द्विगु समास (Dvigu Samas) – परिभाषा, सूत्र, भेद एवं विस्तृत उदाहरण
संख्यापूर्वो द्विगुः (२.१.५२)
संस्कृत व्याकरण में 'द्विगु समास' वास्तव में कर्मधारय (तत्पुरुष) समास का ही एक उपभेद है। जब कर्मधारय समास का पूर्वपद (पहला शब्द) संख्यावाचक हो और उत्तरपद संज्ञा हो, तो उसे द्विगु समास कहते हैं।
१. मुख्य विधान एवं सूत्र
मुख्य सूत्र: तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च (२.१.५१)
अर्थ: दिशावाचक और संख्यावाचक शब्दों का समान-अधिकरण (समान विभक्ति वाले) सुबन्त के साथ समास होता है, यदि (१) तद्धित प्रत्यय का विषय हो, (२) उत्तरपद आगे हो, या (३) समाहार (समूह) अर्थ प्रतीत हो रहा हो।
अर्थ: दिशावाचक और संख्यावाचक शब्दों का समान-अधिकरण (समान विभक्ति वाले) सुबन्त के साथ समास होता है, यदि (१) तद्धित प्रत्यय का विषय हो, (२) उत्तरपद आगे हो, या (३) समाहार (समूह) अर्थ प्रतीत हो रहा हो।
इसी सूत्र के आधार पर पाणिनि जी ने अगले सूत्र "संख्यापूर्वो द्विगुः (२.१.५२)" से यह स्पष्ट किया कि उपर्युक्त तीन स्थितियों (तद्धितार्थ, उत्तरपद, समाहार) में बनने वाले संख्यापूर्व समास का नाम 'द्विगु' होगा।
२. द्विगु समास के तीन प्रमुख भेद
पाणिनीय व्याकरण के अनुसार द्विगु समास के तीन भेद होते हैं:
| भेद का नाम | परिभाषा/स्थिति | उदाहरण एवं विग्रह |
|---|---|---|
| १. तद्धितार्थ द्विगु | जब संख्यावाचक शब्द का किसी तद्धित प्रत्यय के अर्थ को प्रकट करने के लिए समास होता है। | षण्णां मातॄणाम् अपत्यं पुमान् = षाण्मातुरः (कार्तिकेय) |
| २. उत्तरपद द्विगु | जब समास में किसी अन्य पद (उत्तरपद) के कारण संख्यावाचक शब्द का समास होता है। | पञ्च गावो धनं यस्य सः = पञ्चगवधनः (जिसका धन पाँच गाएं हैं) |
| ३. समाहार द्विगु | जब संख्यावाचक शब्द का समास 'समूह' (Collection) का बोध कराने के लिए होता है। (परीक्षाओं में सर्वाधिक यही पूछा जाता है।) | त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रिलोकी (तीन लोकों का समूह) |
३. समाहार द्विगु के विशेष लिंग-नियम (V.V.Imp for PGT/TGT)
समाहार (समूह) अर्थ में बनने वाले द्विगु समास के लिंग निर्धारण के लिए अष्टाध्यायी में विशेष सूत्र दिए गए हैं:
- सूत्र - द्विगुरेकवचनम् (२.४.१): समाहार द्विगु समास सदैव एकवचन में ही प्रयुक्त होता है, क्योंकि समूह एक ही होता है (चाहे उसमें कितनी भी वस्तुएँ हों)।
- सूत्र - स नपुंसकम् (२.४.१७): समाहार द्विगु समास सामान्यतः नपुंसकलिंग में होता है। (जैसे- पञ्चपात्रम्, त्रिभुवनम्)
- स्त्रीलिंग का विशेष नियम: वार्तिक "अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः" के अनुसार यदि द्विगु समास का अन्तिम शब्द अकारान्त (जिसके अन्त में 'अ' हो) है, तो वह नपुंसकलिंग न होकर स्त्रीलिंग हो जाता है और उसमें 'ङीप्' (ई) प्रत्यय लग जाता है। (यही कारण है कि पञ्चवटम् नहीं, पञ्चवटी बनता है।)
अपवाद (Exception): यदि अकारान्त शब्द के अन्त में 'पात्र', 'भुवन' या 'युग' आदि शब्द हों, तो वे नपुंसकलिंग ही रहते हैं (जैसे- पञ्चपात्रम्, त्रिभुवनम्, चतुर्युगम्)।
४. द्विगु समास की विस्तृत उदाहरणावली
नीचे दी गई तालिका में प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले द्विगु समास के महत्वपूर्ण उदाहरण दिए गए हैं:
| क्र० | समस्त पद (Sanskrit) | समास विग्रह (Vigraha) | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|
| १ | पञ्चवटी | पञ्चानां वटानां समाहारः | पाँच वट वृक्षों का समूह |
| २ | त्रिलोकी | त्रयाणां लोकानां समाहारः | तीनों लोकों का समूह |
| ३ | त्रिभुवनम् | त्रयाणां भुवनानां समाहारः | तीन भुवनों का समूह |
| ४ | अष्टाध्यायी | अष्टानाम् अध्यायानां समाहारः | आठ अध्यायों का समूह |
| ५ | पञ्चपात्रम् | पञ्चानां पात्राणां समाहारः | पाँच पात्रों (बर्तनों) का समूह |
| ६ | चतुर्युगम् | चतुर्णां युगानां समाहारः | चार युगों का समूह |
| ७ | सप्ताहः | सप्तानाम् अह्नां समाहारः | सात दिनों का समूह |
| ८ | शताब्दी | शतानाम् अब्दानां समाहारः | सौ वर्षों का समूह |
| ९ | पञ्चगवम् | पञ्चानां गवां समाहारः | पाँच गायों का समूह |
| १० | पञ्चामृतम् | पञ्चानाम् अमृतानां समाहारः | पाँच अमृत्-तुल्य द्रव्यों का समूह |
| ११ | चतुष्पथम् | चतुर्णां पथानां समाहारः | चार रास्तों का समूह (चौराहा) |
| १२ | त्रिरात्रम् | तिसृणां रात्रीणां समाहारः | तीन रातों का समूह |
| १३ | पञ्चतन्त्रम् | पञ्चानां तन्त्राणां समाहारः | पाँच तंत्रों (नीतियों) का समूह |
| १४ | नवरात्रम् | नवानां रात्रीणां समाहारः | नौ रातों का समूह |
| १५ | पञ्चमूलम् | पञ्चानां मूलानां समाहारः | पाँच मूलों (जड़ों) का समूह |
⚠️ एक विशेष ध्यान देने योग्य बात:
यदि किसी नदी के नाम के पहले संख्यावाची शब्द आ जाए (जैसे- पञ्चगङ्गम्, द्वियमुनम्), तो वहाँ 'द्विगु' समास नहीं होता, बल्कि 'नदीभिश्च (२.१.२०)' सूत्र से वहाँ अव्ययीभाव समास माना जाता है। परीक्षाओं में छात्र अक्सर इसमें गलती कर बैठते हैं!
॥ इति द्विगु-समास-प्रकरणम् सम्पूर्णम् ॥
