पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि
त्रयोदशः पाठः (पाठ १३) — दीपकम (कक्षा ६)
१. पाठ-परिचयः
| संस्कृत संवादः | हिन्दी भावार्थः |
|---|---|
| शिक्षकः: छात्राः! पश्यन्तु, अद्य मम हस्ते स्फोरकपत्राणि सन्ति। | शिक्षक: छात्रों! देखो, आज मेरे हाथ में चार्ट पेपर हैं। |
| छात्रः: श्रीमन्! स्फोरकपत्रे पश्यन्तु किम् अस्ति? श्रीमन्! स्फोरकपत्रे तु सुन्दरं चित्रम् अस्ति। श्लोकाः अपि सन्ति। | छात्र: श्रीमान! चार्ट पेपर पर देखिए क्या है? श्रीमान! चार्ट पेपर पर तो सुन्दर चित्र है। श्लोक भी हैं। |
| शिक्षकः: सत्यम्! एतानि सुभाषितानि सन्ति। सुन्दरवचनानि एव सुभाषितानि भवन्ति। एतानि अस्माकं कृते उत्तमकार्यार्थं प्रेरणां यच्छन्ति। छात्राः! एतानि स्फोरकपत्राणि भित्तौ स्थापयन्तु। तदनन्तरं स्वयम् एव पश्यन्तु। | शिक्षक: सच! ये सुभाषित हैं। सुन्दर वचनों को ही सुभाषित कहते हैं। ये हमें अच्छे कार्यों के लिए प्रेरणा देते हैं। छात्रों! इन चार्ट पेपर्स को दीवार पर लगाओ और उसके बाद स्वयं ही देखो। |
| छात्रः: श्रीमन्! तर्हि वयं सुभाषितानि पठामः। | छात्र: श्रीमान! तो हम सुभाषित पढ़ते हैं। |
२. श्लोकाः अन्वयः भावार्थः च
| श्लोक १ | |
|---|---|
| पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।। | अन्वयः: पृथिव्यां जलम् अन्नं सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति)। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते। भावार्थ (हिन्दी): पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं - जल, अन्न और सुन्दर वचन (सुभाषित)। परन्तु मूर्खों द्वारा पत्थर के टुकड़ों (हीरे, पन्ने आदि) को रत्न का नाम दिया जाता है। |
| श्लोक २ | |
|---|---|
| अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। | अन्वयः: अयं निजः परः वा इति गणना लघुचेतसां (जनानां भवति)। उदारचरितानां (जनानां) तु वसुधा एव कुटुम्बकम् (भवति)। भावार्थ (हिन्दी): "यह अपना है, यह पराया है" ऐसी सोच छोटे (संकुचित) हृदय वाले लोगों की होती है। उदार (विशाल) हृदय वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार के समान होती है। |
| श्लोक ३ | |
|---|---|
| उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।। | अन्वयः: कार्याणि उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति मनोरथैः न (सिद्ध्यन्ति)। (यथा) मृगाः (स्वयं) सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति। भावार्थ (हिन्दी): सभी कार्य परिश्रम (मेहनत) से ही सफल होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। जैसे सोते हुए शेर के मुँह में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करते (शेर को भी शिकार के लिए मेहनत करनी पड़ती है)। |
| श्लोक ४ | |
|---|---|
| अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।। | अन्वयः: तस्य नित्यम् अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः आयुः विद्या यशः बलम् (च इति) चत्वारि वर्धन्ते। भावार्थ (हिन्दी): जो व्यक्ति हमेशा दूसरों का अभिवादन (प्रणाम) करता है और बुजुर्गों की सेवा करता है, उस व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल — ये चार चीजें हमेशा बढ़ती हैं। |
| श्लोक ५ | |
|---|---|
| विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्।। | अन्वयः: विद्या विनयं ददाति, (मनुष्यः) विनयात् पात्रतां याति, पात्रत्वात् धनम् आप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम् (च आप्नोति)। भावार्थ (हिन्दी): विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता आती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख मिलता है। |
३. शब्दार्थ-सारणी
| संस्कृत शब्दः | हिन्दी अर्थः | English |
|---|---|---|
| मूढैः | मूर्खों के द्वारा | By fools |
| निजः | अपना | Own |
| परः | अन्य / पराया | Other |
| लघुचेतसाम् | क्षुद्र हृदय वालों का | Of narrow-minded |
| वसुधा | पृथ्वी | Earth |
| उद्यमेन | परिश्रम से | By effort |
| वृद्धोपसेविनः | बुजुर्गों की सेवा करने वाले का | One who serves elders |
| सहायकृत् | सहायता करने वाला | One who helps |
| पात्रताम् | योग्यता को | Ability |
| आप्नोति | प्राप्त करता है | Receives |
| गरीयसी | महान | Great |
| परहस्तेषु | अन्यों के हाथ में | In others hand |
४. अभ्यासः - भाग १ (प्रश्नोत्तराणि १-५)
| १. एतानि सर्वाणि सुभाषितानि उच्चैः पठन्तु स्मरन्तु लिखन्तु च। | |
|---|---|
| (छात्र सभी श्लोकों को जोर से पढ़ें, याद करें और लिखें।) |
| २. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु: | |
|---|---|
| (क) पृथिव्यां कति रत्नानि सन्ति? | त्रीणि |
| (ख) अयं निजः परो वा इति गणना केषां भवति? | लघुचेतसाम् |
| (ग) कार्याणि केन सिद्ध्यन्ति? | उद्यमेन |
| (घ) विद्या किं ददाति? | विनयम् |
| (ङ) जननी जन्मभूमिश्च कस्मात् गरीयसी? | स्वर्गात् |
| (च) लङ्का कीदृशी आसीत्? (पुर्वपाठात् आधारित) | स्वर्णमयी |
| ३. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु: |
|---|
| (क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि कानि सन्ति? ➔ पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलम् अन्नं सुभाषितम् च सन्ति। |
| (ख) उदारचरितानां भावः कः भवति? ➔ उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् भवति। |
| (ग) मृगाः स्वयमेव कस्य मुखे न प्रविशन्ति? ➔ मृगाः स्वयमेव सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति। |
| (घ) अभिवादनशीलस्य नित्यं कानि वर्धन्ते? ➔ अभिवादनशीलस्य नित्यं आयुः विद्या यशः बलम् च वर्धन्ते। |
| (ङ) मनुष्यः धनात् किम् आप्नोति? ➔ मनुष्यः धनात् धर्मम् आप्नोति। |
| (च) उत्पन्नेषु कार्येषु कीदृशं धनं उपयोगाय न भवति? ➔ परहस्तगतं धनं कार्यकाले समुत्पन्ने उपयोगाय न भवति। |
| ४. चित्रं दृष्ट्वा वाक्यानि रचयन्तु (वृक्ष, बच्चे, फल): |
|---|
| यथा – वृक्षः फलानि यच्छति। त्वं फलानि स्वीकरोषि। अहं फलानि स्वीकरोमि। |
| • (क) बालकाः वृक्षात् फलानि त्रोटयन्ति। • (ख) ते उपविश्य भोजनं कुर्वन्ति। • (ग) वृक्षस्य अधः बालौ स्तः। • (घ) अत्र एकं सुन्दरं पुष्पं विकसति। • (ङ) बालकाः प्रसन्नाः सन्ति। |
| ५. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति लिखन्तु: | |
|---|---|
| (क) त्रीणि रत्नानि जलमन्नं पाषाणः च सन्ति? | न |
| (ख) किं धर्मेण सुखं प्राप्यते? | आम् |
| (ग) किं विद्या विनयं ददाति? | आम् |
| (घ) किम् अभिवादनशीलस्य विद्या वर्धते? | आम् |
| (ङ) किम् उद्यमेन कार्याणि नश्यन्ति? | न |
| (च) किं जन्मभूमिः स्वर्गात् गरीयसी भवति? | आम् |
५. अभ्यासः - भाग २ (प्रश्नोत्तराणि ६-१०)
| ६. चित्रे दर्शितस्य नाम लिङ्गं च निर्दिशन्तु (चित्रों के अनुसार): | |
|---|---|
| • पुष्पम् – नपुंसकलिङ्गम् | • वृक्षः – पुंलिङ्गम् |
| • पत्रम् – नपुंसकलिङ्गम् | • लता – स्त्रीलिङ्गम् |
| • फलम् – नपुंसकलिङ्गम् | • पुस्तकानि – नपुंसकलिङ्गम् |
| ७. वलये पदानि विलिख्य सुभाषितं पूरयन्तु: | |
|---|---|
| विद्या ददाति विनयम्, विनयात् याति पात्रताम्, पात्रत्वात् आप्नोति धनम्, धनात् धर्मं ततः सुखम्। |
| ८. पट्टिकातः पदानि चित्वा निर्देशानुसारं पदानि लिखन्तु: |
|---|
| (पट्टिका: जननी, धैर्यम्, विद्या, विनयः, निजः, पत्रम्, बुद्धिः, मूलम्, पराक्रमः, शक्तिः, धनम्, उद्यमः) |
| (क) प्रथमान्त-पुंलिङ्गपदानि सन्ति – १. विनयः २. निजः ३. पराक्रमः ४. उद्यमः |
| (ख) प्रथमान्त-स्त्रीलिङ्गपदानि सन्ति – १. जननी २. विद्या ३. बुद्धिः ४. शक्तिः |
| (ग) प्रथमान्त-नपुंसकलिङ्गपदानि सन्ति – १. धैर्यम् २. पत्रम् ३. मूलम् ४. धनम् |
| ९. पाठगतानि सुभाषितानि स्मृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु: | |
|---|---|
| (क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि ............ सुभाषितम्। | जलमन्नं |
| (ख) उदारचरितानां तु ............ कुटुम्बकं भवति। | वसुधैव |
| (ग) उद्यमेन हि ............ सिद्ध्यन्ति। | कार्याणि |
| (घ) अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः ............ वर्धन्ते। | चत्वारि |
| (ङ) उद्यमः ............ पराक्रमः। | साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः |
| (च) विद्या ............ ददाति। | विनयं |
| (छ) जननी जन्मभूमिश्च ............ गरीयसी भवति। | स्वर्गादपि |
६. योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्
| नीतिग्रन्थानां परिचयः |
|---|
| • चाणक्यनीतिः – एषः एकः नीतिग्रन्थः अस्ति। अस्य रचनाकारः चाणक्यः अस्ति। अस्मिन् ग्रन्थे सूत्ररूपेण धर्म-संस्कृति-न्यायव्यवस्था-शान्ति-सुशिक्षा-इत्यादीनां विषये सुन्दरं विवरणम् अस्ति。 • मनुस्मृतिः – मनुस्मृतिः एकः प्रसिद्धः नीतिग्रन्थः धर्मग्रन्थः च अस्ति। अस्य रचनाकारः महर्षिः मनुः अस्ति। अस्मिन् ग्रन्थे द्वादश अध्यायाः सन्ति। अस्मिन् ग्रन्थे संसारस्य उत्पत्तिः, धर्मः, संस्कृतिः, मनुष्यस्य कर्तव्यानि इत्यादीनां वर्णनम् अस्ति。 • पञ्चतन्त्रम् – पञ्चतन्त्रं कथाग्रन्थः अस्ति। अस्य रचनाकारः पण्डितः विष्णुशर्मा अस्ति। अस्मिन् पञ्च तन्त्राणि सन्ति— मित्रभेदः, मित्रलाभः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकं च。 • हितोपदेशः – हितोपदेशस्य रचनाकारः नारायणपण्डितः अस्ति। अस्मिन् पशु-पक्षिणां कथाभिः बालानां कृते नीतिबोधः प्रस्तुतः अस्ति。 • रामायणम् – एषः ग्रन्थः भारतीयसंस्कृतेः आदर्शस्वरूपं दर्शयति। रामायणस्य रचयिता महर्षिः वाल्मीकिः अस्ति। अस्मिन् ग्रन्थे भगवतः श्रीरामस्य चरितं वर्णितम् अस्ति। एषः ग्रन्थः आदिकाव्यम् इति नाम्ना प्रसिद्धः अस्ति。 • सुभाषितरत्नभाण्डागारः – अस्मिन् ग्रन्थे सुभाषितानां सङ्ग्रहः अस्ति। विविध-संस्कृत ग्रन्थेभ्यः सुभाषितानि चित्वा अस्मिन् ग्रन्थे तेषां सङ्कलनं कृतम् अस्ति। |
परियोजनाकार्यम्:
१. पाठस्य सर्वाणि सुभाषितानि बृहत्-स्फोरकपत्रे सचित्रं लिखित्वा कक्षायाः भित्तौ स्थापयन्तु।
२. सुभाषितेषु प्रयुक्तानां क्रियापदानां सूचीं कुर्वन्तु। तेषाम् आधारेण वाक्यरचनां कुर्वन्तु।
३. विद्या, उद्यमः, अभिवादनशीलः इत्यादिगुणाः येषु सन्ति तादृशानां पञ्चानां महापुरुषाणां जीवनपरिचयं पठन्तु लिखन्तु च।
४. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इति विषये एकां भाषणप्रतियोगिताम् आयोजयन्तु।
१. पाठस्य सर्वाणि सुभाषितानि बृहत्-स्फोरकपत्रे सचित्रं लिखित्वा कक्षायाः भित्तौ स्थापयन्तु।
२. सुभाषितेषु प्रयुक्तानां क्रियापदानां सूचीं कुर्वन्तु। तेषाम् आधारेण वाक्यरचनां कुर्वन्तु।
३. विद्या, उद्यमः, अभिवादनशीलः इत्यादिगुणाः येषु सन्ति तादृशानां पञ्चानां महापुरुषाणां जीवनपरिचयं पठन्तु लिखन्तु च।
४. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इति विषये एकां भाषणप्रतियोगिताम् आयोजयन्तु।

