श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - चतुर्थस्कन्धः
पृथुचरिते द्वाविंशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच
जनेषु प्रगृणत्स्वेवं पृथुं पृथुलविक्रमम् ।
तत्रोपजग्मुर्मुनयः चत्वारः सूर्यवर्चसः ॥ १ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — जब प्रजाजन महाराज पृथु के महान पराक्रम की इस प्रकार प्रशंसा कर रहे थे, तभी सूर्य के समान तेज वाले चार मुनि (सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार) वहाँ आए।
तांस्तु सिद्धेश्वरान् राजा व्योम्नोऽवतरतोऽर्चिषा ।
लोकानपापान् कुर्वत्या सानुगोऽचष्ट लक्षितान् ॥ २ ॥
भावार्थ: राजा पृथु और उनके सेवकों ने उन सिद्धों के स्वामी सनकादि मुनियों को आकाश से उतरते हुए देखा, जिनकी कांति (तेज) से सारे लोक पापमुक्त (पवित्र) हो रहे थे।
तद्दर्शनोद्गतान् प्राणान् प्रत्यादित्सुरिवोत्थितः ।
ससदस्यानुगो वैन्य इन्द्रियेशो गुणानिव ॥ ३ ॥
भावार्थ: उन्हें देखते ही राजा पृथु के प्राण मानो उनके शरीर से निकलकर उनका स्वागत करने के लिए ऊपर की ओर उठ गए हों (रोमांच हो आया)। राजा अपने सभासदों और सेवकों के साथ तुरंत खड़े हो गए, जैसे इंद्रियों का स्वामी (जीव) गुणों को ग्रहण करने के लिए तत्पर होता है।
गौरवाद्यन्त्रितः सभ्यः प्रश्रयानतकन्धरः ।
विधिवत्पूजयां चक्रे गृहीताध्यर्हणासनान् ॥ ४ ॥
भावार्थ: सभासदों में श्रेष्ठ महाराज पृथु ने उनके प्रति आदर भाव से अपनी गर्दन झुका ली (प्रणाम किया)। जब वे मुनि श्रेष्ठ आसनों पर बैठ गए, तब राजा ने विधिपूर्वक उनकी पूजा की।
तत्पादशौचसलिलैः मार्जितालकबन्धनः ।
तत्र शीलवतां वृत्तं आचरन् मानयन्निव ॥ ५ ॥
भावार्थ: उन्होंने मुनियों के चरण धोए और उस पवित्र जल को अपने बालों (सिर) पर धारण किया। ऐसा करके वे मानो सदाचारी पुरुषों के श्रेष्ठ आचरण को सम्मान दे रहे थे (यह दिखा रहे थे कि महापुरुषों का सम्मान कैसे किया जाता है)।
हाटकासन आसीनान् स्वधिष्ण्येष्विव पावकान् ।
श्रद्धासंयमसंयुक्तः प्रीतः प्राह भवाग्रजान् ॥ ६ ॥
भावार्थ: सोने के आसनों पर बैठे हुए वे मुनि ऐसे चमक रहे थे, मानो वेदियों पर अग्नि प्रज्वलित हो। भगवान शिव (भव) के बड़े भाइयों (सनकादि) को देखकर, राजा पृथु ने अत्यंत प्रसन्नता, श्रद्धा और संयम के साथ उनसे कहा।
पृथुरुवाच
अहो आचरितं किं मे मङ्गलं मङ्गलायनाः ।
यस्य वो दर्शनं ह्यासीद् दुर्दर्शानां च योगिभिः ॥ ७ ॥
भावार्थ: महाराज पृथु ने कहा — "हे मंगल के भी आश्रय (मंगलायनाः)! मैंने ऐसा कौन सा महान पुण्य (मंगल) किया है, जिसके कारण आज मुझे आप लोगों के दर्शन हुए हैं? क्योंकि आपका दर्शन तो बड़े-बड़े योगियों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है।"
किं तस्य दुर्लभतरं इह लोके परत्र च ।
यस्य विप्राः प्रसीदन्ति शिवो विष्णुश्च सानुगः ॥ ८ ॥
भावार्थ: "जिन पर आप जैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रसन्न हो जाते हैं, उन पर भगवान शिव, भगवान विष्णु और उनके सभी पार्षद भी प्रसन्न हो जाते हैं। फिर उस मनुष्य के लिए इस लोक और परलोक में क्या दुर्लभ रह जाता है?"
नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् ।
यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥ ९ ॥
भावार्थ: "आप लोग (सनकादि) संसार की भलाई के लिए सभी लोकों में घूमते रहते हैं, फिर भी अज्ञानी लोग आपको वैसे ही नहीं पहचान पाते, जैसे वे अपने भीतर बैठे सब कुछ देखने वाले सर्वसाक्षी परमात्मा (आत्मा) को नहीं पहचान पाते, जो इस संसार का असली कारण है।"
अधना अपि ते धन्याः साधवो गृहमेधिनः ।
यद्गृहा ह्यर्हवर्याम्बु तृणभूमीश्वरावराः ॥ १० ॥
भावार्थ: "वे गृहस्थ भले ही गरीब (अधन) हों, लेकिन वे बहुत भाग्यशाली (धन्य) हैं, जिनके घरों में आप जैसे श्रेष्ठ संतों के लिए जल, बैठने के लिए चटाई (तृण), थोड़ी सी जमीन और घर के मालिक (ईश्वर) का सम्मान मौजूद रहता है।"
व्यालालयद्रुमा वै तेऽपि अरिक्ताखिलसम्पदः ।
यद्गृहास्तीर्थपादीय पादतीर्थविवर्जिताः ॥ ११ ॥
भावार्थ: "और जिनके घर भगवान (तीर्थपाद) के भक्तों के चरणोदक (पैरों की धूल/जल) से पवित्र नहीं हुए हैं, वे घर भले ही सारी संपत्तियों से भरे हों, फिर भी वे उन पेड़ों के समान हैं जिनमें जहरीले साँप रहते हैं।"
स्वागतं वो द्विजश्रेष्ठा यद्व्रतानि मुमुक्षवः ।
चरन्ति श्रद्धया धीरा बाला एव बृहन्ति च ॥ १२ ॥
भावार्थ: "हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ! आपका स्वागत है। आप बालकों (5 वर्ष के) जैसी उम्र वाले हैं, फिर भी मोक्ष चाहने वाले धीर पुरुष अत्यंत श्रद्धा के साथ आपके महान ब्रह्मचर्य (ऊर्ध्वरेता) व्रतों का पालन करते हैं।"
कच्चिन्नः कुशलं नाथा इन्द्रियार्थार्थवेदिनाम् ।
व्यसनावाप एतस्मिन् पतितानां स्वकर्मभिः ॥ १३ ॥
भावार्थ: "हे नाथ! हम लोग जो केवल इंद्रियों के सुखों (विषयों) को ही जीवन का लक्ष्य (अर्थ) मानते हैं, और अपने ही कर्मों के कारण दुःखों (व्यसनों) से भरे इस संसार में गिरे हुए हैं, क्या हमारा कभी कोई कल्याण (कुशल) हो सकता है?"
भवत्सु कुशलप्रश्न आत्मारामेषु नेष्यते ।
कुशलाकुशला यत्र न सन्ति मतिवृत्तयः ॥ १४ ॥
भावार्थ: "आप लोग तो अपनी आत्मा में ही रमण करने वाले (आत्माराम) हैं। आपसे कुशल पूछना तो उचित भी नहीं है, क्योंकि आपके भीतर तो 'यह अच्छा है, यह बुरा है' (कुशल-अकुशल) वाली अज्ञानी बुद्धि (मतिवृत्तियां) बची ही नहीं हैं।"
तदहं कृतविश्रम्भः सुहृदो वस्तपस्विनाम् ।
सम्पृच्छे भव एतस्मिन् क्षेमः केनाञ्जसा भवेत् ॥ १५ ॥
भावार्थ: "इसलिए मैं आप जैसे तपस्वियों, जो हमारे सच्चे मित्र (सुहृद) हैं, पर पूरा विश्वास करके यह पूछ रहा हूँ कि इस जन्म-मरण (भव) के चक्र में फँसे हुए जीव का परम कल्याण (मोक्ष) आसानी से (अंजसा) कैसे हो सकता है?"
व्यक्तमात्मवतामात्मा भगवान् आत्मभावनः ।
स्वानां अनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥ १६ ॥
भावार्थ: "यह स्पष्ट है कि अपने भक्तों (आत्मवानों) से प्रेम करने वाले और अजन्मा भगवान स्वयं ही अपने भक्तों (हम लोगों) पर कृपा करने के लिए आप सिद्धों का रूप धारण करके इस संसार में विचर रहे हैं।"
मैत्रेय उवाच
पृथोस्तत्सूक्तमाकर्ण्य सारं सुष्ठु मितं मधु ।
स्मयमान इव प्रीत्या कुमारः प्रत्युवाच ह ॥ १७ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — महाराज पृथु की वह सारगर्भित (तथ्यपूर्ण), नपी-तुली, मधुर (शहद जैसी) और अत्यंत श्रेष्ठ वाणी सुनकर, सनत्कुमार जी बहुत प्रसन्न हुए और मुस्कुराते हुए बोले।
सनत्कुमार उवाच
साधु पृष्टं महाराज सर्वभूतहितात्मना ।
भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीदृशी ॥ १८ ॥
भावार्थ: सनत्कुमार जी ने कहा — "हे महाराज! आप सभी प्राणियों का हित चाहने वाले हैं और आपने बहुत ही उत्तम प्रश्न पूछा है। यद्यपि आप स्वयं परम ज्ञानी हैं, फिर भी आपने यह प्रश्न पूछा, क्योंकि साधु पुरुषों का ऐसा ही स्वभाव (मती) होता है (वे ज्ञान साझा करना पसंद करते हैं)।"
सङ्गमः खलु साधूनां उभयेषां च सम्मतः ।
यत्सम्भाषणसम्प्रश्नः सर्वेषां वितनोति शम् ॥ ९९ ॥
भावार्थ: "साधु (संत) पुरुषों का मिलन (संगम) दोनों के लिए (पूछने वाले और बताने वाले) मंगलकारी माना जाता है; क्योंकि जब वे आपस में प्रश्न और उत्तर करते हैं, तो उससे सुनने वाले सभी लोगों का परम कल्याण (शम) होता है।"
अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः
पादारविन्दस्य गुणानुवादने ।
रतिर्दुरापा विधुनोति नैष्ठिकी
कामं कषायं मलमन्तरात्मनः ॥ २० ॥
भावार्थ: "हे राजन्! भगवान (मधुसूदन) के चरण-कमलों के गुणों का गान (अनुवाद) करने में आपकी जो गहरी प्रीति (रति) है, वह साधारण लोगों के लिए बहुत दुर्लभ है। यह दृढ़ (नैष्ठिकी) भक्ति ही अंतःकरण के सारे मैल, वासनाओं (काम) और पापों (कषाय) को पूरी तरह धो डालती है।"
शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां
क्षेमस्य सध्र्यग्विमृशेषु हेतुः ।
असङ्ग आत्मव्यतिरिक्त आत्मनि
दृढा रतिर्ब्रह्मणि निर्गुणे च या ॥ २१ ॥
भावार्थ: "सभी शास्त्रों पर गहराई से विचार करने के बाद, मनुष्यों के परम कल्याण (मोक्ष) का केवल यही एक निश्चित उपाय सामने आता है — आत्मा (परमात्मा) को छोड़कर अन्य सभी वस्तुओं (संसार/शरीर) से पूरी तरह वैराग्य (असंग), और निर्गुण परब्रह्म में दृढ़ प्रेम (भक्ति)।"
सा श्रद्धया भगवद्धर्मचर्यया
जिज्ञासयाऽऽध्यात्मिकयोगनिष्ठया ।
योगेश्वरोपासनया च नित्यं
पुण्यश्रवःकथया पुण्यया च ॥ २२ ॥
भावार्थ: "यह वैराग्य और भक्ति कैसे पैदा होती है? यह दृढ़ श्रद्धा से, भगवान के धर्मों (भागवत धर्म) का आचरण करने से, तत्त्व जानने की इच्छा (जिज्ञासा) से, अध्यात्म योग (ध्यान) में स्थित रहने से, योगेश्वरों (सद्गुरुओं) की निरंतर उपासना करने से, और भगवान की पवित्र कथाएँ सुनने से उत्पन्न होती है।"
अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णया
तत्सम्मतानामपरिग्रहेण च ।
विविक्तरुच्या परितोष आत्मन्
विना हरेर्गुणपीयूषपानात् ॥ २३ ॥
भावार्थ: "जो लोग केवल धन (अर्थ) और इन्द्रियों के सुख (भोग) में ही रमण करते हैं, उनकी संगति से दूर रहने (तृष्णा न रखने) से, उनके द्वारा पसंद की गई चीजों (विषयों) को स्वीकार न करने (अपरिग्रह) से, एकांत (विविक्त) स्थानों में रुचि रखने से, और श्रीहरि के गुणों रूपी अमृत को पीने (कथा सुनने) के अलावा अन्य किसी सांसारिक सुख में संतोष न करने से..."
अहिंसया पारमहंस्यचर्यया
स्मृत्या मुकुन्दाचरिताग्र्यसीधुना ।
यमैरकामैर्नियमैश्चाप्यनिन्दया
निरीहया द्वन्द्वतितिक्षया च ॥ २४ ॥
भावार्थ: "...अहिंसा का पालन करने से, परमहंसों (संतों) के नियमों पर चलने से, भगवान मुकुंद की लीलाओं रूपी अमृत (सीधु) का स्मरण करने से, निष्काम भाव से यम और नियमों का पालन करने से, किसी की निंदा न करने से, सांसारिक इच्छाएं न रखने से, और सुख-दुःख (द्वंद्व) को सहन (तितिक्षा) करने से..."
हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूर
गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया ।
भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्यनात्मनि
स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ॥ २५ ॥
भावार्थ: "...तथा जो भक्त श्रीहरि के गुणों को अपने कानों का आभूषण (कर्णपूर) बना लेते हैं, उनके मुख से भगवान के गुणों का गान निरंतर सुनने से, हृदय में भक्ति बढ़ती है। और इस बढ़ती हुई भक्ति से, इस नाशवान शरीर और संसार (सत्य-असत्य) से वैराग्य (असंग) हो जाता है, और निर्गुण परब्रह्म में आसानी से दृढ़ प्रेम (रति) हो जाता है।"
यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमान्
आचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा ।
दहत्यवीर्यं हृदयं जीवकोशं
पञ्चात्मकं योनिमिवोत्थितोऽग्निः ॥ २६ ॥
भावार्थ: "जब मनुष्य को ब्रह्म में दृढ़ (नैष्ठिकी) रति (भक्ति) प्राप्त हो जाती है, तब सद्गुरु (आचार्य) की कृपा से प्राप्त ज्ञान और वैराग्य की शक्ति से वह अपने अहंकार से भरे (अवीर्य) हृदय और पंचभूतों से बने इस शरीर (जीवकोश) को उसी प्रकार जला डालता है, जैसे लकड़ियों से पैदा हुई आग अपनी उत्पत्ति के स्थान (लकड़ी) को ही जला देती है।"
दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो
नैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे ।
परात्मनोर्यद् व्यवधानं पुरस्तात्
स्वप्ने यथा पुरुषस्तद्विनाशे ॥ २७ ॥
भावार्थ: "जिसकी सारी वासनाएँ जल गई हैं और जो प्रकृति के सभी गुणों से मुक्त हो गया है, वह अपने (आत्मा) और परमात्मा के बीच के अंतर को उसी तरह नहीं देखता (भेद खत्म हो जाता है), जैसे नींद (स्वप्न) टूटने के बाद मनुष्य को सपने की चीजें नहीं दिखाई देतीं।"
आत्मानमिन्द्रियार्थं च परं यदुभयोरपि ।
सत्याशय उपाधौ वै पुमान् पश्यति नान्यदा ॥ २८ ॥
भावार्थ: "जब तक मन में उपाधि (अहंकार और वासनाएं) मौजूद रहती है, तभी तक मनुष्य स्वयं को, इन्द्रियों के विषयों को, और इन दोनों के साक्षी परमात्मा को अलग-अलग (भेद रूप में) देखता है, उसके बाद (उपाधि नष्ट होने पर) नहीं।"
निमित्ते सति सर्वत्र जलादौ अपि पूरुषः ।
आत्मनश्च परस्यापि भिदां पश्यति नान्यदा ॥ २९ ॥
भावार्थ: "जैसे पानी या शीशा (निमित्त) होने पर ही मनुष्य अपना प्रतिबिम्ब (परछाईं) देखता है और स्वयं को दो (अपना शरीर और अपनी परछाईं) समझता है, वैसे ही अहंकार रूपी निमित्त के होने पर ही वह आत्मा और परमात्मा में भेद देखता है, अन्यथा नहीं।"
इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैः आक्षिप्तं ध्यायतां मनः ।
चेतनां हरते बुद्धेः स्तम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३० ॥
भावार्थ: "जो व्यक्ति इंद्रियों के विषयों का चिंतन (ध्यान) करता है, उसकी इन्द्रियां विषयों की ओर खिंच जाती हैं। और वे इन्द्रियां उसके मन को भी खींच लेती हैं, जिससे उसकी बुद्धि की चेतना (समझ) वैसे ही नष्ट हो जाती है, जैसे घास (स्तम्ब) तालाब का सारा पानी सोख लेती है।"
भ्रश्यत्यनु स्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये ।
तद्रोधं कवयः प्राहुः आत्मापह्नवमात्मनः ॥ ३१ ॥
भावार्थ: "बुद्धि के नष्ट होने से स्मृति (भगवान की याद) नष्ट हो जाती है। स्मृति नष्ट होने से सच्चा ज्ञान नष्ट हो जाता है। ज्ञानी लोग ज्ञान के इस नाश (अवरोध) को ही आत्मा का अपनी ही आत्मा से नाश (आत्मा का पतन) कहते हैं।"
नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः ।
यदध्यन्यस्य प्रेयस्त्वं आत्मनः स्वव्यतिक्रमात् ॥ ३२ ॥
भावार्थ: "संसार में मनुष्य के लिए इससे बड़ा स्वार्थ का पतन (विनाश) और कुछ नहीं हो सकता कि वह अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को भूलकर, आत्मा से भिन्न चीजों (शरीर और संसार) को अधिक प्यारा (प्रिय) समझने लगे।"
अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् ।
भ्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद् येनाविशति मुख्यताम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ: "धन (अर्थ) और इन्द्रियों के भोगों का निरंतर चिंतन करना ही मनुष्य के सभी पुरुषार्थों (कल्याण) का नाश करने वाला है। क्योंकि इन्हीं के कारण वह ज्ञान (शास्त्रों का ज्ञान) और विज्ञान (अनुभव) से गिरकर वृक्षों जैसी जड़ योनि (मुख्य योनि) में चला जाता है।"
न कुर्यात्कर्हिचित्सङ्गं तमस्तीव्रं तितीरिषुः ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ: "इसलिए, जो व्यक्ति घोर अंधकार (अज्ञान/संसार) को पार करना चाहता है, उसे कभी भी ऐसे विषयों (भोगों) का संग नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह आसक्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों की सबसे बड़ी शत्रु (विघातक) है।"
तत्रापि मोक्ष एवार्थ आत्यन्तिकतयेष्यते ।
त्रैवर्ग्योऽर्थो यतो नित्यं कृतान्तभयसंयुतः ॥ ३५ ॥
भावार्थ: "इन चारों पुरुषार्थों में मोक्ष को ही सबसे श्रेष्ठ (आत्यंतिक) माना गया है, क्योंकि बाकी तीन (धर्म, अर्थ, काम) तो हमेशा काल (मृत्यु / कृतांत) के भय से घिरे रहते हैं।"
परेऽवरे च ये भावा गुणव्यतिकरादनु ।
न तेषां विद्यते क्षेमं ईशविध्वंसिताशिषाम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: "प्रकृति के गुणों से उत्पन्न होने वाले, ब्रह्मा से लेकर तिनके तक (परे-अवरे), जितने भी भाव (पदार्थ/शरीर) हैं, उनका कोई स्थायी कल्याण (सुरक्षा) नहीं है, क्योंकि उन सब की आशाएं ईश्वर (काल) द्वारा नष्ट कर दी जाती हैं।"
तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थूषां च
देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् ।
यः क्षेत्रवित्तपतया हृदि विश्वगाविः
प्रत्यक् चकास्ति भगवान् तमवेहि सोऽस्मि ॥ ३७ ॥
भावार्थ: "इसलिए हे राजन्! यह जान लो कि जो जड़ और चेतन (चराचर) जगत में, शरीर, इन्द्रियों, प्राणों, बुद्धि और अहंकार से ढके रहने पर भी, सबके हृदय में सर्वव्यापी और अंतर्यामी (क्षेत्रज्ञ) के रूप में स्पष्ट प्रकाशमान हैं, वे भगवान (आत्मा) तुम स्वयं ही हो (तत् त्वम् असि)।"
यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति
माया विवेकविधुति स्रजि वाहिबुद्धिः ।
तं नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्धतत्त्वं
प्रत्यूढकर्मकलिलप्रकृतिं प्रपद्ये ॥ ३८ ॥
भावार्थ: "जिस प्रकार अज्ञान के कारण रस्सी (स्रजि) में साँप (अहि) होने का भ्रम होता है, उसी प्रकार जिस आत्मा में माया के कारण यह कार्य-कारण रूप संसार सत्य (सद्-असद्) प्रतीत होता है, उस नित्य मुक्त, परम शुद्ध और कर्मों के बंधनों (प्रकृति) से सर्वथा परे उस परब्रह्म (परमात्मा) की तुम शरण में जाओ।"
यत्पादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या
कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः ।
तद्वन्न रिक्तमतयो यतयोऽपि रुद्ध
स्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम् ॥ ३୯ ॥
भावार्थ: "संत लोग भगवान के चरण-कमलों की अनन्य भक्ति के द्वारा जिस हृदय की (अहंकार रूपी) गाँठ को आसानी से खोल लेते हैं, वैसा अपनी इन्द्रियों को रोकने वाले वे संन्यासी (यति) भी नहीं कर पाते, जिनके हृदय में भक्ति (रस) नहीं है। इसलिए तुम उन सभी के आश्रय भगवान वासुदेव का ही भजन करो।"
कृच्छ्रो महानिह भवार्णवमप्लवेशां
षड्वर्गनक्रमसुखेन तितीरषन्ति ।
तत्त्वं हरेर्भगवतो भजनीयमङ्घ्रिं
कृत्वोडुपं व्यसनमुत्तर दुस्तरार्णम् ॥ ४० ॥
भावार्थ: "जो लोग भगवान की शरण (नाव) लिए बिना, इस संसार रूपी सागर को केवल अपने बल से पार करना चाहते हैं, उनके लिए काम, क्रोध आदि छह मगरमच्छों (षड्वर्ग नक्र) से भरे इस सागर को पार करना बहुत कठिन है। इसलिए तुम भगवान श्रीहरि के पूजनीय चरणों को ही नाव (उड़ुप) बनाकर इस दुस्तर सागर को पार करो।"
मैत्रेय उवाच
स एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा ।
दर्शितात्मगतिः सम्यक् प्रशस्योवाच तं नृपः ॥ ४१ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — ब्रह्मा जी के पुत्र, ब्रह्मज्ञानी (आत्ममेधसा) सनत्कुमार जी द्वारा इस प्रकार आत्मा (मोक्ष) की गति का सही मार्ग दिखाए जाने पर, राजा पृथु ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा।
राजोवाच
कृतो मेऽनुग्रहः पूर्वं हरिणाऽऽर्तानुकम्पिना ।
तमापादयितुं ब्रह्मन् भगवन् यूयमागताः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: राजा पृथु ने कहा — "हे ब्रह्मन्! दीनों पर दया करने वाले भगवान श्रीहरि ने पहले मुझ पर जो कृपा (अनुग्रह) की थी, उसी को पूरा करने के लिए आप लोग यहाँ पधारे हैं।"
निष्पादितश्च कार्त्स्न्येन भगवद्भिः घृणालुभिः ।
साधूच्छिष्टं हि मे सर्वं आत्मना सह किं ददे ॥ ४३ ॥
भावार्थ: "आप दयालु महापुरुषों ने भगवान के उस अनुग्रह को पूरी तरह संपन्न कर दिया है। परन्तु यह मेरा शरीर और मेरा सब कुछ तो पहले से ही आप संतों (साधुओं) का दिया हुआ (उच्छिष्ट) है। अब मैं आपको (दक्षिणा में) क्या दूँ?"
प्राणा दाराः सुता ब्रह्मन् गृहाश्च सपरिच्छदाः ।
राज्यं बलं मही कोश इति सर्वं निवेदितम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: "हे ब्रह्मन्! मेरे प्राण, पत्नी, पुत्र, घर और उसकी सारी संपत्ति, मेरा राज्य, सेना, यह पूरी पृथ्वी और खजाना — यह सब मैं आपको अर्पित करता हूँ।"
सैनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च ।
सर्व लोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ ४५ ॥
भावार्थ: (राजा ने अपना राज्य सौंपते हुए कहा) — "क्योंकि सेनापति का पद, राज्य, दंड देने का अधिकार, और संपूर्ण लोकों का आधिपत्य — इन सब पर केवल वेद-शास्त्रों के ज्ञाता (आप जैसे ब्राह्मण) का ही अधिकार होता है।"
स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च ।
तस्यैवानुग्रहेणान्नं भुञ्जते क्षत्रियादयः ॥ ४६ ॥
भावार्थ: "ब्राह्मण जो कुछ खाता है, पहनता है या दान देता है, वह सब उसी का (स्वयं का) होता है (वह किसी का ऋणी नहीं होता)। क्षत्रिय आदि दूसरे सभी वर्ण तो ब्राह्मणों की कृपा से ही अन्न खाते (जीवित रहते) हैं।"
यैरीदृशी भगवतो गतिरात्मवादे
एकान्ततो निगमिभिः प्रतिपादिता नः ।
तुष्यन्त्वदभ्रकरुणाः स्वकृतेन नित्यं
को नाम तत्प्रतिकरोति विनोदपात्रम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ: "आप जैसे वेदों के ज्ञाता महापुरुषों ने आत्मज्ञान के विषय में भगवान की इस परम गति (मार्ग) का इतने स्पष्ट रूप से वर्णन किया है। आप अपनी इस असीम करुणा (स्वयं के किए उपकार) से ही प्रसन्न हों, क्योंकि हम अज्ञानी तो केवल जल (अंजलि) चढ़ा सकते हैं, आपका यह ऋण (उपकार) कौन चुका सकता है?"
मैत्रेय उवाच
ते आत्मयोगपतय आदिराजेन पूजिताः ।
शीलं तदीयं शंसन्तः खेऽभूवन् मिषतां नृणाम् ॥ ४८ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — आदिराज पृथु द्वारा इस प्रकार पूजित होकर, वे अध्यात्म योग के स्वामी सनकादि मुनि, राजा के शील-स्वभाव की प्रशंसा करते हुए लोगों के देखते-देखते आकाश में अंतर्धान (अदृश्य) हो गए।
वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याध्यात्मशिक्षया ।
आप्तकामं इवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥ ४९ ॥
भावार्थ: महापुरुषों में श्रेष्ठ वेनपुत्र (पृथु), उन सनकादि मुनियों के उपदेश (अध्यात्म शिक्षा) में स्थित होकर, स्वयं को पूर्ण काम (जिसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो गई हों) और आत्मा में ही स्थित मानने लगे।
कर्माणि च यथाकालं यथादेशं यथाबलम् ।
यथोचितं यथावित्तं अकरोद्ब्रह्मसात्कृतम् ॥ ५० ॥
भावार्थ: वे समय, स्थान, अपनी शक्ति, अपनी योग्यता और अपने धन के अनुसार ही कार्य करते थे, और उन सभी कर्मों को भगवान (परब्रह्म) को समर्पित (ब्रह्मसात्कृत) कर देते थे।
फलं ब्रह्मणि विन्यस्य निर्विषङ्गः समाहितः ।
कर्माध्यक्षं च मन्वान आत्मानं प्रकृतेः परम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ: वे कर्मों के फलों को भगवान को सौंपकर पूरी तरह अनासक्त (निर्विषंग) और एकाग्र (समाहित) रहते थे। वे यह मानते थे कि आत्मा केवल कर्मों का साक्षी (अध्यक्ष) है और वह इस प्रकृति से सर्वथा परे (अलग) है।
गृहेषु वर्तमानोऽपि स साम्राज्यश्रियान्वितः ।
नासज्जतेन्द्रियार्थेषु निरहंमतिरर्कवत् ॥ ५२ ॥
भावार्थ: एक महान साम्राज्य के ऐश्वर्य (श्रिया) के साथ गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी, वे अहंकार से मुक्त थे। जैसे सूर्य गंदी चीजों पर चमकने पर भी उनमें लिप्त नहीं होता, वैसे ही वे भी इन्द्रियों के भोगों (विषयों) में आसक्त नहीं होते थे।
एवं अध्यात्मयोगेन कर्माणि अनुसमाचरन् ।
पुत्रान् उत्पादयामास पञ्चार्चिष्यात्मसम्मतान् ॥ ५३ ॥
भावार्थ: इस प्रकार अध्यात्म-योग (भक्ति और ज्ञान) के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, उन्होंने अपनी पत्नी अर्चि से अपने ही समान पाँच उत्तम पुत्र उत्पन्न किए।
विजिताश्वं धूम्रकेशं हर्यक्षं द्रविणं वृकम् ।
सर्वेषां लोकपालानां दधारैकः पृथुर्गुणान् ॥ ५४ ॥
भावार्थ: उन पुत्रों के नाम थे — विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक। महाराज पृथु अकेले ही सभी लोकपालों (देवताओं) के गुणों को धारण करते थे।
गोपीथाय जगत्सृष्टेः काले स्वे स्वेऽच्युतात्मकः ।
मनोवाग् वृत्तिभिः सौम्यैः गुणैः संरञ्जयन् प्रजाः ॥ ५५ ॥
भावार्थ: जगत की रक्षा (गोपीथ) के लिए, भगवान अच्युत के स्वरूप महाराज पृथु ने समय-समय पर, अपने मन, वचन और कर्म की सौम्य वृत्तियों (गुणों) से प्रजा को प्रसन्न (संरंजन) किया।
राजेत्यधान् नामधेयं सोमराज इवापरः ।
सूर्यवद्विसृजन्गृह्णन् प्रतपंश्च भुवो वसु ॥ ५६ ॥
भावार्थ: अपनी प्रजा को प्रसन्न करने के कारण ही उन्होंने चंद्रमा (सोमराज) की तरह 'राजा' (रंजन करने वाला) नाम सार्थक किया। वे सूर्य की तरह पृथ्वी से कर (टैक्स) लेते थे और जरूरत पड़ने पर उसे बरसा (लौटा) देते थे, तथा अपने प्रताप से दुष्टों को तपाते (दंड देते) थे।
दुर्धर्षस्तेजसेवाग्निः महेन्द्र इव दुर्जयः ।
तितिक्षया धरित्रीव द्यौरिवाभीष्टदो नृणाम् ॥ ५७ ॥
भावार्थ: वे अपने तेज में अग्नि के समान दुराधर्ष (जिनके पास कोई जा न सके), युद्ध में इंद्र के समान अजेय, सहनशीलता में पृथ्वी के समान, और मनुष्यों की इच्छाएं पूरी करने में आकाश (स्वर्ग) के समान थे।
वर्षति स्म यथाकामं पर्जन्य इव तर्पयन् ।
समुद्र इव दुर्बोधः सत्त्वेनाचलराडिव ॥ ५८ ॥
भावार्थ: वे बादलों (पर्जन्य) की तरह मनचाही वर्षा करके सबको तृप्त करते थे। उनका स्वभाव समुद्र की तरह गहरा (दुर्बोध - जिसे समझना कठिन हो) था, और धैर्य (सत्त्व) में वे सुमेरु पर्वत (अचलराज) के समान स्थिर थे।
धर्मराडिव शिक्षायां आश्चर्ये हिमवानिव ।
कुवेर इव कोशाढ्यो गुप्तार्थो वरुणो यथा ॥ ५९ ॥
भावार्थ: न्याय और दंड देने में वे धर्मराज (यम) के समान, अद्भुत वस्तुओं के खजाने में हिमालय के समान, धन-सम्पत्ति में कुबेर के समान, और रहस्यों को गुप्त रखने में वरुण के समान थे।
मातरिश्वेव सर्वात्मा बलेन महसौजसा ।
अविषह्यतया देवो भगवान् भूतराडिव ॥ ६० ॥
भावार्थ: वे शारीरिक बल, उत्साह और ओज में वायु (मातरिश्वा) के समान सर्वव्यापी थे। और अपने असहनीय तेज के कारण वे भूतों के स्वामी साक्षात भगवान शिव (रुद्र) के समान थे।
कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव ।
वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः ॥ ६१ ॥
भावार्थ: वे सौंदर्य में कामदेव (कंदर्प) के समान, मनस्विता (वीरता) में सिंह (मृगराज) के समान, वात्सल्य (प्रेम) में मनु के समान और ऐश्वर्य (प्रभुत्व) में ब्रह्मा जी (अज) के समान थे।
बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरिः ।
भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु ।
ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यां आत्मतुल्यः परोद्यमे ॥ ६२ ॥
भावार्थ: ब्रह्मज्ञान में वे बृहस्पति के समान और इन्द्रियों को वश में रखने (आत्मतत्त्व) में साक्षात भगवान श्रीहरि के समान थे। गौ, गुरु, ब्राह्मणों और भगवद्भक्तों की भक्ति करने में, तथा लज्जा, विनय (प्रश्रय) और दूसरों का कार्य करने में उनका कोई सानी नहीं था (वे अपने ही समान थे)।
कीर्त्योर्ध्वगीतया पुम्भिः त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह ।
प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥ ६३ ॥
भावार्थ: जैसे भगवान परशुराम (या राम) की कीर्ति सर्वत्र फैली हुई है, वैसे ही लोगों द्वारा गाए गए अपने ऊँचे यश (कीर्ति) के द्वारा महाराज पृथु तीनों लोकों में घर-घर की स्त्रियों के कानों तक पहुँच गए थे।

