Class 9 Sanskrit Chapter 9 Rituh Vasantah | हिन्दी अनुवाद एवं प्रश्नोत्तर (इरावती)

Sooraj Krishna Shastri
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ऋतुः वसन्तः

(नवमः पाठः) — इरावती (कक्षा ९)
  • १. पाठ-परिचयः एवं सारः (वसन्त ऋतु - 'ऋतुराज' का प्राकृतिक सौन्दर्य)
  • २. मूल-पाठः एवं हिन्दी अनुवादः (पैराग्राफ अनुसार)
  • ३. शब्द-कोषः (संस्कृत, हिन्दी एवं English शब्दार्थ)
  • ४. व्याकरण-बोधः (अव्यय-पद-परिभाषा एवं सन्धिः)
  • ५. अभ्यास-कार्यम् (एकपदेन उत्तरत, अव्ययपदानि, सत्यम्/असत्यम्, सन्धिः)

पाठ-परिचयः एवं सारः

हिन्दी सार: भारतवर्ष ऋतुओं की रमणीयता एवं वैविध्य का अनुपम भंडार है। यहाँ वर्ष को छः ऋतुओं—वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत तथा शिशिर में विभाजित किया गया है। इनमें वसंत ऋतु अपनी अनुपम छटा, नवजीवन-संचारिणी शक्ति तथा सर्वत्र व्याप्त उल्लास के कारण 'ऋतुराज' के रूप में प्रतिष्ठित है। प्रस्तुत पाठ में वसंत के आगमन से प्रकृति में व्याप्त होने वाले नवसौन्दर्य, पुष्पों की सुरभि, पक्षियों के मधुर कलरव तथा समस्त चराचर जगत में उमंग भरने वाले हर्ष और चेतना का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है।
English Summary: India is a land blessed with an extraordinary richness and diversity of seasons. Traditionally, the year is divided into six seasons—Spring (Vasant), Summer, Monsoon, Autumn, Pre-winter and Winter. Among them, Spring holds a place of special honor as the "King of Seasons" because of its enchanting beauty and life-renewing energy. This lesson vividly portrays the arrival of Spring, blooming flowers, melodious birdsongs, and the enchanting transformation in nature.

मूल-पाठः सानुवादः (भाग १)

[१] स्वागतं ते ऋतुराज ! त्वमेव कुसुमाकरः। तवागमने भवति पुष्पाणां विकासः, सौरभाणां च प्रसारः। अतः तव आगमनं सर्वान् जनान् आनन्दयति, निखिलान् प्राणिनः प्रीणयति, चराचरं च रमयति। इदानीं जडता विलीयते, मलिनता अपगता भवति, स्वच्छता एव दृश्यते परितः।
हिन्दी अनुवाद: हे ऋतुराज! आपका स्वागत है। आप ही फूलों का भंडार (वसंत) हैं। आपके आगमन से फूलों का विकास होता है और सुगंध का प्रसार होता है। इसलिए आपका आगमन सभी लोगों को आनंदित करता है, समस्त प्राणियों को प्रसन्न करता है और चराचर जगत को रमाता है। इस समय (सर्दियों की) जड़ता/ठिठुरन मिट जाती है, मलिनता दूर हो जाती है और चारों ओर स्वच्छता ही दिखाई देती है।
[२] पश्यतु मनाक् निर्मलम् आकाशम्। स्वच्छाः दिशः प्रसन्ना इव भान्ति अद्य। सर्वत्र तडागेषु नदीषु कुल्यासु सरःसु च राजते विमलं वारि। क्वचित् मुकुलितानि अपरत्र प्रफुल्लितानि कमलवनानि। विकसितानां पङ्कजानां शोभा कस्य मनो न हरति !
हिन्दी अनुवाद: ज़रा निर्मल आकाश को देखिए। आज स्वच्छ दिशाएँ मानो प्रसन्न दिखाई दे रही हैं। सब जगह तालाबों में, नदियों में, नहरों में और झीलों में स्वच्छ जल सुशोभित हो रहा है। कहीं अधखिले (कलियाँ) और कहीं पूर्ण विकसित (खिले हुए) कमलों के वन हैं। खिले हुए कमलों की शोभा किसके मन को नहीं हर लेती!

मूल-पाठः सानुवादः (भाग २)

[३] वनेषु, वाटिकासु, उद्यानेषु च नानावर्णानि पुष्पाणि शोभन्ते। पुष्पाणामुपरि गुञ्जन्ति भ्रमराः। ते च प्रियाभिः सह सानन्दं मधूनि पिबन्ति, मधुना मत्तः पिको मधुरं कूजति, तदीयं ध्वनिं बालकाः अनुकुर्वन्ति। वृक्षेषु नवपल्लवाः विराजन्ते। आम्रेषु मञ्जर्यः संलग्नाः। कुसुमितं सहकारमाश्रित्य लता प्रमुदिता। रसाले संगता लता लोकानां मनांसि हरति। पक्षिणां कलकूजनमपि सर्वेषां सुखदं भवति।
हिन्दी अनुवाद: वनों में, बगीचों में और उद्यानों में अनेक रंगों के फूल सुशोभित हो रहे हैं। फूलों के ऊपर भौंरे गुंजन कर रहे हैं। वे अपनी प्रेयसियों के साथ आनंदपूर्वक मकरंद (रस) पीते हैं, मकरंद से मस्त हुई कोयल मधुर बोलती है, और उसकी ध्वनि का बच्चे अनुकरण करते हैं। वृक्षों पर नए पत्ते सुशोभित हैं। आम के वृक्षों पर मंजरियाँ लगी हुई हैं। फूलों से लदे आम के पेड़ का सहारा लेकर लता प्रसन्न है। आम के पेड़ से लिपटी लता लोगों के मन को मोह लेती है। पक्षियों की मधुर चहचहाहट भी सभी को सुख देने वाली होती है।
[४] अद्यत्वे मधुनः आधिक्यम्; पुष्पेषु मधूनि भवन्ति, मञ्जरीषु च भवन्ति मधूनि। मधुने लोलुपाः चञ्चरीकाः यदा प्रमादं कुर्वन्ति तदा तेषां पक्षाः संसक्ता भवन्ति, मधुना संश्लिष्टतया ते कदाचित् उड्डयितुं न पारयन्ति। तथापि मधुनि तादृशः स्वादः भवति येन ते ततो न विरमन्ति, अपि तु अनवरतं तत्र स्वानुरागं प्रकटयन्ति।
हिन्दी अनुवाद: इन दिनों शहद (रस) की अधिकता होती है; फूलों में रस होता है और मंजरियों में भी रस होता है। रस के लोभी भौंरे जब असावधानी करते हैं तब उनके पंख चिपक जाते हैं, रस से चिपक जाने के कारण वे कभी-कभी उड़ नहीं पाते। फिर भी रस में ऐसा स्वाद होता है जिससे वे उससे पीछे नहीं हटते, बल्कि निरंतर उसमें अपना प्रेम प्रकट करते हैं।
[५] सर्षपः पीतं वसनं दधानः प्रकटयति वासन्तिकं विलासम्। पुष्पेभ्यः सौरभं, वारिभ्यः शीतलतां चादाय प्रवाति मन्दः पवनः। पवनेन आन्दोलिता मन्दं मन्दं कम्पमाना लता नर्तकीव नृत्यन्ती प्रतीयते। अस्मिन् समये प्रमुदिताः सर्वे जनाः समूहं रचयित्वा प्रकृतिशोभां पश्यन्तः भ्रमन्ति। उद्यानेषु, वाटिकासु, नदीतटेषु च क्वचित् गायन्ति लोकाः। अपरत्र नृत्यन्ति कूर्दन्ति च बालकाः। न केवलं मानवाः एव अपि तु पशवः पक्षिणः चापि प्रमुदिताः भवन्ति वसन्ते।
हिन्दी अनुवाद: पीले वस्त्र धारण किए हुए सरसों का खेत वसंत के सौंदर्य को प्रकट करता है। फूलों से सुगंध और जल से शीतलता लेकर मंद-मंद हवा बहती है। हवा से डगमगाती और धीरे-धीरे काँपती हुई लता नर्तकी के समान नाचती हुई प्रतीत होती है। इस समय प्रसन्नचित्त सभी लोग समूह बनाकर प्रकृति की शोभा देखते हुए घूमते हैं। उद्यानों, बगीचों और नदी के तटों पर कहीं लोग गाते हैं, तो कहीं बालक नाचते और कूदते हैं। वसंत में न केवल मनुष्य ही, बल्कि पशु-पक्षी भी अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

शब्द-कोषः (शब्दार्थाः)

संस्कृत शब्दः संस्कृत अर्थः हिन्दी अर्थः English
कुसुमाकरः वसन्तः ऋतुः फूलों का भण्डार, वसन्त ऋतु Wealth of flowers, Spring
प्रीणयति आनन्दयति प्रसन्न करता है Brings joy / Pleases
आश्रित्य अवलम्ब्य सहारा लेकर By taking support
जडता शैत्यम् / ठिठुरन सर्दी / आलस्य Cold season / Lethargy
विलीयते विलीनं भवति मिट जाती है / गायब होती है Has disappeared
परितः सर्वत्र / परितः चारों ओर All around
मनाक् किञ्चित् एव थोड़ा / ज़रा Slightly / A little
कुल्यासु लघुनदीषु नहरों में / छोटी नदियों में In the canals / rivulets
मुकुलितानि कलिकावस्थितानि अधखिले / कलियों के रूप में Budding / Unbloomed
पिकः कोकिलः कोयल Cuckoo
चञ्चरीकाः भ्रमराः भौंरे Bumblebees
प्रमादम् असावधानताम् असावधानी / भूल Carelessness / Negligence
पक्षाः पिच्छानि / पक्षाः पंख Wings / Feathers
संश्लिष्टतया संयुक्तया / चिपके होने से चिपके होने के कारण Due to sticking
वसनम् वस्त्रम् वस्त्र / कपड़े Clothes / Garment
आन्दोलिता कम्पिता / हिलती हुई हिलती हुई / डगमगाती Swaying / Moving
पश्यन्तः ईक्षमाणाः देखते हुए Seeing / Watching
प्रमुदिताः अतीव प्रसन्नाः अत्यंत प्रसन्न Extremely happy
सानन्दम् सहर्षम् आनंद सहित Joyfully
प्रवाति वहति बहती है (हवा) Flows / Blows
क्वचित् कस्मिंश्चित् स्थाने कहीं पर Somewhere

व्याकरण-बोधः (अव्ययपदानि)

अव्ययपदस्य परिभाषा

संस्कृतभाषायां कानिचन अपरिवर्तनीयानि पदानि भवन्ति येषां कस्यामपि विभक्तौ, वचने, लिङ्गे वा किमपि परिवर्तनं न भवति। एतादृशानि पदानि अव्ययानि कथ्यन्ते।

"सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु।
वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥"

पाठे प्रयुक्तानि प्रमुखाणि अव्ययपदानि

अद्य = आज | • इदानीम् = अब | • क्वचित् = कहीं | • अपरत्र = दूसरी जगह

एव = ही | • अपि = भी | • तथापि = फिर भी | • यदा-तदा = जब-तब

सह = साथ | • इव = जैसे/समान | • = और | • परितः = चारों ओर

अभ्यास-कार्यम् : एकपदेन उत्तरत

क. वसन्तस्य पर्यायवाचकः शब्दः कः ?
उत्तरः कुसुमाकरः (ऋतुराजः)
ख. वसन्ते आकाशः कीदृशो भवति ?
उत्तरः निर्मलः
ग. वसन्ते कः मधुरं कूजति ?
उत्तरः पिकः (कोकिलः)
घ. पिकस्य ध्वनिं के अनुकुर्वन्ति ?
उत्तरः बालकाः
ङ. कम्पमाना लता कीदृशी प्रतीयते ?
उत्तरः नर्तकीव

अभ्यास-कार्यम् : अव्ययपदैः रिक्तस्थानपूर्तिः

पट्टिकातः उचितम् अव्ययपदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत:

[सर्वत्र, तदा, इदानीम्, क्वचित्, एव, अद्यत्वे]

क. इदानीम् जडता विलीयते, मलीनता अपगता भवति।

ख. सर्वत्र तडागेषु नदीषु कुल्यासु सरःसु च राजते विमलं वारि।

ग. अद्यत्वे मधुनः आधिक्यम्; पुष्पेषु मधूनि भवन्ति।

घ. क्वचित् मुकुलितानि अपरत्र प्रफुल्लितानि कमलवनानि।

ङ. यदा प्रमादं कुर्वन्ति तदा तेषां पक्षाः संसक्ता भवन्ति।

अभ्यास-कार्यम् : सत्यम्/असत्यम् एवं सन्धि-विच्छेदः

१. सत्यम् / असत्यम् चिह्नितं कुरुत:

क. वसन्तः ऋतुराजः इति कथ्यते। → ( सत्यम् )

ख. वसन्तसमये आकाशः मलिनः दृश्यते। → ( असत्यम् )

ग. वनेषु वाटिकासु च नानावर्णानि पुष्पाणि शोभन्ते। → ( सत्यम् )

घ. केवलं मानवाः एव वसन्ते प्रमुदिताः भवन्ति। → ( असत्यम् )

ङ. विकसितानां पङ्कजानां शोभा कस्यापि मनः न हरति । → ( असत्यम् )

२. सन्धिं सन्धिविच्छेदं च कुरुत:

सु + आगतम् = स्वागतम्

तव + आगमनम् = तवागमने

नर्तकी + इव = नर्तकीव

पुष्पाणामुपरि = पुष्पाणाम् + उपरि

स्वानुरागम् = स्व + अनुरागम्

पाठस्य मुख्यसन्देशः

संदेशः — वसन्त ऋतुः प्रकृत्याः नवरूपस्य चेतनायाः च सन्देशवाहिका अस्ति। वसन्तस्य आगमनेन चराचरजगत् आनन्देन उल्लासेन च परिपूर्णं भवति।

(वसंत ऋतु प्रकृति के नए रूप और नई चेतना का संदेशवाहक है। वसंत के आगमन से संपूर्ण चराचर जगत आनंद और उल्लास से भर जाता है।)

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