प्रमुख हलन्त पुँल्लिंग: राजन्, गच्छत्, विद्वस् एवं भगवत्
संस्कृत व्याकरण के चार सर्वाधिक रहस्यमयी हलन्त शब्दरूपों की तालिका। लाल रंग में अंकित रूप प्रतियोगी परीक्षाओं (विशेषकर द्वितीया बहुवचन के परिवर्तन) हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
१. राजन् (नकारान्त पुँल्लिंग - राजा) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | राजा | राजानौ | राजानः |
| द्वितीया | राजानम् | राजानौ | राज्ञः |
| तृतीया | राज्ञा | राजभ्याम् | राजभिः |
| चतुर्थी | राज्ञे | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| पञ्चमी | राज्ञः | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| षष्ठी | राज्ञः | राज्ञोः | राज्ञाम् |
| सप्तमी | राज्ञि / राजनि | राज्ञोः | राजसु |
| सम्बोधन | हे राजन्! | हे राजानौ! | हे राजानः! |
💡 विशेष (राजन्): द्वितीया बहुवचन में रूप अचानक सिकुड़कर 'राज्ञः' (ज् + ञ्) हो जाता है। सप्तमी एकवचन में दो रूप (राज्ञि और राजनि) बनते हैं। सम्बोधन एकवचन में 'हे राजन्!' बनता है ('हे राजा' नहीं)।
२. गच्छत् (तकारान्त पुँल्लिंग - जाता हुआ) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | गच्छन् | गच्छन्तौ | गच्छन्तः |
| द्वितीया | गच्छन्तम् | गच्छन्तौ | गच्छतः |
| तृतीया | गच्छता | गच्छद्भ्याम् | गच्छद्भिः |
| चतुर्थी | गच्छते | गच्छद्भ्याम् | गच्छद्भ्यः |
| पञ्चमी | गच्छतः | गच्छद्भ्याम् | गच्छद्भ्यः |
| षष्ठी | गच्छतः | गच्छतोः | गच्छताम् |
| सप्तमी | गच्छति | गच्छतोः | गच्छत्सु |
| सम्बोधन | हे गच्छन्! | हे गच्छन्तौ! | हे गच्छन्तः! |
💡 विशेष (शतृ प्रत्ययान्त): 'गच्छत्' शब्द गम् धातु में 'शतृ' प्रत्यय लगने से बनता है। ध्यान दें कि इसका प्रथमा एकवचन 'गच्छन्' (ह्रस्व) बनता है (गच्छान् नहीं)। पठन, लिखन्, हसन्, पश्यन् आदि सभी शतृ प्रत्ययान्त शब्द इसी प्रकार चलेंगे।
३. विद्वस् (सकारान्त पुँल्लिंग - विद्वान) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विद्वान् | विद्वांसौ | विद्वांसः |
| द्वितीया | विद्वांसम् | विद्वांसौ | विदुषः |
| तृतीया | विदुषा | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भिः |
| चतुर्थी | विदुषे | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| पञ्चमी | विदुषः | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| षष्ठी | विदुषः | विदुषोः | विदुषाम् |
| सप्तमी | विदुषि | विदुषोः | विद्वत्सु |
| सम्बोधन | हे विद्वन्! | हे विद्वांसौ! | हे विद्वांसः! |
💡 विशेष (विद्वस् - V.V.Imp): द्वितीया बहुवचन में आकर 'विद्वांसौ' अचानक 'विदुषः' बन जाता है (सम्प्रसारण नियम के कारण व का उ और स का ष हो जाता है)। तृतीया द्विवचन में 'विद्वद्भ्याम्' (जश्त्व सन्धि) और सप्तमी बहुवचन में 'विद्वत्सु' (चर्त्व सन्धि) भी विशेष ध्यान देने योग्य हैं।
४. भगवत् (तकारान्त पुँल्लिंग - भगवान्/ऐश्वर्यवान्) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | भगवान् | भगवन्तौ | भगवन्तः |
| द्वितीया | भगवन्तम् | भगवन्तौ | भगवतः |
| तृतीया | भगवता | भगवद्भ्याम् | भगवद्भिः |
| चतुर्थी | भगवते | भगवद्भ्याम् | भगवद्भ्यः |
| पञ्चमी | भगवतः | भगवद्भ्याम् | भगवद्भ्यः |
| षष्ठी | भगवतः | भगवतोः | भगवताम् |
| सप्तमी | भगवति | भगवतोः | भगवत्सु |
| सम्बोधन | हे भगवन्! | हे भगवन्तौ! | हे भगवन्तः! |
💡 विशेष (मतुप् प्रत्ययान्त): 'गच्छत्' और 'भगवत्' दोनों तकारान्त हैं, किन्तु 'गच्छत्' में शतृ प्रत्यय है और 'भगवत्' में 'मतुप्' (वतुप्) प्रत्यय है। इसी कारण गच्छत् का प्रथमा एकवचन 'गच्छन्' (ह्रस्व) बनता है, जबकि भगवत् का 'भगवान्' (दीर्घ) बनता है। श्रीमान्, धीमान्, रूपवान्, बलवान् आदि इसी प्रकार चलेंगे।
