३. शब्दरूप (सुबन्त) एवं धातुरूप (तिङन्त) प्रकरण
संस्कृत व्याकरण की आधारशिला: शब्दों और धातुओं के निर्माण (सिद्धि) की वैज्ञानिक पाणिनीय प्रक्रिया, प्रत्यय और सूत्र।
१. सुबन्त प्रकरण (शब्दरूप / Declensions)
मूल शब्दों (प्रातिपदिकों - जैसे राम, हरि, लता) को वाक्य में प्रयोग करने योग्य (पद) बनाने के लिए उनके अन्त में जो २१ प्रत्यय लगाए जाते हैं, उन्हें 'सुप्' (SuP) प्रत्यय कहते हैं।
२१ सुप् प्रत्यय विधायक सूत्र (४.१.२):
द्वितीया: अम्, औट्, शस्
तृतीया: टा, भ्याम्, भिस्
चतुर्थी: ङे, भ्याम्, भ्यस्
पञ्चमी: ङसि, भ्याम्, भ्यस्
षष्ठी: ङस्, ओस्, आम्
सप्तमी: ङि, ओस्, सुप्
छात्र 'रामः' कैसे रटते हैं, और सूत्र से कैसे बनता है?
१. प्रातिपदिक: राम
२. प्रथमा एकवचन का प्रत्यय आया: सु (राम + सु)
३. 'सु' के 'उ' की इत् संज्ञा होकर लोप हुआ: राम + स्
४. 'ससजुषो रुः' से 'स्' का 'रु' (र्) हुआ: राम + र्
५. 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' से 'र्' का विसर्ग (:) हुआ: रामः।
२. तिङन्त प्रकरण (धातुरूप / Conjugations)
धातुओं (Roots - जैसे भू, पठ्, गम्) से क्रिया (Verb) बनाने के लिए जो १८ प्रत्यय लगाए जाते हैं, उन्हें 'तिङ्' (TiN) प्रत्यय कहते हैं। ये प्रत्यय १० लकारों (Tenses/Moods) में प्रयुक्त होते हैं।
१८ तिङ् प्रत्यय विधायक सूत्र (३.४.७८):
१. धातु: भू (सत्तायाम्)
२. लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन का प्रत्यय: तिप् (भू + तिप्)
३. 'तिप्' के 'प्' की इत् संज्ञा होकर लोप हुआ: भू + ति
४. 'कर्तरि शप्' से बीच में 'शप्' (अ) का आगम: भू + अ + ति
५. 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' से भू के ऊ को 'ओ' (गुण): भो + अ + ति
६. 'एचोऽयवायावः' (अयादि सन्धि) से 'ओ' का 'अव्': भ् + अव् + अ + ति = भवति।
इस प्रकरण में हम रटने की प्रवृत्ति को छोड़कर, पाणिनीय सूत्रों की शल्य-चिकित्सा (Surgical precision) से एक-एक शब्द सिद्ध करेंगे। आगे हम अजन्त पुँल्लिंग (राम, हरि, भानु), हलन्त (राजन्, गच्छत्), और धातुओं में भ्वादि गण (भू, एध्) की सम्पूर्ण रूप-सिद्धियाँ सूत्रों सहित पढ़ेंगे, जो TGT/PGT में सर्वाधिक पूछी जाती हैं।
