Kabir Das Bhakti Darshan: जब मैं था तब हरि नहीं – अहंकार से मुक्ति और सच्चे सुख की प्राप्ति

Sooraj Krishna Shastri
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संत कबीरदास के दोहे “जब मैं था तब हरि नहीं” का गहन अर्थ जानें। गीता के श्लोकों सहित अहंकार से मुक्ति और भक्ति से स्थायी सुख का रहस्य।

Kabir Das Bhakti Darshan: जब मैं था तब हरि नहीं – अहंकार से मुक्ति और सच्चे सुख की प्राप्ति


🌿 "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं" — अहंकार से भगवत्सत्ता तक की यात्रा

🕉️ 1. कबीरदास जी का अमृतवचन और उसका भावार्थ

"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।"

कबीरदास जी कहते हैं —
जब इस हृदय में ‘मैं’ अर्थात् अहंकार का वास था, तब उसमें परमात्मा का प्रवेश नहीं था। परंतु अब जब उसमें ‘हरि’ का वास हो गया, तब ‘मैं’ का अभाव है।
यह हृदय रूपी प्रेम की गली इतनी संकरी है कि उसमें दो — ‘अहं’ और ‘हरि’ — एक साथ नहीं रह सकते।
अर्थात् जहाँ अहंकार है, वहाँ ईश्वर नहीं; और जहाँ ईश्वर हैं, वहाँ ‘मैंपन’ का अंश भी नहीं।

Kabir Das Bhakti Darshan: जब मैं था तब हरि नहीं – अहंकार से मुक्ति और सच्चे सुख की प्राप्ति
Kabir Das Bhakti Darshan: जब मैं था तब हरि नहीं – अहंकार से मुक्ति और सच्चे सुख की प्राप्ति



🌼 2. भक्ति योग में अहंकार का विसर्जन

ज्ञान योग और अष्टांग योग में अहंकार से मुक्त होने के लिए अनेक साधनाएँ करनी पड़ती हैं — ध्यान, एकाग्रता, और नियंत्रण।
किन्तु भक्ति योग में यह अत्यंत सरल है।
हम ‘अहं’ के आगे केवल ‘दास’ जोड़ देते हैं —

दासोऽहम् — “मैं भगवान का सेवक हूँ।”

अब यह अहं चेतना भगवत् चेतना में परिवर्तित हो जाती है।
‘मैं’ अब अलग सत्ता नहीं रहती — वह ईश्वर के कार्य का साधन बन जाती है।


📜 3. गीता का साक्ष्य — विनम्रता और आत्मसंयम

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌ ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ (गीता 13.7-8)

इन गुणों का अर्थ है —

  • विनम्रता — मान-अपमान के भाव से परे रहना,
  • दंभहीनता — कर्तापन का त्याग,
  • अहिंसा — किसी को कष्ट न पहुँचाना,
  • क्षमा — सभी के प्रति क्षमाशील होना,
  • सरलता — सत्य को न छिपाना,
  • पवित्रता — मन व शरीर की शुद्धता,
  • गुरुभक्ति — श्रद्धा सहित सेवा,
  • स्थैर्य — संकल्प में दृढ़ता,
  • आत्मसंयम — इन्द्रियों को वश में रखना।

🌺 4. आध्यात्मिक सुख बनाम भौतिक सुख

सिय राम मय सब जग जानी — जब यह अनुभूति होती है, तब सुख का स्वरूप ही बदल जाता है।

आध्यात्मिक सुख आंतरिक, शाश्वत और आत्मानुभूति से प्राप्त होता है, जबकि भौतिक सुख अस्थायी और बाहरी है।
सच्चे सुख की प्राप्ति के लिए हमें ध्यान, सत्संग, सेवा, भक्ति, और संतोष जैसे आंतरिक साधनों का अभ्यास करना पड़ता है।

आध्यात्मिक सुख मन की उत्तेजना से परे है —
यह आत्मा से जुड़ता है और इसीलिए स्थायी है।


🪷 5. इंद्रिय सुखों से वैराग्य — गीता का निर्देश

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शनम् ॥ (गीता 13.8)

ज्ञान का अर्थ है —
इंद्रिय-सुखों से विरक्ति,
अहंकार का अभाव,
और जीवन-मृत्यु-बुढ़ापे-रोग आदि के दुःखों पर बार-बार विचार करना।
इससे व्यक्ति संसार के असत्य सुखों से विमुख होता है और सत्य की ओर बढ़ता है।


🌿 6. क्षणिक सुख और स्थायी विषाद

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ (गीता 18.38)

जो सुख इन्द्रिय और विषयों के संयोग से होता है, वह आरंभ में अमृत समान लगता है, पर अंत में विष समान दुःख देता है।
यह राजस सुख है — क्षणिक और मृगतृष्णा समान।


🔆 7. ज्ञानी पुरुष की दृष्टि

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ (गीता 5.22)

इन्द्रिय विषयों से उत्पन्न भोग दुःख के कारण हैं।
उनका आदि और अंत होता है — इसलिए ज्ञानी पुरुष उनमें आनंद नहीं लेते।

वह जानता है कि बाहरी सुख क्षणिक हैं;
स्थायी आनंद केवल भीतर है — मन के स्थिर और निर्मल होने में।


🔮 8. भक्ति में सद्गुणों की उत्पत्ति

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना
सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः ।
हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा
मनोरथेनासति धावतो बहिः ॥ (भागवत 5.18.12)

जिसमें भगवान के प्रति अनन्य भक्ति होती है,
उसमें सभी देवताओं के दिव्य गुण अपने आप प्रकट होते हैं —
धर्म, ज्ञान, क्षमा, और करुणा।
परंतु जिसमें भक्ति नहीं, उसका सारा ज्ञान केवल बाह्य प्रदर्शन है।


🌞 9. स्थायी सुख का स्रोत — भीतर का परमात्मा

मनुष्य के लिए सुख की खान बाहर नहीं, भीतर है।
बाहरी सुख केवल उसकी छाया है।
सच्चा सुख तब मिलता है जब चित्त स्थिर होता है, और मन परमात्मा से जुड़ जाता है।
इसी को साधना धर्म कहते हैं।

धर्म ही वह मार्ग है जो हमें क्षणिक सुख छोड़कर अक्षय सुख की ओर ले जाता है।


🌸 10. तुलसीदास जी का अमृत उपदेश

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू।
सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू॥
सुलभ सुखद मारग यह भाई।
भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥

अर्थात् —
यदि तुम इस लोक और परलोक दोनों में सुख चाहते हो,
तो मेरे वचन को हृदय में दृढ़ता से धारण करो।
यह मार्ग अत्यंत सहज और सुखद है — यह है भक्ति का मार्ग।
पुराण और श्रुतियाँ भी इसी की महिमा गाती हैं।


🌼 समग्र निष्कर्ष

🌺 अहं का अंत ही हरि की शुरुआत है।
🌺 भक्ति वह सेतु है जो ‘मैं’ से ‘तू’ तक पहुँचाती है।
🌺 सच्चा सुख भीतर है, जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं।



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