अजन्त (स्वरान्त) पुँल्लिंग: 'राम' शब्द की रूप-सिद्धि
पाणिनीय व्याकरण का प्रवेश द्वार: 'राम' शब्द के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूपों की सूत्रों सहित वैज्ञानिक सिद्धि-प्रक्रिया।
अजन्त क्या है? 'अच्' (स्वर) है 'अन्त' (आख़िर) में जिसके, उसे अजन्त कहते हैं (अच् + अन्तः = अजन्तः - जश्त्व सन्धि)। जैसे— राम (अ), हरि (इ), भानु (उ), पितृ (ऋ)। सबसे पहले अकारान्त पुँल्लिंग 'राम' शब्द को सिद्ध किया जाता है, क्योंकि इसे समझे बिना कोई अन्य शब्दरूप सिद्ध नहीं हो सकता।
१. प्रथमा विभक्ति की सिद्धि (रामः, रामौ, रामाः)
सर्वप्रथम 'अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्' से 'राम' शब्द की प्रातिपदिक संज्ञा होती है। इसके बाद 'स्वौजसमौट्...' सूत्र से २१ सुप् प्रत्यय आते हैं।
रामः (एकवचन)
१. राम + सु (प्रथमा एकवचन का प्रत्यय)।
२. 'सु' के उकार की इत् संज्ञा होकर लोप ➔ राम + स्।
३. 'ससजुषो रुः' से 'स्' को 'रु' (र्) ➔ राम + र्।
४. 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' से 'र्' को विसर्ग (:) ➔ रामः।
२. 'सु' के उकार की इत् संज्ञा होकर लोप ➔ राम + स्।
३. 'ससजुषो रुः' से 'स्' को 'रु' (र्) ➔ राम + र्।
४. 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' से 'र्' को विसर्ग (:) ➔ रामः।
रामौ (द्विवचन)
१. राम + औ (प्रथमा द्विवचन)। (यहाँ 'वृद्धिरेचि' से 'रामौ' प्राप्त था, परन्तु 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' ने उसे रोक कर पूर्वसवर्ण दीर्घ 'रामा' करना चाहा)।
२. 'नादिचि' (६.१.१०४): इस सूत्र ने 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' को रोक दिया कि अवर्ण (अ/आ) के बाद 'इच्' (औ) हो तो पूर्वसवर्ण नहीं होता।
३. अतः पुनः 'वृद्धिरेचि' से अ + औ = औ होकर ➔ रामौ सिद्ध हुआ।
२. 'नादिचि' (६.१.१०४): इस सूत्र ने 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' को रोक दिया कि अवर्ण (अ/आ) के बाद 'इच्' (औ) हो तो पूर्वसवर्ण नहीं होता।
३. अतः पुनः 'वृद्धिरेचि' से अ + औ = औ होकर ➔ रामौ सिद्ध हुआ।
रामाः (बहुवचन)
१. राम + जस् (प्रथमा बहुवचन)।
२. 'जस्' के 'ज्' की 'चुटू' सूत्र से इत् संज्ञा और लोप ➔ राम + अस्।
३. 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' से 'राम' के 'अ' और 'अस्' के 'अ' को पूर्वसवर्ण दीर्घ (आ) ➔ रामा + स्।
४. स् को रुत्व और विसर्ग होकर ➔ रामाः।
२. 'जस्' के 'ज्' की 'चुटू' सूत्र से इत् संज्ञा और लोप ➔ राम + अस्।
३. 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' से 'राम' के 'अ' और 'अस्' के 'अ' को पूर्वसवर्ण दीर्घ (आ) ➔ रामा + स्।
४. स् को रुत्व और विसर्ग होकर ➔ रामाः।
२. तृतीया विभक्ति: 'रामेण' (TGT/PGT Special)
परीक्षाओं में सर्वाधिक पूछा जाने वाला प्रश्न: "रामेन" के 'न्' को 'ण्' किस सूत्र से हुआ?
रामेण (एकवचन)
१. राम + टा (तृतीया एकवचन)।
२. 'टाङसिङसामिनाथ्याः' (७.१.१२): इस सूत्र से 'टा' के स्थान पर 'इन्' आदेश हुआ ➔ राम + इन्।
३. 'आद्गुणः' से अ + इ = ए (गुण) ➔ रामेन।
न् ➔ ण् की प्रक्रिया (V.V.Imp):
४. 'अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि' (८.४.२): इस सूत्र के अनुसार, यदि एक ही पद में र् या ष् के बाद 'न्' हो, और उनके बीच में अट् (स्वर, ह, य, व, र), कवर्ग, पवर्ग, आङ् या नुम् का व्यवधान हो, तो 'न्' को 'ण्' हो जाता है।
५. 'रामेन' में 'र्' के बाद 'न्' है, और बीच में 'आ', 'म्' (पवर्ग), 'ए' (अट्) का व्यवधान है। अतः इस सूत्र से 'न्' को 'ण्' होकर ➔ रामेण सिद्ध हुआ।
२. 'टाङसिङसामिनाथ्याः' (७.१.१२): इस सूत्र से 'टा' के स्थान पर 'इन्' आदेश हुआ ➔ राम + इन्।
३. 'आद्गुणः' से अ + इ = ए (गुण) ➔ रामेन।
न् ➔ ण् की प्रक्रिया (V.V.Imp):
४. 'अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि' (८.४.२): इस सूत्र के अनुसार, यदि एक ही पद में र् या ष् के बाद 'न्' हो, और उनके बीच में अट् (स्वर, ह, य, व, र), कवर्ग, पवर्ग, आङ् या नुम् का व्यवधान हो, तो 'न्' को 'ण्' हो जाता है।
५. 'रामेन' में 'र्' के बाद 'न्' है, और बीच में 'आ', 'म्' (पवर्ग), 'ए' (अट्) का व्यवधान है। अतः इस सूत्र से 'न्' को 'ण्' होकर ➔ रामेण सिद्ध हुआ।
३. चतुर्थी, पञ्चमी और षष्ठी (विशेष आदेश)
रामाय (चतुर्थी एकवचन)
१. राम + ङे।
२. 'ङेर्यः' (७.१.१३): अकारान्त शब्द से परे 'ङे' के स्थान पर 'य' आदेश होता है ➔ राम + य।
३. 'सुपि च' (७.३.१०२): यञ् प्रत्याहार वाला सुप् प्रत्यय बाद में हो तो अकारान्त अङ्ग को दीर्घ (आ) हो जाता है। अतः राम ➔ रामा होकर ➔ रामाय बना।
२. 'ङेर्यः' (७.१.१३): अकारान्त शब्द से परे 'ङे' के स्थान पर 'य' आदेश होता है ➔ राम + य।
३. 'सुपि च' (७.३.१०२): यञ् प्रत्याहार वाला सुप् प्रत्यय बाद में हो तो अकारान्त अङ्ग को दीर्घ (आ) हो जाता है। अतः राम ➔ रामा होकर ➔ रामाय बना।
रामात् (पञ्चमी एकवचन) / रामस्य (षष्ठी एकवचन)
१. राम + ङसि (पञ्चमी) / राम + ङस् (षष्ठी)।
२. सूत्र 'टाङसिङसामिनाथ्याः' से ङसि को 'आत्' और ङस् को 'स्य' आदेश होता है।
३. सवर्ण दीर्घ होकर ➔ रामात्। और सीधे जुड़कर ➔ रामस्य।
२. सूत्र 'टाङसिङसामिनाथ्याः' से ङसि को 'आत्' और ङस् को 'स्य' आदेश होता है।
३. सवर्ण दीर्घ होकर ➔ रामात्। और सीधे जुड़कर ➔ रामस्य।
४. सप्तमी विभक्ति: 'रामेषु' (षत्व विधान)
रामे (एकवचन)
१. राम + ङि। 'ङि' में केवल 'इ' शेष बचता है ➔ राम + इ।
२. 'आद्गुणः' से अ + इ = ए होकर ➔ रामे।
२. 'आद्गुणः' से अ + इ = ए होकर ➔ रामे।
रामेषु (बहुवचन) - V.V.Imp
१. राम + सुप्। 'सुप्' में 'सु' शेष बचता है ➔ राम + सु।
२. 'बहुवचने झल्येत्' (७.३.१०३): झलादि बहुवचन प्रत्यय (सु) बाद में हो तो अकारान्त अङ्ग के 'अ' को 'ए' हो जाता है ➔ रामे + सु।
३. 'आदेशप्रत्यययोः' (८.३.५९): इण् (अ/आ को छोड़कर स्वर) या कवर्ग से परे प्रत्यय के 'स्' को मूर्धन्य 'ष्' हो जाता है। यहाँ 'ए' के बाद 'सु' है, अतः 'स्' को 'ष्' होकर ➔ रामेषु बना।
२. 'बहुवचने झल्येत्' (७.३.१०३): झलादि बहुवचन प्रत्यय (सु) बाद में हो तो अकारान्त अङ्ग के 'अ' को 'ए' हो जाता है ➔ रामे + सु।
३. 'आदेशप्रत्यययोः' (८.३.५९): इण् (अ/आ को छोड़कर स्वर) या कवर्ग से परे प्रत्यय के 'स्' को मूर्धन्य 'ष्' हो जाता है। यहाँ 'ए' के बाद 'सु' है, अतः 'स्' को 'ष्' होकर ➔ रामेषु बना।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Quick Revision):
- रामेण: 'टाङसि...' से 'इन्' आदेश, और अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से 'न्' को 'ण्'।
- रामाय: 'ङेर्यः' से 'य' आदेश, और सुपि च से 'राम' को दीर्घ 'रामा'।
- रामेषु: 'बहुवचने झल्येत्' से 'ए' की मात्रा, और आदेशप्रत्यययोः से 'स्' को 'ष्'।
- रामौ: 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' को रोककर नादिचि के बाद 'वृद्धिरेचि' से वृद्धि।
