Bhagwat Raspanchadhyayi gopi geet: रासपंचाध्यायी भागवत अध्याय 31 गोपी गीत का दार्शनिक विश्लेषण

Sooraj Krishna Shastri
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Bhagwat Raspanchadhyayi gopi geet: रासपंचाध्यायी भागवत अध्याय 31 गोपी-गीत का दार्शनिक विश्लेषण

रासपंचाध्यायी का 31वां अध्याय 'गोपी-गीत' है। यह संपूर्ण भागवत महापुराण का हृदय, रत्न और सार-सर्वस्व है। पिछले अध्याय (30) में गोपियों ने 'कर्म' (खोज) किया था, लेकिन कृष्ण नहीं मिले। जब सारे प्रयास विफल हो गए, अहंकार पूरी तरह गल गया, तब वे यमुना के पुलिन (रेती) पर बैठकर सामूहिक रूप से 'रोदन' (क्रंदन) करने लगीं। यह गीत केवल गाना नहीं है, यह जीवात्मा की वह पुकार है जो परमात्मा को प्रकट होने पर विवश कर देती है। इसमें कुल 19 श्लोक हैं।

विषय: विरह की पराकाष्ठा, उलाहना, आत्म-निवेदन और शरणागति

1. ब्रज की महिमा और अपने वध का उलाहना (श्लोक 1-2)

गीत के आरंभ में गोपियों ने 'जयकार' की, लेकिन उसमें भी एक तीखा व्यंग्य (Upalambh) था।

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते॥ (10.31.1)

भावार्थ:

"हे प्यारे! तुम्हारे जन्म लेने से यह ब्रज बैकुंठ से भी अधिक महिमावान हो गया है। यहाँ लक्ष्मी जी (इन्दिरा) नित्य निवास करती हैं। लेकिन देखो, जिन्होंने तुम्हारे लिए अपने प्राण रोक रखे हैं, वे तुम्हारी गोपियाँ तुम्हें हर दिशा में ढूंढ रही हैं। तुम हमें दर्शन दो।"

  • तर्क: गोपियाँ कहती हैं कि लक्ष्मी जी तो यहाँ आ गईं, ब्रज धन्य हो गया, पर हम तो 'अनाथ' होकर मर रही हैं। यह कैसा न्याय है?
शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (10.31.2)

"हे वरद! शरद ऋतु के सुंदर कमल की शोभा को चुराने वाले अपने नेत्रों से तुम हमें घायल कर रहे हो। क्या अस्त्र-शस्त्र से मारना ही वध है? नहीं, आँखों से घायल करके तड़पाना भी तो वध ही है। और हम कौन हैं? हम तुम्हारी 'अशुल्क-दासिका' (बिना दाम की दासी) हैं।"

2. रक्षक ही भक्षक क्यों? (श्लोक 3-4)

गोपियों ने भगवान को उनकी पुरानी रक्षाओं की याद दिलाई।

विषजलाप्ययाद्व्याधराक्षसाद्... रक्षिता वयं। (10.31.3)

"हे प्रिय! तुमने कालिया नाग के विषैले जल से, अघासुर-बकासुर जैसे राक्षसों से, इंद्र की वर्षा से और दावानल से बार-बार हमारी रक्षा की है। अब इस 'विरह' रूपी मृत्यु से हमारी रक्षा क्यों नहीं कर रहे?"

दार्शनिक शिखर (वेदांत):

चौथे श्लोक में गोपियों का ज्ञान पक्ष उजागर होता है। वे जानती हैं कि कृष्ण केवल एक ग्वाल-बाल नहीं हैं।

न खलु गोपिकानन्दनो भवान् अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान सात्वतां कुले॥ (10.31.4)

"हे सखे! तुम केवल यशोदा के पुत्र (गोपिकानन्दन) नहीं हो। तुम तो समस्त शरीरधारियों के अंतःकरण के साक्षी (अंतरात्मा) हो। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर विश्व की रक्षा के लिए तुम यदुवंश में प्रकट हुए हो।"

  • यह श्लोक सिद्ध करता है कि गोपियों का प्रेम 'अंधा' नहीं है। वे कृष्ण के ब्रह्मत्व को जानती हैं, फिर भी उन्हें 'सखा' और 'प्रियतम' मानकर प्रेम करती हैं। यही 'ज्ञान-मिश्रित-भक्ति' की पराकाष्ठा है।

3. तुम्हारी कथा ही जीवन है (श्लोक 9 - संजीवनी मंत्र)

रोते-रोते गोपियाँ मूर्छित होने लगती हैं, लेकिन फिर उन्हें कृष्ण-कथा की याद आती है। यह 9वां श्लोक गोपी-गीत का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, जिसे 'भागवत का प्राण' कहा जाता है।

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥ (10.31.9)

अर्थ:

  • तव कथामृतं: तुम्हारी कथा अमृत स्वरूप है।
  • तप्तजीवनं: यह संसार की आग (विरह/ताप) में जलते हुए प्राणियों को जीवन देने वाली है।
  • कल्मषापहम्: यह सारे पापों और विकारों को नष्ट करने वाली है।
  • भूरिदा जनाः: जो लोग इस पृथ्वी पर तुम्हारी कथा का गान करते हैं, वे ही वास्तव में सबसे बड़े 'दानी' (भूरिदा) हैं।

महत्व: जब चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में भाव-विभोर होते थे, तो वे इसी श्लोक को बार-बार सुनते थे। गोपियाँ कहती हैं—"हे कृष्ण! यदि तुम नहीं आते, तो कम से कम अपनी कथा ही भेज दो, उसी के सहारे हम जी लेंगी।"

4. कृपा और उलाहना (श्लोक 10-15)

कथा की स्मृति से थोड़ा जीवन पाकर गोपियाँ फिर से प्रेम-कलह (उलाहना) करने लगती हैं।

  • "हे प्रिय! जब तुम गाय चराने वन में जाते हो, तो दिन का एक-एक क्षण हमारे लिए युग के समान बीतता है। और शाम को जब तुम लौटते हो, तो तुम्हारे सुंदर मुख को पलकें गिराकर देखने में भी हमें विधाता पर गुस्सा आता है कि उसने पलकें क्यों बनाईं? (जड उद्दृशाम - 10.31.15)"
  • "हमने पति, पुत्र, भाई, बंधु—सबका त्याग कर दिया और तुम्हारे गीत गाती हुई यहाँ आईं। क्या रात्रि के समय आईं हुई शरणागत नारियों को इस तरह छोड़ना उचित है?"

5. समर्पण की पराकाष्ठा (चरण-कमल का ध्यान)

अंतिम श्लोक (19वां) प्रेम की उस कोमलता को दर्शाता है, जहाँ प्रेमी को अपनी नहीं, बल्कि प्रियतम के कष्ट की चिंता होती है। इसे 'तत्सुख-सुखित्वम्' (प्रिय के सुख में ही अपना सुख) कहते हैं।

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ (10.31.19)

भावार्थ:

"हे प्यारे! तुम्हारे चरण कमल इतने कोमल हैं कि हम उन्हें अपने कठोर स्तनों (हृदय) पर भी डरते-डरते रखती हैं कि कहीं तुम्हें चोट न लग जाए। लेकिन उन्हीं कोमल चरणों से तुम रात के घोर अंधकार में कंकड़-पत्थरों से भरे जंगल में भटक रहे हो। क्या उनमें चोट नहीं लगती होगी? यह सोचकर हमारा मन चक्कर खा रहा है, हम मूर्छित हो रही हैं।"

विश्लेषण:

  • यहाँ गोपियों का 'स्व-सुख' पूरी तरह समाप्त हो गया है। वे कृष्ण से मिलने के लिए नहीं रो रहीं, बल्कि इस चिंता में रो रही हैं कि कृष्ण को कष्ट हो रहा होगा।
  • जब प्रेम इस अवस्था में पहुँचता है—जहाँ अपनी देह की सुध नहीं, केवल प्रियतम की चिंता हो—तभी परमात्मा प्रकट होते हैं।

अध्याय 31 का सार और निष्कर्ष

31वां अध्याय 'आत्म-निवेदन' (Surrender) का अध्याय है।

  • गोपियों ने तर्क, ज्ञान, व्यंग्य और प्रेम—सभी अस्त्र चलाकर देख लिए।
  • अंत में, उन्होंने अपनी चिंता छोड़कर कृष्ण के कोमल चरणों की चिंता की।
  • इस गीत ने गोपियों के हृदय से 'अहंकार' का अंतिम कण भी धो डाला।
  • परिणाम: जैसे ही यह गीत समाप्त हुआ और गोपियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं, वैसे ही अगले अध्याय (32) के पहले श्लोक में भगवान श्री कृष्ण उनके बीच वैसे ही प्रकट हो गए, जैसे अंधकार के बाद सूर्य प्रकट होता है।

गोपी-गीत हमें सिखाता है कि भगवान 'तपस्या' से नहीं, 'धन' से नहीं, बल्कि 'व्याकुलता' और 'अनन्य प्रेम' से मिलते हैं।

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