महाराज रघु की मंत्र-शक्ति और रघुकुल की मर्यादा|The Spiritual Power of Maharaj Raghu and the Tradition of Raghukul

Sooraj Krishna Shastri
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महाराज रघु की मंत्र-शक्ति और रघुकुल की मर्यादा|The Spiritual Power of Maharaj Raghu and the Tradition of Raghukul


✨ परिचय

अयोध्या के सूर्यवंशी चक्रवर्ती सम्राट महाराज रघु का नाम भारतीय इतिहास और साहित्य में अमर है। इन्हीं के नाम पर "रघुकुल" या "रघुवंश" की परंपरा चली, जो सत्य, मर्यादा, धर्मपालन, वचन-निष्ठा और शौर्य के लिए प्रसिद्ध है। इसी वंश में राजा भागीरथ, अंबरीष, दिलीप, रघु, दशरथ और भगवान श्रीराम जैसे महापुरुष हुए।


🔥 रावण का षड्यंत्र

त्रिकालदर्शी और मायावी रावण को विदित था कि उसकी मृत्यु श्रीराम के हाथों होगी। इसी कारण वह अयोध्या और उसके राजवंश को नष्ट करने का संकल्प किए हुए था।
एक अवसर पर वह ब्राह्मण का वेष धारण कर अयोध्या पहुंचा। उस समय महाराज रघु सिंहासनासीन थे। रघु के शासनकाल में ब्राह्मणों को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था, इसलिए वे स्वतंत्र रूप से दरबार तक आ-जा सकते थे।


👑 रावण और अयोध्या का सिंहासन

एक दिन अवसर पाकर रावण अयोध्या के राजसिंहासन कक्ष में पहुंचा।

  • सिंहासन स्वर्णमंडित चबूतरे पर स्थित था, जिसकी सीढ़ियां चढ़कर उस पर जाया जाता था।
  • पीछे विशाल दर्पण लगे थे जो सिंहासन की गरिमा को और बढ़ाते थे।

उस अपूर्व राजसिंहासन को देखकर रावण के मन में लालसा जागी कि वह स्वयं उस पर बैठे। किंतु जैसे ही वह सीढ़ियां चढ़ा, दर्पणों में ब्राह्मण रूप नहीं, बल्कि उसका लंकाधिपति रावण वाला वास्तविक स्वरूप दिखाई देने लगा।
डरकर वह नीचे उतर आया और पुनः प्रयास किया, पर हर बार वही परिणाम हुआ।
रावण समझ गया कि अयोध्या का राजसिंहासन कपट और छल को स्वीकार नहीं करता।

महाराज रघु की मंत्र-शक्ति और रघुकुल की मर्यादा|The Spiritual Power of Maharaj Raghu and the Tradition of Raghukul
महाराज रघु की मंत्र-शक्ति और रघुकुल की मर्यादा|The Spiritual Power of Maharaj Raghu and the Tradition of Raghukul



🌊 सरयू तट पर रघु और रावण का सामना

इसके बाद रावण सरयू नदी के तट पर पहुंचा। वहां उसने देखा कि महाराज रघु संध्यावंदन कर रहे हैं।
रावण भी कर्मकाण्ड का महान ज्ञाता था। वह समीप बैठकर उनकी विधि देखता रहा।

संध्या के उपरांत रावण ने कहा –
“राजन! आप महान धर्मनिष्ठ हैं, किंतु संध्या में त्रुटि की। आपने आचमन का जल पीने के स्थान पर पूर्व दिशा में फेंक दिया।”


🕉 महाराज रघु का उत्तर

महाराज रघु ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया –
“विप्रवर! जब मैंने जल ग्रहण किया, तभी मैंने देखा कि सरयू के उस पार एक सिंह ने गौ पर आक्रमण कर दिया है।
मैंने अघमर्षण मंत्र का उच्चारण कर उस मंत्र-जल को सिंह पर फेंका। जल के प्रभाव से सिंह तत्काल मारा गया और गौ की रक्षा हो गई।

धर्मरक्षा के लिए संध्यावंदन में इस प्रकार का परिवर्तन शास्त्रसम्मत है। अतः हमारी संध्या अशुद्ध नहीं हो सकती।”


🌼 रावण का सत्य से साक्षात्कार

रावण ने सत्यता की परीक्षा लेने का निश्चय किया और सरयू के उस पार पहुंचा।
वहां उसने सचमुच एक मृत सिंह को पड़ा पाया तथा पास ही गौ के खुरों के चिह्न देखे।

अब रावण के मन में यह विचार दृढ़ हुआ –
“यदि महाराज रघु की मंत्र-शक्ति मात्र एक जलकण से सिंह का संहार कर सकती है, तो यदि यही जल लंका की ओर फेंका जाए, तो लंका का विनाश निश्चित है।”

भय और श्रद्धा से अभिभूत रावण ने दूर से ही महाराज रघु को प्रणाम किया और प्रण लिया कि रघु के शासनकाल में वह अयोध्या का अपमान करने का साहस नहीं करेगा।


🌟 निष्कर्ष

इस प्रकार महाराज रघु ने न केवल अपने धर्म और संकल्प की शक्ति का परिचय दिया, बल्कि यह सिद्ध कर दिया कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए प्रयुक्त शक्ति ही वास्तविक शक्ति है।
उनके आदर्श आज भी “रघुकुल रीत” के रूप में लोक में गाए जाते हैं –

👉 “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई।”


🌸🚩 ऐसे थे धर्मनिष्ठ, प्रतापी और मंत्रशक्ति से संपन्न महाराज रघु, जिनकी कीर्ति से रघुवंश अमर हो गया। 🚩🌸

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