श्रीमद्भागवत माहात्म्यम्
षष्ठोऽध्यायः : श्रीमद्भागवत सप्ताह पारायण विधि और माहात्म्य
कुमारा ऊचुः
अथ ते संप्रवक्ष्यामः सप्ताहश्रवणे विधिम् ।
सहायैर्वसुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिः स्मृतः ॥ १ ॥
भावार्थ: सनकादि कुमारों ने कहा: "अब हम तुमसे सप्ताह कथा के श्रवण की विधि का विस्तार से वर्णन करते हैं। यह विधि प्रायः सहायकों (कार्यकर्ताओं) और यथोचित धन (वसु) के सहयोग से संपन्न होती है।"
दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छ्य यत्नतः ।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्पयेत् ॥ २ ॥
भावार्थ: "ज्योतिषी (दैवज्ञ) को आदरपूर्वक बुलाकर यत्नपूर्वक शुभ मुहूर्त पूछना चाहिए। इस कथा के आयोजन में विवाह के समान ही यथोचित धन और व्यवस्था का प्रबंध करना चाहिए।"
नभस्य आश्विनोर्जौ च मार्गशीर्षः शुचिर्नभाः ।
एते मासाः कथारम्भे श्रोतॄणां मोक्षसूचकाः ॥ ३ ॥
भावार्थ: "भाद्रपद (नभस्य), आश्विन, कार्तिक (ऊर्ज), मार्गशीर्ष, पौष (शुचि) और माघ (नभाः)—कथा के आरंभ के लिए ये महीने श्रोताओं को मोक्ष प्रदान करने वाले माने गए हैं।"
मासानां विप्र हेयानि तानि त्याज्यानि सर्वथा ।
सहायाश्चेतरे तत्र कर्तव्याः सोद्यमाश्च वे ॥ ४ ॥
भावार्थ: "इनके अतिरिक्त अन्य महीनों को कथा के लिए त्याग देना चाहिए। इस यज्ञ में पूरी तरह उत्साही और उद्यमी सहायकों को ही नियुक्त करना चाहिए।"
देशे देशे तथा सेयं वार्ता प्रेष्या प्रयत्नतः ।
भविष्यति कथा चात्र आगन्तव्यं कुटुम्बिभिः ॥ ५ ॥
भावार्थ: "देश-देशांतर में यत्नपूर्वक यह संदेश भेजना चाहिए कि अमुक स्थान पर श्रीमद्भागवत कथा होने जा रही है, अतः आप सभी परिवारजनों सहित इसमें सम्मिलित होने पधारें।"
दूरे हरिकथाः केचित् दूरे चाच्युतकीर्तनाः ।
स्त्रियः शूद्रादयो ये च तेषां बोधो यतो भवेत् ॥ ६ ॥
भावार्थ: "जो लोग भगवान की हरिकथाओं और अच्युत के कीर्तन से दूर हैं—विशेषकर स्त्रियाँ, शूद्र और अन्य साधारण जन—वे भी इस कथा के माध्यम से ज्ञान और भक्ति को प्राप्त कर सकें, ऐसा प्रबंध होना चाहिए।"
देशे देशे विरक्ता ये वैष्णवाः कीर्तनोत्सुकाः ।
तेष्वेव पत्रं प्रेष्यं च तल्लेखनं इतीरितम् ॥ ७ ॥
भाव#'भावार्थ: "देश-विदेश में जो विरक्त वैष्णव जन भगवान के कीर्तन के लिए उत्सुक रहते हैं, उनके पास विशेष रूप से निमंत्रण-पत्र भेजना चाहिए। इसे 'कथा का लेखन और प्रेषण' कहा गया है।"
सतां समाजो भविता सप्तरात्रं सुदुर्लभः ।
अपूर्वरसरूपैव कथा चात्र भविष्यति ॥ ८ ॥
भावार्थ: "कथा के सात दिनों तक संतों का वह महान समाज सुलभ होगा, जो सामान्यतः मिलना कठिन है। वहाँ श्रीमद्भागवत की अपूर्व और रसयुक्त कथा का प्रवाह बहेगा।"
श्रीमद्भागवत पीयुष पानाय रसलम्पटाः ।
भवन्तश्च तथा शीघ्रं आयात प्रेमतत्पराः ॥ ९ ॥
भावार्थ: "श्रीमद्भागवत रूपी पीयूष (अमृत) का पान करने के लिए रस के लोभी और प्रेम में तत्पर सभी भक्त शीघ्रातिशीघ्र वहाँ चले आएँ।"
नावकाशः कदाचित् चेत् दिनमात्रं तथापि तु ।
सर्वथाऽऽगमनं कार्यं क्षणोऽत्रैव सुदुर्लभः ॥ १० ॥
भावार्थ: "यदि किसी के पास अधिक समय न हो और अवकाश न मिले, तो कम से कम एक दिन के लिए ही सही, परंतु सभी को अवश्य आना चाहिए, क्योंकि यहाँ संतों का एक क्षण का संग भी अत्यंत दुर्लभ है।"
एवमाकारणं तेषां कर्तव्यं विनयेन च ।
आगन्तुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत् ॥ ११ ॥
भावार्थ: "इस प्रकार अत्यंत विनम्रता के साथ उन सबका आमंत्रण करना चाहिए। और दूर-दूर से आने वाले सभी आगंतुकों के ठहरने के लिए सुंदर निवास-स्थानों की व्यवस्था करनी चाहिए।"
तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं मतम् ।
विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत्कथास्थलम् ॥ १२ ॥
भावार्थ: "तीर्थ में, वन में अथवा अपने घर में—कहीं भी बैठकर कथा का श्रवण किया जा सकता है। यह विशाल पृथ्वी जहाँ भी उपयुक्त लगे, वहीं कथा का स्थल निर्धारित करना चाहिए।"
शोधनं मार्जनं भूमेः लेपनं धातुमण्डनम् ।
गृहोपस्करमुद्ध्रुत्य गृहकोणे निवेशयेत् ॥ १३ ॥
भावार्थ: "कथा स्थल की भूमि को अच्छी तरह झाड़ू लगाकर साफ करना चाहिए, गोबर आदि से लीपकर गेरू-चौक आदि रत्नाभूषणों (रंगोली) से सजाना चाहिए। घर के अन्य सामानों को समेटकर किसी एक कोने में रख देना चाहिए।"
अर्वाक् पंचाहतो यत्नात् आस्तीर्णानि प्रमेलयेत् ।
कर्तव्यो मण्डपः प्रोच्चैः कदलीखण्डमण्डितः ॥ १४ ॥
भावार्थ: "कथा आरंभ होने से पाँच दिन पहले से ही यत्नपूर्वक कथा-मंडप की सजावट शुरू कर देनी चाहिए। मंडप बहुत ऊँचा और सुंदर होना चाहिए, तथा चारों ओर केले के खंभों (कदली खंड) से सजा होना चाहिए।"
फलपुष्पदलैर्विष्वक् वितानेन विराजितः ।
चतुर्दिक्षु ध्वजारोपो बहुसम्पद्विराजितः ॥ १५ ॥
भावार्थ: "वह मंडप फल, फूल और सुंदर पल्लवों से तथा ऊपर चाँदनी (वित्तानेन) से सुशोभित होना चाहिए। चारों दिशाओं में ध्वजाएँ फहरानी चाहिए और वह सभी प्रकार की सुख-संपदाओं से युक्त दिखना चाहिए।"
ऊर्ध्वं सप्तैव लोकाश्च कल्पनीयाः सविस्तरम् ।
तेषु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीयाः प्रबोध्य च ॥ १६ ॥
भावार्थ: "मंडप के ऊपर विस्तारपूर्वक सात लोकों की कल्पना (सजावट) करनी चाहिए। उनमें विद्वान और विरक्त ब्राह्मणों को आदरपूर्वक समझाकर स्थापित करना चाहिए।"
पूर्वं तेषां आसनानि कर्तव्यानि यथोत्तरम् ।
वक्तुश्चापि तदा दिव्यं आसनं परिकल्पयेत् ॥ १७ ॥
भावार्थ: "श्रोताओं के लिए उनकी योग्यता के अनुसार क्रमानुसार आसन लगाने चाहिए। और कथावाचक (वक्ता) के लिए एक अत्यंत दिव्य और ऊँचा आसन निर्धारित करना चाहिए।"
उदङ्मुखो भवेद्वक्ता श्रोता वै प्राङ्मुखस्तदा ।
प्राङ्मुखश्चेत् भवेद्वक्ता श्रोता च उदङ्मुखस्तदा ॥ १८ ॥
भावार्थ: "कथावाचक का मुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए और श्रोताओं का मुख पूर्व दिशा की ओर। अथवा यदि वक्ता का मुख पूर्व दिशा की ओर हो, तो श्रोताओं का मुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।"
अथवा पूर्वदिग्ज्ञेया पूज्यपूजकमध्यतः ।
श्रोतॄणां आगमे प्रोक्ता देशकालादिकोविदैः ॥ १९ ॥
भावार्थ: "अथवा देश और काल के मर्म को जानने वाले विद्वानों के अनुसार पूज्य (वक्ता/व्यासपीठ) और पूजक (श्रोता) के मध्य की दिशा को पूर्व दिशा मानकर व्यवस्था करनी चाहिए।"
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशुद्धिकृत् ।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्योऽति निःस्पृह ॥ २० ॥
भावार्थ: "वक्ता ऐसा होना जो विरक्त हो, वैष्णव ब्राह्मण हो, वेदों और शास्त्रों के मर्म को शुद्ध रूप से जानने वाला हो, कथा में दृष्टियाँ देने में कुशल हो, धीर हो और सर्वथा निष्पृह (लोभ-मोह से मुक्त) हो।"
अनेकधर्मनिभ्रान्ताः स्त्रैणाः पाखण्डवादिनः ।
शुकशास्त्रकथोच्चारे त्याज्यास्ते यदि पण्डिताः ॥ २१ ॥
भावार्थ: "जो अनेक प्रकार के धर्मों के पाखंड का प्रचार करने वाले हैं, स्त्री-लोभी हैं, या पाखंडी वादी हैं—वे चाहे कितने भी बड़े पंडित क्यों न हों, शुकदेव जी के इस शास्त्र (भागवत) की कथा कहने के लिए उन्हें वक्ता के रूप में कभी न चुनें।"
वक्तुः पार्श्वे सहायार्थं अन्यः स्थाप्यस्तथाविधः ।
पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः ॥ २२ ॥
भावार्थ: "मुख्य वक्ता के पास सहायता के लिए उसी के समान किसी अन्य पंडित को भी रखना चाहिए, जो श्रोताओं के संशयों को काटने वाला और लोगों को तत्त्वज्ञान समझाने में तत्पर हो।"
वक्त्रा क्षौरं प्रकर्तव्यं दिनाद् अर्वाक् व्रताप्तये ।
अरुणोदयेऽसौ निर्वर्त्य शौचं स्नानं समाचरेत् ॥ २३ ॥
भावार्थ: "कथा आरंभ होने से पहले ही वक्ता को अपने बाल-दाढ़ी (क्षौर) बनवाकर व्रत की शुद्धि कर लेनी चाहिए। कथा के दिन अरुणोदय (भोर) में ही उठकर शौच और स्नान आदि नित्यकर्म से निवृत्त होना चाहिए।"
नित्यं संक्षेपतः कृत्वा संध्याद्यं स्वं प्रयत्नतः ।
कथाविघ्नविघाताय गणनाथं प्रपूजयेत् ॥ २४ ॥
भाव#'भावार्थ: "अपनी संध्यावंदਨਾदि नित्यक्रियाओं को संक्षेप में संपन्न करके, कथा में आने वाले सभी विघ्नों को दूर करने के लिए भगवान गणेश (गणनाथ) की विशेष पूजा करनी चाहिए।"
पितॄन् संतर्प्य शुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ।
मण्डलं च प्रकर्तव्यं तत्र स्थाप्यो हरिस्तथा ॥ २५ ॥
भावार्थ: "पितरों का तर्पण करके अपनी शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करना चाहिए। इसके बाद सुंदर रंगोली से मंडल बनाकर उसमें भगवान श्रीहरि की स्थापना करनी चाहिए।"
कृष्णमुद्दिश्य मंत्रेण चरेत् पूजाविधिं क्रमात् ।
प्रदक्षिण नमस्कारान् पूजान्ते स्तुतिमाचरेत् ॥ २६ ॥
भावार्थ: "भगवान श्रीकृष्ण को उद्देश्य मानकर वैदिक मंत्रों से क्रमानुसार उनकी पूजा-विधि संपन्न करनी चाहिए। पूजा के अंत में परिक्रमा, नमस्कार और स्तुति करनी चाहिए।"
संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे ।
कर्ममोहगृहीताङ्गं मामुद्धर भवार्णवात् ॥ २७ ॥
भावार्थ: (प्रार्थना का मंत्र:) "हे करुणानिधे! इस संसार-सागर में मग्न, कर्मों के मोह से जकड़े हुए दीन मुझको इस भवसागर से आप ही उद्धार कीजिए।"
श्रीमद्भागवतस्यापि ततः पूजा प्रयत्नतः ।
कर्तव्या विधिना प्रीत्या धूपदीपसमन्विता ॥ २८ ॥
भावार्थ: "तत्पश्चात, बड़े प्रेम और विधि-विधान के साथ धूप, दीप आदि अर्पित करते हुए श्रीमद्भागवत ग्रंथ की भी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए।"
ततस्तु श्रीफलं धृत्वा नमस्कारं समाचरेत् ।
स्तुतिः प्रसन्नचित्तेन कर्तव्या केवलं तदा ॥ २९ ॥
भावार्थ: "इसके बाद हाथ में नारियल (श्रीफल) लेकर ग्रंथ को नमस्कार करना चाहिए और अत्यंत प्रसन्न चित्त से भगवान की स्तुति करनी चाहिए।"
श्रीमद्भागवताख्योऽयं प्रत्यक्षः कृष्ण एव हि ।
स्वीकृतोऽसि मया नाथ मुक्त्यर्थं भवसागरे ॥ ३० ॥
भावार्थ: (ग्रंथ-पूजन के समय यह भाव रखें:) "हे भगवन! यह 'श्रीमद्भागवत' नामक ग्रंथ साक्षात् आपके (कृष्ण के) ही प्रत्यक्ष स्वरूप हैं। इस भवसागर से मुक्ति पाने के लिए हे नाथ! मैंने आपको स्वीकार किया है।"
मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया ।
निर्विघ्नेनैव कर्तव्य दासोऽहं तव केशव ॥ ३१ ॥
भावार्थ: "हे केशव! मेरी यह अभिलाषा आपके द्वारा सर्वथा सफल की जानी चाहिए। यह कथा बिना किसी विघ्न के संपन्न हो, क्योंकि मैं आपका ही दास हूँ।"
एवं दीनवचः प्रोच्य वक्तारं चाथ पूजयेत् ।
सम्भूष्य वस्त्रभूषाभिः पूजान्ते तं च संस्तवेत् ॥ ३२ ॥
भावार्थ: इस प्रकार दीनतापूर्वक भगवान से प्रार्थना करके, कथावाचक (व्यासजी) की भी पूजा करनी चाहिए। वस्त्र और आभूषणों से उनका सम्मान करके पूजा के अंत में उनकी स्तुति करनी चाहिए।
शुकरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ॥ ३३ ॥
भावार्थ: (वक्ता की स्तुति का मंत्र:) "हे शुकदेव रूप! सबको आत्मज्ञान कराने वाले और समस्त शास्त्रों के मर्मज्ञ! इस भागवत कथा के प्रकाश से मेरे अज्ञान का पूरी तरह नाश कर दीजिए।"
तदग्रे नियमः पश्चात् कर्तव्यः श्रेयसे मुदा ।
सप्तरात्रं यथाशक्त्या धारणीयः स एव हि ॥ ३४ ॥
भावार्थ: इसके बाद अपने परम कल्याण और आनंद के लिए कथा मंडप में नियमों का संकल्प लेना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार सात दिनों तक उन नियमों को दृढ़तापूर्वक धारण करना चाहिए।
वरणं पंचविप्राणां कथाभङ्गनिवृत्तये ।
कर्तव्यं तैः हरेर्जाप्यं द्वादशाक्षरविद्यया ॥ ३५ ॥
भावार्थ: कथा में किसी प्रकार की बाधा (भंग) न आए, इसके लिए पाँच योग्य ब्राह्मणों का वरण (चयन) करना चाहिए। वे ब्राह्मण 'द्वादशाक्षर मंत्र' (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का निरंतर जप करते रहें।
ब्राह्मणान् वैष्णवान् चान्यान् तथा कीर्तनकारिणः ।
नत्वा संपूज्य दत्ताज्ञः स्वयं आसनमाविशेत् ॥ ३६ ॥
भावार्थ: ब्राह्मणों, वैष्णवों और कीर्तन करने वाले अन्य कलाकारों को प्रणाम करके और उनका पूजन करके, उनकी आज्ञा पाकर ही वक्ता को अपने आसन पर विराजमान होना चाहिए।
लोकवित्तधनागार पुत्रचिन्तां व्युदस्य च ।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत्फलमुत्तमम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ: लोक-संसार, धन, संपत्ति, घर और पुत्र-परिवार की सभी चिंताओं को पूरी तरह त्यागकर, जो मनुष्य शुद्ध बुद्धि और एकाग्र चित्त से कथा सुनता है, वही इसका उत्तम फल प्राप्त करता है।
आसूर्योदयमारभ्य सार्धत्रिप्रहरान्तकम् ।
वाचनीया कथा सम्यक् धीरकण्ठं सुधीमता ॥ ३८ ॥
भावार्थ: सूर्योदय से लेकर साढ़े तीन प्रहर (लगभग साढ़े दस घंटे) तक बुद्धिमान वक्ता को अत्यंत स्पष्ट और मधुर स्वर में विधिपूर्वक कथा का वाचन करना चाहिए।
कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने घटिकाद्वयं ।
तत्कथामनु कार्यं वै कीर्तनं वैष्णवैस्तदा ॥ ३९ ॥
भावार्थ: दोपहर के समय दो घड़ी (लगभग 48 मिनट) के लिए कथा को विश्राम (विराम) देना चाहिए। उस समय सभी वैष्णव जनों को कथा के प्रसंगानुसार भगवान का संकीर्तन करना चाहिए।
मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः ।
हविष्यान्नेन कर्तव्यो हि, एकवारं कथार्थिना ॥ ४० ॥
भावार्थ: मल-मूत्र के वेग और आलस को जीतने के लिए हल्का और सुपाच्य भोजन करना ही सुखकर होता है। कथा का फल चाहने वाले व्रती को दिन में केवल एक बार हविष्यान्न (शुद्ध सात्विक भोजन) करना चाहिए।
उपोष्य सप्तरात्रं वै शक्तिश्चेत् श्रुणुयात् तदा ।
घृतपानं पयःपानं कृत्वा वै श्रृणुयात् सुखम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ: यदि शारीरिक सामर्थ्य हो, तो सात दिनों तक पूर्ण उपवास रखकर कथा सुननी चाहिए। अथवा केवल घी पीकर या दूध पीकर (पयःपान करके) सुखपूर्वक कथा का श्रवण करना चाहिए।
फलाहारेण वा भाव्यं एकभुक्तेन वा पुनः ।
सुखसाध्यं भवेद् यत्तु कर्तव्यं श्रवणाय तत् ॥ ४२ ॥
भावार्थ: अथवा केवल फलाहार करके या दिन में एक बार भोजन करके व्रत रखना चाहिए। अपने शरीर के लिए जो भी साधना सुखसाध्य (आसानी से निभ सके), कथा सुनने के लिए वही नियम अपनाना चाहिए।
भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम् ।
नोपवासो वरः प्रोक्तः कथाविघ्नकरो यदि ॥ ४३ ॥
भावार्थ: मैं तो यही मानता हूँ कि यदि उपवास करने से कथा सुनने में विघ्न या कमजोरी आती हो, तो उससे अच्छा साधारण भोजन करना ही है। जो उपवास कथा में बाधा डाले, वह श्रेष्ठ नहीं कहा गया है।
सप्ताहव्रतिनां पुंसां नियमान् श्रुणु नारद ।
विष्णुदीक्षाविहीनानां नाधिकारः कथाश्रवे ॥ ४४ ॥
भावार्थ: हे नारद! अब सप्ताह व्रत का पालन करने वाले पुरुषों के विशेष नियम सुनो। जो लोग विष्णु-दीक्षा से विहीन हैं, उन्हें इस कथा के श्रवण का अधिकार नहीं है (अर्थात दीक्षा लेकर ही कथा सुननी चाहिए)।
ब्रह्मचर्यमधः सुप्तिः पत्रावल्यां च भोजनम् ।
कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यात् नित्यं कथाव्रती ॥ ४५ ॥
भावार्थ: कथा का व्रत रखने वाले को सातों दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, भूमि पर सोना चाहिए, पत्तल (पत्रावली) पर भोजन करना चाहिए, और कथा की समाप्ति के बाद ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
द्विदलं मधु तैलं च गरिष्ठान्नं तथैव च ।
भावदुष्टं पर्युषितं जह्यात् नित्यं कथाव्रती ॥ ४६ ॥
भावार्थ: कथा का व्रत रखने वाले को द्विदल (मसूर, उड़द आदि दालें), शहद, तेल, गरिष्ठ (भारी) अन्न, भावना से दूषित अन्न, और बासी (पर्युषित) भोजन का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।
कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च ।
दम्भ मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती ॥ ४७ ॥
भावार्थ: कथा का व्रत रखने वाले को काम, क्रोध, मद, मान, ईर्ष्या (मत्सर), लोभ, दंभ, मोह और द्वेष—इन सभी दुर्गुणों को अपने से कोसों दूर रखना चाहिए।
वेदवैष्णवविप्राणां गुरुगोव्रतिनां तथा ।
स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेत् यः कथाव्रती ॥ ४८ ॥
भावार्थ: कथा-व्रती मनुष्य को वेदों, वैष्णवों, ब्राह्मणों, गुरुओं, गोमाता, व्रजवासियों, तथा स्त्रियों, राजाओं और महापुरुषों की निंदा कभी नहीं करनी चाहिए।
रजस्वला अन्त्यज म्लेच्छ पतित व्रात्यकैस्तथा ।
द्विजद्विड् वेदबाह्यैश्च न वदेत् यः कथाव्रती ॥ ४९ ॥
भावार्थ: कथा-व्रती को रजस्वला स्त्री, चांडाल, म्लेच्छ, पतित, व्रात्य, ब्राह्मण-द्वेषी और वेदों से बहिष्कृत लोगों के साथ बातचीत (संग) नहीं करनी चाहिए।
सत्यं शौचं दयां मौनं आर्जवं विनयं तथा ।
उदारमानसं तद्वत् एवं कुर्यात् कथाव्रती ॥ ५० ॥
भावार्थ: सत्य, पवित्रता, दया, मौन, सरलता, विनम्रता और उदार हृदय—इन गुणों को कथा-व्रती पुरुष को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
दरिद्रश्च क्षयी रोगी निर्भाग्यः पापकर्मवान् ।
अनपत्यो मोक्षकामः श्रुणुयाच्च कथामिमाम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ: दरिद्र, क्षय रोग से पीड़ित, अन्य रोगी, अभागा, पापकर्म करने वाला, संतानहीन, और मोक्ष की इच्छा रखने वाला—इन सभी को यह कथा अवश्य सुननी चाहिए।
अपुष्पा काकवन्ध्या च वन्ध्या या च मृतार्भका ।
स्रवत् गर्भा च या नारी तया श्राव्या प्रयत्नतः ॥ ५२ ॥
भावार्थ: जिस स्त्री को ऋतुधर्म न आता हो, जो काकवन्ध्या (एक ही संतान वाली), बाँझ, मृतवत्सा (जिसकी संतानें मर जाती हों), या गर्भस्राव (मिसकैरेज) से पीड़ित हो—ऐसी नारी को विशेष प्रयत्न करके यह कथा सुननी चाहिए।
एतेषु विधिना श्रावे तदक्षयतरं भवेत् ।
अत्युत्तमा कथा दिव्या कोटियज्ञफलप्रदा ॥ ५३ ॥
भावार्थ: यदि इन सभी लोगों द्वारा विधिपूर्वक यह कथा सुनी जाए, तो इसका फल कभी क्षीण नहीं होता। यह अत्यंत उत्तम और दिव्य कथा करोड़ों यज्ञों का फल प्रदान करने वाली है।
एवं कृत्वा व्रतविधिं उद्यापनं अथाचरेत् ।
जन्माष्टमी व्रतमिव कर्तव्यं फलकांक्षिभिः ॥ ५४ ॥
भावार्थ: इस प्रकार व्रत-विधि पूर्ण करके कथा का उद्यापन करना चाहिए। अपने इच्छित फल की कामना करने वालों को यह व्रत जन्माष्टमी के व्रत की तरह ही करना चाहिए।
अकिंचनेषु भक्तेषु प्रायो नोद्यापनाग्रहः ।
श्रवणेनैव पूतास्ते निष्कामा वैष्णवा यतः ॥ ५५
भावार्थ: परंतु जो अकिंचन (निधन और निष्काम) भक्त हैं, उनके लिए उद्यापन का कोई कड़ा आग्रह नहीं है, क्योंकि वे निष्काम वैष्णव भक्त तो केवल कथा के श्रवण मात्र से ही पूरी तरह पवित्र हो जाते हैं।
एवं नगाहयज्ञेऽस्मिन् समाप्ते श्रोतृभिस्तदा ।
पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्यातिभक्तितः ॥ ५६ ॥
भावार्थ: इस प्रकार जब यह कथा-यज्ञ समाप्त हो जाए, तब सभी श्रोताओं को मिलकर भागवत पुस्तक की और कथावाचक (व्यासजी) की अत्यंत भक्तिभाव से पूजा करनी चाहिए।
प्रसादतुलसीमाला श्रोतृभ्यश्चाथ दीयताम् ।
मृदंगतालललितं कर्तव्यं कीर्तनं ततः ॥ ५७ ॥
भावार्थ: इसके बाद सभी श्रोताओं को महाप्रसाद और तुलसी की माला वितरित करनी चाहिए। फिर मृदंग और ताल की मधुर ध्वनि के साथ भगवान का संकीर्तन करना चाहिए।
जयशब्दं नमःशब्दं शंखशब्दं च कारयेत् ।
विप्रेभ्यो याचकेभ्यश्च वित्तं अन्नं च दीयताम् ॥ ५८ ॥
भावार्थ: "जय-जयकार", "नमस्कार" और शंख की ध्वनियाँ गूँजनी चाहिए। ब्राह्मणों और याचकों (जरूरतमंदों) को यथोचित धन और भरपेट अन्न दान करना चाहिए।
विरक्तश्चेत् भवेत् श्रोता गीता वाद्या परेऽहनि ।
गृहस्थश्चेत् तदा होमः कर्तव्यः कर्मशान्तये ॥ ५९ ॥
भावार्थ: यदि श्रोता विरक्त (संन्यासी) हों, तो कथा के अगले दिन केवल संगीत और वाद्य-उत्सव करना चाहिए। और यदि श्रोता गृहस्थ हों, तो अपने कर्म-दोषों की शांति के लिए हवन अवश्य करना चाहिए।
प्रतिश्लोकं तु जुहुयात् विधिना दशमस्य च ।
पायसं मधु सर्पिश्च तिलान् आदिकसंयुतम् ॥ ६० ॥
भावार्थ: श्रीमद्भागवत के 'दशम स्कंध' के प्रत्येक श्लोक की विधि के अनुसार पायस (खीर), शहद, घी, तिल और अन्न को मिलाकर हवन करना चाहिए।
अथवा हवनं कुर्याद् गायत्र्या सुसमाहितः ।
तन्मयत्वात् पुराणस्य परमस्य च तत्त्वतः ॥ ६१ ॥
भावार्थ: अथवा पूरी तरह एकाग्रचित्त होकर गायत्री मंत्र से हवन करना चाहिए, क्योंकि यह संपूर्ण पुराण साक्षात् परम ब्रह्म का ही स्वरूप है।
होमाशक्तौ बुधो हौम्यं दद्यात् तत्फल सिद्धये ।
नानाच्छिद्रनिरोधार्थं न्यूनताधिकतानयोः ॥ ६२ ॥
भावार्थ: यदि कोई हवन करने में असमर्थ हो, तो यज्ञ की पूर्णता और फल की सिद्धि के लिए, तथा कथा में हुई किसी भी प्रकार की न्यूनता या अधिकता (त्रुटि) के दोष को दूर करने के लिए...
दोषयोः प्रशमार्थं च पठेत् नामसहस्रकम् ।
तेन स्यात् सफलं सर्वं नास्त्यस्मादधिकं यतः ॥ ६३ ॥
...
भावार्थ: ...उन सभी दोषों की शांति के लिए भगवान के 'विष्णु सहस्रनाम' का पाठ करना चाहिए। इससे संपूर्ण अनुष्ठान सफल हो जाता है, क्योंकि इससे बढ़कर दूसरा कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
द्वादश ब्राह्मणान् पश्चात् भोजयेत् मधुपायसैः ।
दद्यात् सुवर्णं धेनुं च व्रतपूर्णत्वहेतवे ॥ ६४ ॥
भावार्थ: तत्पश्चात व्रत की पूर्णता के लिए बारह ब्राह्मणों को खीर और मधु (मधुपायस) का भोजन कराना चाहिए तथा उन्हें स्वर्ण और गाय दान में देनी चाहिए।
शक्तौ पलत्रयमितं स्वर्णसिंहं विधाय च ।
तत्रास्य पुस्तकं स्थाप्यं लिखितं ललिताक्षरम् ॥ ६५ ॥
भावार्थ: यदि सामर्थ्य हो, तो तीन पल (पलत्रय) सोने का एक सिंह (सिंहासन) बनवाकर, उस पर सुंदर और स्पष्ट अक्षरों में लिखी हुई भागवत पुस्तक को स्थापित करना चाहिए।
संपूज्य आवाहनाद्यैः तद् उपचारैः सदक्षिणम् ।
वस्त्रभूषण गन्धाद्यैः पूजिताय यतात्मने ॥ ६६ ॥
भावार्थ: आवाहनादि सोलह उपचारों से, वस्त्र, आभूषण और सुगंधित गंध आदि से उस पुस्तक तथा आचार्य की यथोचित पूजा करके दक्षिणा सहित उन्हें संतुष्ट करना चाहिए।
आचार्याय सुधीर्दत्त्वा मुक्तः स्याद् भवबंधनैः ।
एवं कृते विधाने च सर्वपापनिवारणे ॥ ६७ ॥
भावार्थ: बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह वह पुस्तक और स्वर्ण सिंहासन आचार्य को दान कर दे, जिससे वह संसार के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सभी पापों का निवारण करने वाली यह विधि कही गई है।
फलदं स्यात् पुराणं तु श्रीमद्भागवतं शुभम् ।
धर्मकामार्थमोक्षाणां साधनं स्यात् न संशयः ॥ ६८ ॥
भावार्थ: यह शुभ श्रीमद्भागवत पुराण साक्षात् सभी फलों को देने वाला है। यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कराने का एकमात्र साधन है। इसमें कोई संशय नहीं है।
कुमारा ऊचुः
इति ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
श्रीमद्भागवतेनैव भुक्तिमुक्ति करे स्थिते ॥ ६९ ॥
भावार्थ: सनकादि कुमारों ने कहा: "इस प्रकार हमने तुम्हें यह सब कह सुनाया। अब तुम इसके बाद और क्या सुनना चाहते हो? श्रीमद्भागवत के माध्यम से भोग (भुक्ति) और मोक्ष (मुक्ति)—दोनों ही मानो हथेली पर रखे हुए सुलभ हो जाते हैं।"
श्रीसूत उवाच
इत्युक्त्वा ते महात्मानः प्रोचुर्भागवतीं कथाम् ।
सर्वपापहरां पुण्यां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् ॥ ७० ॥
भावार्थ: सूत जी बोले: ऐसा कहकर उन महात्माओं (सनकादि कुमारों) ने समस्त पापों को हरने वाली, पवित्र करने वाली तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली उस भागवत कथा का वर्णन किया।
श्रृण्वतां सर्वभूतानां सप्ताहं नियतात्मनाम् ।
यथाविधि ततो देवं तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥ ७१ ॥
भावार्थ: नियमपूर्वक संयमित चित्त से सात दिनों तक कथा सुनने वाले वहाँ उपस्थित सभी जीवों ने, कथा की समाप्ति पर विधिपूर्वक पुरुषोत्तम भगवान की स्तुति की।
तदन्ते ज्ञानवैराग्य-भक्तीनां पुष्टता परा ।
तारुण्यं परमं चाभूत् सर्वभूतमनोहरम् ॥ ७२ ॥
भावार्थ: कथा की समाप्ति पर ज्ञान, वैराग्य और भक्ति—तीनों की पराकाष्ठा की पुष्टि हुई। वे ऐसे परम तरुण (युवा और तेजस्वी) हो गए कि सभी जीवों के मन को मोहने वाले प्रतीत होने लगे।
नारदश्च कृतार्थोऽभूत् सिद्धे स्वीये मनोरथे ।
पुलकीकृतसर्वाङ्ग परमानन्दसम्भृतः ॥ ७३ ॥
भावार्थ: अपना मनोरथ सिद्ध हो जाने पर देवर्षि नारद भी कृतार्थ हो गए। उनका रोम-रोम प्रेम से पुलकित हो उठा और वे परमानंद से भर गए।
एवं कथां समाकर्ण्य नारदो भगवत्प्रियः ।
प्रेमगद्गदया वाचा तानुवाच कृताञलिः ॥ ७४ ॥
भावार्थ: इस प्रकार उस पावन कथा को सुनकर भगवान के प्रिय नारद जी ने प्रेम से गद्गद वाणी में, हाथ जोड़कर उन सनकादि कुमारों से कहा।
नारद उवाच
धन्योस्मि अनुगृहितोऽस्मि भवद्भिः करुणापरैः ।
अद्य मे भगवान् लब्धः सर्वपापहरो हरिः ॥ ७५ ॥
भावार्थ: नारद जी ने कहा: "हे करुणा की खान! मैं धन्य हो गया हूँ, आप महानुभावों द्वारा मैं पूरी तरह अनुगृहीत हो गया हूँ। आज मुझे समस्त पापों को हरने वाले भगवान श्रीहरि की प्राप्ति हो गई है।"
श्रवणं सर्वधर्मेभ्यो वरं मन्ये तपोधनाः ।
वैकुण्ठस्थो यतः कृष्णः श्रवणाद् यस्य लभ्यते ॥ ७६ ॥
...
भावार्थ: "हे तपोधन! मैं सभी धर्मों और साधनाओं में केवल 'श्रवण' (कथा सुनना) को ही सबसे श्रेष्ठ मानता हूँ, क्योंकि वैकुंठ धाम में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण भी केवल कथा के श्रवण मात्र से ही सुलभ हो जाते हैं।"
श्रीसूत उवाच
एवं ब्रुवति वै तत्र नारदे वैष्णवोत्तमे ।
परिभ्रमन् समायातः शुको योगेश्वरास्तदा ॥ ७७ ॥
भाव#'भावार्थ: सूत जी कहते हैं: जब वैष्ण्वों में श्रेष्ठ देवर्षि नारद इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए योगेश्वरों के स्वामी श्री शुकदेव जी महाराज वहाँ आ पहुँचे।
तत्राययौ षोडशवार्षिकस्तदा
व्यासात्मजो ज्ञानमहाब्धिचन्द्रमाः ।
कथावसाने निजलाभपूर्णः
प्रेम्णा पठन् भागवतं शनैः शनैः ॥ ७८ ॥
भावार्थ: उस सभा में सोलह वर्ष की अवस्था वाले, व्यासजी के पुत्र, ज्ञान के महान समुद्र के लिए चंद्रमा के समान (ज्ञान को बढ़ाने वाले), और अपने आत्मानंद (निजलाभ) में पूर्ण रूप से तृप्त श्री शुकदेव जी पधारे। वे कथा की समाप्ति पर प्रेमपूर्वक धीरे-धीरे भागवत का पाठ कर रहे थे।
दृष्ट्वा सदस्याः परमोरुतेजसं
सद्यः समुत्थाय ददुर्महासनम् ।
प्रीत्या सुरर्षिस्तमपूजयत् सुखं
स्थितोऽवदत् संश्रृणुतामलां गिरम् ॥ ७९ ॥
भावार्थ: उनके परम असीम तेज को देखकर सभा के सभी सदस्य तुरंत अपने आसनों से उठ खड़े हुए और उन्हें एक भव्य महासन अर्पित किया। देवर्षि नारद जी ने प्रेमपूर्वक उनका सत्कार किया। जब वे सुखपूर्वक बैठ गए, तब उन्होंने अपनी निर्मल वाणी में यह कहा।
श्रीशुक उवाच
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं
शुकमुखात् अमृतद्रवसंयुतम् ।
पिबत भागवतं रसमालयं
मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ ८० ॥
भावार्थ: श्री शुकदेव जी ने कहा: "हे पृथ्वी के रसिक और भावुक जन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूपी कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है, जो मेरे (शुक के) मुख से निकला है और अमृत के द्रव से पूर्ण है। जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक इस भागवत रस का बार-बार पान करते रहो।"
धर्मप्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां
वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः
सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ ८१ ॥
भावार्थ: "महामुनि व्यासदेव द्वारा रचित इस श्रीमद्भागवत में सभी प्रकार के कपट-रहित परम धर्म का निरूपण किया गया है। यह निर्मत्सर (ईर्ष्या-रहित) संतों के जानने योग्य वास्तविक तत्त्व है, जो कल्याणकारी और तीनों तापों का नाश करने वाला है। इसे सुनने की इच्छा रखने वाले पुण्यात्माओं के हृदय में ईश्वर तत्काल (उसी क्षण) आकर स्थापित हो जाते हैं, फिर अन्य शास्त्रों की क्या आवश्यकता है?"
श्रीमद्भागवतं पुराणतिलकं यद्वैष्णवानां धनं
यस्मिन् पारमहंस्यमेवममलं ज्ञानं परं गीयते ।
यत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं
तत् श्रुण्वन् प्रपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः ॥ ८२ ॥
भावार्थ: "यह श्रीमद्भागवत सभी पुराणों का तिलक (शिरोमणि) है और वैष्णवों का परम धन है। इसमें परमहंसों द्वारा आचरणीय वह अमल (निर्मल) परम ज्ञान गाया गया है। जिसमें ज्ञान, वैराग्य और भक्ति सहित निष्कर्मता का रहस्य प्रकट किया गया है। जो मनुष्य भक्तिभाव से इसे सुनता है, पढ़ता है और इस पर विचार करता है, वह सर्वथा मुक्त हो जाता है।"
स्वर्गे सत्ये च कैलासे वैकुण्ठे नास्त्ययं रसः ।
अतः पिबन्तु सद्भाग्या मा मा मुञ्चत कर्हिचित् ॥ ८३ ॥
भावार्थ: "जो भागवत-रस पृथ्वी पर है, वह न स्वर्ग में है, न सत्यलोक में, न कैलाश में और न ही वैकुंठ में है। इसलिए हे सद्भाग्यशाली लोगो! इस रस का पान करो और इसे कभी भी, किसी भी परिस्थिति में मत छोड़ो।"
श्रीसूत उवाच
एवं ब्रुवाणे सति बादरायणौ
मध्ये सभायां हरिराविरासीत् ।
प्रह्रादबल्युद्धवफाल्गुनादिभिः
वृत्तं सुरर्षिस्तमपूजयच्च तान् ॥ ८४ ॥
भावार्थ: सूत जी बोले: शुकदेव जी (बादरायणि) के इस प्रकार कहने पर, प्रह्लाद, बलि, उद्धव और अर्जुन (फाल्गुन) आदि भक्तों से घिरे हुए स्वयं भगवान श्रीहरि उस सभा के बीचों-बीच प्रकट हो गए। देवर्षि नारद जी ने भगवान का तथा उन सभी पार्षदों का यथोचित पूजन किया।
दृष्ट्वा प्रसन्नं महदासने हरिं
ते चक्रिरे कीर्तनमग्रतस्तदा ।
भवो भवान्या कमलासनस्तु
तत्रागमत् कीर्तनदर्शनाय ॥ ८५ ॥
भावार्थ: महान आसन पर भगवान हरि को प्रसन्न मुद्रा में बैठा देखकर, उन सभी पार्षदों ने उनके सामने अत्यंत मधुर कीर्तन करना आरंभ किया। उस कीर्तन के दर्शन के लिए भवानी सहित भगवान शिव (भव) और ब्रह्मा जी (कमलासन) भी वहाँ आ पहुँचे।
प्रह्रादस्तालधारी तरलगतितया चोद्धवः कांस्यधारी
वीणाधारी सुरर्षि स्वरकुशलतया रागकर्तार्जुनोऽभूत् ।
इन्द्रोऽवादीन्मृदङ्गं जय जय सुकराः कीर्तने ते कुमारा
यत्राग्रे भववक्ता सरसरचनया व्यासपुत्रो बभूव ॥ ८६ ॥
भावार्थ: उस दिव्य कीर्तन में प्रह्लाद जी ने ताल संभाली, चंचल गति वाले उद्धव जी ने झाँझ (कांस्य) बजाई, देवर्षि नारद जी ने अपनी वीणा उठाई और रागों के मर्मज्ञ अर्जुन ने गायन में सहयोग किया। देवराज इंद्र ने मृदंग बजाया। सनकादि कुमार "जय हो, जय हो" कहकर कीर्तन को सुखकर बनाने लगे, और व्यासपुत्र शुकदेव जी ने अत्यंत मधुर रचना के साथ इस सरस संकीर्तन का नेतृत्व किया।
ननर्त मध्ये त्रिकमेव तत्र
भक्तिदिकानां नटवत्सुतेजसाम् ।
अलौलिकं कीर्तनमेतदीक्ष्य
हरिः प्रसन्नोऽपि वचोऽब्रवीत् तत् ॥ ८७ ॥
भावार्थ: उस कीर्तन के बीच में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य—ये तीनों महान तेजस्वी नट की तरह नृत्य करने लगे। इस अलौकिक संकीर्तन को देखकर भगवान हरि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने यह वचन कहा।
मत्तो वरं भाववृताद्वृणुध्वं
प्रीतः कथाकीर्तनतोऽस्मि साम्प्रतम् ।
श्रुत्वेति तद्वाक्यमतिप्रसन्नाः
प्रेमार्द्रचित्ता हरिमूचिरे ते ॥ ८८ ॥
भावार्थ: भगवान ने कहा: "मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तन से इस समय अत्यंत प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम सब अपने भाव के अनुसार मुझसे वरदान माँगो।" भगवान के ऐसे प्रेमपूर्ण वचन सुनकर, प्रेम से जिनके हृदय आर्द्र हो चुके थे, उन सभी ने भगवान से कहा।
नगाहगाथासु च सर्वभक्तैः
एभिस्त्वया भाव्यमिति प्रयत्नात् ।
मनोरथोऽयं परिपूरनीयः
तथेति चोक्त्वान्तरधीयताच्युतः ॥ ८९ ॥
भावार्थ: उन्होंने कहा: "हे प्रभु! इन सभी भक्तों के साथ-साथ श्रीमद्भागवत कथाओं में आप भी हमेशा यत्नपूर्वक निवास करें—हमारा यही एकमात्र मनोरथ है, जिसे आपको पूरा करना चाहिए।" भगवान अच्युत ने "तथास्तु" (ऐसा ही हो) कहकर वहीं अंतर्धान हो गए।
ततोऽनमत्तत् चरणेषु नारदः
तथा शुकादीनपि तापसांश्च ।
अथ प्रहृष्टाः परिनष्टमोहाः
सर्व ययुः पीतकथामृतास्ते ॥ ९० ॥
भावार्थ: तदनंतर देवर्षि नारद ने भगवान के चरणों में प्रणाम किया तथा श्री शुकदेव जी और अन्य सभी तपस्वियों का भी वंदन किया। तब वे सभी आनंदित और मोह से सर्वथा मुक्त होकर उस कथा-अमृत का पूर्ण पान करके अपने-अपने गंतव्य को लौट गए।
भक्तिः सुताभ्यां सह रक्षिता सा
शास्त्रे स्वकीयेऽपि तदा शुकेन ।
अतो हरिर्भागवतस्य सेवनात्
चित्तं समायाति हि वैष्णवानाम् ॥ ९१ ॥
भाव#'भावार्थ: इस प्रकार श्री शुकदेव जी द्वारा इस श्रीमद्भागवत शास्त्र के माध्यम से भक्ति की अपने दोनों पुत्रों (ज्ञान और वैराग्य) के साथ रक्षा की गई। इसीलिए श्रीमद्भागवत की सेवा (श्रवण-पाठ) करने से भगवान श्रीहरि वैष्णवों के हृदय में अनायास ही आ बसते हैं।
दारिद्र्यदुःखज्वरदाहितानां
मायापिशाचीपरिमर्दितानाम्।
संसारसिन्धौ परिपातितानां
क्षेमाय वै भागवतं प्रगर्जति ॥ ९२ ॥
भावार्थ: दरिद्रता और दुःखों के ज्वर से जलने वाले, माया रूपी पिशाचिनी द्वारा सताए जाने वाले, और संसार-सागर में गिरे हुए प्राणियों के परम कल्याण (क्षेम) के लिए ही यह श्रीमद्भागवत डंके की चोट पर (गर्जना करके) मार्ग दिखाता है।
शौनक उवाच
शुकेनोक्तं कदा राज्ञे गोकर्णेन कदा पुनः ।
सुरर्षये कदा ब्राह्मैः छिन्धि मे संशयं त्विमम् ॥ ९३ ॥
भावार्थ: शौनक जी ने पूछा: "हे सूत जी! श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को यह कथा कब सुनाई थी? गोकर्ण जी ने प्रेत (धुंधुकारी) को यह कथा कब सुनाई? और देवर्षि नारद को ब्राह्मणों (सनकादि कुमारों) ने यह कथा कब सुनाई? मेरे इस संशय को दूर कीजिए।"
श्रीसूत उवाच
आकृष्णनिर्गमात् त्रिंशत् वर्षाधिकगते कलौ ।
नवमीतो नभस्ये च कथारंभं शुकोऽकरोत् ॥ ९४ ॥
भावार्थ: सूत जी बोले: भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के बाद कलियुग के तीस वर्ष अधिक बीत जाने पर, भाद्रपद (नभस्य) मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को कथा का आरंभ कराया था।
परीक्षित् श्रवणान्ते च कलौ वर्षशतद्वये ।
शुद्धे शुचौ नवम्यां च धेनुजोऽकथयत्कथाम् ॥ ९५ ॥
भावार्थ: और परीक्षित जी के कथा सुनने के अंत के लगभग दो सौ वर्ष बीत जाने पर, आषाढ़ (शुचि) मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को गोकर्ण जी (धेनुज) ने प्रेत की मुक्ति के लिए वह कथा कही थी।
तस्मादपि कलौ प्राप्ते त्रिंशत् वर्षगते सति ।
ऊचुरूर्जे सिते पक्षे नवम्यां ब्रह्मणः सुताः ॥ ९६ ॥
भावार्थ: उसके भी तीस वर्ष बाद कलियुग में, कार्तिक (ऊर्ज) मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को ब्रह्मा के पुत्रों (सनकादि कुमारों) ने नारद जी को यह कथा सुनाई थी।
इत्येतत्ते समाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वयानघ ।
कलौ भागवती वार्ता भवरोगविनाशिनी ॥ ९७ ॥
भावार्थ: हे निष्पाप शौनक! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें कह सुनाया। कलियुग में यह भागवत कथा ही संसार के सभी भवरोगों का नाश करने वाली है।
कृष्णप्रियं सकलकल्मषनाशनं च
मुक्त्येकहेतुमिह भक्तिविलासकारि ।
सन्तः कथानकमिदं पिबतादरेण
लोके हि तीर्थपरिशीलनसेवया किम् ॥ ९८ ॥
भावार्थ: यह कथा भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय है, समस्त पापों का नाश करने वाली है, मुक्ति का एकमात्र हेतु है और हृदय में भक्ति के विलास को जगाने वाली है। हे संतजनों! इस कथा-अमृत का आदरपूर्वक पान कीजिए; संसार में अन्य तीर्थों के सेवन से अब और क्या लाभ है?
स्वपुरुषमपि वीक्ष्य पाशहस्तं
वदति यमः किल तस्य कर्णमूले ।
परिहर भगवत्कथासु मत्तान्
प्रभुरहमन्युनृणां न वैष्णवानाम् ॥ ९९ ॥
भावार्थ: जब यमराज अपने हाथ में पाश लिए हुए अपने दूतों को देखते हैं, तब वे उनके कान में फुसफुसाकर कहते हैं: "देखो! जो लोग भगवान की कथा में मस्त (लीन) रहते हैं, उन्हें दूर से ही छोड़ देना। मैं सामान्य मनुष्यों का प्रभु हूँ, किंतु वैष्णव भक्तों पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।"
असारे संसारे विषयविषसङ्गाकुलधियः
क्षणार्धं क्षेमार्थं पिबत शुकगाथातुलसुधाम् ।
किमर्थं व्यर्थं भो व्रजथ कुपथे कुत्सितकथे
परीक्षित्साक्षी यत् श्रवणगतमुक्त्युक्तिकथने ॥ १०० ॥
भावार्थ: हे असार संसार में विषयों के विष से आकुल बुद्धि वाले लोगो! अपने परम कल्याण के लिए क्षण भर के लिए ही सही, शुकदेव जी की इस अमृततुल्य गाथा का पान करो। राजा परीक्षित इस बात के प्रत्यक्ष साक्षी हैं कि इसके श्रवण मात्र से कैसी सुलभ मुक्ति मिलती है, फिर तुम क्यों व्यर्थ में कुमार्ग और नीच कथाओं के पीछे भटक रहे हो?
रसप्रवाहसंस्थेन श्रीशुकेनेरिता कथा ।
कण्ठे संबध्यते येन स वैकुण्ठप्रभुर्भवेत् ॥ १०१ ॥
भावार्थ: रस के प्रवाह में स्थित श्री शुकदेव जी द्वारा कही गई यह कथा जो मनुष्य अपने कंठ में (अर्थात सदा स्मरण और वाचन द्वारा) धारण कर लेता है, वह साक्षात् वैकुंठ के स्वामी (भगवान के समान) हो जाता है।
इति च परमगुह्यं सर्वसिद्धान्तसिद्धं
सपदि निगदितं ते शास्त्रपुञ्जं विलोक्य ।
जगति शुककथातो निर्मलं नास्ति किञ्चित्
पिब परसुखहेतोर्द्वादशस्कन्धसारम् ॥ १०२ ॥
भावार्थ: समस्त शास्त्रों के समूहों का सार देखकर यह परम गोपनीय और सभी सिद्धांतों का निष्कर्ष हमने तुम्हें तुरंत कह सुनाया है। इस जगत में शुकदेव जी की इस कथा से बढ़कर कोई भी पवित्र वस्तु नहीं है। अतः अपने परम सुख के लिए इस द्वादश स्कंध (भागवत) के सार का पान करो।
एतां यो नियततया श्रृणोति भक्त्या
यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे ।
तौ सम्यक् विधिकरणात्फलं लभेते
याथार्थ्यान्न हि भुवने किमप्यसाध्यम् ॥ १०३ ॥
भावार्थ: जो मनुष्य नियमपूर्वक श्रद्धा और भक्ति के साथ इस कथा को सुनता है, और जो शुद्ध वैष्णवों के समक्ष इसका वाचन करता है—वे दोनों विधि-विधान से इसके संपूर्ण फल को प्राप्त करते हैं। वास्तव में यथार्थ रूप से देखा जाए तो इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस कथा से असाध्य (असंभव) हो।

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