Bhagwat Raspanchadhyayi: रासपंचाध्यायी भागवत अध्याय 30 का दार्शनिक विश्लेषण
रासपंचाध्यायी का 30वां अध्याय 'विरह' और 'उन्माद' का अध्याय है। पिछले अध्याय (29) में गोपियों का कृष्ण से मिलन हुआ था, लेकिन प्रेम में जब 'सौभाग्य-मद' (अहंकार) आ जाता है, तो भगवान अंतर्धान हो जाते हैं। इस अध्याय में गोपियों की वह दशा वर्णित है जहाँ वे कृष्ण के वियोग में पागल होकर (उन्मत्तवत्) जड़-चेतन से उनका पता पूछती हैं और स्वयं कृष्ण बनकर उनकी लीलाओं का अभिनय करती हैं। इसे 'चित्र-जल्प' और 'लीला-अनुकरण' भी कहा जाता है।
विषय: भगवान का अंतर्धान, गोपियों की खोज और लीला-अनुकरण
1. भगवान के अंतर्धान का कारण (सौभाग्य-मद)
अध्याय की शुरुआत भगवान के अंतर्धान होने के कारण से होती है। भगवान प्रेम के भूखे हैं, अभिमान के नहीं।
प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत॥ (10.29.48 - प्रसंगवश)
विश्लेषण:
- गोपियों के मन में यह भाव आ गया कि "हम त्रिभुवन में सर्वश्रेष्ठ सुंदरियाँ हैं, स्वयं भगवान हमारे अधीन हैं।" (सौभाग्य-मद)।
- प्रेम में 'द्वैत' (मैं और तुम) बाधा है। जहाँ 'मैं' (अहंकार) है, वहाँ भगवान नहीं रह सकते।
- 'प्रशमाय प्रसादाय': भगवान का छिपना गोपियों को दंड देना नहीं, बल्कि 'प्रसाद' (कृपा) था। वे उनके अहंकार को मिटाकर उनके प्रेम को 'विशुद्ध' करना चाहते थे। जैसे कपड़े को साफ करने के लिए उसे पत्थर पर पटका जाता है, वैसे ही विरह की अग्नि में तपाकर भगवान गोपियों के अंतःकरण को निर्मल कर रहे थे।
2. गोपियों की उन्मत्त दशा (वृक्षों से पूछताछ)
श्रीकृष्ण के अचानक गायब होते ही गोपियाँ विरह में तड़प उठीं। उनकी दशा हथिनियों के उस झुंड जैसी हो गई जो अपने यूथपति (गजराज) से बिछड़ गई हों। वे 'उन्माद' (Divine Madness) की अवस्था में पहुँच गईं, जहाँ उन्हें जड़ और चेतन का भेद नहीं रहा। वे वृक्षों और लताओं से कृष्ण का पता पूछने लगीं।
अश्वत्थ, प्लक्ष और न्यग्रोध से प्रश्न:
नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः॥ (10.30.5)
"हे पीपल! हे पाकर! हे बरगद! क्या तुमने नन्दनन्दन को देखा है? वे अपनी प्रेमभरी मुस्कान और चितवन से हमारे मन को चुराकर ले गए हैं।"
- भावार्थ: गोपियाँ ऊंचे वृक्षों से इसलिए पूछ रही हैं क्योंकि वे ऊंचाई पर हैं और दूर तक देख सकते हैं। पीपल, पाकर और बरगद विष्णु, शिव और ब्रह्मा के प्रतीक माने जाते हैं, शायद वे ही बता सकें।
तुलसी से प्रश्न (अनन्य प्रेम):
सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद्दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ (10.30.7)
"हे कल्याणी तुलसी! तुम तो गोविन्द के चरणों की दासी हो और उन्हें अत्यंत प्रिय हो। क्या तुमने अपने प्रियतम अच्युत को देखा है?"
- गोपियों को लगता है कि तुलसी भगवान के चरणों में रहती हैं, इसलिए उन्हें अवश्य पता होगा। यहाँ गोपियों का 'मात्सर्य' (ईर्ष्या) नहीं, बल्कि तुलसी के प्रति सखी-भाव झलक रहा है।
पृथ्वी से प्रश्न:
"हे पृथ्वी देवी! तुम इतनी रोमांचित (हरी-भरी) क्यों हो रही हो? क्या तुम्हारे ऊपर केशव के चरण पड़े हैं?"
3. तन्मयता और लीला-अनुकरण (Abhinaya)
जब वृक्षों और लताओं ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो गोपियाँ निराशा के सागर में डूब गईं। फिर एक अद्भुत मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक घटना घटी। वे कृष्ण का चिंतन करते-करते स्वयं को ही कृष्ण मानने लगीं (अहं-ग्रह उपासना)।
लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः॥ (10.30.14)
लीलाओं का मंचन:
वे "मैं ही कृष्ण हूँ" (असावहं) कहकर भगवान की बाल-लीलाओं का अभिनय करने लगीं:
- पूतना वध: एक गोपी पूतना बनकर आई, दूसरी कृष्ण बनकर उसका दूध पीने (प्राण हरने) लगी।
- शकटासुर वध: एक गोपी छकड़ा (गाड़ी) बनकर लेटी, दूसरी ने उसे लात मारकर उलट दिया।
- गोवर्धन धारण: एक गोपी ने अपनी ओढ़नी (दुपट्टा) ऊपर उठाई और कहा, "हे ब्रजवासियों! डरो मत, मैंने इस पर्वत को उठा लिया है, अब इंद्र की वर्षा तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।"
- कालिया मर्दन: एक गोपी दूसरी गोपी के सिर पर चढ़कर नृत्य करने लगी, मानो कृष्ण कालिया नाग पर नाच रहे हों।
दार्शनिक रहस्य: यह केवल नाटक नहीं था। यह 'तन्मयता' की स्थिति है। जैसे नदी समुद्र में गिरकर समुद्र हो जाती है, वैसे ही गोपियों की चेतना कृष्ण-चेतना में विलीन हो गई। इसे वेदांत में 'कीट-भृंग न्याय' कहते हैं।
4. विशेष गोपी (श्रीराधा) का प्रसंग
खोजते-खोजते गोपियों ने जमीन पर भगवान के चरण-चिह्न देखे। लेकिन उन चरण-चिह्नों के साथ-साथ एक स्त्री के भी चरण-चिह्न थे।
अनयत्परया मुदा॥
यह देखकर अन्य गोपियाँ विस्मित हो गईं। उन्होंने अनुमान लगाया कि अवश्य ही वह कोई विशेष गोपी है जिसे भगवान अपने साथ एकांत में ले गए हैं। यहाँ भागवतकार ने उस गोपी का नाम नहीं लिया, लेकिन वैष्णव आचार्यों के अनुसार वह 'श्रीराधा' जी हैं।
राधा तत्व का प्रामाणिक श्लोक:
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः॥ (10.30.28)
अर्थ:
"अवश्य ही इस गोपी ने सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि की आराधना (राधितः) हमसे अधिक श्रेष्ठ रूप में की है। इसीलिए गोविन्द हम सबको छोड़कर प्रसन्नतापूर्वक इसे एकांत में ले गए हैं।"
विश्लेषण:
- 'राधितः' शब्द से ही 'राधा' नाम की उत्पत्ति मानी जाती है।
- भगवान ने उस विशेष गोपी को साथ क्यों लिया? यह दिखाने के लिए कि भगवान 'समदर्शी' होते हुए भी 'भजते अभजतो' के नियम से श्रेष्ठ भक्त को विशेष कृपा देते हैं।
- लेकिन, भगवान ने यह भी दिखाया कि उस विशेष प्रेम में भी अगर 'सूक्ष्म अहंकार' आ जाए, तो भगवान वहाँ भी नहीं टिकते।
5. विशेष गोपी का मान और द्वितीय अंतर्धान
जब भगवान उस विशेष गोपी (राधा) को लेकर वन में आगे बढ़े, तो उस गोपी के मन में भी एक सात्विक अभिमान आ गया। उसने सोचा, "मैं कितनी भाग्यशालिनी हूँ, जो भगवान ने अन्य सभी गोपियों को छोड़कर केवल मुझे चुना।"
उसने भगवान से कहा: "हे प्रियतम! मैं अब और नहीं चल सकती। मेरे पैर थक गए हैं। आप मुझे अपने कंधे पर उठा लीजिये।"
न पारयेऽहं चलितुम नय मां यत्र ते मनः॥ (10.30.37)
भगवान की लीला:
भगवान ने कहा, "ठीक है, मेरे कंधे पर चढ़ जाओ।" और जैसे ही वह गोपी चढ़ने लगी, भगवान वहीं अंतर्धान हो गए।
ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत॥ (10.30.38)
पश्चाताप:
भगवान के गायब होते ही वह विशेष गोपी विलाप करने लगी, "हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! आप कहाँ चले गए? मैं आपकी दासी हूँ, मुझे दर्शन दीजिये।"
तात्पर्य: प्रेम के साम्राज्य में 'मैं' और 'मेरा' के लिए रत्ती भर भी जगह नहीं है। चाहे वह साधारण गोपियाँ हों या प्रधान गोपी, भगवान अहंकार के लेशमात्र स्पर्श को भी सहन नहीं करते। वे पूर्ण समर्पण और शून्यता चाहते हैं।
6. पुनर्मिलन और यमुना पुलिन पर आगमन
अन्य गोपियाँ कृष्ण के चरण-चिह्नों को खोजती हुई वहाँ पहुंचीं, जहाँ वह विशेष गोपी विलाप कर रही थी।
- उस गोपी ने अपनी सखियों को बताया कि कैसे भगवान ने उसे विशेष कृपा दी, लेकिन उसके 'मान' (दोष) के कारण वे उसे भी छोड़कर चले गए।
- यह सुनकर अन्य गोपियों को आश्चर्य हुआ कि भगवान ने इसके साथ भी अपनी निष्ठुरता दिखाई।
- अब सब गोपियाँ एक हो गईं। 'विशेष' और 'सामान्य' का भेद मिट गया। सबका दुख एक था, सबका लक्ष्य एक था।
घोर अंधकार और वापसी:
वे सब मिलकर कृष्ण को खोजने के लिए घने वन में घुसीं। लेकिन जब उन्होंने देखा कि आगे घोर अंधकार है (जो अज्ञान और निराशा का प्रतीक है), तो वे वापस लौट आईं।
तद्गुणानेव गायन्त्यो नात्मागाराणि सस्मरुः॥ (10.30.43)
वे यमुना के उसी तट (पुलिन) पर वापस आ गईं जहाँ से रास शुरू हुआ था। उनका मन, उनकी वाणी, उनकी चेष्टा—सब कुछ कृष्णमय हो चुका था। उन्हें अपने घर-बार की सुध नहीं रही। अब उनके पास केवल एक ही सहारा बचा था—सामूहिक क्रंदन (प्रार्थना)। यही स्थिति अगले अध्याय (31) में 'गोपी-गीत' के रूप में प्रकट होती है।
अध्याय 30 का सार और निष्कर्ष
30वां अध्याय 'शोधन' (Purification) का अध्याय है।
- अंतर्धान: भगवान का छिपना प्रेम को 'तीव्र' करने की प्रक्रिया है।
- वृक्षों से प्रश्न: यह 'सर्वत्र ब्रह्म दर्शन' का अभ्यास है।
- लीला-अनुकरण: यह 'अद्वैत' (So-ham) की अनुभूति है।
- राधा प्रसंग: यह सिद्ध करता है कि प्रेम में 'अधिकार' की भावना भी बाधक है।
इस अध्याय ने गोपियों के बचे-खुचे अहंकार को पूरी तरह नष्ट कर दिया। अब वे पूरी तरह से 'दीन' और 'हृदयहीन' हो चुकी हैं। जब अहंकार शून्य हो जाता है, तभी असली पुकार (गोपी-गीत) निकलती है, जो भगवान को प्रकट होने पर विवश कर देती है।

