दश लकार एवं दश गण: पाणिनीय सूत्र-रहस्य
धातुओं में काल (Tense), भाव (Mood) और विकरण कैसे जुड़ते हैं? पाणिनीय सूत्रों की शल्य-चिकित्सा (Surgical Analysis) के साथ सम्पूर्ण प्रक्रिया।
१. दश लकार: अर्थ एवं पाणिनीय सूत्र
संस्कृत व्याकरण में 'लकार' केवल काल नहीं बताते, बल्कि वक्ता की भावना (आज्ञा, प्रार्थना, आशीर्वाद) भी बताते हैं। आइए इन्हें इनके निर्धारक सूत्रों के साथ समझें:
जो कार्य वर्तमान में चल रहा है (Present Tense), उसे बताने के लिए धातु से 'लट्' प्रत्यय होता है। (उदा: पठति - पढ़ता है)।
ऐसा भूतकाल जो हमारी आँखों के सामने न हुआ हो (Unseen Past) और बहुत पुराना हो। (उदा: पपाठ - उसने पढ़ा था)।
ऐसा भविष्यत् काल जो आज (अद्यतन) का न हो, अर्थात् कल या परसों होने वाला हो (First Future)। (उदा: पठिता - वह कल पढ़ेगा)।
सामान्य भविष्यत् काल (General Future), जो आज भी हो सकता है और कल भी। (उदा: पठिष्यति - वह पढ़ेगा)।
यह केवल वेदों में प्रयोग होता है (छन्दोमात्रगोचरः)। लौकिक संस्कृत में इसका प्रयोग वर्जित है।
आज्ञा (Order), प्रार्थना (Request) या आशीर्वाद देने के अर्थ में लोट् लकार आता है। (उदा: पठतु - तुम पढ़ो)।
ऐसा भूतकाल जो आज का न हो (कल का या उससे पहले का हो)। इसे Imperfect Past कहते हैं। (उदा: अपठत् - उसने पढ़ा)।
इसके दो भेद हैं: १. विधिलिङ् (चाहिए, सम्भावना, नियम अर्थ में - पठेत् / पढ़ना चाहिए)। २. आशीर्लिङ् (आशीर्वाद देने अर्थ में - भूयात् / तुम्हारा कल्याण हो)।
सामान्य भूतकाल (General Past), जो आज भी हुआ हो सकता है। (उदा: अपाठीत् - उसने पढ़ा)।
हेतुहेतुमद् भाव (Conditional)। जहाँ एक क्रिया दूसरी पर निर्भर हो और दोनों ही पूरी न हुई हों। (उदा: यदि सः अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् अभविष्यत् - यदि वह पढ़ता, तो विद्वान हो जाता)।
२. दश गण: विकरण (बीच के प्रत्यय) के सूत्र
धातु और तिङ् (ति, तः, अन्ति) प्रत्यय के ठीक बीच में जो विशेष शब्द आकर बैठता है, उसे 'विकरण' कहते हैं। इसी विकरण के आधार पर १० गण बने हैं। परीक्षाओं में सीधे पूछा जाता है कि किस गण का क्या विकरण है:
| गण का नाम | विकरण सूत्र | शेष क्या बचता है? |
|---|---|---|
| १. भ्वादि (भू) | कर्तरि शप् | अ (पठ् + अ + ति) |
| २. अदादि (अद्) | अदिप्रभृतिभ्यः शपः | लुक् (शप् का लोप ➔ अत्ति) |
| ३. जुहोत्यादि (हु) | जुहोत्यादिभ्यः श्लुः | श्लु (लोप + धातु को द्वित्व ➔ जुहोति) |
| ४. दिवादि (दिव्) | दिवादिभ्यः श्यन् | य (नृत् + य + ति ➔ नृत्यति) |
| ५. स्वादि (सु) | स्वादिभ्यः श्नुः | नु (सु + नु + ति ➔ सुनोति) |
| ६. तुदादि (तुद्) | तुदादिभ्यः शः | अ (यहाँ गुण नहीं होता ➔ तुदति) |
| ७. रुधादि (रुध्) | रुधादिभ्यः श्नम् | न (धातु के बीच में ➔ रुणद्धि) |
| ८. तनादि (तन्) | तनादिकृञ्भ्य उः | उ (तन् + उ + ति ➔ तनोति) |
| ९. क्र्यादि (क्री) | क्र्यादिभ्यः श्ना | ना (क्री + ना + ति ➔ क्रीणाति) |
| १०. चुरादि (चुर्) | चुरादिभ्यो णिच् | अय (णिच् का 'इ' + शप् का 'अ' ➔ चोरयति) |
परस्मैपदी एवं आत्मनेपदी: १८ तिङ् प्रत्यय
संस्कृत क्रियाओं का मूल रहस्य: धातुएँ 'भवति' और 'एधते' जैसे दो अलग-अलग रूपों में क्यों चलती हैं? पाणिनीय सूत्रों सहित सम्पूर्ण विवेचन।
१. तीन प्रकार के पद (Types of Padas)
पाणिनि मुनि ने "क्रिया का फल (Result) किसे मिल रहा है?" इसके आधार पर धातुओं को तीन श्रेणियों में बाँटा है:
(क) परस्मैपदी धातुएँ (Parasmaipada)
अर्थ: 'परस्मै' अर्थात् दूसरों के लिए। जब क्रिया का फल (परिणाम) कर्ता को न मिलकर किसी अन्य (कर्म आदि) को मिलता है, तो वहाँ परस्मैपदी धातुओं का प्रयोग होता है।
(उदा: पठ्, गम्, पा, दृश् — सः पुस्तकं पठति। इसमें 'तिप्' आदि ९ प्रत्यय लगते हैं।)
(ख) आत्मनेपदी धातुएँ (Atmanepada)
अर्थ: 'आत्मने' अर्थात् स्वयं (अपने) के लिए। जब क्रिया का फल सीधे कर्ता (स्वयं काम करने वाले) को मिलता है, तब आत्मनेपदी धातुओं का प्रयोग होता है। ये धातुएँ अनुदात्त या ङित् होती हैं।
(उदा: एध् (बढ़ना), सेव् (सेवा करना), लभ् (पाना), वृत् (होना) — सः एधते। इसमें 'त' आदि ९ प्रत्यय लगते हैं।)
(ग) उभयपदी धातुएँ (Ubhayapada)
अर्थ: 'उभय' अर्थात् दोनों। जो धातुएँ स्वरित या ञित् होती हैं, उनके रूप दोनों पदों में चलते हैं। यदि फल कर्ता को मिले तो आत्मनेपद, और दूसरों को मिले तो परस्मैपद।
(उदा: कृ, पच्, नी — सः ओदनं पचति / सः ओदनं पचते)।
२. १८ 'तिङ्' प्रत्ययों का विभाजन
"तिप्तस्झिसिप्थस्थ..." सूत्र से प्राप्त १८ प्रत्ययों में से प्रथम ९ प्रत्यय परस्मैपदी हैं और अंतिम ९ प्रत्यय आत्मनेपदी हैं:
(अ) परस्मैपदी ९ प्रत्यय (पठति, गच्छति आदि के लिए)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | तिप् (ति) | तस् (तः) | झि (अन्ति) |
| मध्यम पुरुष | सिप् (सि) | थस् (थः) | थ |
| उत्तम पुरुष | मिप् (मि) | वस् (वः) | मस् (मः) |
(आ) आत्मनेपदी ९ प्रत्यय (एधते, सेवते आदि के लिए)
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | त (ते) | आताम् (एते) | झ (अन्ते) |
| मध्यम पुरुष | थास् (से) | आथाम् (एथे) | ध्वम् (ध्वे) |
| उत्तम पुरुष | इड् (ए) | वहि (वहे) | महिङ् (महे) |
३. 'एधते' कैसे बनता है? (आत्मनेपद सूत्र सिद्धि)
जिस प्रकार हमने 'भवति' सिद्ध किया था (जहाँ 'ति' लगता है), आइए देखें कि आत्मनेपदी धातु (एध् - बढ़ना) से 'एधते' कैसे बनता है:
३. 'भवति' कैसे बनता है? (सम्पूर्ण पाणिनीय सिद्धि)
टीजीटी/पीजीटी साक्षात्कारों (Interviews) में अक्सर एक शब्द सिद्ध करवाया जाता है। आइए 'भू' धातु से 'भवति' (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) की शल्य-चिकित्सा (Surgery) करें:
