Govindam Aadi Purush Stotram with Hindi Meaning | गोविन्दमादिपुरुष स्तोत्रम्

Sooraj Krishna Shastri
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गोविन्दमादिपुरुषस्तोत्रम्

(श्री ब्रह्मसंहितान्तर्गतम्)

ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥ १॥ (१)
हिन्दी अर्थ:
श्रीकृष्ण ही परम ईश्वर हैं। उनका स्वरूप सत्, चित् और आनन्दमय है। वे सबके आदि हैं, उनका कोई आदि नहीं है (वे अनादि हैं), वे ही आदिपुरुष 'गोविन्द' हैं और समस्त कारणों के भी मूल कारण हैं।
चिन्तामणिप्रकरसद्मसु कल्पवृक्ष-
लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम् ।
लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २॥
हिन्दी अर्थ:
जो चिंतामणि रत्नों से निर्मित भवनों में निवास करते हैं, जो लाखों कल्पवृक्षों से घिरे हुए स्थानों में कामधेनु गायों का पालन करते हैं, और जिनकी सेवा लाखों लक्ष्मियाँ (गोपियाँ) अत्यंत आदर और प्रेम के साथ करती हैं, उन आदिपुरुष भगवान गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
वेणुं क्वणन्तमरविन्ददलायताक्षं
बर्हावतंसमसिताम्बुदसुन्दराङ्गम् ।
कन्दर्पकोटिकमनीयविशेषशोभं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ३॥
हिन्दी अर्थ:
जो मधुर स्वर में अपनी वंशी बजा रहे हैं, जिनके नेत्र खिले हुए कमल के पत्तों के समान विशाल हैं, जिनके मस्तक पर मोर पंख सुशोभित है, जिनका शरीर सजल श्याम मेघ के समान सुन्दर है और जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक मनमोहक है, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
आलोलचन्द्रकलसद्वनमाल्यवंशी-
रत्नाङ्गदं प्रणयकेलिकलाविलासम् ।
श्यामं त्रिभङ्गललितं नियतप्रकाशं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ४॥
हिन्दी अर्थ:
जिनके गले में झूलती हुई सुंदर वनमाला है, हाथों में वंशी और रत्नों के बाजूबंद हैं, जो प्रेममयी लीलाओं की कलाओं में विलास करते हैं, जो श्यामवर्ण हैं और त्रिभंग (तीन जगह से टेढ़े) ललित मुद्रा में खड़े हुए निरंतर प्रकाशमान हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
अङ्गानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति
पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति ।
आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वलविग्रहस्य
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ५॥
हिन्दी अर्थ:
जिनके श्रीअंगों (शरीर के प्रत्येक अंग) में सम्पूर्ण इन्द्रियों के कार्य करने की शक्ति है (अर्थात वे नेत्रों से सुन सकते हैं, हाथों से देख सकते हैं), जो अनन्त लोकों को देखते, पालते और संचालित करते हैं, ऐसे आनन्द और चिन्मय (चेतन) उज्ज्वल स्वरूप वाले आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपं
आद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च ।
वेदेषु दुर्लभमदुर्लभमात्मभक्तौ
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ६॥
हिन्दी अर्थ:
जो अद्वैत हैं, अच्युत हैं (कभी पतन नहीं होता), अनादि हैं, अनन्तरूप हैं, जो सबसे आद्य (प्रथम) और पुराण (प्राचीन) पुरुष होते हुए भी नित्य नवयौवन से युक्त हैं, जो वेदों के अध्ययन से भी दुर्लभ हैं किन्तु अपने शुद्ध भक्तों के लिए अत्यंत सुलभ हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
पन्थास्तु कोटिशतवत्सरसम्प्रगम्यो
वायोरथापि मनसो मुनिपुङ्गवानाम् ।
सोऽप्यस्ति यत्प्रपदसीम्न्यविचिन्त्य तत्त्वे
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ७॥
हिन्दी अर्थ:
बड़े-बड़े मुनिश्रेष्ठ यदि वायु या मन की गति से करोड़ों वर्षों तक भी यात्रा करें, तो भी वे जिनके चरण कमलों के केवल अग्रभाग तक ही पहुँच पाते हैं, ऐसे अचिन्त्य तत्त्व स्वरूप वाले आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
एकोऽप्यसौ रचयितुं जगदण्डकोटिं
यच्छक्तिरस्ति जगदण्डचये यदन्तः ।
अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ८॥
हिन्दी अर्थ:
जो एक होते हुए भी अपनी शक्ति से करोड़ों ब्रह्माण्डों की रचना करते हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों में व्याप्त हैं और इतना ही नहीं, जो प्रत्येक परमाणु के भीतर भी पूर्ण रूप से स्थित हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यद्भावभावितधियो मनुजास्तथैव
सम्प्राप्यरूपमहिमासनयानभूषाः ।
सूक्तैर्यमेव निगमप्रथितैः स्तुवन्ति
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ९॥
हिन्दी अर्थ:
जिनके प्रेमभाव में डूबे हुए भक्त मनुष्य, उन्हीं के समान दिव्य रूप, महिमा, आसन, वाहन और आभूषण प्राप्त कर लेते हैं और वेदों में प्रसिद्ध सूक्तों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि-
स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः ।
गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १०॥
हिन्दी अर्थ:
जो आनन्द और चिन्मय रस से पूर्ण अपनी ही स्वरूपा शक्ति की कलाओं (गोपियों) के साथ सम्पूर्ण जीवों की आत्मा होकर अपने निज धाम 'गोलोक' में निवास करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन
सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति ।
यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ ११॥
हिन्दी अर्थ:
संत और भक्तजन प्रेमरूपी अंजन (काजल) लगे हुए भक्तिरूपी नेत्रों से सदैव अपने हृदय में जिनके दर्शन करते रहते हैं, उन अचिन्त्य गुणों वाले श्यामसुन्दर आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
रामादि मूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्
नानावतारमकरोद्भुवनेषु किन्तु ।
कृष्णः स्वयं समभवत् परमः पुमान् यो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १२॥
हिन्दी अर्थ:
जो राम, नृसिंह आदि स्वरूपों में अपनी कलाओं और अंशों के नियम से इस जगत में अनेक अवतार धारण करते हैं, किन्तु जो स्वयं साक्षात् परम पुरुष पूर्ण भगवान 'कृष्ण' रूप में अवतरित हुए, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि-
कोटिष्वशेषवसुधादिविभूतिभिन्नम् ।
तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १३॥
हिन्दी अर्थ:
जिनके श्रीअंगों की कांति (प्रकाश) ही वह निराकार, अनन्त और असीम 'ब्रह्म' है, जिसके प्रभाव से करोड़ों ब्रह्माण्डों में पृथ्वी आदि असीमित ऐश्वर्य और विभूतियाँ प्रकट होती हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
माया हि यस्य जगदण्डशतानि सूते
त्रैगुण्यतद्विषयवेदवितायमाना ।
सत्त्वावलम्बिपरसत्त्वविशुद्धसत्त्वं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १४॥
हिन्दी अर्थ:
जिनकी त्रिगुणमयी (सत्त्व, रज, तम) माया, जिसका वर्णन वेदों में किया गया है, करोड़ों ब्रह्माण्डों को जन्म देती है, किन्तु जो स्वयं माया से परे विशुद्ध सत्त्व (परम तत्त्व) स्वरूप हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
आनन्दचिन्मयरसात्मकतया मनःसु
यः प्राणिनां प्रतिफलं स्मरतामुपेत्य ।
लीलायितेन भुवनानि जयत्यजस्रं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १५॥
हिन्दी अर्थ:
जो आनन्द और चिन्मय रस के रूप में अपने स्मरण करने वाले प्राणियों के मन में सदैव निवास करते हैं और अपनी दिव्य लीलाओं से निरंतर सम्पूर्ण लोकों पर विजय प्राप्त करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले च तस्य
देवि महेशहरिधामसु तेषु तेषु ।
ते ते प्रभावनिचया विहिताश्च येन
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १६॥
हिन्दी अर्थ:
जिन्होंने 'गोलोक' नामक अपने सर्वोच्च निज धाम में, और उसके नीचे स्थित देवी-धाम, महेश-धाम (शिवलोक) और हरि-धाम (वैकुण्ठ) में अपनी ही शक्तियों और प्रभावों को स्थापित किया है, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका
छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा ।
इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १७॥
हिन्दी अर्थ:
सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाली आदिशक्ति 'दुर्गा' जिनकी छाया के समान कार्य करती हैं, जो सम्पूर्ण लोकों का भरण-पोषण करती हैं और जो सर्वदा गोविन्द की इच्छा के अनुसार ही चेष्टा करती हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
क्षीरं यथा दधिविकारविशेषयोगात्
सञ्जायते नहि ततः पृथगस्ति हेतोः ।
यत्सम्भूतमपि तथा समुपैति कार्याद्
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १८॥
हिन्दी अर्थ:
जिस प्रकार दूध खटाई आदि के योग (विकार) से 'दही' बन जाता है, फिर भी वह मूल रूप में दूध से भिन्न नहीं है, उसी प्रकार जो संसार के विनाश कार्य के लिए 'शिव' रूप धारण करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
दीपार्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्य
दीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा ।
यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ १९॥
हिन्दी अर्थ:
जिस प्रकार एक दीपक से दूसरा दीपक प्रज्वलित करने पर वह दूसरा दीपक भी पहले के समान ही प्रकाशमान और गुणवान होता है, उसी प्रकार जो सृष्टि के पालन हेतु महाविष्णु के रूप में सुशोभित होते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यः कारणार्णवजले भजति स्म योग-
निद्रामनन्तजगदण्डसरोमकूपः ।
आधारशक्तिमवलम्ब्य परं स्वमूर्तिं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २०॥
हिन्दी अर्थ:
जिनके रोम-रोम (रोमकूपों) से अनंत ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं, जो कारण-सागर के जल में अपनी ही आधार शक्ति का आश्रय लेकर योगनिद्रा में शयन करते हैं (महाविष्णु रूप में), उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यस्यैकनिःश्वसितकालमथावलम्ब्य
जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः ।
विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २१॥
हिन्दी अर्थ:
जिनके केवल एक श्वास लेने और छोड़ने के काल तक ही ब्रह्माण्डों के रचयिता (ब्रह्मा आदि) जीवित रहते हैं, वे कारणार्णवशायी महाविष्णु भी जिनके एक कला-विशेष (अंश) हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
भास्वान्यथाश्मशकलेषु निजेषु तेजः
स्वीयं कियत्प्रकटयत्यपि तद्वदत्र ।
ब्रह्मा य एष जगदण्डविधानकर्ता
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २२॥
हिन्दी अर्थ:
जिस प्रकार सूर्य सूर्यकांत मणि में अपना तेज प्रकट करता है, ठीक उसी प्रकार जो ब्रह्माण्ड के निर्माणकर्ता 'ब्रह्मा' में अपनी सृजन शक्ति का संचार करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यत्पादपल्लवयुगं विनिधाय कुम्भ-
द्वन्द्वे प्रणामसमये स गणाधिराजः ।
विघ्नान्विहन्तुमलमस्यजगत्त्रयस्य
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २३॥
हिन्दी अर्थ:
तीनों लोकों के विघ्न हरने वाले गणाधिराज (भगवान गणेश) प्रणाम करते समय जिनके पल्लव-समान कोमल चरण कमलों को अपने मस्तक के दोनों कुम्भों (गंडस्थलों) पर धारण करके ही विघ्न-विनाशक शक्ति प्राप्त करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
अग्निर्महीगगनमम्बुमरुद्दिशाश्च
कालस्तथात्ममनसीति जगत्त्रयाणि ।
यस्मात्भवन्ति विभवन्ति विशन्ति यं च
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २४॥
हिन्दी अर्थ:
अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, वायु, दिशाएं, काल, आत्मा और मन - तथा सम्पूर्ण तीनों लोक जिनसे उत्पन्न होते हैं, जिनके द्वारा रक्षित होते हैं और प्रलय के समय जिनमें लीन हो जाते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यच्चक्षुरेष सविता सकलग्रहाणां
राजा समस्तसुरमूर्तिरशेषतेजः ।
यस्याज्ञया भ्रमति सम्भृतकालचक्रो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २५॥
हिन्दी अर्थ:
समस्त ग्रहों के राजा, सभी देवताओं के मूर्तिमान स्वरूप और असीम तेज वाले सूर्य जिनकी आँख (नेत्र) हैं, और जो सूर्य उन्हीं की आज्ञा से कालचक्र पर आरूढ़ होकर अपनी कक्षा में भ्रमण करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
धर्मोऽथ पापनिचयः श्रुतयस्तपांसि
ब्रह्मादिकीटपटगवादयश्च जीवाः ।
यद्दत्तमात्रविभवप्रकटप्रभावा
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २६॥
हिन्दी अर्थ:
धर्म, पाप का समूह, श्रुतियाँ (वेद), तपस्या, और ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र कीट (कीड़े) तक सभी जीव-जंतु, जिनके द्वारा दी गई शक्ति के अनुसार ही अपना प्रभाव प्रकट करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो स्वकर्म-
बन्धानुरूपफलभाजनमातनोति ।
कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजां
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २७॥
हिन्दी अर्थ:
जो इन्द्रगोप (एक अत्यंत क्षुद्र कीड़ा) से लेकर देवराज इन्द्र तक सभी को उनके कर्म-बंधनों के अनुरूप फल प्रदान करते हैं, किन्तु जो अपने शुद्ध भक्तों के समस्त कर्म-बंधनों को जड़ से जलाकर भस्म कर देते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
यं क्रोधकामसहजप्रणयादिभीति-
वात्सल्यमोहगुरुगौरवसेव्यभावैः ।
सञ्चिन्त्य तस्य सदृशीं तनुमापुरेते
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २८॥
हिन्दी अर्थ:
जिन्हें क्रोध, काम, सहज प्रेम, भय, वात्सल्य, मोह या गुरुभाव से निरंतर स्मरण करने वाले लोग उन्हीं के समान (सारूप्य) दिव्य शरीर प्राप्त कर लेते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।
श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो
द्रुमा भूमिश्चिन्तामणिगणमयि तोयममृतम् ।
कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखि
चिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च ।
स यत्र क्षीराब्धिः स्रवति सुरभीभ्यश्च सुमहान्
निमेषार्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः ।
भजे श्वेतद्वीपं तमहमिह गोलोकमिति यं
विदन्तस्ते सन्तः क्षितिविरलचाराः कतिपये ॥ २९॥
हिन्दी अर्थ:
जहाँ अनंत लक्ष्मियाँ प्रेयसी हैं, परम पुरुष श्रीकृष्ण ही एकमात्र कान्त (प्रियतम) हैं, जहाँ के सभी वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, भूमि चिंतामणि रत्नों से बनी है, जहाँ का जल अमृत है, बोलना ही गान है, चलना ही नृत्य है, जहाँ वंशी प्रिय सखी है, जहाँ का प्रकाश चिदानन्दमय है। जहाँ अनन्त कामधेनु गायों से महान क्षीरसागर बहता है, और जहाँ समय का आधा निमेष (पलभर) भी व्यर्थ नहीं जाता। ऐसे उस 'गोलोक' (श्वेतद्वीप) धाम को, जिसे पृथ्वी पर विचरने वाले कुछ विरले संत ही जानते हैं, मैं भजता हूँ।

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