श्रीमद्भागवत माहात्म्यम्
पञ्चमोऽध्यायः : गोकर्णोपाख्यान और धुंधुकारी की मुक्ति
श्रीसूत उवाच
पितरि उपरते तेन जननी ताडिता भृशम् ।
क्व वित्तं तिष्ठति ब्रूहि हनिष्ये लत्तया न चेत् ॥ १ ॥
भावार्थ: सूत जी बोले: पिता (आत्मदेव) की मृत्यु के बाद उस पापी धुंधुकारी ने अपनी माता को बुरी तरह पीटा और कहा— "बताओ, धन कहाँ छिपा है? यदि नहीं बताओगी, तो मैं तुम्हें लात मारकर मार डालूँगा!"
इति तद्वाक्य संत्रासात् जनन्या पुत्रदुःखतः ।
कूपे पातः कृतो रात्रौ तेन सा निधनं गता ॥ २ ॥
भावार्थ: उस पुत्र के वचनों के भयंकर त्रास से और पुत्र के ऐसे दुराचार से दुःखी होकर माता ने रात के समय कुएँ में कूदकर आत्महत्या कर ली, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
गोकर्णः तीर्थयात्रार्थं निर्गतो योगसंस्थितः ।
न दुःखं न सुखं तस्य न वैरी नापि बान्धवः ॥ ३ ॥
भावार्थ: दूसरी ओर, गोकर्ण जी योग में स्थित होकर तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े। उनके लिए न कोई सुख था, न दुःख, न कोई उनका शत्रु था और न ही कोई बान्धव (मोह-संबंधी)।
धुन्धुकारी गृहेऽतिष्ठत् पंचपण्यवधूवृतः ।
अत्युग्रकर्मकर्ता च तत् पोषणविमूढधीः ॥ ४ ॥
भावार्थ: इधर धुंधुकारी पाँच वेश्याओं (कुलटाओं) को साथ रखकर उसी घर में रहने लगा। वह अत्यंत उग्र और नीच कर्म करने लगा तथा उन वेश्याओं का पोषण करने में ही उसकी बुद्धि पूरी तरह विमूढ़ हो गई थी।
एकदा कुलटास्तास्तु भूषणान्यभिलिप्सवः ।
तदर्थं निर्गतो गेहात् कामान्धो मृत्युमस्मरन् ॥ ५ ॥
भावार्थ: एक बार उन कुलटा वेश्याओं की इच्छा आभूषण (गहने) पाने की हुई। उनके लिए धन लाने हेतु वह कामान्ध धुंधुकारी अपनी मृत्यु को भूला हुआ घर से बाहर गया।
यतस्ततश्च संहृत्य वित्तं वेश्म पुनर्गतः ।
ताभ्योऽयच्छत् सुवस्त्राणि भूषणानि कियन्ति C ॥ ६ ॥
भावार्थ: वह इधर-उधर से चोरी और जुल्म करके बहुत सा धन इकट्ठा करके घर लौटा, और उसने उन वेश्याओं को सुंदर वस्त्र तथा कुछ आभूषण लाकर दिए।
बहुवित्तचयं दृष्ट्वा रात्रौ नार्यो व्यचारयन् ।
चौर्यं करोत्यसौ नित्यं अतो राजा ग्रहीष्यति ॥ ७ ॥
भाव#'भावार्थ: रात के समय धन का अपार संचय देखकर उन स्त्रियों ने आपस में विचार किया— "यह नित्य चोरी करता है, इसलिए किसी दिन राजा इसे पकड़ लेगा।"
वित्तं हृत्वा पुनश्चैनं मारयिष्यति निश्चितम् ।
अतोऽर्थगुप्तये गूढं अस्माभिः किं न हन्यते ॥ ८ ॥
भावार्थ: "राजा इसका सारा धन छीनकर अंत में इसे निश्चित ही मार डालेगा। इसलिए क्यों न हम ही इसका सारा धन हड़प लें और चुपचाप इसे यहीं मार डालें?"
निहत्यैनं गृहीत्वार्थं यास्यामो यत्र कुत्रचित् ।
इति ता निश्चयं कृत्वा सुप्तं सम्बद्ध्य रश्मिभिः ॥ ९ ॥
भावार्थ: "इसे मारकर धन लेकर हम जहाँ चाहें चली जाएँगी।" ऐसा निश्चय करके उन कुटिल स्त्रियों ने सोते हुए धुंधुकारी को रस्सियों से कसकर बाँध दिया।
पाशं कण्ठे निधायास्य तन्मृत्युं उपचक्रमुः ।
त्वरितं न ममारासौ चिन्तायुक्ताः तदाभवन् ॥ १० ॥
भावार्थ: उसके गले में फंदा डालकर उन्होंने उसकी हत्या करनी चाही, किंतु वह तुरंत नहीं मरा, जिससे वे चिंता में पड़ गईं।
तप्तांगारसमूहांश्च तन्मुखे हि विचिक्षिपुः ।
अग्निज्वालातिदुःखेन व्याकुलो निधनं गतः ॥ ११ ॥
भावार्थ: तब उन्होंने जलते हुए अंगारों के समूह को उसके मुँह में भर दिया। अग्नि की ज्वाला के तीव्र कष्ट से व्याकुल होकर अंततः उसकी मृत्यु हो गई।
तं देहं मुमुचुर्गर्ते प्रायः साहसिकाः स्त्रियः ।
न ज्ञातं तद्रहस्यं तु केनापीदं तथैव च ॥ १२ ॥
भावार्थ: साहसी (क्रूर) स्त्रियों ने उसके शव को एक गड्ढे (गर्ते) में फेंक दिया। इस रहस्य को उस समय किसी ने नहीं जाना कि उसकी मृत्यु कैसे हुई थी।
लोकैः पृष्ट्वा वदन्ति स्म दूरं यातः प्रियो हि नः ।
आगमिष्यति वर्षेऽस्मिन् वित्तलोभविकर्षितः ॥ १३ ॥
भावार्थ: लोगों के पूछने पर वे वेश्याएँ झूठ बोलतीं कि "हमारे प्रियतम तो कहीं दूर गए हैं, धन के लोभ में वे इसी वर्ष लौटकर आ जाएँगे।"
स्त्रीणां नैव तु विश्वासं दुष्टानां कारयेत् बुधः ।
विश्वासे यः स्थितो मूढः स दुःखैः परिभूयते ॥ १४ ॥
भावार्थ: समझदार मनुष्य को कभी भी दुष्ट स्त्रियों का विश्वास नहीं करना चाहिए। जो मूर्ख उनके विश्वास में फँसा रहता है, वह अंततः भीषण दुःखों से कुचला जाता है।
सुधामयं वचो यासां कामिनां रसवर्धनम् ।
हृदयं क्षुरधाराभं प्रियः को नाम योषिताम् ॥ १५ ॥
भावार्थ: जिन स्त्रियों की वाणी कामियों के रस को बढ़ाने वाली अमृत के समान मीठी होती है, किंतु हृदय छुरी की धार (क्षुरधारा) के समान अत्यंत क्रूर होता है, उनका भला इस संसार में कौन अपना प्रिय हो सकता है?
संहृत्य वित्तं ता याताः कुलटा बहुभर्तृकाः ।
धुम्धुकारी बभूवाथ महान् प्रेतः कुकर्मतः ॥ १६ ॥
भावार्थ: वे अनेक पतियों वाली कुलटा स्त्रियाँ सारा धन समेटकर वहाँ से भाग गईं। इधर अपने कुकर्मों के कारण वह धुंधुकारी मरने के बाद एक भयंकर 'प्रेत' (पिशाच) बन गया।
वात्यारूपधरो नित्यं धावन् दशदिशोन्तरम् ।
शीतातप परिक्लिष्टो निराहारः पिपासितः ॥ १७ ॥
भावार्थ: वह हमेशा बवंडर (आँधी) का रूप धारण करके दसों दिशाओं में भटकता रहता था। सर्दी और धूप से संतप्त, हमेशा भूखा और प्यासा रहता था।
न लेभे शरणं क्वापि हा दैवेति मुहुर्वदन् ।
कियत्कालेन गोकर्णो मृतं लोकादबुध्यत ॥ १८ ॥
भावार्थ: "हा दैव!" ऐसा बार-बार चिल्लाते हुए भी उसे कहीं शरण नहीं मिली। कुछ समय बीतने पर गोकर्ण जी को लोगों से यह समाचार मिला कि उनके भाई धुंधुकारी की मृत्यु हो चुकी है।
अनाथं तं विदित्वैव गयाश्राद्धं अचीकरत् ।
यस्मिन् तीर्थे तु संयाति तत्र श्राद्धं अवर्तयत् ॥ १९ ॥
भावार्थ: उसे अनाथ (अगति को प्राप्त) जानकर गोकर्ण जी ने गया जाकर उसका विधिपूर्वक श्राद्ध किया। वे जिस भी तीर्थ में जाते, वहीं उसके नाम से श्राद्ध और तर्पण करते थे।
एवं भ्रमन् स गोकर्णः स्वपुरं समुपेयिवान् ।
रात्रौ गृहांगणे स्वप्तुं आगतोऽलक्षितः परैः ॥ २० ॥
भावार्थ: इस प्रकार तीर्थों में भ्रमण करते हुए गोकर्ण जी अपने नगर (घर) वापस लौटे। एक रात वे चुपचाप बिना किसी के देखे घर के आँगन में सोने के लिए लेटे।
तत्र सुप्तं स विज्ञाय धुन्धुकारी स्वबान्धवम् ।
निशीथे दर्शयामास महारौद्रतरं वपुः ॥ २१ ॥
भावार्थ: वहीं आँगन में अपने भाई गोकर्ण को सोया हुआ जानकर, उस प्रेत बने धुंधुकारी ने आधी रात के समय (निशीथे) अपना अत्यंत भयंकर और रौद्र रूप उन्हें दिखाया।
सकृन्मेषः सकृद्धस्ती सकृच्च महिषोऽभवत् ।
सकृदिन्द्र सकृच्चाग्निः पुनश्च पुरुषोऽभवत् ॥ २२ ॥
भावार्थ: वह प्रेत अपनी माया से पलभर में मेढ़ा (भेड़), पलभर में हाथी, कभी भैंसा, कभी इंद्र, कभी अग्नि, और कभी भयानक मनुष्य का रूप धारण कर रहा था (यानी वह वायु रूप होने के कारण अनेक रूप बदल रहा था)।
वैपरीत्यं इदं दृष्ट्वा गोकर्णो धैर्यसंयुतः ।
अयं दुर्गतिकं कोऽपि निश्चित्याथ तमब्रवीत् ॥ २३ ॥
भाव#'भावार्थ: इस प्रकार के विचित्र और भयानक परिवर्तन को देखकर भी धैर्यवान गोकर्ण जी घबराए नहीं। उन्होंने यह पहचान लिया कि यह कोई दुर्गतिको (प्रेत योनि) को प्राप्त हुआ जीव है, और उन्होंने उससे कहा।
गोकर्ण उवाच
कस्त्वं उग्रतरो रात्रौ कुतो यातो दशां इमाम् ।
किंवा प्रेतः पिशाचो वा राक्षसोऽसीति शंस नः ॥ २४ ॥
भावार्थ: गोकर्ण जी ने कहा: "रात्रि के समय इस अत्यंत उग्र रूप में तुम कौन हो? तुम्हारी यह दशा कैसे हुई? क्या तुम कोई प्रेत हो, पिशाच हो, या राक्षस हो? सच-सच बताओ।"
श्रीसूत उवाच
एवं पृष्टस्तदा तेन रुरोदोच्चैः पुनः पुनः ।
अशक्तो वचनोच्चारे संज्ञामात्रं चकार ह ॥ २५ ॥
भावार्थ: सूत जी कहते हैं: गोकर्ण जी द्वारा इस प्रकार पूछने पर वह प्रेत जोर-जोर से फफक कर रोने लगा। मुँह से स्पष्ट वचन न निकल पाने के कारण वह केवल हाथ के इशारों (संज्ञामात्र) से अपनी बात समझाने लगा।
ततोऽञ्जलौ जलं कृत्वा गोकर्णस्तमुदैरयत् ।
तत्सेकहतपापोऽसौ प्रवक्तुं उपचक्रमे ॥ २६ ॥
भावार्थ: तब गोकर्ण जी ने अंजलि में पवित्र जल लेकर उसका मार्जन (छिड़काव) किया। उस जल के स्पर्श से उसके कुछ पाप कम हुए, और तब वह प्रेत बोलने में समर्थ हुआ।
प्रेत उवाच
अहं भ्राता त्वदीयोऽस्मि धुन्धुकारीरि नामतः ।
स्वकीयेनैव दोषेण ब्रह्मत्वं नाशितं मया ॥ २७ ॥
भावार्थ: प्रेत ने कहा: "हे भाई! मैं आपका ही भाई 'धुंधुकारी' हूँ। अपने ही पापी कर्मों और दोषों के कारण मैंने अपना ब्राह्मणत्व (मानव योनि) नष्ट कर दिया है।"
कर्मणो नास्ति संख्या मे महाज्ञाने विवर्तिनः ।
लोकानां हिंसकः सोऽहं स्त्रीभिर्दुःखेन मारितः ॥ २८ ॥
भावार्थ: "मेरे द्वारा किए गए पाप कर्मों की कोई संख्या नहीं है। मैं समस्त लोकों का हिंसक था, और अंत में उन कुटिल स्त्रियों द्वारा अत्यंत कष्ट देकर मार डाला गया।"
अतः प्रेतत्वं आपन्नो दुर्दशां च वहाम्यहम् ।
वाताहारेण जीवामि दैवाधीनफलोदयात् ॥ २९ ॥
भावार्थ: "उसी पाप के कारण मैं प्रेत योनि को प्राप्त हुआ हूँ और यह भयंकर दुर्दशा भोग रहा हूँ। दैवयोग से मिले कर्मफल के कारण मैं केवल हवा (वात) खाकर ही जीवित रहता हूँ।"
अहो बन्धो कृपासिन्धो भ्रातर्मामाशु मोचय ।
गोकर्णो वचनं श्रुत्वा तस्मै वाक्यं अथाब्रवीत् ॥ ३० ॥
भावार्थ: "अहो भाई! आप तो कृपा के सागर हैं। हे भाई, मुझे इस भयंकर योनि से शीघ्र ही मुक्त कीजिए!" प्रेत की यह करुण पुकार सुनकर गोकर्ण जी ने उससे कहा।
गोकर्ण उवाच
त्वदर्थं तु गयापिण्डो मया दत्तो विधानतः ।
तत्कथं नैव मुक्तोऽसि ममाश्चर्यं इदं महत् ॥ ३१ ॥
भावार्थ: गोकर्ण जी ने कहा: "तुम्हारी मुक्ति के लिए मैंने गया जाकर पूरी विधि-विधान से पिंडदान किया था। फिर भी तुम इस प्रेत योनि से क्यों नहीं मुक्त हुए? यह मेरे लिए बड़े आश्चर्य की बात है!"
गयाश्राद्धान्न मुक्तिश्चेत् उपायो नापरस्त्विह ।
किं विधेयं मया प्रेत तत्त्वं वद सविस्तरम् ॥ ३२ ॥
भाव#'भावार्थ: "यदि गया के श्राद्ध से भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हुई, तो संसार में इसके सिवा और कोई दूसरा उपाय नहीं है। हे प्रेत! अब मुझे क्या करना चाहिए? तुम विस्तार से सत्य बताओ।"
प्रेत उवाच
गयाश्राद्धशतेनापि मुक्तिर्मे न भविष्यति ।
उपायं अपरं कंचित् त्वं विचारय साम्प्रतम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ: प्रेत ने कहा: "गया में सौ बार भी श्राद्ध करने से मेरी मुक्ति नहीं हो सकती। इसलिए आप इसके अलावा किसी अन्य उपाय का ही विचार कीजिए।"
इति तद्वाक्यमाकर्ण्य गोकर्णो विस्मयं गतः ।
शतश्राद्धैर्न मुक्तिश्चेत् असाध्यं मोचनं तव ॥ ३४ ॥
भावार्थ: प्रेत की यह बात सुनकर गोकर्ण जी विस्मय में पड़ गए और बोले— "यदि सैकड़ों श्राद्धों से भी तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती, तो लगता है तुम्हारा छूटना (मोचन) अत्यंत असाध्य है।"
इदानीं तु निजं स्थानं आतिष्ठ प्रेत निर्भयः ।
त्वन्मुक्तिसाधकं किंचित् आचरिष्ये विचार्य च ॥ ३५ ॥
भावार्थ: "हे प्रेत! अब तुम बिना किसी भय के अपने (प्रेत के) स्थान पर जाओ। मैं भली-भाँति विचार करके तुम्हारी मुक्ति का कोई अचूक साधन अवश्य करूँगा।"
धुन्धुकारी निजस्थानं तेनादिष्टस्ततो गतः ।
गोकर्णश्चिन्तयामास तां रात्रिं न तदध्यगात् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: गोकर्ण जी द्वारा ऐसा कहे जाने पर धुंधुकारी अपने स्थान को चला गया। गोकर्ण जी पूरी रात इसी चिंता में जागते रहे कि इसे कैसे मुक्त किया जाए, किंतु उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा।
प्रातस्तं आगतं दृष्ट्वा लोकाः प्रीत्याः समागताः ।
तत्सर्वं कथितं तेन यत् जातं च यथा निशि ॥ ३७ ॥
भावार्थ: प्रातःकाल जब लोग गोकर्ण जी के पास आए, तो प्रेमपूर्वक उन्होंने रात में घटी हुई वह सारी घटना ज्यों-की-त्यों सबको बता दी।
विद्वांसो योगनिष्ठाश्च ज्ञानिनो ब्रह्मवादिनः ।
तन्मुक्तिं नैव तेऽपश्यन् पश्यन्तः शास्त्रसंचयान् ॥ ३८ ॥
भावार्थ: वहाँ बड़े-बड़े विद्वान, योगनिष्ठ, ज्ञानी और ब्रह्मवादी महात्मा एकत्रित हुए। उन्होंने अनेकों शास्त्रों को खंगाला, परंतु उस प्रेत की मुक्ति का कोई भी उपाय उन्हें दिखाई नहीं दिया।
ततः सर्वैः सूर्यवाक्यं तन्मुक्तौ स्थापितं परम् ।
गोकर्णः स्तम्भनं चक्रे सूर्यवेगस्य वै तदा ॥ ३९ ॥
भावार्थ: तब सभी ने यह निर्णय लिया कि इस विषय में साक्षात् भगवान सूर्य से ही उपाय पूछा जाना चाहिए। तब गोकर्ण जी ने सूर्य की गति को रोकने (स्तम्भन) के लिए योगबल का प्रयोग किया।
तुभ्यं नमो जगत् साक्षिन् ब्रूहि मे मुक्तिहेतुकम् ।
तत् श्रुत्वा दूरतः सूर्यः स्फुटमित्यभ्यभाषत ॥ ४० ॥
भाव#'भावार्थ: गोकर्ण जी ने आकाश की ओर हाथ जोड़कर कहा: "हे जगत् साक्षी भगवान सूर्य! आपको नमस्कार है। कृपया इस प्रेत की मुक्ति का उपाय मुझे बताइए।" यह सुनकर सूर्यदेव ने आकाश से ही स्पष्ट वाणी में उत्तर दिया।
श्रीमद्भागवतान् मुक्तिः सप्ताहं वाचनं कुरु ।
इति सूर्यवचः सर्वैः धर्मरूपं तु विश्रुतम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ: सूर्यदेव ने कहा: "श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से ही इसकी मुक्ति संभव है, अतः तुम सात दिन (सप्ताह) तक भागवत कथा का वाचन करो।" सूर्यदेव के इन वचनों को सभी ने परम धर्म के रूप में सुना।
सर्वेऽब्रुवन् प्रयत्नेन कर्तव्यं सुकरं त्विदम् ।
गोकर्णो निश्चयं कृत्वा वाचनार्थं प्रवर्तितः ॥ ४२ ॥
भावार्थ: सभी ने कहा कि "यह उपाय बहुत ही सुगम (आसानी से करने योग्य) है, इसे बड़े प्रयत्न से करना चाहिए।" तब गोकर्ण जी ने दृढ़ निश्चय करके भागवत कथा कहने का संकल्प लिया।
तत्र संश्रवणार्थाय देशग्रामाज्जना ययुः ।
पङ्ग्वन्ध वृद्धमन्दाश्च तेऽपि पापक्षयाय वै ॥ ४३ ॥
भावार्थ: उस कथा को सुनने के लिए दूर-दूर के देशों और गाँवों से लोग आने लगे। अपने पापों का नाश करने के लिए लँगड़े, अंधे, वृद्ध और मंदबुद्धि लोग भी वहाँ एकत्रित हुए।
समाजस्तु महाञ्जातो देवविस्मयकारकः ।
यदैवासनमास्थाय गोकर्णोऽकथयत्कथाम् ॥ ४४ ॥
भावार्थ: वह सभा इतनी विशाल और भव्य हो गई कि देवताओं को भी विस्मय हुआ। जब गोकर्ण जी ने व्यास-आसन पर बैठकर कथा कहना आरंभ किया...
स प्रेतोऽपि तदाऽऽयातः स्थानं पश्यन् इतस्ततः ।
सप्तग्रन्थियुतं तत्र अपश्यत् कीचकमुछ्रितम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ: ...तब वह प्रेत (धुंधुकारी) भी वहाँ आ पहुँचा और इधर-उधर स्थान देखने लगा। उसने देखा कि वहाँ सात गाँठों (सप्तग्रंथि) से युक्त एक ऊँचा बाँस (कीचक) गड़ा हुआ है।
तन्मूलच्छिद्रमाविश्य श्रवणार्थं स्थितौ ह्यसौ ।
वातरूपी स्थितिं कर्तुं अशक्तो वंशमाविशत् ॥ ४६ ॥
भावार्थ: कथा सुनने की इच्छा से वह वायु (प्रेत) रूपी धुंधुकारी उस बाँस के जड़ के छिद्र में घुस गया। वह प्रेत रूप में बाहर स्थिर नहीं रह सकता था, इसलिए कथा सुनने के लिए उसने उस बाँस (वंश) के भीतर प्रवेश कर लिया।
वैष्णवं ब्राह्मणं मुख्यं श्रोतारं परिकल्प्य सः ।
प्रथमस्कन्धतः स्पष्टं आख्यानं धेनुजोऽकरत् ॥ ४७ ॥
भावार्थ: गोकर्ण जी ने एक श्रेष्ठ वैष्णव ब्राह्मण को मुख्य श्रोता के रूप में स्थापित किया, और प्रथम स्कंध से श्रीमद्भागवत की कथा स्पष्ट रूप से कहना आरंभ किया।
दिनान्ते रक्षिता गाथा तदा चित्रं बभूव ह ।
वंशैकग्रन्थिभेदोऽभूत् सशब्दं पश्यतां सताम् ॥ ४८ ॥
...
भावार्थ: प्रथम दिन की कथा समाप्त होने पर एक अद्भुत चमत्कार हुआ। वहाँ उपस्थित सभी संतों के देखते-देखते उस बाँस की पहली गाँठ (ग्रंथि) बड़े ज़ोर की आवाज के साथ फट गई (टूट गई)।
द्वितीयेऽह्नि तथा सायं द्वितीयग्रन्थिभेदनम् ।
तृतीयेऽह्नि तथा सायं तृतीयग्रन्थिभेदनम् ॥ ४९ ॥
भावार्थ: इसी प्रकार दूसरे दिन शाम को दूसरी गाँठ फटी, और तीसरे दिन शाम को तीसरी गाँठ फट गई।
एवं सप्तदिनैश्चैव सप्तग्रन्थिविभेदनम् ।
कृत्वा स द्वादशस्कन्ध श्रवणात् प्रेततां जहौ ॥ ५० ॥
भावार्थ: इस प्रकार सातों दिनों में उस बाँस की सातों गाँठें एक-एक करके फट गईं। और सातवें दिन बारहवें स्कंध की कथा पूरी होने पर धुंधुकारी की प्रेतयोनि हमेशा के लिए छूट गई।
दिव्यरूपधरो जातः तुलसीदाममंडितः ।
पीतवासा घनश्यमो मुकुटी कुण्डलान्वितः ॥ ५१ ॥
भावार्थ: वह प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप को प्राप्त हो गया। उसके गले में तुलसी की माला शोभा पा रही थी, उसने पीले वस्त्र (पीतांबर) पहन रखे थे, उसका शरीर घनश्याम था और उसके सिर पर मुकुट तथा कानों में कुंडल जगमगा रहे थे।
ननाम भ्रातरं सद्यो गोकर्णं इति चाब्रवीत् ।
त्वयाहं मोचितो बन्धो कृपया प्रेतकश्मलात् ॥ ५२ ॥
भावार्थ: उसने तुरंत अपने भाई गोकर्ण जी को प्रणाम किया और कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा: "हे भाई! आपकी कृपा से ही मैं इस भयंकर प्रेत-कष्ट से मुक्त हुआ हूँ।"
धन्या भागवती वार्ता प्रेतपीडाविनाशिनी ।
सप्ताहोऽपि तथा धन्यः कृष्णलोकफलप्रदः ॥ ५३ ॥
भावार्थ: "प्रेत की पीड़ा को हमेशा के लिए नष्ट कर देने वाली यह भागवती कथा धन्य है! और श्रीकृष्ण के परम लोक (वैकुंठ/गोलोक) को प्रदान करने वाला यह 'सप्ताह' व्रत भी धन्य है!"
कम्पन्ते सर्वपापानि सप्ताहश्रवणे स्थिते ।
अस्माकं प्रलयं सद्यः कथा चेयं करिष्यति ॥ ५४ ॥
भाव#'भावार्थ: "जहाँ सप्ताह कथा का आयोजन होता है, वहाँ के सभी पाप काँपने लगते हैं। यह कथा हमारे जैसे पापी जीवों के समस्त पापों और दुखों का तत्काल प्रलय (नाश) कर देती है।"
आर्द्रं शुष्कं लघु स्थूलं वाङ्मनः कर्मभिः कृतम् ।
श्रवणं विदहेत्पापं पावकं समिधो यथा ॥ ५५ ॥
भावार्थ: "चाहे पाप गीला हो या सूखा, हल्का हो या भारी, वाणी, मन या कर्म से किया गया हो—भागवत का यह श्रवण उन सभी पापों को ऐसे जलाकर भस्म कर देता है, जैसे अग्नि सूखी लकड़ियों (समिधा) को जला देती है।"
अस्मिन् वै भारते वर्षे सूरिभिः देवसंसदि ।
अकथाश्राविणां पुंसां निष्फलं जन्म कीर्तितम् ॥ ५६ ॥
भावार्थ: "इस भारतवर्ष में देवताओं की सभा में विद्वानों ने यही कहा है कि जो मनुष्य इस कथा को नहीं सुनते, उनका यह मनुष्य जन्म पूरी तरह निष्फल (व्यर्थ) है।"
किं मोहतो रक्षितेन सुपुष्टेन बलीयसा ।
अध्रुवेण शरीरेण शुकशास्त्रकथां विना ॥ ५७ ॥
भावार्थ: "मोह वश पोषित किए गए, इस शक्तिशाली किंतु अंततः नाशवान (अध्रुव) शरीर को सुरक्षित रखने से क्या लाभ, यदि शुकदेव जी के इस शास्त्र (भागवत कथा) का श्रवण न किया जाए?"
अस्थिस्तम्भं स्नायुबद्धं मांसशोणितलेपितम् ।
चर्मावनद्धं दुर्गन्धं पात्रं मूत्रपुरीषयोः ॥ ५८ ॥
जराशोकविपाकार्तं रोगमन्दिरमातुरम् ।
दूष्पूरं दुर्धरं दुष्टं सदोषं क्षणभंगुरम् ॥ ५९ ॥
कृमिविड् भस्म संज्ञान्तं शरीरं इति वर्णितम् ।
अस्थिरेण स्थिर कर्म कुतोऽयं साधयेत् न हि ॥ ६० ॥
भावार्थ: "यह शरीर हड्डियों का खंभा है, नसों से बँधा है, मांस और खून से लिपा हुआ है। यह चमड़े से मढ़ा हुआ, दुर्गंधयुक्त और मूत्र-विष्ठा का पात्र है। यह बुढ़ापे, शोक और विकारों से आर्त, रोगों का घर और दुखों का आलय है। यह कभी न भरने वाला, दुष्ट, दोषयुक्त और क्षणभंगुर है। अंत में यह कीड़े, विष्ठा या राख बनकर समाप्त होने वाला है। इस नश्वर शरीर से कोई मनुष्य स्थायी और अमर कर्म कैसे सिद्ध कर सकता है?"
यत्प्रातः संस्कृतं चान्नं सायं तच्च विनश्यति ।
तदीयरससम्पुष्टे काये का नाम नित्यता ॥ ६१ ॥
भावार्थ: "जो भोजन सवेरे पकाया जाता है, वह शाम को ही नष्ट (खराब) हो जाता है। ऐसे अन्न के रस से पुष्ट होने वाले इस शरीर में नित्यता (अमरता) की क्या बात की जाए?"
सप्ताहश्रवणात् लोके प्राप्यते निकटे हरिः ।
अतो दोषनिवृत्त्यर्थं एतद् एव हि साधनम् ॥ ६२ ॥
भावार्थ: "सप्ताह भागवत श्रवण करने से भगवान श्रीहरि अत्यंत निकट प्राप्त हो जाते हैं। इसलिए अपने समस्त दोषों और पापों की निवृत्ति के लिए यही एकमात्र सर्वोत्तम साधन है।"
बुद्बुदा इव तोयेषु मशका इव जन्तुषु ।
जायन्ते मरणायैव कथाश्रवणवर्जिताः ॥ ६३ ॥
भावार्थ: "जल में बुलबुले (बुद्बुद) और जीवों में मच्छरों की तरह, जो लोग भागवत कथा के श्रवण से विमुख हैं, वे केवल मरने के लिए ही जन्म लेते हैं।"
जडस्य शुष्कवंशस्य यत्र ग्रन्थिविभेदनम् ।
चित्रं किमु तदा चित्त ग्रन्थिभेदः कथाश्रवात् ॥ ६४ ॥
भावार्थ: "जब एक जड़ और सूखे बाँस की गाँठें कथा की ध्वनि से फट सकती हैं, तो क्या यह आश्चर्य की बात है कि कथा सुनने से मनुष्यों के हृदय की मोह-गाँठें (हृदयग्रंथि) न टूट सकें?"
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि सप्ताहश्रवणे कृते ॥ ६५ ॥
भावार्थ: "सप्ताह भागवत श्रवण करने से मनुष्य के हृदय की सारी ग्रंथियाँ भेद जाती हैं, उसके समस्त संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, और उसके संचित कर्म क्षीण (समाप्त) हो जाते हैं।"
संसारकर्दमालेप प्रक्षालनपटीयसि ।
कथातीर्थे स्थिते चित्ते मुक्तिरेव बुधैः स्मृता ॥ ६६ ॥
भावार्थ: "संसार रूपी कीचड़ के लेप को पूरी तरह धोने में सक्षम इस कथा-तीर्थ में जब किसी का चित्त स्थिर हो जाता है, तो विद्वान पुरुषों ने उसी को 'मुक्ति' कहा है।"
एवं ब्रुवति वै तस्मिन् विमानं आगमत् तदा ।
वैकुण्ठवासिभिर्युक्तं प्रस्फुरत् दीप्तिमण्डलम् ॥ ६७ ॥
भावार्थ: धुंधुकारी जब इस प्रकार कह रहा था, तभी वहाँ एक दिव्य विमान आ पहुँचा। वह विमान वैकुंठ के पार्षदों से युक्त था और उसके चारों ओर प्रज्वलित दीप्तियों (प्रकाश) का मंडल था।
सर्वेषां पश्यतां भेजे विमानं धुन्धुलीसुतः ।
विमाने वैष्णवान् वीक्श्य गोकर्णो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६८ ॥
भावार्थ: सभी उपस्थित लोगों के देखते-देखते धुंधुकारी उस दिव्य विमान पर सवार हो गया। विमान में बैठे हुए उन वैष्णव पार्षदों को देखकर गोकर्ण जी ने उनसे पूछा।
गोकर्ण उवाच
अत्रैव बहवः सन्ति श्रोतारो मम निर्मलाः ।
आनीतानि विमानानि न तेषां युगपत्कुतः ॥ ६९ ॥
भावार्थ: गोकर्ण जी ने कहा: "यहाँ कथा सुनने वाले और भी बहुत से निर्मल श्रोता उपस्थित हैं। फिर केवल इसी (धुंधुकारी) के लिए विमान क्यों आया है, अन्य सभी श्रोताओं के लिए एक साथ विमान क्यों नहीं आए?"
श्रवणं समभागेन सर्वेषामिह दृश्यते ।
फलभेदः कुतो जातः प्रब्रुवन्तु हरिप्रियाः ॥ ७० ॥
भावार्थ: "कथा का श्रवण तो इन सभी ने एक समान भाव से किया है, फिर फल में यह भेद (अंतर) क्यों उत्पन्न हुआ? हे हरिप्रिया पार्षदगण! कृपा करके इसका कारण हमें बताइए।"
हरिदासा ऊचुः
श्रवणस्य विभेदेन फलभेदोऽत्र संस्थितः ।
श्रवणं तु कृतं सर्वैः न तथा मननं कृतम् ।
फलभेदोस्ततो जातो भजनादपि मानद ॥ ७१ ॥
भावार्थ: हरि के पार्षदों ने कहा: "हे मानद गोकर्ण! श्रवण करने के तरीके में अंतर होने के कारण ही फल में यह अंतर आया है। श्रवण तो सभी ने किया, परंतु उस प्रकार का 'मनन' (चिंतन) सभी ने नहीं किया। यही कारण है कि भक्ति और भजन के फल में भेद हो जाता है।"
सप्तरात्रं उपोषैव प्रेतेन श्रवणं कृतम् ।
मननादि तथा तेन स्थिरचित्ते कृतं भृशम् ॥ ७२ ॥
भावार्थ: "इस प्रेत (धुंधुकारी) ने सात दिन तक पूरी तरह उपवास (नारायण स्मरण) करते हुए कथा का श्रवण किया था, और अत्यंत स्थिर चित्त से उसका मनन व निदिध्यासन भी किया था।"
अदृढं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतम् ।
संदिग्धो हि हतो मंत्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः ॥ ७३ ॥
भावार्थ: "जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता, वह नष्ट हो जाता है; प्रमाद (लापरवाही) से सुना हुआ शास्त्र-ज्ञान व्यर्थ हो जाता है; संदेहयुक्त मंत्र और व्याग्र (अशांत) चित्त से किया गया जप भी निष्फल हो जाता है।"
अवैष्णवो हतो देशो हतं श्राद्धं अपात्रकम् ।
हतं अश्रोत्रिये दानं अनाचारं हतं कुलम् ॥ ७४ ॥
भावार्थ: "अवैष्णव (भगवान के भक्तों से रहित) देश नष्ट हो जाता है, अपात्र को दिया गया श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है, अश्रोत्रिय (अज्ञानी) को दिया दान और अनाचारी कुल—सब नष्ट हो जाते हैं।"
विश्वासो गुरुवाक्येषु स्वस्मिन् दीनत्वभावना ।
मनोदोषजयश्चैव कथायां निश्चला मतिः ॥ ७५ ॥
भावार्थ: "गुरु के वचनों में अटूट विश्वास, स्वयं में दीनता की भावना (अभिमान का अभाव), मन के दोषों पर विजय, और कथा में बिल्कुल अचल मति (निश्चल श्रद्धा)..."
एवं आदि कृतं चेत् स्यात् तदा वै श्रवणे फलम् ।
पुनः श्रवान्ते सर्वेषां वैकुण्ठे वसतिर्ध्रुवम् ॥ ७६ ॥
भावार्थ: "...यदि इस प्रकार के साधन और भावयुक्त होकर कथा सुनी जाए, तभी श्रवण का वास्तविक फल मिलता है। और इस सप्ताह कथा के अंत में आप सभी की वैकुंठ में निवास करने की स्थिति निश्चित है।"
गोकर्ण तव गोविन्दो गोलोकं दास्यति स्वयम् ।
एवमुक्त्वा ययुः सर्वे वैकुण्ठ हरिकीर्तनाः ॥ ७७ ॥
भावार्थ: "हे गोकर्ण! भगवान गोविंद तुम्हें स्वयं अपना परम धाम 'गोलोक' प्रदान करेंगे।" ऐसा कहकर, हरिकीर्तन करते हुए वे सभी पार्षद वैकुंठ को प्रस्थान कर गए।
श्रवणो मासि गोकर्णः कथां ऊचे तथा पुनः ।
सप्तरात्रवतीं भूयः श्रवणं तैः कृतं पुनः ॥ ७८ ॥
भावार्थ: इसके बाद श्रावण मास में गोकर्ण जी ने फिर से श्रीमद्भागवत की सात दिन की कथा कही, जिसे उन सभी (गाँववालों और श्रोताओं) ने पुनः अत्यंत श्रद्धा से सुना।
कथासमाप्तौ यज्जातं श्रूयतां तच्च नारद ॥ ७९ ॥
भावार्थ: कथा की समाप्ति पर जो अद्भुत घटना घटी, हे नारद! तुम उसे सुनो।
विमानैः सह भक्तैश्च हरिराविर्बभूव ह ।
जयशब्दा नमःशब्दाः तत्रासन् बहवस्तदा ॥ ८० ॥
भावार्थ: अपने अनन्य भक्तों और अनेक दिव्य विमानों के साथ स्वयं भगवान श्रीहरि वहाँ प्रकट हो गए। उस समय वहाँ "जय-जय" और "नमस्कार" की अनेकों ध्वनियाँ गूँज उठीं।
पाञ्चजन्य ध्वनिं चक्रे हर्षात् तत्र स्वयं हरिः ।
गोकर्णं तु समालिंग्य अकरोत् स्वसदृषं हरिः ॥ ८१ ॥
भावार्थ: भगवान हरि ने स्वयं हर्षित होकर अपने पाञ्चजन्य शंख की ध्वनि की। उन्होंने गोकर्ण जी को प्रेम से गले लगाया और उन्हें अपने ही समान (दिव्य रूप और पार्षद पद) बना दिया।
श्रोतॄन् अन्यान् घनश्यामान् पीतकौशेयवाससः ।
कीरीटिनः कुण्डलिनः तथा चक्रे हरिः क्षणात् ॥ ८२ ॥
भावार्थ: भगवान श्रीहरि ने कथा सुनने वाले अन्य सभी श्रोताओं को भी एक ही क्षण में घनश्याम (श्यामवर्ण), पीले रेशमी वस्त्र पहने हुए, मुकुट और कुंडल धारण किए हुए अपने दिव्य पार्षदों जैसा बना दिया।
तद्ग्रामे ये स्थिता जीवा आश्वचाण्डालजातयः ।
विमाने स्थापितास्तेऽपि गोकर्णकृपया तदा ॥ ८३ ॥
भावार्थ: उस गाँव में जितने भी जीव रहते थे, चांडाल जाति तक के जो लोग थे, वे सभी गोकर्ण जी की उस महान कृपा से दिव्य विमानों पर बिठाए गए।
प्रेषिता हरिलोके ते यत्र गच्छन्ति योगिनः ।
गोकर्णेन स गोपालो गोलोकं गोपवल्लभम् ।
कथाश्रवणतः प्रीतो निर्ययौ भक्तवत्सलः ॥ ८४ ॥
भावार्थ: उन सबको उसी हरिलोक (वैकुंठ) में भेज दिया गया, जहाँ बड़े-बड़े योगी जाते हैं। गोकर्ण जी की इस कथा के श्रवण से प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवान, जो गोपों के प्रियतम (गोपाल) हैं, गोलोक धाम को पधारे।
अयोध्यावासिनं पूर्वं यथा रामेण संगताः ।
तथा कृष्णेन ते नीता गोलोकं योगिदुर्लभम् ॥ ८५ ॥
भाव#'भावार्थ: जिस प्रकार प्राचीन काल में अयोध्या के सभी निवासी भगवान राम के साथ साकेत धाम (सुकेत) गए थे, उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने उन सभी श्रोताओं को योगियों के लिए भी दुर्लभ 'गोलोक धाम' पहुँचा दिया।
यत्र सूर्यस्य सोमस्य सिद्धानां न गतिः कदा ।
तं लोकं हि गतास्ते तु श्रीमद्भागवतश्रवात् ॥ ८६ ॥
भावार्थ: जहाँ सूर्य, चंद्रमा और बड़े-बड़े सिद्धों की भी गति कभी नहीं होती (जो प्रकाश भौतिक नेत्रों से परे है), श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण मात्र से वे सभी जीव उसी परम धाम को प्राप्त हो गए।
ब्रूमोऽत्र ते किं फलवृन्दमुज्ज्वलं
सप्ताहयज्ञेन कथासु संचितम् ।
कर्णेन गोकर्णकथाक्षरो यैः
पीतश्च ते गर्भगता न भूयः ॥ ८७ ॥
भावार्थ: "सप्ताह यज्ञ रूपी कथाओं के श्रवण से जो यह उज्जवल और महान फल संचित होता है, उसके विषय में हम तुम्हें और क्या कहें? जिन लोगों ने अपने कानों से गोकर्ण जी के मुख की इस कथा-अमृत का पान कर लिया है, वे फिर कभी माता के गर्भ में जन्म नहीं लेते।"
वाताम्बुपर्णाशन देहशोषणैः
तपोभिः उग्रैः चिरकालसंचितैः ।
योगैश्च संयान्ति न तां गतिं वै
सप्ताहगाथाश्रवणेन यान्ति याम् ॥ ८८ ॥
भावार्थ: "वायु, जल या केवल पत्ते खाकर शरीर को सुखाने वाले, तथा दीर्घकाल तक संचित की गई उग्र तपस्याओं और योगों द्वारा भी मनुष्य उस परम गति को नहीं प्राप्त कर पाता, जिसे वह केवल 'सप्ताह गाथा' के श्रवण मात्र से प्राप्त कर लेता है।"
इतिहासं इमं पुण्यं शाण्डिल्योऽपि मुनीश्वरः ।
पठते चित्रकूटस्थो ब्रह्मानन्दपरिप्लुतः ॥ ८९ ॥
भावार्थ: ब्रह्मानंद से ओत-प्रोत मुनीश्वर शांडिल्य जी भी चित्रकूट में बैठकर इस पवित्र इतिहास (माहात्म्य) का नित्य पाठ करते हैं।
आख्यानमेतत् परमं पवित्रं
श्रुतं सकृद्वै विदहेदघौघम् ।
श्राद्धे प्रयुक्तं पितृतृप्तिमावहेत्
नित्यं सुपाठाद अपुनर्भवं च ॥ ९० ॥
भावार्थ: यह परम पवित्र आख्यान (माहात्म्य) एक बार भी सुन लिए जाने पर पापों के समूहों को जलाकर भस्म कर देता है। श्राद्ध के समय इसका पाठ करने से पितरों को तृप्ति मिलती है, और इसके नित्य उत्तम पाठ से मनुष्य 'अपुनर्भव' (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

