, उसके सारे पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं और सभी सद्गुण स्वयं ही उसके पास आ जाते हैं।"
गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं
वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः ।
प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च
जनार्दनः सानुचरश्च मह्यम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: "जो व्यक्ति गुणों का खजाना है, अच्छे स्वभाव (शील) रूपी धन वाला है, किए गए उपकार को मानने वाला (कृतज्ञ) है, और वृद्धों की सेवा (आश्रय) करने वाला है, सारी संपत्तियां उसके पास स्वयं चली आती हैं। इसलिए ब्राह्मणों का कुल, गौ-माताएं, और अपने भक्तों (अनुचरों) सहित भगवान जनार्दन मुझ पर हमेशा प्रसन्न रहें।"
मैत्रेय उवाच
इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातयः ।
तुष्टुवुर्हृष्टमनसः साधुवादेन साधवः ॥ ४५ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — राजा पृथु को इस प्रकार बोलते हुए सुनकर, वहां उपस्थित सभी पितर, देवता, ब्राह्मण और साधु पुरुष बहुत प्रसन्न हुए और "साधु-साधु" (बहुत सुंदर) कहकर उनकी प्रशंसा (स्तुति) करने लगे।
पुत्रेण जयते लोकान् इति सत्यवती श्रुतिः ।
ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोऽत्यतरत्तमः ॥ ४६ ॥
भावार्थ: उन्होंने कहा — "वेदों का यह वचन बिल्कुल सत्य (सत्यवती श्रुति) है कि 'पुत्र के द्वारा पिता उत्तम लोकों को जीत लेता है'। क्योंकि ब्राह्मणों के शाप (ब्रह्मदंड) से मारा गया वह पापी वेन भी आपके कारण घोर नर्क (अंधकार) को पार कर गया है।"
हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन् निन्दया तमः ।
विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥ ४७ ॥
भावार्थ: "ठीक वैसे ही जैसे भगवान की निंदा करने के कारण घोर नर्क में जाने वाला हिरण्यकशिपु भी, अपने पुत्र प्रह्लाद के प्रभाव (भक्ति) के कारण तर गया था।"
वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः सञ्जीव शाश्वतीः ।
यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि ॥ ४८ ॥
भावार्थ: "हे वीरों में श्रेष्ठ! हे पृथ्वी के पिता! आप অনন্ত (शाश्वत) वर्षों तक जीवित रहें (शासन करें); क्योंकि संपूर्ण लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान अच्युत में आपकी ऐसी अगाध भक्ति है।"
अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते
त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः ।
य उत्तमश्लोकतमस्य विष्णोः
ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्ति ॥ ४९ ॥
भावार्थ: "हे पवित्र कीर्ति वाले महाराज! आप जैसे राजा को पाकर आज हम सब वास्तव में भगवान मुकुंद (विष्णु) के संरक्षण में आ गए हैं, क्योंकि आप हम सबको उन परम श्लोक (जिनकी स्तुति की जाती है) और ब्राह्मणों के रक्षक (ब्रह्मण्यदेव) भगवान विष्णु की कथाओं का उपदेश दे रहे हैं।"
नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम् ।
प्रजानुरागो महतां प्रकृतिः करुणात्मनाम् ॥ ५० ॥
भावार्थ: "हे नाथ! अपनी आजीविका चलाने वाली प्रजा को इस प्रकार (धर्म का) उपदेश देना आपके लिए कोई बहुत आश्चर्य की बात नहीं है; क्योंकि आप जैसे करुणा से भरे महापुरुषों का अपनी प्रजा से प्रेम करना तो स्वभाव ही होता है।"
अद्य नस्तमसः पारः त्वयोपासादितः प्रभो ।
भ्राम्यतां नष्टदृष्टीनां कर्मभिर्दैवसंज्ञितैः ॥ ५१ ॥
भावार्थ: "हे प्रभो! प्रारब्ध (भाग्य) कहलाने वाले अपने ही कर्मों के कारण अंधी (नष्टदृष्टि) होकर भटकने वाली हम प्रजाओं को, आज आपने इस संसार रूपी अंधकार के पार (ईश्वर तक) पहुँचा दिया है।"
नमो विवृद्धसत्त्वाय पुरुषाय महीयसे ।
यो ब्रह्म क्षत्रमाविश्य बिभर्तीदं स्वतेजसा ॥ ५२ ॥
भावार्थ: "जो ब्राह्मणों (ब्रह्म) और क्षत्रियों (क्षत्र) के शरीर में प्रवेश करके अपने तेज से इस पूरे संसार का भरण-पोषण (पालन) कर रहे हैं, उन शुद्ध सत्त्वगुण वाले महान पुरुष (भगवान) को हमारा नमस्कार है।"

