परस्मैपदी धातु: पाणिनीय सूत्र एवं प्रक्रिया | parasmaipadi dhatu

Sooraj Krishna Shastri
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परस्मैपदी धातु: पाणिनीय सूत्र एवं प्रक्रिया

धातुओं में 'तिप्', 'तस्', 'झि' लगने का विज्ञान। लोट् और लिट् लकारों में प्रत्यय कैसे रूप बदलते हैं? TGT/PGT हेतु सम्पूर्ण शल्य-चिकित्सा (Surgical Analysis)।

परस्मैपद का अर्थ: 'परस्मै' अर्थात् दूसरों के लिए। पाणिनि मुनि के अनुसार जब क्रिया का फल (Result of action) कर्ता (करने वाले) को न मिलकर किसी अन्य को (कर्म आदि को) प्राप्त हो, तो वहाँ परस्मैपदी प्रत्ययों का प्रयोग होता है।

१. परस्मैपदी विधायक मुख्य सूत्र

सूत्र: शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् (१.३.७८)

अर्थ: आत्मनेपद के नियमों (अनुदात्तङित आत्मनेपदम् आदि) से जो धातुएँ 'शेष' (बच गई) रह जाती हैं, उनमें कर्ता अर्थ (Active Voice) में 'परस्मैपद' प्रत्यय (तिप्, तस्, झि आदि ९ प्रत्यय) लगते हैं。
(उदा: पठ्, गम्, पा, भू आदि धातुएँ अनुदात्त या ङित् नहीं हैं, अतः ये 'शेष' होने के कारण परस्मैपदी हैं।)

२. ९ परस्मैपदी प्रत्यय और उनका शेष भाग

'तिप्तस्झि...' सूत्र में जो ९ प्रत्यय गिनाए गए हैं, वे अपने मूल रूप में नहीं जुड़ते। पाणिनीय व्याकरण में 'इत् संज्ञा' (अनुबन्ध लोप) होकर उनका शुद्ध रूप बचता है:

मूल प्रत्यय इत् संज्ञा (लोप) का सूत्र क्या शेष बचा?
तिप्'हलन्त्यम्' से 'प्' का लोपति
तस्(सकार का रुत्व-विसर्ग)तः
झि'झोऽन्तः' से झ् को 'अन्त्'अन्ति
सिप्'हलन्त्यम्' से 'प्' का लोपसि
थस्(सकार का रुत्व-विसर्ग)थः
(कोई लोप नहीं)
मिप्'हलन्त्यम्' से 'प्' का लोपमि
वस्(सकार का रुत्व-विसर्ग)वः
मस्(सकार का रुत्व-विसर्ग)मः

३. विशेष लकारों में प्रत्यय-परिवर्तन (TGT/PGT Special)

लट्‍ (वर्तमान) और लृट् (भविष्यत्) में तो सीधे 'ति, तः, अन्ति' लग जाते हैं। परन्तु लोट् (आज्ञा) और लिट् (परोक्ष भूतकाल) में ये प्रत्यय अपना रूप बदल लेते हैं। यही परीक्षाओं में सर्वाधिक पूछा जाता है:

(क) लोट् लकार का परिवर्तन: 'भवतु' कैसे बना?

सूत्र: एरुः (३.४.८६)
प्रक्रिया: लोट् लकार में जो इकार (इ) है, उसे 'उकार' (उ) हो जाता है।
सिद्धान्त: भू + शप् + तिप् ➔ भव + ति ➔ 'एरुः' सूत्र से 'ति' के 'इ' को 'उ' हुआ ➔ भवतु

(ख) लिट् लकार का महा-परिवर्तन: 'बभूव' कैसे बना?

सूत्र: परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः (३.४.८२)
प्रक्रिया: यह सूत्र लिट् लकार के पूरे ढाँचे को बदल देता है। यह कहता है कि लिट् लकार में परस्मैपदी ९ प्रत्ययों (तिप्, तस्, झि...) के स्थान पर क्रमशः णल्, अतुस्, उस्, थल्, अथुस्, अ, णल्, व्, म् आदेश हो जाते हैं।

णल् (अ) का चमत्कार: प्रथम पुरुष एकवचन में 'तिप्' की जगह 'णल्' आता है। 'णल्' में ण और ल की इत् संज्ञा होकर केवल 'अ' बचता है।
सिद्धान्त: भू + लिट् ➔ धातु को द्वित्व (बभू) ➔ बभू + तिप् ➔ बभू + णल् ➔ बभू + अ ➔ (वृद्धि और उवङ् आदेश) ➔ बभूव

४. 'पठति' की सम्पूर्ण पाणिनीय सिद्धि

१.
पठँ व्यक्तायां वाचि: धातुपाठ से 'पठ्' धातु ली गई।
२.
वर्तमाने लट् (३.२.१२३): वर्तमान काल की विवक्षा में 'पठ्' से 'लट्' प्रत्यय आया ➔ पठ् + लट्
३.
शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्: 'पठ्' धातु अनुदात्त या ङित् नहीं है, अतः यह परस्मैपदी है।
४.
तिप्तस्झिसिप्थस्थ...: प्रथम पुरुष एकवचन में लट् के स्थान पर 'तिप्' आदेश हुआ ➔ पठ् + तिप्। (हलन्त्यम् से प् का लोप ➔ ति)।
५.
कर्तरि शप् (३.१.६८): कर्तृवाच्य में सार्वधातुक प्रत्यय (ति) परे होने के कारण धातु और प्रत्यय के बीच में 'शप्' (अ) विकरण आया ➔ पठ् + अ + ति = पठति
॥ इति 'पठति' रूपं सिद्धम् ॥

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