शब्दरूप (सुबन्त) एवं धातुरूप (तिङन्त) प्रकरण | subant tingant

Sooraj Krishna Shastri
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३. शब्दरूप (सुबन्त) एवं धातुरूप (तिङन्त) प्रकरण

संस्कृत व्याकरण की आधारशिला: शब्दों और धातुओं के निर्माण (सिद्धि) की वैज्ञानिक पाणिनीय प्रक्रिया, प्रत्यय और सूत्र।

परिचय: महर्षि पाणिनि का प्रसिद्ध नियम है — "सुप्तिङन्तं पदम्" (सुबन्त और तिङन्त ही पद कहलाते हैं, और बिना पद बनाए वाक्य में प्रयोग वर्जित है)। सुबन्त अर्थात् शब्दरूप (संज्ञा, सर्वनाम आदि) और तिङन्त अर्थात् धातुरूप (क्रिया)। आइए इन दोनों के मूल रहस्य को समझें।

१. सुबन्त प्रकरण (शब्दरूप / Declensions)

मूल शब्दों (प्रातिपदिकों - जैसे राम, हरि, लता) को वाक्य में प्रयोग करने योग्य (पद) बनाने के लिए उनके अन्त में जो २१ प्रत्यय लगाए जाते हैं, उन्हें 'सुप्' (SuP) प्रत्यय कहते हैं।

२१ सुप् प्रत्यय विधायक सूत्र (४.१.२):

स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् ॥
२१ प्रत्ययों का विभाजन (७ विभक्तियाँ × ३ वचन):
प्रथमा: सु, औ, जस्
द्वितीया: अम्, औट्, शस्
तृतीया: टा, भ्याम्, भिस्
चतुर्थी: ङे, भ्याम्, भ्यस्
पञ्चमी: ङसि, भ्याम्, भ्यस्
षष्ठी: ङस्, ओस्, आम्
सप्तमी: ङि, ओस्, सुप्
सिद्धि प्रक्रिया की एक झलक (TGT/PGT Special):
छात्र 'रामः' कैसे रटते हैं, और सूत्र से कैसे बनता है?
१. प्रातिपदिक: राम
२. प्रथमा एकवचन का प्रत्यय आया: सु (राम + सु)
३. 'सु' के 'उ' की इत् संज्ञा होकर लोप हुआ: राम + स्
४. 'ससजुषो रुः' से 'स्' का 'रु' (र्) हुआ: राम + र्
५. 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' से 'र्' का विसर्ग (:) हुआ: रामः

२. तिङन्त प्रकरण (धातुरूप / Conjugations)

धातुओं (Roots - जैसे भू, पठ्, गम्) से क्रिया (Verb) बनाने के लिए जो १८ प्रत्यय लगाए जाते हैं, उन्हें 'तिङ्' (TiN) प्रत्यय कहते हैं। ये प्रत्यय १० लकारों (Tenses/Moods) में प्रयुक्त होते हैं।

१८ तिङ् प्रत्यय विधायक सूत्र (३.४.७८):

तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् ॥
प्रत्ययों का विभाजन (परस्मैपदी और आत्मनेपदी):
परस्मैपदी (९ प्रत्यय):
तिप् तस् झि सिप् थस् मिप् वस् मस्
आत्मनेपदी (९ प्रत्यय):
आताम् थास् आथाम् ध्वम् इड् वहि महिङ्
सिद्धि प्रक्रिया की एक झलक (भवति कैसे बनता है?):
१. धातु: भू (सत्तायाम्)
२. लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन का प्रत्यय: तिप् (भू + तिप्)
३. 'तिप्' के 'प्' की इत् संज्ञा होकर लोप हुआ: भू + ति
४. 'कर्तरि शप्' से बीच में 'शप्' (अ) का आगम: भू + अ + ति
५. 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' से भू के ऊ को 'ओ' (गुण): भो + अ + ति
६. 'एचोऽयवायावः' (अयादि सन्धि) से 'ओ' का 'अव्': भ् + अव् + अ + ति = भवति
🌺 आगामी अध्याय योजना:

इस प्रकरण में हम रटने की प्रवृत्ति को छोड़कर, पाणिनीय सूत्रों की शल्य-चिकित्सा (Surgical precision) से एक-एक शब्द सिद्ध करेंगे। आगे हम अजन्त पुँल्लिंग (राम, हरि, भानु), हलन्त (राजन्, गच्छत्), और धातुओं में भ्वादि गण (भू, एध्) की सम्पूर्ण रूप-सिद्धियाँ सूत्रों सहित पढ़ेंगे, जो TGT/PGT में सर्वाधिक पूछी जाती हैं।

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