ऋतुः वसन्तः
- १. पाठ-परिचयः एवं सारः (वसन्त ऋतु - 'ऋतुराज' का प्राकृतिक सौन्दर्य)
- २. मूल-पाठः एवं हिन्दी अनुवादः (पैराग्राफ अनुसार)
- ३. शब्द-कोषः (संस्कृत, हिन्दी एवं English शब्दार्थ)
- ४. व्याकरण-बोधः (अव्यय-पद-परिभाषा एवं सन्धिः)
- ५. अभ्यास-कार्यम् (एकपदेन उत्तरत, अव्ययपदानि, सत्यम्/असत्यम्, सन्धिः)
पाठ-परिचयः एवं सारः
मूल-पाठः सानुवादः (भाग १)
मूल-पाठः सानुवादः (भाग २)
शब्द-कोषः (शब्दार्थाः)
| संस्कृत शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी अर्थः | English |
|---|---|---|---|
| कुसुमाकरः | वसन्तः ऋतुः | फूलों का भण्डार, वसन्त ऋतु | Wealth of flowers, Spring |
| प्रीणयति | आनन्दयति | प्रसन्न करता है | Brings joy / Pleases |
| आश्रित्य | अवलम्ब्य | सहारा लेकर | By taking support |
| जडता | शैत्यम् / ठिठुरन | सर्दी / आलस्य | Cold season / Lethargy |
| विलीयते | विलीनं भवति | मिट जाती है / गायब होती है | Has disappeared |
| परितः | सर्वत्र / परितः | चारों ओर | All around |
| मनाक् | किञ्चित् एव | थोड़ा / ज़रा | Slightly / A little |
| कुल्यासु | लघुनदीषु | नहरों में / छोटी नदियों में | In the canals / rivulets |
| मुकुलितानि | कलिकावस्थितानि | अधखिले / कलियों के रूप में | Budding / Unbloomed |
| पिकः | कोकिलः | कोयल | Cuckoo |
| चञ्चरीकाः | भ्रमराः | भौंरे | Bumblebees |
| प्रमादम् | असावधानताम् | असावधानी / भूल | Carelessness / Negligence |
| पक्षाः | पिच्छानि / पक्षाः | पंख | Wings / Feathers |
| संश्लिष्टतया | संयुक्तया / चिपके होने से | चिपके होने के कारण | Due to sticking |
| वसनम् | वस्त्रम् | वस्त्र / कपड़े | Clothes / Garment |
| आन्दोलिता | कम्पिता / हिलती हुई | हिलती हुई / डगमगाती | Swaying / Moving |
| पश्यन्तः | ईक्षमाणाः | देखते हुए | Seeing / Watching |
| प्रमुदिताः | अतीव प्रसन्नाः | अत्यंत प्रसन्न | Extremely happy |
| सानन्दम् | सहर्षम् | आनंद सहित | Joyfully |
| प्रवाति | वहति | बहती है (हवा) | Flows / Blows |
| क्वचित् | कस्मिंश्चित् स्थाने | कहीं पर | Somewhere |
व्याकरण-बोधः (अव्ययपदानि)
✦ अव्ययपदस्य परिभाषा
संस्कृतभाषायां कानिचन अपरिवर्तनीयानि पदानि भवन्ति येषां कस्यामपि विभक्तौ, वचने, लिङ्गे वा किमपि परिवर्तनं न भवति। एतादृशानि पदानि अव्ययानि कथ्यन्ते।
"सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु।
वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥"
✦ पाठे प्रयुक्तानि प्रमुखाणि अव्ययपदानि
• अद्य = आज | • इदानीम् = अब | • क्वचित् = कहीं | • अपरत्र = दूसरी जगह
• एव = ही | • अपि = भी | • तथापि = फिर भी | • यदा-तदा = जब-तब
• सह = साथ | • इव = जैसे/समान | • च = और | • परितः = चारों ओर
अभ्यास-कार्यम् : एकपदेन उत्तरत
अभ्यास-कार्यम् : अव्ययपदैः रिक्तस्थानपूर्तिः
पट्टिकातः उचितम् अव्ययपदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत:
[सर्वत्र, तदा, इदानीम्, क्वचित्, एव, अद्यत्वे]
क. इदानीम् जडता विलीयते, मलीनता अपगता भवति।
ख. सर्वत्र तडागेषु नदीषु कुल्यासु सरःसु च राजते विमलं वारि।
ग. अद्यत्वे मधुनः आधिक्यम्; पुष्पेषु मधूनि भवन्ति।
घ. क्वचित् मुकुलितानि अपरत्र प्रफुल्लितानि कमलवनानि।
ङ. यदा प्रमादं कुर्वन्ति तदा तेषां पक्षाः संसक्ता भवन्ति।
अभ्यास-कार्यम् : सत्यम्/असत्यम् एवं सन्धि-विच्छेदः
१. सत्यम् / असत्यम् चिह्नितं कुरुत:
क. वसन्तः ऋतुराजः इति कथ्यते। → ( सत्यम् )
ख. वसन्तसमये आकाशः मलिनः दृश्यते। → ( असत्यम् )
ग. वनेषु वाटिकासु च नानावर्णानि पुष्पाणि शोभन्ते। → ( सत्यम् )
घ. केवलं मानवाः एव वसन्ते प्रमुदिताः भवन्ति। → ( असत्यम् )
ङ. विकसितानां पङ्कजानां शोभा कस्यापि मनः न हरति । → ( असत्यम् )
२. सन्धिं सन्धिविच्छेदं च कुरुत:
• सु + आगतम् = स्वागतम्
• तव + आगमनम् = तवागमने
• नर्तकी + इव = नर्तकीव
• पुष्पाणामुपरि = पुष्पाणाम् + उपरि
• स्वानुरागम् = स्व + अनुरागम्
पाठस्य मुख्यसन्देशः
(वसंत ऋतु प्रकृति के नए रूप और नई चेतना का संदेशवाहक है। वसंत के आगमन से संपूर्ण चराचर जगत आनंद और उल्लास से भर जाता है।)

