वृक्षाः सत्पुरुषाः इव
षोडशः पाठः (पाठ १६) — दीपकम (कक्षा ६)
१. पाठ-परिचयः (पर्यावरण-संरक्षणम्)
पर्यावरणसंरक्षणस्य विषये एका प्रदर्शनी विद्यालये आयोजिता अस्ति। छात्राः तां प्रदर्शनीं पश्यन्ति। शिक्षकेण सह संलापं च कुर्वन्ति।
(पर्यावरण संरक्षण के विषय में विद्यालय में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई है। छात्र उस प्रदर्शनी को देख रहे हैं और शिक्षक के साथ बातचीत कर रहे हैं।)
(पर्यावरण संरक्षण के विषय में विद्यालय में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई है। छात्र उस प्रदर्शनी को देख रहे हैं और शिक्षक के साथ बातचीत कर रहे हैं।)
| संस्कृत संवादः | हिन्दी भावार्थः |
|---|---|
| छात्रः: श्रीमन्! अहं जीवशास्त्रस्य पुस्तके पठामि यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छन्ति। | छात्र: श्रीमान! मैं जीव विज्ञान (Biology) की पुस्तक में पढ़ता हूँ कि पेड़ शुद्ध हवा (ऑक्सीजन) देते हैं। |
| छात्रा: श्रीमन्! मम माता अपि वदति यत् वृक्षाः पूज्याः भवन्ति। | छात्रा: श्रीमान! मेरी माँ भी कहती हैं कि पेड़ पूजनीय होते हैं। |
| शिक्षकः: प्रियाः छात्राः! सत्यम्, वृक्षाः शुद्धं वायुं, फलानि, पुष्पाणि च सर्वम् अपि यच्छन्ति। अतः ते पूज्याः। | शिक्षक: प्रिय छात्रों! सच है, पेड़ शुद्ध हवा, फल और फूल सब कुछ देते हैं। इसलिए वे पूजनीय हैं। |
| मुदिता: श्रीमन्! अहम् एकं सुभाषितं पठितवती यत् ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः’ सन्ति इति। | मुदिता: श्रीमान! मैंने एक सुभाषित (श्लोक) पढ़ा है कि ‘पेड़ सज्जन पुरुषों के समान’ होते हैं। |
| शिक्षकः: किम् एवम्? अस्तु, तर्हि तत् सुभाषितं श्रावयतु। | शिक्षक: क्या ऐसा है? ठीक है, तो वह सुभाषित सुनाओ। |
| (मुदिता सुभाषितं श्रावयति, अन्ये छात्राः अपि गायन्ति) | (मुदिता श्लोक सुनाती है, और अन्य छात्र भी उसे गाते हैं।) |
२. श्लोकाः अन्वयः भावार्थः च
| श्लोक १ | |
|---|---|
| छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥ | अन्वयः: (वृक्षाः) स्वयम् आतपे तिष्ठन्ति (किन्तु) अन्यस्य छायां कुर्वन्ति, फलानि अपि परार्थाय (यच्छन्ति) (अतः) वृक्षाः सत्पुरुषाः इव (सन्ति)। भावार्थ (हिन्दी): पेड़ खुद धूप में खड़े रहते हैं किन्तु दूसरों को छाया देते हैं। वे अपने फल भी दूसरों की भलाई (परोपकार) के लिए ही देते हैं। इसलिए पेड़ सज्जन पुरुषों के समान होते हैं, जो स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों का भला करते हैं। |
| श्लोक २ | |
|---|---|
| दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमो द्रुमः॥ | अन्वयः: दशकूपसमा वापी (अस्ति), दशवापीसमः ह्रदः (अस्ति), दशह्रदसमः पुत्रः (अस्ति), दशपुत्रसमः द्रुमः (अस्ति)। भावार्थ (हिन्दी): दस कुओं के बराबर एक बावड़ी होती है। दस बावड़ियों के बराबर एक बड़ा तालाब होता है। दस झीलों के बराबर एक पुत्र होता है। और दस पुत्रों के बराबर एक पेड़ होता है। अर्थात्, एक पेड़ लगाना सबसे अधिक उपकारी और महान कार्य है। |
| श्लोक ३ | |
|---|---|
| अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम्। सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः॥ | अन्वयः: अहो! एषां सर्वप्राण्युपजीवनं जन्म वरम् (अस्ति)। सुजनस्य इव येषाम् अर्थिनः विमुखाः न यान्ति। भावार्थ (हिन्दी): अहो! इन पेड़ों का जन्म श्रेष्ठ (महान) है, क्योंकि ये सभी प्राणियों का जीवन चलाते हैं। जैसे किसी सज्जन व्यक्ति के पास से कोई खाली हाथ नहीं लौटता, वैसे ही पेड़ों के पास से कोई भी मांगने वाला (याचक) निराश नहीं लौटता। |
| श्लोक ४ | |
|---|---|
| परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ | अन्वयः: वृक्षाः परोपकाराय फलन्ति, नद्यः परोपकाराय वहन्ति, गावः परोपकाराय दुहन्ति, परोपकारार्थम् (एव) इदं शरीरम् (अस्ति)। भावार्थ (हिन्दी): पेड़ परोपकार के लिए फलते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, गाएँ परोपकार के लिए दूध देती हैं। इसी प्रकार, मनुष्य का यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है। |
| श्लोक ५ | |
|---|---|
| पुष्प-पत्र-फलच्छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः। धन्या महीरुहा येषां विमुखा यान्ति नार्थिनः॥ | अन्वयः: येषां पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः अर्थिनः विमुखाः न यान्ति (ते) महीरुहाः धन्याः (सन्ति)। भावार्थ (हिन्दी): वे पेड़ धन्य हैं, जो अपने फूल, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल और लकड़ियों से लोगों की मदद करते हैं और जिनके पास से कोई याचक कभी खाली हाथ नहीं लौटता। |
| श्लोक ६ | |
|---|---|
| पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥ | अन्वयः: नद्यः अम्भः स्वयम् एव न पिबन्ति। वृक्षाः अपि फलानि स्वयं न खादन्ति। वारिवाहाः (अपि) सस्यं न अदन्ति खलु। (यतः) सतां विभूतयः परोपकाराय (भवन्ति)। भावार्थ (हिन्दी): नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं। पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। बादल भी अपनी बरसाई गई बारिश से उगाई गई फसल को खुद नहीं खाते। इसी प्रकार, सज्जन (महान) लोगों की संपत्तियाँ केवल दूसरों की भलाई (परोपकार) के लिए ही होती हैं। |
३. शब्दार्थ-सारणी
| संस्कृत शब्दः | हिन्दी अर्थः | English |
|---|---|---|
| आतपे | धूप में | In sunlight |
| परार्थाय | दूसरों के उपकार के लिए | For others |
| सत्पुरुषाः | सज्जन लोग | Noble men |
| वापी | बावड़ी / कुआँ | Stepwell |
| ह्रदः | तालाब / झील | Pond / Lake |
| द्रुमः | पेड़ | Tree |
| वरम् | श्रेष्ठ / महान | Best / Excellent |
| अर्थिनः | याचक / मांगने वाले | Wishing to receive |
| वहन्ति | बहती हैं | Flows |
| वल्कलम् | पेड़ की छाल | Bark of tree |
| दारुभिः | लकड़ियों से | By Wood |
| महीरुहाः | पेड़ | Trees |
| अम्भः | पानी / जल | Water |
| वारिवाहाः | बादल | Clouds |
| विभूतयः | संपत्तियाँ | Wealth |
४. अभ्यासः - भाग १ (प्रश्नोत्तराणि १-४)
| १. पाठे लिखितानि सुभाषितानि सस्वरं पठन्तु, अवगच्छन्तु, लिखन्तु स्मरन्तु च। | |
|---|---|
| (छात्र सभी श्लोकों को जोर से पढ़ें, उनका अर्थ समझें, लिखें और याद करें।) |
| २. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु: | |
|---|---|
| (क) वृक्षाः स्वयं कुत्र तिष्ठन्ति? | आतपे |
| (ख) परोपकाराय काः वहन्ति? | नद्यः |
| (ग) दशवापीसमः कः भवति? | ह्रदः |
| (घ) सत्पुरुषाः इव के सन्ति? | वृक्षाः |
| (ङ) अर्थिनः केभ्यः विमुखाः न यान्ति? | वृक्षेभ्यः (महीरुहेभ्यः) |
| (च) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति? | फलानि |
| ३. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु: |
|---|
| (क) नद्यः किं न पिबन्ति? ➔ नद्यः स्वयमेव जलं (अम्भः) न पिबन्ति। |
| (ख) वृक्षाः अस्मभ्यं किं किं यच्छन्ति? ➔ वृक्षाः अस्मभ्यं शुद्धं वायुं, फलानि, पुष्पाणि, छायां च यच्छन्ति। |
| (ग) इदं शरीरं किमर्थम् अस्ति? ➔ इदं शरीरं परोपकारार्थम् अस्ति। |
| (घ) दशपुत्रसमः कः भवति? ➔ दशपुत्रसमः द्रुमः (वृक्षः) भवति। |
| (ङ) केषां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति? ➔ सतां (सज्जनानां) विभूतयः परोपकाराय भवन्ति। |
| (च) अन्यस्य छायां के कुर्वन्ति? ➔ अन्यस्य छायां वृक्षाः कुर्वन्ति। |
| ४. पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु: | |
|---|---|
| (पट्टिका: तिष्ठन्ति, सुजनस्येव, विभूतयः, वृक्षाः, फलानि, दशपुत्रसमः, परोपकारार्थम्) | |
| (क) फलान्यपि परार्थाय ............ सत्पुरुषा इव। | वृक्षाः |
| (ख) दशह्रदसमः पुत्रः ............ द्रुमः। | दशपुत्रसमः |
| (ग) ............ येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः। | सुजनस्येव |
| (घ) ............ इदं शरीरम्। | परोपकारार्थम् |
| (ङ) स्वयं न खादन्ति ............ वृक्षाः। | फलानि |
| (च) परोपकाराय सतां ............। | विभूतयः |
५. अभ्यासः - भाग २ (प्रश्नोत्तराणि ५-८)
| ५. अधोलिखितेषु वाक्येषु स्थूलाक्षरपदानां विभक्तिं निर्दिशन्तु: | |
|---|---|
| (क) वृक्षाः अन्यस्य कृते छायां कुर्वन्ति। ➔ | षष्ठी विभक्तिः |
| (ख) वृक्षाः परार्थाय फलानि यच्छन्ति। ➔ | चतुर्थी विभक्तिः |
| (ग) वृक्षाः सत्पुरुषाः इव सन्ति। ➔ | प्रथमा विभक्तिः (बहुवचनम्) |
| (घ) द्रुमः दशसन्तानसमः भवति। ➔ | प्रथमा विभक्तिः |
| (ङ) वृक्षः प्राणिभ्यः काष्ठानि यच्छति। ➔ | चतुर्थी / पञ्चमी विभक्तिः |
| (च) नद्यः जलं स्वयमेव न पिबन्ति। ➔ | द्वितीया विभक्तिः |
| (छ) सज्जनानां सङ्गतिं करोतु। ➔ | द्वितीया विभक्तिः |
| ६. अधोलिखितानां पदानां द्विवचने बहुवचने च रूपाणि लिखन्तु: | ||
|---|---|---|
| एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| (क) वृक्षः | वृक्षौ | वृक्षाः |
| (ख) मेघः | मेघौ | मेघाः |
| (ग) ह्रदः | ह्रदौ | ह्रदाः |
| (घ) सत्पुरुषः | सत्पुरुषौ | सत्पुरुषाः |
| (ङ) छाया | छाये | छायाः |
| (च) वापी | वाप्यौ | वाप्यः |
| (छ) नदी | नद्यौ | नद्यः |
| (ज) शरीरम् | शरीरे | शरीराणि |
| (झ) पुष्पम् | पुष्पे | पुष्पाणि |
| ७. पदानां परस्परं समुचितं मेलनं कृत्वा ‘कः किं ददाति’ इति लिखन्तु: | |
|---|---|
| • (क) वृक्षः ➔ | शुद्धं वायुं ददाति। |
| • (ख) गौः ➔ | दुग्धं ददाति। |
| • (ग) सूर्यः ➔ | प्रकाशं ददाति। |
| • (घ) नदी ➔ | जलं ददाति। |
| • (ङ) अग्निः ➔ | तापं ददाति। |
| • (च) शिक्षकः ➔ | विद्यां ददाति। |
| ८. अधोलिखितानां क्रियापदानां लट्-लकारे प्रथमपुरुषस्य रूपाणि लिखन्तु: | |||
|---|---|---|---|
| धातु-रूपम् | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| कुर्वन्ति | करोति | कुरुतः | कुर्वन्ति |
| तिष्ठन्ति | तिष्ठति | तिष्ठतः | तिष्ठन्ति |
| फलन्ति | फलति | फलतः | फलन्ति |
| यान्ति | याति | यातः | यान्ति |
| पिबन्ति | पिबति | पिबतः | पिबन्ति |
| खादन्ति | खादति | खादतः | खादन्ति |
६. योग्यताविस्तरः एवं प्रहेलिका
| प्रहेलिका (पहेली) पठित्वा उत्तरं वदन्तु: |
|---|
| वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः। त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः॥ हिन्दी अर्थ: वह पेड़ के सबसे ऊपरी हिस्से पर रहता है, लेकिन पक्षीराज गरुड़ नहीं है। उसके तीन आँखें हैं, लेकिन वह त्रिशूलधारी भगवान शिव नहीं है। वह वल्कल (छाल) के वस्त्र पहनता है, लेकिन कोई सिद्ध योगी नहीं है। उसके अंदर जल भरा है, लेकिन वह न तो घड़ा है और न ही बादल है। बताओ वह क्या है? उत्तरम् (Answer): नारिकेलम् (नारियल / Coconut) |
परियोजनाकार्यम्:
१. विद्यालयं गृहं वा परितः विद्यमानानां पञ्च-पादपानां (वृक्षाणां) संरक्षणं कुर्वन्तु। (अपने विद्यालय या घर के आस-पास मौजूद किन्हीं पाँच पेड़ों की देखभाल करें।)
२. अन्तर्जालस्य साहाय्येन परोपकारविषये दश-सुभाषितानां सङ्ग्रहणं कुर्वन्तु। (इंटरनेट की सहायता से 'परोपकार' विषय पर 10 श्लोक/सुभाषित खोजकर लिखें।)
१. विद्यालयं गृहं वा परितः विद्यमानानां पञ्च-पादपानां (वृक्षाणां) संरक्षणं कुर्वन्तु। (अपने विद्यालय या घर के आस-पास मौजूद किन्हीं पाँच पेड़ों की देखभाल करें।)
२. अन्तर्जालस्य साहाय्येन परोपकारविषये दश-सुभाषितानां सङ्ग्रहणं कुर्वन्तु। (इंटरनेट की सहायता से 'परोपकार' विषय पर 10 श्लोक/सुभाषित खोजकर लिखें।)
| परिशिष्टम् (आगच्छन्तु! संस्कृतेन संभाषणं कुर्मः) |
|---|
| • भवतः नाम किम्? – मम नाम राजेशः। • भवतः गृहं कुत्र अस्ति? – मम गृहं सञ्जय-नगरे अस्ति। • भवान् किं करोति? – अहं कार्यं करोमि। • भवती किं लिखति? – अहं श्लोकं लिखामि। • सः कदा आगच्छति? – सः दशवादने आगच्छति। • कक्षायां कति छात्राः सन्ति? – कक्षायां त्रिंशत् छात्राः सन्ति। • रविः कुतः आगच्छति? – रविः ग्रन्थालयतः आगच्छति। • सः किमर्थं योगासनं करोति? – सः आरोग्यार्थं योगासनं करोति। • एतत् कस्य पुस्तकम्? – एतत् राजेशस्य पुस्तकम्। • नमस्ते। भवान् कथम् अस्ति? – नमस्ते। अहं कुशली अस्मि। • इदानीं कः समयः? – इदानीं एकादशवादनम्। |

