दश लकार एवं दश गण: पाणिनीय सूत्र-रहस्य | 10 lakar parichay

Sooraj Krishna Shastri
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दश लकार एवं दश गण: पाणिनीय सूत्र-रहस्य

धातुओं में काल (Tense), भाव (Mood) और विकरण कैसे जुड़ते हैं? पाणिनीय सूत्रों की शल्य-चिकित्सा (Surgical Analysis) के साथ सम्पूर्ण प्रक्रिया।

१. दश लकार: अर्थ एवं पाणिनीय सूत्र

संस्कृत व्याकरण में 'लकार' केवल काल नहीं बताते, बल्कि वक्ता की भावना (आज्ञा, प्रार्थना, आशीर्वाद) भी बताते हैं। आइए इन्हें इनके निर्धारक सूत्रों के साथ समझें:

(क) टित् लकार (६) - जिनके अन्त में 'ट्' है:
१. लट् लकार: वर्तमाने लट् (३.२.१२३)
जो कार्य वर्तमान में चल रहा है (Present Tense), उसे बताने के लिए धातु से 'लट्' प्रत्यय होता है। (उदा: पठति - पढ़ता है)।
२. लिट् लकार: परोक्षे लिट् (३.२.११५)
ऐसा भूतकाल जो हमारी आँखों के सामने न हुआ हो (Unseen Past) और बहुत पुराना हो। (उदा: पपाठ - उसने पढ़ा था)।
३. लुट् लकार: अनद्यतने लुट् (३.३.१५)
ऐसा भविष्यत् काल जो आज (अद्यतन) का न हो, अर्थात् कल या परसों होने वाला हो (First Future)। (उदा: पठिता - वह कल पढ़ेगा)।
४. लृट् लकार: लृट् शेषे च (३.३.१३)
सामान्य भविष्यत् काल (General Future), जो आज भी हो सकता है और कल भी। (उदा: पठिष्यति - वह पढ़ेगा)।
५. लेट् लकार: लिङर्थे लेट् (३.४.७)
यह केवल वेदों में प्रयोग होता है (छन्दोमात्रगोचरः)। लौकिक संस्कृत में इसका प्रयोग वर्जित है।
६. लोट् लकार: आशिषि लिङ्लोटौ (३.३.१७३) / विध्यनिमन्त्रणा...
आज्ञा (Order), प्रार्थना (Request) या आशीर्वाद देने के अर्थ में लोट् लकार आता है। (उदा: पठतु - तुम पढ़ो)।
(ख) ङित् लकार (४) - जिनके अन्त में 'ङ्' है:
७. लङ् लकार: अनद्यतने लङ् (३.२.१११)
ऐसा भूतकाल जो आज का न हो (कल का या उससे पहले का हो)। इसे Imperfect Past कहते हैं। (उदा: अपठत् - उसने पढ़ा)।
८. लिङ् लकार: विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ् (३.३.१६१)
इसके दो भेद हैं: १. विधिलिङ् (चाहिए, सम्भावना, नियम अर्थ में - पठेत् / पढ़ना चाहिए)। २. आशीर्लिङ् (आशीर्वाद देने अर्थ में - भूयात् / तुम्हारा कल्याण हो)।
९. लुङ् लकार: लुङ् (३.२.११०)
सामान्य भूतकाल (General Past), जो आज भी हुआ हो सकता है। (उदा: अपाठीत् - उसने पढ़ा)।
१०. लृङ् लकार: लिङ्निमित्ते लृङ् क्रियातिपत्तौ (३.३.१३९)
हेतुहेतुमद् भाव (Conditional)। जहाँ एक क्रिया दूसरी पर निर्भर हो और दोनों ही पूरी न हुई हों। (उदा: यदि सः अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् अभविष्यत् - यदि वह पढ़ता, तो विद्वान हो जाता)।

२. दश गण: विकरण (बीच के प्रत्यय) के सूत्र

धातु और तिङ् (ति, तः, अन्ति) प्रत्यय के ठीक बीच में जो विशेष शब्द आकर बैठता है, उसे 'विकरण' कहते हैं। इसी विकरण के आधार पर १० गण बने हैं। परीक्षाओं में सीधे पूछा जाता है कि किस गण का क्या विकरण है:

गण का नाम विकरण सूत्र शेष क्या बचता है?
१. भ्वादि (भू) कर्तरि शप् (पठ् + अ + ति)
२. अदादि (अद्) अदिप्रभृतिभ्यः शपः लुक् (शप् का लोप ➔ अत्ति)
३. जुहोत्यादि (हु) जुहोत्यादिभ्यः श्लुः श्लु (लोप + धातु को द्वित्व ➔ जुहोति)
४. दिवादि (दिव्) दिवादिभ्यः श्यन् (नृत् + य + ति ➔ नृत्यति)
५. स्वादि (सु) स्वादिभ्यः श्नुः नु (सु + नु + ति ➔ सुनोति)
६. तुदादि (तुद्) तुदादिभ्यः शः (यहाँ गुण नहीं होता ➔ तुदति)
७. रुधादि (रुध्) रुधादिभ्यः श्नम् (धातु के बीच में ➔ रुणद्धि)
८. तनादि (तन्) तनादिकृञ्भ्य उः (तन् + उ + ति ➔ तनोति)
९. क्र्यादि (क्री) क्र्यादिभ्यः श्ना ना (क्री + ना + ति ➔ क्रीणाति)
१०. चुरादि (चुर्) चुरादिभ्यो णिच् अय (णिच् का 'इ' + शप् का 'अ' ➔ चोरयति)

परस्मैपदी एवं आत्मनेपदी: १८ तिङ् प्रत्यय

संस्कृत क्रियाओं का मूल रहस्य: धातुएँ 'भवति' और 'एधते' जैसे दो अलग-अलग रूपों में क्यों चलती हैं? पाणिनीय सूत्रों सहित सम्पूर्ण विवेचन।

१. तीन प्रकार के पद (Types of Padas)

पाणिनि मुनि ने "क्रिया का फल (Result) किसे मिल रहा है?" इसके आधार पर धातुओं को तीन श्रेणियों में बाँटा है:

(क) परस्मैपदी धातुएँ (Parasmaipada)

सूत्र: शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् (१.३.७८)
अर्थ: 'परस्मै' अर्थात् दूसरों के लिए। जब क्रिया का फल (परिणाम) कर्ता को न मिलकर किसी अन्य (कर्म आदि) को मिलता है, तो वहाँ परस्मैपदी धातुओं का प्रयोग होता है।
(उदा: पठ्, गम्, पा, दृश् — सः पुस्तकं पठति। इसमें 'तिप्' आदि ९ प्रत्यय लगते हैं।)

(ख) आत्मनेपदी धातुएँ (Atmanepada)

सूत्र: अनुदात्तङित आत्मनेपदम् (१.३.१२)
अर्थ: 'आत्मने' अर्थात् स्वयं (अपने) के लिए। जब क्रिया का फल सीधे कर्ता (स्वयं काम करने वाले) को मिलता है, तब आत्मनेपदी धातुओं का प्रयोग होता है। ये धातुएँ अनुदात्त या ङित् होती हैं।
(उदा: एध् (बढ़ना), सेव् (सेवा करना), लभ् (पाना), वृत् (होना) — सः एधते। इसमें 'त' आदि ९ प्रत्यय लगते हैं।)

(ग) उभयपदी धातुएँ (Ubhayapada)

सूत्र: स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले (१.३.७२)
अर्थ: 'उभय' अर्थात् दोनों। जो धातुएँ स्वरित या ञित् होती हैं, उनके रूप दोनों पदों में चलते हैं। यदि फल कर्ता को मिले तो आत्मनेपद, और दूसरों को मिले तो परस्मैपद।
(उदा: कृ, पच्, नी — सः ओदनं पचति / सः ओदनं पचते)।

२. १८ 'तिङ्' प्रत्ययों का विभाजन

"तिप्तस्झिसिप्थस्थ..." सूत्र से प्राप्त १८ प्रत्ययों में से प्रथम ९ प्रत्यय परस्मैपदी हैं और अंतिम ९ प्रत्यय आत्मनेपदी हैं:

(अ) परस्मैपदी ९ प्रत्यय (पठति, गच्छति आदि के लिए)

पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथम पुरुषतिप् (ति)तस् (तः)झि (अन्ति)
मध्यम पुरुषसिप् (सि)थस् (थः)
उत्तम पुरुषमिप् (मि)वस् (वः)मस् (मः)

(आ) आत्मनेपदी ९ प्रत्यय (एधते, सेवते आदि के लिए)

पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथम पुरुषत (ते)आताम् (एते)झ (अन्ते)
मध्यम पुरुषथास् (से)आथाम् (एथे)ध्वम् (ध्वे)
उत्तम पुरुषइड् (ए)वहि (वहे)महिङ् (महे)

३. 'एधते' कैसे बनता है? (आत्मनेपद सूत्र सिद्धि)

जिस प्रकार हमने 'भवति' सिद्ध किया था (जहाँ 'ति' लगता है), आइए देखें कि आत्मनेपदी धातु (एध् - बढ़ना) से 'एधते' कैसे बनता है:

१.
एध् वृद्धौ: भ्वादि गण की आत्मनेपदी धातु 'एध्' (बढ़ना) ली गई।
२.
वर्तमाने लट्: वर्तमान काल में 'लट्' प्रत्यय ➔ एध् + लट्
३.
तिप्तस्झि... / तङ्मानावात्मनेपदम्: 'लट्' के स्थान पर प्रथम पुरुष एकवचन का आत्मनेपदी प्रत्यय 'त' आदेश हुआ ➔ एध् + त
४.
कर्तरि शप्: 'त' (सार्वधातुक) प्रत्यय होने से बीच में 'शप्' (अ) विकरण आया ➔ एध् + शप् + त ➔ एध् + अ + त
५.
टित आत्मनेपदानां टेरे (३.४.७९) - V.V.Imp: यह सूत्र कहता है कि टित् लकारों (जैसे लट्, लृट्) में आत्मनेपदी प्रत्यय की 'टि' (अंतिम स्वर) को 'ए' हो जाता है। अतः 'त' के 'अ' को 'ए' हुआ ➔ एध् + अ + ते = एधते
॥ इति 'एधते' रूपं सिद्धम् ॥

३. 'भवति' कैसे बनता है? (सम्पूर्ण पाणिनीय सिद्धि)

टीजीटी/पीजीटी साक्षात्कारों (Interviews) में अक्सर एक शब्द सिद्ध करवाया जाता है। आइए 'भू' धातु से 'भवति' (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) की शल्य-चिकित्सा (Surgery) करें:

१.
भू सत्तायाम्: धातुपाठ से 'भू' धातु ली गई।
२.
वर्तमाने लट् (३.२.१२३): वर्तमान काल की विवक्षा में 'भू' से 'लट्' प्रत्यय आया ➔ भू + लट्
३.
तिप्तस्झिसिप्थस्थ... (३.४.७८): प्रथम पुरुष एकवचन में लट् के स्थान पर 'तिप्' आदेश हुआ ➔ भू + तिप्। (तिप् के 'प्' की इत् संज्ञा होकर 'ति' शेष बचा)।
४.
कर्तरि शप् (३.१.६८): 'तिङ्' (सार्वधातुक) प्रत्यय बाद में होने के कारण धातु और प्रत्यय के बीच में 'शप्' (अ) विकरण आया ➔ भू + शप् + ति ➔ भू + अ + ति
५.
सार्वधातुकार्धधातुकयोः (७.३.८४): शप् (अ) के परे होने के कारण 'भू' के 'ऊ' को गुण 'ओ' हो गया ➔ भो + अ + ति
६.
एचोऽयवायावः (६.१.७८): अयादि सन्धि से 'ओ' के बाद 'अ' आने पर 'ओ' को 'अव्' आदेश हो गया ➔ भ् + अव् + अ + ति = भवति
॥ इति 'भवति' रूपं सिद्धम् ॥
💡 सन्धि का महत्त्व: आपने देखा कि धातुरूप सिद्ध करने के अंतिम चरण में अयादि सन्धि (एचोऽयवायावः) का ही प्रयोग हुआ! इसीलिए संस्कृत व्याकरण में 'सन्धि प्रकरण' को सबसे पहले पढ़ा जाता है।

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