श्रीमद्भागवतमहापुराणम् - चतुर्थस्कन्धः
पृथुचरिते त्रयोविंशोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच
दृष्ट्वात्मानं प्रवयसं एकदा वैन्य आत्मवान् ।
आत्मना वर्धिताशेष स्वानुसर्गः प्रजापतिः ॥ १ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — एक बार, जब प्रजापति वेनकुमार पृथु ने देखा कि वे वृद्ध (प्रवयस) हो गए हैं, और उन्होंने स्वयं ही अपनी प्रजा (स्वानुसर्ग) को सभी प्रकार से बढ़ा लिया है और सुखी कर दिया है...
जगतस्तस्थुषश्चापि वृत्तिदो धर्मभृत्सताम् ।
निष्पादितेश्वरादेशो यदर्थमिह जज्ञिवान् ॥ २ ॥
भावार्थ: ...जो महाराज पृथु स्थावर (पेड़-पौधे) और जंगम (पशु-पक्षी, मनुष्य) सभी को आजीविका देने वाले, सज्जनों के धर्म के रक्षक, और जिस उद्देश्य (धर्म-संस्थापना) के लिए वे यहाँ अवतीर्ण हुए थे, उस ईश्वर के आदेश को पूरा कर चुके थे...
आत्मजेष्वात्मजां न्यस्य विरहाद् रुदतीमिव ।
प्रजासु विमनःस्वेकः सदारोऽगात्तपोवनम् ॥ ३ ॥
भावार्थ: ...तब उन्होंने अपनी पुत्री के समान उस (पृथ्वी) को, जो उनके विरह में मानो रो रही थी, अपने पुत्रों को सौंप दिया। और जब प्रजा अत्यंत उदास (विमनः) हो रही थी, तब वे अकेले ही अपनी पत्नी के साथ तपस्या करने के लिए वन में चले गए।
तत्राप्यदाभ्यनियमो वैखानससुसम्मते ।
आरब्ध उग्रतपसि यथा स्वविजये पुरा ॥ ४ ॥
भावार्थ: वहाँ वन में जाकर भी, उन्होंने वानप्रस्थों (वैखानस) के अनुकूल अत्यंत कठोर (अदाभ्य) नियमों का पालन करते हुए वैसी ही उग्र तपस्या शुरू की, जैसी कठोरता से उन्होंने पहले पृथ्वी को जीता था।
कन्दमूलफलाहारः शुष्कपर्णाशनः क्वचित् ।
अब्भक्षः कतिचित्पक्षान् वायुभक्षस्ततः परम् ॥ ५ ॥
भावार्थ: शुरू में वे कंद, मूल और फल खाते थे; फिर सूखे पत्ते खाकर रहने लगे। कुछ समय बाद वे केवल पानी पीकर (अब्भक्ष) कई पखवाड़े (पक्ष) बिताते, और अंत में केवल हवा (वायु) पीकर रहने लगे।
ग्रीष्मे पञ्चतपा वीरो वर्षास्वासारषाण्मुनिः ।
आकण्ठमग्नः शिशिरे उदके स्थण्डिलेशयः ॥ ६ ॥
भावार्थ: वे वीर मुनि गर्मियों (ग्रीष्म) में पंचाग्नि तापते थे, बरसात में खुले आकाश के नीचे मूसलाधार बारिश सहते थे, सर्दियों (शिशिर) में गले तक ठंडे पानी में खड़े रहते थे, और रात में नंगी ज़मीन (स्थण्डिल) पर सोते थे।
तितिक्षुर्यतवाग्दान्त ऊर्ध्वरेता जितानिलः ।
आरिराधयिषुः कृष्णं अचरत् तप उत्तमम् ॥ ७ ॥
भावार्थ: सब कुछ सहन करने वाले (तितिक्षु), मौन रहने वाले, इंद्रियों को वश में करने वाले (दान्त), अखंड ब्रह्मचारी (ऊर्ध्वरेता) और श्वास (प्राण) को जीतने वाले महाराज पृथु ने भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए यह अत्यंत उत्तम तप किया।
तेन क्रमानुसिद्धेन ध्वस्तकर्ममलाशयः ।
प्राणायामैः सन्निरुद्ध षड्वर्गश्छिन्नबन्धनः ॥ ८ ॥
भावार्थ: इस प्रकार क्रम से सिद्ध हुई तपस्या के द्वारा, उनके कर्मों के सभी मैल और वासनाएँ (आशय) नष्ट हो गए। प्राणायाम के द्वारा उन्होंने मन सहित पांचों इंद्रियों (षड्वर्ग) को रोक लिया और संसार के सभी बंधनों को काट दिया।
सनत्कुमारो भगवान् यदाहाध्यात्मिकं परम् ।
योगं तेनैव पुरुषं अभजत् पुरुषर्षभः ॥ ९ ॥
भावार्थ: भगवान सनत्कुमार जी ने उन्हें जिस परम आध्यात्मिक योग (ज्ञान और भक्ति) का उपदेश दिया था, पुरुषों में श्रेष्ठ (पुरुषर्षभ) पृथु ने उसी योग-मार्ग से परम पुरुष परमात्मा का भजन किया।
भगवद्धर्मिणः साधोः श्रद्धया यततः सदा ।
भक्तिर्भगवति ब्रह्मणि अनन्यविषयाभवत् ॥ १० ॥
भावार्थ: भगवान के धर्मों का पालन करते हुए और श्रद्धा के साथ निरंतर प्रयास करते हुए, उन साधु पृथु की भगवान परब्रह्म में अनन्य भक्ति (जिसमें भगवान के सिवा कुछ और न हो) हो गई।
तस्यानया भगवतः परिकर्मशुद्ध
सत्त्वात्मनस्तदनु संस्मरणानुपूर्त्या ।
ज्ञानं विरक्तिमदभूत् निशितेन येन
चिच्छेद संशयपदं निजजीवकोशम् ॥ ११ ॥
भावार्थ: भगवान की सेवा (परिकर्म) से उनका अंतःकरण (सत्त्व) पूरी तरह शुद्ध हो गया। फिर भगवान के निरंतर स्मरण (ध्यान) से उन्हें वैराग्य से भरा हुआ वह ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसकी तीखी धार से उन्होंने संदेह के कारण रूप अपने अहंकार (जीवकोश) को काट डाला।
छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीहः
तत्तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन ।
तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रमत्तो
यावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२ ॥
भावार्थ: जब उनकी संसार (अन्य) की बुद्धि कट गई और उन्हें आत्मा (परमात्मा) की प्राप्ति हो गई, तो वे पूरी तरह निष्काम (निरीह) हो गए। फिर जिस ज्ञान से उन्होंने अहंकार को काटा था, उस (साधन रूप) ज्ञान को भी उन्होंने छोड़ दिया। क्योंकि सावधान संन्यासी (यति) को भी योग की गतियों (साधनों) से तब तक शांति नहीं मिलती, जब तक कि उसे भगवान की कथाओं में प्रेम (रति) नहीं हो जाता।
एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि ।
ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वं कलेवरम् ॥ १३ ॥
भावार्थ: इस प्रकार वीरों में श्रेष्ठ महाराज पृथु ने अपनी आत्मा को परमात्मा में मिला दिया, और ब्रह्मरूप होकर (मोक्ष प्राप्त करके) उचित समय पर दृढ़ता के साथ अपना शरीर त्याग दिया।
सम्पीड्य पायुं पार्ष्णिभ्यां वायुमुत्सारयन् शनैः ।
नाभ्यां कोष्ठेष्ववस्थाप्य हृदुरःकण्ठशीर्षणि ॥ १४ ॥
भावार्थ: उन्होंने अपनी एड़ियों से गुदा द्वार (पायु) को दबाकर प्राण वायु को धीरे-धीरे ऊपर उठाया। उसे नाभि, फिर पेट, हृदय, छाती, गले और अंत में सिर (मूर्धा) में स्थापित किया।
उत्सर्पयंस्तु तं मूर्ध्नि क्रमेणावेश्य निःस्पृहः ।
वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥
भावार्थ: इस प्रकार प्राणों को धीरे-धीरे सिर में चढ़ाकर और सब इच्छाओं से मुक्त होकर, उन्होंने अपने प्राण (वायु) को बाहरी वायु में, शरीर (मिट्टी) को पृथ्वी में और शरीर की गर्मी (तेज) को अग्नि में मिला दिया।
खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः ।
क्षितिमम्भसि तत्तेजसि अदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥
भावार्थ: उन्होंने शरीर के छिद्रों (आकाश) को महा-आकाश में और तरल पदार्थों (द्रव) को जल में मिला दिया। फिर उन्होंने पृथ्वी को जल में, जल को अग्नि (तेज) में, अग्नि को वायु में, और वायु को आकाश में विलीन (लय) कर दिया।
इन्द्रियेषु मनस्तानि तन्मात्रेषु यथोद्भवम् ।
भूतादिनामून्युत्कृष्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥
भावार्थ: मन को इन्द्रियों में, इन्द्रियों को उनके विषयों (तन्मात्राओं) में, और तन्मात्राओं को अहंकार (भूतादि) में मिलाकर, उन्होंने उस अहंकार को महत्तत्त्व में मिला दिया।
तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् ।
तं चानुशयमात्मस्थं असावनुशयी पुमान् ।
ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोऽजहात्प्रभुः ॥ १८ ॥
भावार्थ: फिर सभी गुणों के भंडार उस महत्तत्त्व को उन्होंने मायामय जीव (प्रकृति) में लीन कर दिया। इसके बाद, अपनी आत्मा में स्थित उस जीव-भाव (प्रकृति) को भी ज्ञान और वैराग्य की शक्ति से त्यागकर, वे अपने वास्तविक स्वरूप (ब्रह्म) में स्थित हो गए।
अर्चिर्नाम महाराज्ञी तत्पत्न्यनुगता वनम् ।
सुकुमार्यतदर्हा च यत्पद्भ्यां स्पर्शनं भुवः ॥ १९ ॥
भावार्थ: उनकी पत्नी महारानी अर्चि भी उनके साथ वन में गई थीं। वे अत्यंत कोमल थीं और पृथ्वी पर पैदल चलने के योग्य नहीं थीं (क्योंकि महलों में रहने के कारण उनके पैर कभी ज़मीन पर नहीं पड़े थे)।
अतीव भर्तुर्व्रतधर्मनिष्ठया
शुश्रूषया चार्षदेहयात्रया ।
नाविन्दतार्तिं परिकर्शितापि सा
प्रेयस्करस्पर्शनमाननिर्वृतिः ॥ २० ॥
भावार्थ: मुनियों के समान कठोर जीवन बिताने के कारण उनका शरीर बहुत कमज़ोर (परिकर्षित) हो गया था। फिर भी, अपने पति के व्रत, धर्म और उनकी सेवा में इतनी निष्ठा थी कि अपने प्रिय पति के स्पर्श और सम्मान से मिलने वाले आनंद के कारण उन्हें वन के किसी कष्ट का अनुभव (आर्ति) ही नहीं हुआ।
देहं विपन्नाखिलचेतनादिकं
पत्युः पृथिव्या दयितस्य चात्मनः ।
आलक्ष्य किञ्चिच्च विलप्य सा सती
चितामथारोपयदद्रिसानुनि ॥ २१ ॥
भावार्थ: जब उस सती (अर्चि) ने देखा कि पृथ्वी के स्वामी और उनके अपने प्राणप्रिय पति के शरीर में चेतना (प्राण) नहीं रही है, तो वे थोड़ा सा विलाप करके (रोकर) पति के शरीर को पर्वत की चोटी (सानु) पर बनी चिता पर ले गईं।
विधाय कृत्यं ह्रदिनीजलाप्लुता
दत्त्वोदकं भर्तुरुदारकर्मणः ।
नत्वा दिविस्थांस्त्रिदशांस्त्रिः परीत्य
विवेश वह्निं ध्यायती भर्तृपादौ ॥ २२ ॥
भावार्थ: पति के अंतिम संस्कार का कार्य (कृत्य) पूरा करके, वे नदी के जल में नहाईं। फिर अपने उदार कर्मों वाले पति को जलांजलि (उदक) देकर, आकाश में स्थित देवताओं को प्रणाम किया। चिता की तीन बार परिक्रमा करके, अपने पति के चरणों का ध्यान करते हुए वे भी उसी चिता की अग्नि में प्रवेश कर गईं (सती हो गईं)।
विलोक्यानुगतां साध्वीं पृथुं वीरवरं पतिम् ।
तुष्टुवुर्वरदा देवैः देवपत्न्यः सहस्रशः ॥ २३ ॥
भावार्थ: उस साध्वी को अपने वीरवर पति पृथु का अनुगमन (सती) करते हुए देखकर, देवताओं के साथ आई हुईं हजारों देव-पत्नियां बहुत प्रसन्न हुईं और वरदान देने के भाव से उनकी स्तुति करने लगीं।
कुर्वत्यः कुसुमासारं तस्मिन् मन्दरसानुनि ।
नदत्स्वमरतूर्येषु गृणन्ति स्म परस्परम् ॥ २४ ॥
भावार्थ: मंदराचल पर्वत की उस चोटी पर वे देवी अर्चि पर फूलों की वर्षा करने लगीं। जब देवताओं के बाजे (तूर्य) बज रहे थे, तब देव-स्त्रियां आपस में बातें करने लगीं।
देव्य ऊचुः
अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् ।
सर्वात्मना पतिं भेजे यज्ञेशं श्रीर्वधूरिव ॥ २५ ॥
भावार्थ: देवियों ने कहा — "अहो! यह रानी (वधू) सचमुच धन्य है, जिसने राजाओं के स्वामी अपने पति की पूरे मन (सर्वात्मा) से उसी तरह सेवा की, जैसे साक्षात लक्ष्मी जी (श्री) यज्ञेश्वर भगवान विष्णु की सेवा करती हैं।"
सैषा नूनं व्रजत्यूर्ध्वमनु वैन्यं पतिं सती ।
पश्यतास्मानतीत्यार्चिः दुर्विभाव्येन कर्मणा ॥ २६ ॥
भावार्थ: "देखो! यह सती अर्चि अपने उस अकल्पनीय कर्म (पतिव्रत धर्म) के प्रभाव से हम सबसे भी बहुत ऊपर (ऊर्ध्व) अपने पति वैन्य (पृथु) के पीछे-पीछे जा रही है।"
तेषां दुरापं किं त्वन्यन् मर्त्यानां भगवत्पदम् ।
भुवि लोलायुषो ये वै नैष्कर्म्यं साधयन्त्युत ॥ २७ ॥
भावार्थ: "पृथ्वी पर जिनकी आयु बहुत ही चंचल (थोड़ी) है, ऐसे मनुष्यों में जो लोग निष्काम कर्मयोग (नैष्कर्म्य) को साध लेते हैं, उनके लिए भगवान का परम पद भी दुर्लभ नहीं है, फिर और क्या दुर्लभ हो सकता है?"
स वञ्चितो बतात्मध्रुक् कृच्छ्रेण महता भुवि ।
लब्ध्वापवर्ग्यं मानुष्यं विषयेषु विषज्जते ॥ २८ ॥
भावार्थ: "अरे! वह मनुष्य अपनी ही आत्मा का दुश्मन (आत्मध्रुक्) और ठगा हुआ (वंचित) है, जो पृथ्वी पर बड़ी कठिनाई से मोक्ष दिलाने वाले इस मनुष्य जन्म को पाकर भी, इन्द्रियों के विषयों (भोगों) में फँसा रहता है।"
मैत्रेय उवाच
स्तुवतीष्वमरस्त्रीषु पतिलोकं गता वधूः ।
यं वा आत्मविदां धुर्यो वैन्यः प्रापाच्युताश्रयः ॥ २९ ॥
भावार्थ: मैत्रेय जी ने कहा — जब देव-स्त्रियां उनकी इस प्रकार स्तुति कर रही थीं, तब वह वधू (अर्चि) अपने पति के उस लोक में पहुँच गई, जिसे आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ और भगवान के आश्रित महाराज पृथु (वैन्य) ने प्राप्त किया था।
इत्थम्भूतानुभावोऽसौ पृथुः स भगवत्तमः ।
कीर्तितं तस्य चरितं उद्दामचरितस्य ते ॥ ३० ॥
भावार्थ: भगवान के श्रेष्ठ भक्त (भगवत्तम) महाराज पृथु का प्रभाव ऐसा ही महान था। मैंने उनके उन महान चरित्रों का वर्णन तुम्हें सुना दिया है।
य इदं सुमहत्पुण्यं श्रद्धयावहितः पठेत् ।
श्रावयेत् श्रुणुयाद्वापि स पृथोः पदवीमियात् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: जो कोई व्यक्ति इस अत्यंत पुण्यमयी कथा को श्रद्धा और एकाग्रता के साथ पढ़ता है, दूसरों को सुनाता है या स्वयं सुनता है, वह महाराज पृथु के ही परम पद को प्राप्त होता है।
ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी राजन्यो जगतीपतिः ।
वैश्यः पठन् विट्पतिः स्यात् शूद्रः सत्तमतामियात् ॥ ३२ ॥
भावार्थ: इस कथा को पढ़ने से ब्राह्मण को ब्रह्मतेज प्राप्त होता है, क्षत्रिय (राजन्य) पृथ्वी का स्वामी बनता है, वैश्य व्यापार में सफल (धनवान) होता है, और शूद्र को समाज में श्रेष्ठता (सत्तमता) प्राप्त होती है।
त्रिकृत्व इदमाकर्ण्य नरो नार्यथवाऽऽदृता ।
अप्रजः सुप्रजतमो निर्धनो धनवत्तमः ॥ ३३ ॥
भावार्थ: यदि कोई पुरुष या स्त्री आदरपूर्वक तीन बार इस कथा को सुन ले, तो निसंतान को उत्तम संतान मिलती है और निर्धन व्यक्ति बहुत धनवान हो जाता है।
अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः ।
इदं स्वस्त्ययनं पुंसां अमङ्गल्यनिवारणम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ: जिसकी कोई कीर्ति नहीं है (अज्ञात है), उसे महान यश मिलता है; और मूर्ख भी विद्वान (पंडित) हो जाता है। यह कथा मनुष्यों के लिए बहुत कल्याणकारी (स्वस्त्ययन) और सभी अमंगलों को दूर करने वाली है।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं कलिमलापहम् ।
धर्मार्थकाममोक्षाणां सम्यक् सिद्धिमभीप्सुभिः ।
श्रद्धयैतदनुश्राव्यं चतुर्णां कारणं परम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ: यह कथा धन, यश, आयु और स्वर्ग देने वाली है तथा कलियुग के पापों को नष्ट करने वाली है। जो लोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों की सिद्धि चाहते हैं, उन्हें इसे श्रद्धापूर्वक सुनना चाहिए, क्योंकि यह इन चारों को प्रदान करने का परम साधन है।
विजयाभिमुखो राजा श्रुत्वैतदभियाति यान् ।
बलिं तस्मै हरन्त्यग्रे राजानः पृथवे यथा ॥ ३६ ॥
भावार्थ: यदि कोई राजा विजय की इच्छा से इस कथा को सुनकर अपने शत्रुओं पर चढ़ाई करता है, तो उसके शत्रु भी (बिना लड़े ही) आकर उसे वैसे ही कर (भेंट) देते हैं, जैसे अन्य राजा महाराज पृथु को देते थे।
मुक्तान्यसङ्गो भगवति अमलां भक्तिमुद्वहन् ।
वैन्यस्य चरितं पुण्यं श्रृणुयात् श्रावयेत्पठेत् ॥ ३७ ॥
भावार्थ: संसार की अन्य आसक्तियों से मुक्त होकर, जो व्यक्ति भगवान के प्रति निर्मल भक्ति रखता है, उसे वैन्य (पृथु) के इस पवित्र चरित्र को सुनना, सुनाना या पढ़ना चाहिए।
वैचित्रवीर्याभिहितं महन्माहात्म्यसूचकम् ।
अस्मिन्कृतमतिमर्त्यः पार्थवीं गतिमाप्नुयात् ॥ ३८ ॥
भावार्थ: हे विचित्रवीर्य के पुत्र विदुर! मैंने तुम्हें महाराज पृथु के महान माहात्म्य को बताने वाली यह कथा सुना दी है। जो मनुष्य इस कथा में अपना मन लगाता है, वह पृथु जी की परम गति को प्राप्त कर लेता है।
अनुदिनमिदमादरेण श्रृण्वन्
पृथुचरितं प्रथयन् विमुक्तसङ्गः ।
भगवति भवसिन्धुपोतपादे
स च निपुणां लभते रतिं मनुष्यः ॥ ३९ ॥
भावार्थ: जो व्यक्ति सभी आसक्तियों से मुक्त होकर (विमुक्तसंग), प्रतिदिन इस पृथु चरित्र को आदरपूर्वक सुनता है या दूसरों को सुनाता (प्रथयन्) है, उसे संसार-सागर को पार कराने वाली नाव के समान, भगवान के श्रीचरणों में अनन्य भक्ति (निपुणा रति) प्राप्त हो जाती है।

