शारदीय नवरात्रि: एक विस्तृत शास्त्रीय, दार्शनिक एवं कर्मकाण्डीय मीमांसा
भारतीय सनातन वाङ्मय में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं है, अपितु यह चराचर जगत में व्याप्त आदि-शक्ति के ब्रह्माण्डीय स्पंदन (Cosmic Vibration) और मानव चेतना के ऊर्ध्वगमन का एक अत्यंत वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान है। वर्ष में ऋतु परिवर्तन के मुख्य संधिकालों पर शक्ति की उपासना का विधान शास्त्रों में निर्दिष्ट है। जब सूर्य दक्षिणायन की ओर अग्रसर होता है और प्रकृति ग्रीष्म एवं वर्षा के ताप से मुक्त होकर शरद ऋतु में प्रवेश करती है, तब ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का एक विशेष संतुलन उत्पन्न होता है। आयुर्वेद और ज्योतिष के दृष्टिकोण से यह ऋतु परिवर्तन मानव शरीर के वात, पित्त और कफ के असंतुलन का काल होता है, जहाँ शारीरिक और मानसिक शुद्धि अनिवार्य हो जाती है। इस संधिकाल में उपवास, ध्यान और मन्त्रों के माध्यम से ऊर्जा के जागरण हेतु जो नौ रात्रियोँ का अनुष्ठान किया जाता है, उसे ही 'शारदीय नवरात्रि' कहा जाता है।
सनातन धर्म में शक्ति ही परब्रह्म की वह क्रियात्मक सत्ता है, जिसके बिना सृजन, पालन और संहार सर्वथा असम्भव हैं। यह शोध-पत्र वेदों, उपनिषदों, अठारह महापुराणों (विशेषकर श्रीमद्देवीभागवत, मार्कण्डेय पुराण, वामन पुराण, और अग्नि पुराण) तथा शाक्त आगमों के आलोक में शारदीय नवरात्रि के सम्पूर्ण शास्त्रीय, कर्मकाण्डीय और दार्शनिक रहस्यों का विशद विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
शक्ति उपासना के वैदिक मूल: रात्रिसूक्त एवं देवीसूक्त
यद्यपि शक्ति उपासना का वर्तमान स्वरूप मुख्यतः पौराणिक और तान्त्रिक प्रतीत होता है, तथापि इसका उद्गम पूर्णतः वैदिक है। ऋग्वेद में शक्ति को वाक्, अदिति, उषा और रात्रि के रूप में वर्णित किया गया है। 'नवरात्रि' में 'रात्रि' शब्द अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाली, प्रलयंकारी और सम्पूर्ण चराचर को विश्राम देने वाली भगवती का प्रतीक है।
ऋग्वेदोक्तं रात्रिसूक्तम्
ऋग्वेद के दसवें मण्डल के 127वें सूक्त में 'रात्रिसूक्त' का विशद वर्णन आता है। वैदिक ऋषियों ने रात्रि को केवल अंधकार का प्रतीक नहीं माना, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपनी गोद में सुलाने वाली और नव-सृजन हेतु विश्राम देने वाली चेतनामयी भगवती माना है। महर्षि कुशिक द्वारा दृष्ट इस सूक्त में रात्रि देवी की महिमा इस प्रकार गाई गई है:
ॐ रात्री व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभि:। विश्वा अधि श्रियोऽधित॥
ओर्वप्रा अमर्त्यानिवतो देव्युद्वत:। ज्योतिषा बाधते तम:॥
ओर्वप्रा अमर्त्यानिवतो देव्युद्वत:। ज्योतिषा बाधते तम:॥
भावार्थ:
सर्वव्यापिनी रात्रि देवी अपने अनन्त ज्ञानमय नेत्रों से सम्पूर्ण प्रपंच को देखती हैं और अपनी महिमा से सम्पूर्ण जगत को धारण करती हैं। वे देवी अमर्त्य हैं, जो नीचे और ऊपर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं और अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करती हैं। जब जीव दिन भर के कर्मों से श्रांत हो जाता है, तो रात्रि देवी ही उसे योगनिद्रा के माध्यम से पुनः ऊर्जावान करती हैं। नवरात्रि की नौ रात्रियाँ उसी महाकालरात्रि की द्योतक हैं, जिसमें साधक अपनी इन्द्रियों को बाह्य प्रपंचों से समेटकर अंतर्मुखी करता है और आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है।
वागाम्भृणी सूक्त (देवीसूक्त)
ऋग्वेद के दसवें मण्डल का 125वाँ सूक्त 'देवीसूक्त' या 'वागाम्भृणी सूक्त' कहलाता है। महर्षि अम्भृण की पुत्री 'वाक्' ने समाधि की उच्चतम अवस्था में स्वयं को साक्षात् परब्रह्म के अभिन्न स्वरूप में अनुभव करते हुए जिस सूक्त का गान किया, वह शाक्त दर्शन और अद्वैत वेदान्त का सर्वोच्च प्रमाण है। इस सूक्त में देवी स्वयं उद्घोष करती हैं:
ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्य्यावेशयन्तीम्॥
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्य्यावेशयन्तीम्॥
दार्शनिक अर्थ:
"मैं ही एकादश रुद्रों और अष्ट वसुओं के रूप में विचरण करती हूँ। मैं ही आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में विद्यमान हूँ। मित्र, वरुण, इन्द्र, अग्नि और अश्विनीकुमारों को मैं ही धारण करती हूँ। मैं ही सम्पूर्ण राष्ट्र की स्वामिनी और धन (वसु) को एकत्रित करने वाली हूँ। मैं ज्ञानवती और यज्ञ के योग्य शक्तियों में प्रथम हूँ।"
देवी आगे कहती हैं कि जो व्यक्ति भोजन करता है, जो देखता है, जो साँस लेता है, वह मेरी ही शक्ति से करता है। "अहं रुद्राय धनुरा तनोमि" अर्थात् मैं ही रुद्र का धनुष तानती हूँ जिससे वे शत्रुओं का दमन करते हैं। यह सूक्त यह सिद्ध करता है कि जिसे मनुष्य बाहरी शक्ति मानता है, वह वास्तव में उसकी आत्मा के भीतर की 'चित्-शक्ति' ही है। दुर्गा सप्तशती के पाठ के उपसंहार के रूप में इस वेदोक्त सूक्त का पाठ अनिवार्य माना गया है।
उपनिषदों में परब्रह्ममयी सत्ता: देवी अथर्वशीर्ष
वैदिक ज्ञान का सार उपनिषदों में निहित है। 'देवी अथर्वशीर्ष' (देवी उपनिषद्) शाक्त परम्परा का एक प्रमुख उपनिषद है, जो देवी को निर्गुण ब्रह्म और सगुण प्रकृति दोनों रूपों में स्थापित करता है। जब सभी देवता देवी के पास जाकर पूछते हैं कि "कासि त्वं महादेवीति?" (हे महादेवी, आप कौन हैं?), तब देवी उत्तर देती हैं:
साब्रवीत् — अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकम् जगत् शून्यंचाशून्यम् च।
अहम् आनन्दानानन्दौ अहम् विज्ञानाविज्ञाने। अहम् ब्रह्म अब्रह्मणि वेदितव्ये।
अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि। अहमखिलं जगत्।
अहम् आनन्दानानन्दौ अहम् विज्ञानाविज्ञाने। अहम् ब्रह्म अब्रह्मणि वेदितव्ये।
अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि। अहमखिलं जगत्।
अर्थ:
"मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ। मुझसे ही यह प्रकृति और पुरुष रूपी चराचर जगत उत्पन्न हुआ है। मैं ही शून्य हूँ और मैं ही अशून्य हूँ। मैं ही आनंद हूँ और मैं ही निरानंद हूँ। मैं ही विज्ञान हूँ और मैं ही अविज्ञान हूँ। जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म दोनों मैं ही हूँ। पञ्चमहाभूत और अपञ्चमहाभूत मैं ही हूँ। यह सम्पूर्ण जगत मैं ही हूँ।"
यह उद्घोष शाक्त दर्शन के इस मूल सिद्धान्त को पुष्ट करता है कि शिव (चैतन्य) और शक्ति (विमर्श) में कोई भेद नहीं है। शक्ति के बिना शिव की अभिव्यक्ति असम्भव है।
पुराणों में सृष्टि मीमांसा एवं नवरात्रि महात्म्य
पुराणों ने वैदिक ज्ञान को कथाओं और रूपकों के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाया। श्रीमद्देवीभागवत पुराण, वामन पुराण और मार्कण्डेय पुराण में शक्ति की महिमा और नवरात्रि अनुष्ठान का अत्यंत विशद वर्णन प्राप्त होता है।
श्रीमद्देवीभागवत पुराण (स्कन्ध 3): त्रिदेवों का मणिद्वीप गमन
श्रीमद्देवीभागवत पुराण शाक्त सम्प्रदाय का सबसे महत्त्वपूर्ण महापुराण है। इसके तृतीय स्कन्ध में सृष्टि की उत्पत्ति और त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की स्थिति का रहस्य उद्घाटित किया गया है। राजा जनमेजय महर्षि व्यास से पूछते हैं कि सृष्टि का वास्तविक रचयिता कौन है और क्या ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी काल और मृत्यु के अधीन हैं? व्यास जी बताते हैं कि एक बार उन्हें भी यही संशय हुआ था, तब उन्होंने देवर्षि नारद से पूछा, और नारद जी ने भगवान ब्रह्मा से यही प्रश्न किया था।
ब्रह्मा जी ने नारद को बताया कि सृष्टि के आरम्भ में जब वे कमल पुष्प पर प्रकट हुए, तो उन्हें अपने स्रष्टा का ज्ञान नहीं था। तब आकाशवाणी के माध्यम से उन्हें तप करने का निर्देश मिला। इसी बीच मधु और कैटभ नामक असुरों ने उन पर आक्रमण कर दिया। उनसे बचने के लिए ब्रह्मा जी ने योगनिद्रा में लीन भगवान विष्णु की स्तुति की, जिससे भगवती योगनिद्रा विष्णु के नेत्रों से बाहर आईं और विष्णु जी ने उन असुरों का वध किया। इसके पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु और शिव को एक दिव्य विमान में बैठाकर ब्रह्माण्ड का दर्शन कराया गया। वे विमान से विभिन्न लोकों को पार करते हुए सुधा-सागर (अमृत के महासागर) के मध्य स्थित मणिद्वीप पहुँचे, जहाँ उन्होंने परमेश्वरी भुवनेश्वरी का दर्शन किया।
त्रिदेवों ने देखा कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवी के चरण नखों में प्रतिबिम्बित हो रहा है। भगवान विष्णु स्तुति करते हुए कहते हैं:
"हे माता! यदि आप ही सम्पूर्ण जगत की मूल प्रकृति हैं, तो ब्रह्मा, मैं (विष्णु) और शंकर भी आपकी ही रचना हैं। आपके बिना हमारी कोई सत्ता नहीं है।"
भगवान शिव भी स्वीकार करते हैं कि "यदि ब्रह्मा और विष्णु आपकी शक्ति से उत्पन्न हुए हैं, तो मैं तमोगुणी शिव भी आपसे ही उत्पन्न हुआ हूँ।" भगवान ब्रह्मा देवी से पूछते हैं कि वेदों में जिस 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' की बात कही गई है, वह आप ही हैं या कोई और? तब देवी उत्तर देती हैं:
सदाएकत्वम ना भेदोसती सर्वदेव ममस्या च।
योसाऊ साहमहम् योसाउ भेदोस्ती मतिविभ्रमात्॥
योसाऊ साहमहम् योसाउ भेदोस्ती मतिविभ्रमात्॥
(मुझमें और उस परब्रह्म में सदा एकत्व है, कोई भेद नहीं है। जो वह है, वही मैं हूँ। मानसिक भ्रम के कारण ही भेद प्रतीत होता है।)
इसी पुराण में महर्षि व्यास जनमेजय को नवरात्रि व्रत का उपदेश देते हुए कहते हैं:
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि नवरात्रव्रतं शुभम् ।
शरत्काले विशेषेण कर्तव्यं विधिपूर्वकम् ॥
शरत्काले विशेषेण कर्तव्यं विधिपूर्वकम् ॥
(हे राजन्! मैं तुम्हें शुभ नवरात्र व्रत का विधान बताता हूँ। शरद ऋतु में विशेष रूप से इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए।)
वामन पुराण: महिषासुर की उत्पत्ति का रहस्य
शारदीय नवरात्रि में देवी द्वारा महिषासुर के वध का विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। मार्कण्डेय पुराण में तो युद्ध का विस्तार है, किन्तु महिषासुर की उत्पत्ति का अत्यंत गूढ़ रहस्य 'वामन पुराण' में प्राप्त होता है।
वामन पुराण के अनुसार, रम्भ और करम्भ नामक दो महाबलवान असुर भाई थे जो संतान प्राप्ति हेतु पञ्चनद के जल और अग्नि के मध्य कठोर तपस्या कर रहे थे। देवराज इन्द्र ने मगरमच्छ का रूप धारण कर जल में तपस्यारत करम्भ का वध कर दिया। इससे कुपित होकर रम्भ ने अपने शीश की आहुति अग्नि में देनी चाही, तब अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने रम्भ को वरदान दिया कि उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो त्रैलोक्यविजयी और अजेय होगा।
अग्निदेव ने कहा कि जिस स्त्री में तुम्हारा चित्त सर्वप्रथम आसक्त होगा, उसी से यह पुत्र उत्पन्न होगा। रम्भ जब यक्षों के क्षेत्र में गया, तो वहाँ उसका चित्त एक महिषी (भैंस) पर आसक्त हो गया। नियति की प्रेरणा से रम्भ ने उस महिषी के साथ समागम किया, जिसके फलस्वरूप एक अत्यंत शक्तिशाली असुर का जन्म हुआ, जो इच्छानुसार रूप बदलने में सक्षम था। क्योंकि वह महिषी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था, इसलिए उसका नाम 'महिषासुर' पड़ा। इस असुर ने ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि किसी भी देव, दानव या पुरुष के हाथों उसकी मृत्यु न हो। महिषासुर का यह रूपक वस्तुतः मानव के भीतर छिपे असीमित 'अहंकार' और 'जड़ता' (तमोगुण) का प्रतीक है।
मार्कण्डेय पुराण एवं श्री दुर्गा सप्तशती
मार्कण्डेय पुराण के 81वें से 93वें अध्याय तक विस्तृत 700 श्लोकों का संग्रह 'श्री दुर्गा सप्तशती' या 'देवी माहात्म्य' कहलाता है। यह ग्रंथ शाक्त परम्परा का मेरुदण्ड है। इसमें देवी स्वयं शारदीय नवरात्रि की महत्ता का उद्घोष करती हैं:
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥
(शरद ऋतु में जो मेरी वार्षिक महापूजा की जाती है, उस अवसर पर जो कोई भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य को सुनेगा, वह मनुष्य मेरी कृपा से सभी बाधाओं से मुक्त होकर धन, धान्य और पुत्र से सम्पन्न हो जाएगा, इसमें कोई संशय नहीं है।)
दुर्गा सप्तशती तीन प्रमुख चरित्रों (भागों) में विभक्त है, जो मानव चेतना की आध्यात्मिक विकास यात्रा का प्रतीक हैं:
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प्रथम चरित्र (महाकाली):
इसके अधिष्ठाता ऋषि ब्रह्मा हैं और इसका मुख्य तत्त्व अग्नि है। इसमें मधु और कैटभ के वध की कथा है। 'मधु' आसक्ति (राग) का और 'कैटभ' घृणा (द्वेष) का प्रतीक है। जब तक मनुष्य राग और द्वेष के तमस से मुक्त नहीं होता, आत्म-चेतना का जागरण असम्भव है।
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मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी):
इसके अधिष्ठाता ऋषि विष्णु हैं। इसमें महिषासुर वध की कथा है। महिष (भैंसा) आलस्य, अज्ञानता, जड़ता और बहुरूपिये अहंकार का प्रतीक है। महालक्ष्मी रजोगुण और क्रियाशीलता की देवी हैं, जो इस जड़ता का नाश करती हैं।
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उत्तम चरित्र (महासरस्वती):
इसके अधिष्ठाता ऋषि रुद्र (शिव) हैं। इसमें शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज के वध की कथा है। 'शुम्भ' अहंता (मैं) और 'निशुम्भ' ममता (मेरा) का प्रतीक है। 'रक्तबीज' मनुष्य की उन असीमित सांसारिक इच्छाओं का प्रतीक है, जिनकी पूर्ति करने पर वे रक्त की बूँदों के समान और अधिक उत्पन्न हो जाती हैं। महासरस्वती (सत्त्व गुण) अपने ज्ञान रूपी खड्ग से इन अज्ञान रूपी वृत्तियों का समूल नाश करती हैं।
अकाल बोधन: शारदीय दुर्गा पूजा का ऐतिहासिक एवं रामकथा सन्दर्भ
प्राचीन वैदिक और शास्त्रीय परम्परा के अनुसार, वसंत ऋतु (चैत्र मास) में होने वाली नवरात्रि ही मूल नवरात्रि (वासन्तिक नवरात्र) मानी जाती थी। शरद ऋतु को देवताओं का शयन काल (दक्षिणायन) माना जाता था। किन्तु वर्तमान समय में शारदीय नवरात्रि का महत्त्व सर्वाधिक है। इसके पीछे एक ऐतिहासिक और पौराणिक कथा 'कृत्तिवास रामायण' तथा 'कालिका पुराण' में प्राप्त होती है।
कृत्तिवास रामायण के लंकाकाण्ड के अनुसार, रावण देवी का परम भक्त था और देवी की कृपा से ही वह अजेय हो रहा था। रावण का वध करने हेतु भगवान ब्रह्मा ने श्री राम को परम शक्ति की आराधना का परामर्श दिया। श्री राम ने कहा कि यह तो दक्षिणायन है, देवी के शयन का अकाल (असमय) है। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि आपको देवी का 'अकाल बोधन' (असमय जागरण) करना होगा।
श्री राम ने देवी को प्रसन्न करने के लिए 108 नीले कमल (नीलोत्पल) अर्पित करने का संकल्प लिया। जब श्री राम ने विधि-विधान से पूजा आरम्भ की, तो भगवती ने उनकी परीक्षा लेने हेतु चुपके से एक नीलकमल चुरा लिया। जब श्री राम ने देखा कि एक कमल कम है, तो उनका चित्त व्याकुल हो गया। उन्हें स्मरण आया कि लोग उन्हें 'कमलनयन' (कमल के समान नेत्रों वाले) कहते हैं। अतः उन्होंने अपना एक नेत्र निकालकर देवी के चरणों में अर्पित करने के लिए जैसे ही बाण उठाया, भगवती साक्षात् प्रकट हो गईं। देवी ने श्री राम का हाथ पकड़ लिया और उन्हें रावण पर विजय का अमोघ आशीर्वाद दिया।
चूँकि भगवान राम ने शरद ऋतु के अकाल में देवी का बोधन कर विजय प्राप्त की थी, इसीलिए शरद ऋतु की इस महापूजा को 'अकाल बोधन' कहा जाता है और तभी से शारदीय दुर्गा पूजा का महत्त्व सर्वोपरि हो गया।
नवदुर्गा: चेतना के ऊर्ध्वगमन की नौ अवस्थाएँ
नवरात्रि के नौ दिनों में भगवती दुर्गा के नौ विशिष्ट स्वरूपों की उपासना की जाती है। महर्षि मार्कण्डेय द्वारा रचित 'श्री देव्याः कवचम्' में नवदुर्गाओं का स्पष्ट नामोल्लेख है:
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
इन नौ स्वरूपों का केवल पौराणिक महत्त्व ही नहीं है, अपितु यह यौगिक शरीर-विज्ञान और कुण्डलिनी जागरण की नौ अवस्थाओं का भी वैज्ञानिक निरूपण है:
| दिन | देवी का स्वरूप | आध्यात्मिक एवं यौगिक अर्थ | शासक ग्रह |
|---|---|---|---|
| प्रथम | शैलपुत्री | पर्वतराज हिमालय की पुत्री। मूलाधार चक्र में स्थित अचल इच्छाशक्ति और कुण्डलिनी का प्रतीक। | सूर्य |
| द्वितीय | ब्रह्मचारिणी | तपस्या और वैराग्य की साक्षात् मूर्ति। स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण और मन का नियंत्रण। | चन्द्रमा |
| तृतीय | चन्द्रघण्टा | मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र। मणिपूर चक्र का जागरण और नाद-ब्रह्म की अनुभूति। | मंगल |
| चतुर्थ | कूष्माण्डा | "कु-उष्म-अण्ड"—अपने मंद हास्य से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने वाली ऊर्जा। अनाहत चक्र का जागरण। | बुध |
| पञ्चम | स्कन्दमाता | कुमार कार्तिकेय (स्कन्द) की माता। विशुद्ध चक्र का जागरण, वात्सल्य और शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति। | बृहस्पति |
| षष्ठ | कात्यायनी | महर्षि कात्यायन की पुत्री। आज्ञा चक्र का जागरण। महिषासुर का वध करने वाली उग्र योद्धा देवी। | शुक्र |
| सप्तम | कालरात्रि | घोर अंधकार के समान कृष्ण वर्णा। सहस्रार के मार्ग की बाधाओं का नाश करने वाली प्रलयंकारी शक्ति। | शनि |
| अष्टम | महागौरी | तपस्या से अत्यंत उज्जवल वर्ण प्राप्त करने वाली। सहस्रार चक्र में पवित्रता और परम शान्ति का स्वरूप। | राहु |
| नवम | सिद्धिदात्री | अष्ट सिद्धियों और नव निधियों को प्रदान करने वाली। शिवत्व (अर्द्धनारीश्वर) की पूर्णता और मोक्ष की अंतिम अवस्था। | केतु |
ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवीपुराण के अनुसार, देवी सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव ने 18 प्रकार की सिद्धियाँ (अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व, कामावसायिता आदि) प्राप्त की थीं और 'अर्द्धनारीश्वर' स्वरूप को प्राप्त हुए थे।
नवरात्रि के मुख्य कर्मकाण्डीय विधान एवं उनका विज्ञान
शारदीय नवरात्रि में वैदिक मन्त्रों, तान्त्रिक (आगम) प्रक्रियाओं और लौकिक परम्पराओं का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।
1. कलश (घट) स्थापना
नवरात्रि के प्रथम दिन प्रतिपदा को शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना (घटस्थापन) की जाती है। अग्नि पुराण और निर्णयसिन्धु जैसे ग्रन्थों में इसका विस्तृत वैदिक विधान वर्णित है। कलश कोई सामान्य मिट्टी या धातु का पात्र नहीं है, अपितु वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, त्रिदेवों और समस्त नदियों (तीर्थों) का लघु-प्रतीक (Microcosm) है। इसके स्थापन काल में पुरोहित द्वारा निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण किया जाता है:
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा। ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः। अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा। ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः। अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
(कलश के मुख में भगवान विष्णु, कण्ठ में भगवान रुद्र (शिव), और मूल (आधार) में भगवान ब्रह्मा निवास करते हैं। इसके मध्य भाग में मातृशक्तियों का वास है। इसकी कुक्षि में सातों समुद्र, सप्त द्वीप वाली पृथ्वी, और चारों वेद (ऋग्, यजुर्, साम, अथर्व) अपने सभी अंगों सहित विराजमान हैं।)
कलश के भीतर जल, चन्दन, सर्वौषधि, दूर्वा, पञ्चरत्न, और द्रव्य डाला जाता है, जो जीवन के पञ्चमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के प्रतीक हैं। इस प्रकार एक छोटे से कलश में सम्पूर्ण विराट सत्ता का आवाहन कर साधक परब्रह्म की निकटता प्राप्त करता है।
2. नवपत्रिका प्रवेश (कोला बौ)
विशेष रूप से पूर्वी भारत और शाक्त परम्पराओं में दुर्गा पूजा के अंतर्गत सप्तमी तिथि को 'नवपत्रिका' का विधान है। इसमें नौ प्रकार की औषधीय वनस्पतियों या पत्तियों—रम्भा (केला), कच्चू, हरिद्रा (हल्दी), जयन्ती, बिल्व, दाड़िम (अनार), अशोक, मान और धान—को एकत्र कर एक स्त्री का आकार दिया जाता है, जिसे अपभ्रंश में 'कोला बौ' (केले की बहू) कहा जाता है।
ये नौ वनस्पतियाँ नवदुर्गा की नौ शक्तियों (ब्राह्मणी, कालिका, दुर्गा, कार्तिकी, शिवा, रक्तदन्तिका, शोकहरिणी, चामुण्डा और लक्ष्मी) की साक्षात् प्रतीक हैं। यह प्राचीन तान्त्रिक अनुष्ठान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि हिन्दू दर्शन में प्रकृति, पर्यावरण और वनस्पति ही साक्षात् जगदम्बा का स्वरूप हैं।
3. सन्धि पूजा: महाशक्ति का प्रलयंकारी क्षण
शारदीय दुर्गा पूजा का सबसे रहस्यमय और तान्त्रिक अनुष्ठान 'सन्धि पूजा' है। यह अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रारम्भिक 24 मिनट—कुल मिलाकर 48 मिनट (दो घटी) की अवधि में सम्पन्न होती है।
देवी भागवत और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, यह 48 मिनट का वही परम शक्तिशाली संधिकाल है जब देवी चण्डिका ने अपने भृकुटि से उग्र देवी चामुण्डा (महाकाली) को प्रकट किया था। इसी काल में देवी चामुण्डा ने चण्ड तथा मुण्ड नामक महादानवों का संहार किया था। इस वेला में तांत्रिक और वैदिक दोनों विधियों से देवी के सम्मुख 108 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं तथा विशेष बलि (कूष्माण्ड, ककड़ी, केला अथवा सात्विक बलिदान) अर्पित की जाती है। जो साधक इस काल में महामाया की उपासना करता है, उसके जीवन के सबसे विकट शत्रुओं और घोर संकटों का तत्काल शमन हो जाता है।
4. पशु बलि (छाग बलि) बनाम प्रतीकात्मक बलि का दार्शनिक रहस्य
शाक्त सम्प्रदाय (विशेषकर वामाचार और तान्त्रिक परम्पराओं) में महानिर्वाण तन्त्र और कालिका पुराण के आधार पर देवी को पशु बलि (छाग बलि या भैंसे की बलि) देने का विधान रहा है। यह विषय आधुनिक समाज में प्रायः विवादित रहता है। किन्तु तन्त्र शास्त्रों में इसका अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ बताया गया है।
बलि का अर्थ किसी जीव की हत्या करना नहीं है, अपितु साधक द्वारा अपने भीतर छिपी पाशविक प्रवृत्तियों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) को देवी के चरणों में समर्पित कर देना है। कालिका पुराण में स्पष्ट वर्णित है कि बलि हेतु अर्पित किया जाने वाला पशु सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर सीधे स्वर्ग या देवयोनि को प्राप्त होता है:
"रक्षार्थं बन्धनस्थोऽसि मुक्तये मोचितो मया।
देव्याः प्रीतिं समुत्पाद्य स्वर्गं गच्छ पशूत्तम॥"
देव्याः प्रीतिं समुत्पाद्य स्वर्गं गच्छ पशूत्तम॥"
(हे पशूत्तम! तुम अपनी रक्षा के लिए बन्धन में थे, मैंने तुम्हें मुक्ति के लिए मुक्त किया है। देवी को प्रसन्न करके तुम स्वर्ग को प्राप्त करो।)
वर्तमान में अधिकांश वैदिक और सात्विक साधक कूष्माण्ड (पेठा), नीबू, ककड़ी या नारियल की बलि देकर अपने भीतर के 'अहंकार' का ही विसर्जन करते हैं, जो बलि की वास्तविक भावना के पूर्णतः अनुकूल है।
5. कुमारी पूजन: साक्षात् शक्ति का जीवंत विग्रह
श्रीमद्देवीभागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध के 26वें और 27वें अध्याय तथा निर्णयसिन्धु में 'कुमारी पूजन' को नवरात्रि का सबसे महत्त्वपूर्ण और फलदायी अनुष्ठान बताया गया है। योगिनी तन्त्र में भगवती स्पष्ट करती हैं कि मैं कोटि-कोटि यज्ञों या होमादि से उतनी प्रसन्न नहीं होती, जितनी एक निर्दोष कुमारी कन्या के विधिपूर्वक पूजन से होती हूँ।
नित्यं भूमौ च शयनं कुमारीणां च पूजनम् ।
वस्त्रालङ्करणैर्दिव्यैर्भोजनैश्च सुधामयैः ॥
वस्त्रालङ्करणैर्दिव्यैर्भोजनैश्च सुधामयैः ॥
शास्त्रों में 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याओं की पूजा का विशेष विधान है। 1 वर्ष की कन्या अज्ञानी होने के कारण और 10 वर्ष से ऊपर की कन्या को इस विशेष पूजन में सम्मिलित नहीं किया जाता। कन्याओं की आयु के अनुसार उनके विशेष नाम और फल इस प्रकार हैं:
| आयु | कन्या का नाम | पूजन का फल (महिमा) |
|---|---|---|
| 2 वर्ष | कुमारी | दुःख और दरिद्रता का नाश, आयु और बल की वृद्धि। |
| 3 वर्ष | त्रिमूर्ति | धर्म, अर्थ, और काम की प्राप्ति, धन-धान्य का आगमन। |
| 4 वर्ष | कल्याणी | सभी मनोकामनाओं की पूर्ति, विद्या और राज-सुख की प्राप्ति। |
| 5 वर्ष | रोहिणी | समस्त भयंकर रोगों का नाश और स्वास्थ्य लाभ। |
| 6 वर्ष | कालिका | क्रूर शत्रुओं का विनाश और संकटों से त्वरित मुक्ति। |
| 7 वर्ष | चण्डिका | ऐश्वर्य और अपार धन की प्राप्ति। |
| 8 वर्ष | शाम्भवी | दुःख का नाश, संग्राम में विजय और किसी को भी सम्मोहित करने की शक्ति। |
| 9 वर्ष | दुर्गा | परलोक में सुख, उग्र कर्मों की सिद्धि और शत्रुओं का शमन। |
| 10 वर्ष | सुभद्रा | वाञ्छित अर्थ की सिद्धि, अभद्र का नाश और मोक्ष की प्राप्ति। |
इस प्रकार, कुमारी पूजन समाज में नारी शक्ति के सम्मान और बालिकाओं को साक्षात् भगवती का स्वरूप मानने की एक महान मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परम्परा है।
नवार्ण मन्त्र मीमांसा: शाक्त तन्त्र का परमोच्च रहस्य
दुर्गा सप्तशती और सम्पूर्ण शाक्त साधना का प्राण 'नवार्ण मन्त्र' है। इसे नौ अक्षरों का महामन्त्र कहा जाता है, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ऊर्जा समाहित है। भुनेश्वरी संहिता और तन्त्र ग्रन्थों के अनुसार यह मन्त्र कल्पवृक्ष के समान है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
इस मन्त्र में तीन बीज मन्त्र माँ दुर्गा के तीन चरित्रों (महासरस्वती, महालक्ष्मी, और महाकाली) के द्योतक हैं। इसका अक्षरशः दार्शनिक और तान्त्रिक विश्लेषण इस प्रकार है:
-
ॐ:
यह परब्रह्म का सूचक और अनाहत प्रणव नाद है। यद्यपि मूल नवार्ण मन्त्र नौ अक्षरों का ही है, किन्तु परब्रह्म से एकाकार करने हेतु इसके सम्पुट में 'ॐ' लगाया जाता है।
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ऐं (वाक् बीज):
यह महासरस्वती का बीज मन्त्र है। यह सत्त्व गुण, ज्ञान, विद्या, और सृष्टि-रचना की शक्ति का द्योतक है। इसका शासक ग्रह सूर्य है।
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ह्रीं (माया बीज):
यह महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है। यह रजो गुण, ऐश्वर्य, धन, स्थिति (संरक्षण) और ब्रह्माण्डीय भ्रम (माया) पर नियंत्रण का प्रतीक है। इसका शासक ग्रह चन्द्रमा है।
-
क्लीं (काम बीज):
यह महाकाली का बीज मन्त्र है। यह तमो गुण, इच्छा शक्ति, शत्रु-दमन और संहार (रूपांतरण) की ऊर्जा है। इसका शासक ग्रह मंगल है।
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चामुण्डायै:
चण्ड (प्रचण्ड प्रवृत्तियों/क्रोध) और मुण्ड (निरंकुश विचारों/काम) का नाश करने वाली भगवती चामुण्डा (महाकाली) को समर्पित।
-
विच्चे:
यह पूर्ण समर्पण का सूचक है, जिसका अर्थ है 'नमस्कार' या 'अविद्या रूपी ग्रन्थि को खोलकर मुझे मोक्ष प्रदान करें'।
यह मन्त्र त्रिकाल, त्रिलोक, त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम) और त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की शक्तियों को एकाकार कर साधक के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को शुद्ध करता है। तन्त्र शास्त्र में नवार्ण मन्त्र में वषट्, फट्, स्वाहा आदि का सम्पुट लगाकर षट्-कर्म (मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तम्भन, और विद्वेषण) भी सिद्ध किए जाते हैं। किन्तु एक निष्काम साधक के लिए यह मन्त्र सीधे कुण्डलिनी जागरण और मोक्ष का द्वार है। सप्तशती के पाठ से पूर्व और पश्चात् नवार्ण मन्त्र का 108 बार जाप (रुद्राक्ष, लाल चन्दन या कमलगट्टे की माला पर) अनिवार्य माना गया है।
शारदीय नवरात्रि 2026: तिथियाँ, माता के स्वरूप और शुभ रंग
पंचांग और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व 11 अक्टूबर 2026 (रविवार) को घटस्थापना (प्रतिपदा) के साथ प्रारम्भ होगा और 19 अक्टूबर 2026 (महानवमी) को सम्पन्न होगा। 20 अक्टूबर (मंगलवार) को विजयादशमी अर्थात् दशहरा का पर्व मनाया जाएगा। चूँकि इस वर्ष नवरात्रि का आरम्भ रविवार से हो रहा है, अतः माता का आगमन 'गज' (हाथी) पर होगा, जिसे वृष्टि (अच्छी वर्षा) और धन-धान्य की समृद्धि का अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है।
| दिन | तिथि (अक्टूबर 2026) | माता का स्वरूप | शुभ रंग (Color) |
|---|---|---|---|
| पहला दिन | 11 अक्टूबर (रविवार) | माँ शैलपुत्री | नारंगी (Orange) |
| दूसरा दिन | 12 अक्टूबर (सोमवार) | माँ ब्रह्मचारिणी | श्वेत (White) |
| तीसरा दिन | 13 अक्टूबर (मंगलवार) | माँ चन्द्रघण्टा | लाल (Red) |
| चौथा दिन | 14 अक्टूबर (बुधवार) | माँ कूष्माण्डा | गहरा नीला (Royal Blue) |
| पाँचवाँ दिन | 15 अक्टूबर (गुरुवार) | माँ स्कन्दमाता | पीला (Yellow) |
| छठा दिन | 16 अक्टूबर (शुक्रवार) | माँ कात्यायनी | हरा (Green) |
| सातवाँ दिन | 17 अक्टूबर (शनिवार) | माँ कालरात्रि | स्लेटी (Grey) |
| आठवाँ दिन | 18 अक्टूबर (रविवार) | माँ महागौरी (दुर्गा अष्टमी) | बैंगनी (Purple) |
| नौवाँ दिन | 19 अक्टूबर (सोमवार) | माँ सिद्धिदात्री (महानवमी) | मयूर पंखी हरा (Peacock Green) |
निष्कर्ष: प्रकृति, विज्ञान और अद्वैत चेतना का परम संगम
शारदीय नवरात्रि मात्र कुछ कर्मकाण्डों, उपवासों या बाह्य उत्सवों का समूह नहीं है। यह परम्परा विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक सिद्धान्तों पर आधारित है। आयुर्वेद के अनुसार, शरद और वसंत ऋतु दोनों बड़े संधिकाल हैं, जहाँ वात, पित्त और कफ के असंतुलन से शरीर में विकार उत्पन्न होने की सम्भावना सर्वाधिक होती है। नौ दिनों का उपवास (लंघन), यम-नियम का पालन, सात्विक आहार और रात्रिकालीन जागरण शरीर का पूर्ण शुद्धिकरण (Detoxification) करता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यह नौ दिनों का संग्राम हमारे अंतर्मन का ही संग्राम है। महर्षि मेधा द्वारा राजा सुरथ और समाधि वैश्य को सुनाया गया 'देवी माहात्म्य' हमें यह शिक्षा देता है कि हमारे समस्त दुःखों का कारण बाह्य संसार नहीं, अपितु हमारा अपना 'अहंकार' (महिषासुर) और 'ममता' (निशुम्भ) है। महामाया अपने 'अविद्या' रूप से जीवों को मोहपाश में बाँधती हैं और अपनी कृपा से 'विद्या' रूप होकर उसी मोहपाश को काटकर मोक्ष प्रदान करती हैं।
अंततः, श्री दुर्गा सप्तशती का यह प्रसिद्ध श्लोक शक्ति की इस सर्वव्यापकता और अद्वैत दर्शन का सबसे सुंदर सारांश प्रस्तुत करता है:
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
(हे नारायणी! आप ही सभी मंगलों का मंगल करने वाली हैं। आप ही परम कल्याणमयी शिवा हैं, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली हैं। आप शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली और महागौरी हैं; आपको हमारा बारंबार नमस्कार है।)
शारदीय नवरात्रि की यह महान साधना मनुष्य को इसी अद्वैत चेतना की ओर ले जाती है, जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जो ब्रह्माण्ड को अपनी इच्छा-शक्ति से संचालित कर रही है, वही 'चित्-शक्ति' उसके भीतर भी कुण्डलिनी के रूप में स्पंदित हो रही है। इसी पराशक्ति के जागरण से मनुष्य अज्ञान के महिषासुर का वध कर आत्मज्ञान और शिवत्व की परम शान्ति को प्राप्त करता है।
इन स्रोतों से जानकारी ली गई
- नवरात्रि व्रत वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक लाभ - ZODIAQ
- Navratri 2025: नवरात्रि 9 दिन क्यों मनाई जाती है? जानें धार्मिक - YouTube
- Navarātri - Nine Powerful Nights of Devī Worship - Brhat
- नवरात्रि के ज्योतिषीय और स्वास्थवर्धक फायदे : वैज्ञानिक निष्कर्ष के साथ
- अथ वेदोक्तं रात्रिसूक्तम् - Astroprabha
- रात्रि सूक्तम् (वेदोक्त एवं तांत्रोक्त) — अर्थ, महत्व और सम्पूर्ण - Aghordham
- Rigvedoktam Devi Suktam - ऋग्वेदोक्तं देवी सूक्तम् - पवित्र ग्रंथ
- सम्पूर्ण चण्डी पाठ (Durga Saptashati) - श्री दुर्गा सप्तशती
- देवी अथर्वशीर्ष - उपनिषद - TransLiteral Foundations
- Devi Bhagavatam Skandha 3 in English - Read, Listen & Ask
- श्रीमद्देवी भागवत (दुर्गा) पुराण के बारे में पूरी जानकारी
- श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण (Archive.org)
- Shrimad Devi Bhagwat Puran - Supreme Knowledge
- The Devi Bhagavatam: The Third Book: Chapter 5 - Sacred Texts
- श्रीवामनपुराण - अध्याय १७ - वामन पुराण Vaman Puran - Bookstruck
- vaman puran sanskrit - Scribd
- माँ दुर्गा और महिषासुर की कथा | सम्पूर्ण पौराणिक कहानी, अर्थ और महत्व
- The Greatness of The Markandeya Purana - Historified.in
- अध्याय 3: महिषासुर मर्दिनी - सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व
- Markandeya Purana 003 - YouTube
- दुर्गा सप्तशती / Durga Saptshati - Essence Of Astrology
- जब भगवान राम ने स्वयं नवरात्र का व्रत करके लंका पर की थी चढ़ाई - NBT
- Devi Mahatmya - Glory of the Goddess - GitHub
- श्रेष्ठ कौन मंत्र: नवार्ण, गायत्री या महामृत्युंजय
- श्री दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय: 6 शक्तिशाली जीवन मंत्र
- शाक्त संप्रदाय (तंत्र मार्ग): आदिशक्ति की सर्वोच्च उपासना, तंत्र
- शक्तिदेवता ! - सनातन संस्था - Sanatan.org
- वकता व सीजन्धसे - Archive.org
- Sanmarga Agama Visheshanka Kamla Dutta Tripathi - Archive.org
- १०वीं-११वीं सदी के बंगाल के स्वर्णिम युग, तांत्रिक वज्रयान बौद्ध पाल - Reddit
- Akaal Bodhan and Durga Puja: Rama's Worship of Durga - Advocate Tanmoy
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- नवरात्रि नवमी: जानें, नवदुर्गा के 9वें रूप का महत्व - AajTak
- द्वितीय परिच्छेद - वैधृति योग - TransLiteral Foundations
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- नवरात्रि पूजा : छाग बलि विधि और मंत्र - KarmkandVidhi
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- Powerful Mantras Of Durga Saptashati | 34 Mantras - GuruKripa
- मन्त्रमहोदधि - अष्टादश तरङ्ग - TransLiteral
- नवार्ण-विधि: नवर्नों (नवरूप) का पूजन कैसे करें - BDA
- तान्त्रोक्त नवदुर्गा साधना विधान - निखिल तन्त्र दर्शन
- ७४-॥नवरात्र/Happy Navratri!॥ - भक्तिपथ

