पन्ना धाय जयन्ती 8 मार्च: मातृभूमि के प्रति अद्वितीय त्याग की प्रतीक

Sooraj Krishna Shastri
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पन्ना धाय जयन्ती 8 मार्च: मातृभूमि के प्रति अद्वितीय त्याग की प्रतीक

पन्ना धाय जयन्ती 8 मार्च: मातृभूमि के प्रति अद्वितीय त्याग की प्रतीक

आज जब सम्पूर्ण संसार विश्व महिला दिवस मना रहा है तो मैं अपनी मातृभूमि के प्रति महान त्याग की मूर्ति पन्ना धाय की हम जयंती मना रहे हैं। पन्ना धाय भारतीय इतिहास की उन वीर माताओं में से एक हैं, जिनकी कर्तव्यनिष्ठा, बलिदान और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा का कोई सानी नहीं है। उन्होंने न केवल मेवाड़ के वैध उत्तराधिकारी राणा उदय सिंह के प्राणों की रक्षा की, बल्कि अपने सगे पुत्र का बलिदान देकर मातृत्व को भी देशसेवा के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर दिया।


1. पन्ना धाय का परिचय

पन्ना धाय का जन्म राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में एक सामंत परिवार में 8 मार्च 1501 में हुआ था। वे राणा सांगा के दरबार में सेवा करती थीं और उनके पुत्र राणा उदय सिंह की धाय (पालन-पोषण करने वाली) थीं। धाय मात्र एक सेविका नहीं होती थी, बल्कि वह शिशु का उसी प्रकार लालन-पालन करती थी जैसे एक माता अपने पुत्र का करती है।

पन्ना धाय की पृष्ठभूमि

  • पन्ना धाय का विवाह एक वीर सैनिक से हुआ था, जो मेवाड़ की सेना में कार्यरत थे।
  • उनका एक पुत्र था, जिसका नाम चित्तू था।
  • उन्होंने राणा उदय सिंह को अपने पुत्र के समान पाला।

2. मेवाड़ की राजनीतिक स्थिति

राणा सांगा के शासनकाल में मेवाड़ एक शक्तिशाली राज्य था, लेकिन उनके निधन के बाद राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गई। उनके पुत्र राणा विक्रमादित्य कमजोर शासक साबित हुए और दरबारी उनसे असंतुष्ट हो गए। इसी बीच, बनवीर नामक षड्यंत्रकारी (जो राणा सांगा के सौतेले भाई पृथ्वीराज का पुत्र था) ने सत्ता हथियाने की योजना बनाई।

बनवीर का षड्यंत्र

  • बनवीर ने राजमहल में अपनी शक्ति बढ़ा ली और धीरे-धीरे सत्ता पर कब्ज़ा करने लगा।
  • उसने राणा विक्रमादित्य को हटाने के बाद सत्ता पाने की योजना बनाई।
  • उसने न केवल स्वयं को राजा घोषित करने का प्रयास किया, बल्कि राणा उदय सिंह को भी मार डालने का षड्यंत्र रचा ताकि मेवाड़ के वैध उत्तराधिकारी का अंत हो जाए।

3. मातृत्व और कर्तव्य का अद्वितीय बलिदान

राणा उदय सिंह की रक्षा की योजना

जब पन्ना धाय को यह ज्ञात हुआ कि बनवीर सैनिकों को भेजकर राणा उदय सिंह की हत्या करवाना चाहता है, तो उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया।

  • उन्होंने उदय सिंह को सुरक्षित स्थान पर छुपाया और अपने पुत्र चित्तू को उदय सिंह के स्थान पर सुला दिया।
  • जब बनवीर के सैनिक महल में आए, तो उन्होंने बिना सोचे-समझे बिस्तर पर सोए हुए बच्चे का सिर काट दिया।
  • यह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि पन्ना धाय का पुत्र चित्तू था।

यह एक ऐसा त्याग था, जो इतिहास में अमर हो गया।


4. उदय सिंह को बचाने का संघर्ष

कुंभलगढ़ की यात्रा

बेटे के बलिदान के बावजूद, पन्ना धाय ने अपने आंसुओं को बहने नहीं दिया और तत्काल राणा उदय सिंह को लेकर महल से निकल पड़ीं।

  • वे रात के अंधेरे में छिपते-छिपाते महल से बाहर निकलीं।
  • कई जंगलों और कठिन रास्तों को पार कर वे उदय सिंह को लेकर कुंभलगढ़ पहुँचीं।
  • कुंभलगढ़ के किले में उदय सिंह को संरक्षित रखा गया।

सिसोदिया सरदारों का समर्थन

पन्ना धाय की वीरता और समर्पण को देखकर मेवाड़ के कई सरदारों ने उदय सिंह का समर्थन किया और उन्हें राजा बनाने के लिए एकजुट हुए।


5. उदय सिंह का राज्यारोहण और पन्ना धाय का अज्ञातवास

कुछ समय बाद, मेवाड़ के वीर सरदारों ने बनवीर को हराकर राणा उदय सिंह को चित्तौड़गढ़ का वैध शासक घोषित किया।

पन्ना धाय का त्याग

  • जब उदय सिंह सिंहासन पर बैठे, तो उन्होंने पन्ना धाय को सम्मानित करने का प्रयास किया।
  • किंतु पन्ना धाय ने किसी भी पद या सम्मान को स्वीकार नहीं किया।
  • वे महल छोड़कर कहीं चली गईं और इतिहास में उनके जीवन का अंत एक रहस्य बन गया।

6. पन्ना धाय का ऐतिहासिक योगदान

वीरता और त्याग का प्रतीक

पन्ना धाय केवल एक दासी नहीं थीं, बल्कि वे मातृभूमि के लिए अपने पुत्र का बलिदान करने वाली महान नारी थीं।

नारी सशक्तिकरण का उदाहरण

  • पन्ना धाय का साहस दिखाता है कि नारी केवल कोमल हृदय वाली माता नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के लिए कठोर निर्णय लेने वाली योद्धा भी हो सकती है।
  • उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति के आगे व्यक्तिगत सुख-दुख का कोई मूल्य नहीं है।

इतिहास में स्थान

पन्ना धाय की गाथा राजस्थान और पूरे भारत में वीर माताओं की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान पर है।


7. निष्कर्ष

पन्ना धाय का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र और कर्तव्य के लिए बलिदान सर्वोपरि है। उनका जीवन सदैव प्रेरणा स्रोत रहेगा और उनकी कथा भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी। वे केवल एक महिला नहीं, बल्कि एक महानायक थीं, जिन्होंने अपने पुत्र की कुर्बानी देकर मेवाड़ के भविष्य को सुरक्षित किया।

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