💌 रुक्मिणी का पत्र (भागवत कथा)
विदर्भ देश के राजा भीष्मक की कन्या रुक्मिणी ने भगवान के चरित्र और कीर्ति बहुत से लोगों से सुनी थी। इस कारण उसने निश्चय कर लिया था कि "मैं भगवान के साथ ही विवाह करूँगी।" भगवान के कानों में भी उसके शील, गुण और सुंदरता की ख्याति पड़ चुकी थी और उन्होंने भी उसे अपने योग्य समझ रखा था। राजा भीष्मक भी यही चाहते थे कि इन दोनों का विवाह हो, किन्तु उनके पुत्र रुक्मी की यह तीव्र इच्छा थी कि रुक्मिणी शिशुपाल को दी जाय।
अंत में रुक्मी का ही निश्चय स्थिर रहा। यह जानकर रुक्मिणी अत्यंत दुःखी हुई और उसने श्रीकृष्ण भगवान को पाने का एक उपाय सोचा। उसने एक सुशील ब्राह्मण को पत्र देकर शीघ्रता से भगवान को लिवा लाने के लिए भेजा...
॥ श्री रुक्मिणी सन्देश ॥
श्रुत्वा गुणान् भुवनसुंदर श्रृण्वतां ते
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोंऽगतापम्।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे।।
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोंऽगतापम्।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे।।
अर्थ: हे भुवन सुंदर! हे अच्युत! सुनने वाले मनुष्यों के कर्ण छिद्र से अंतःकरण में प्रवेश करके तीनों तापों को हरने वाले तुम्हारे गुणों को सुनकर तथा नेत्रधारी पुरुषों के नेत्रों को सकल प्रयोजन प्राप्त कराने वाले तुम्हारे रूप को सुनकर, मेरा निर्लज्ज चित्त आप में आसक्त हो गया है।
❓ शंका: ऐसा उद्धतपना (निर्लज्जता) कुलीन कन्या के लिए योग्य नहीं है?
💡 समाधान: रुक्मिणी जी कहती हैं- यह संदेह मन में मत लाओ क्योंकि --
💡 समाधान: रुक्मिणी जी कहती हैं- यह संदेह मन में मत लाओ क्योंकि --
का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप-
विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम्।
धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या
काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्।।
विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम्।
धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्या
काले नृसिंह नरलोकमनोऽभिरामम्।।
अर्थ: हे मुकुन्द! हे नृसिंह! ऐसी कौन सी कुलीन, बहुगुणवती तथा धैर्यवती कन्या है जो सत्कुल में उत्पन्न, सुंदर स्वभाव और रूपयुत, सर्वविद्यावान्, धनाढ्य और अनुपम तेजस्वी तथा संपूर्ण जन्तुओं को आनन्द देने वाले आपको विवाह के योग्य काल में पतिरूप से न वरेगी? अर्थात सभी वरेंगी, अतः मुझमें दोष की आशंका नहीं होनी चाहिए।
तन्मे भवान्खलु वृतः पतिरंग जाया-
मात्मार्पितश्च भवतोऽत्र विभो विधेहि।
मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्य आराद्
गोमायुवन्मृगपतेर्बलिम्मबुजाक्ष।।
मात्मार्पितश्च भवतोऽत्र विभो विधेहि।
मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्य आराद्
गोमायुवन्मृगपतेर्बलिम्मबुजाक्ष।।
अर्थ: हे विभो! इस कारण मैंने आपको अपना पति वर लिया है और अपना देहादि भी आपको पत्नीरूप से अर्पण कर दिया है। आप यहाँ आकर मुझे अपनी भार्या बनाकर ले जाइये। हे अम्बुजाक्ष! आप वीर हैं, आपके भाग (मुझे) को शिशुपाल रूपी गीदड़ (शृगाल) शीघ्र आकर स्पर्श न करे, जैसे सिंह के भाग को गीदड़ नहीं छू सकता।
पूर्तेष्टदत्तनियमव्रतदेवविप्र-
गुर्वर्चनादिभिरलं भगवान् परेशः।
आराधितो यदि गदाग्रज एत्य पाणिं
गृह्णातु मे न दमघोषसुतादयोऽन्ये।।
गुर्वर्चनादिभिरलं भगवान् परेशः।
आराधितो यदि गदाग्रज एत्य पाणिं
गृह्णातु मे न दमघोषसुतादयोऽन्ये।।
अर्थ: यदि मैंने किसी जन्म में पूर्त (कूपादि बनवाना), इष्ट (अग्निहोत्रादि), दान, नियम (तीर्थयात्रादि), व्रत या देव, विप्र और गुरु की पूजा आदि से भगवान परमेश्वर की बड़ी आराधना की है, तो उससे प्रसन्न हुए आप गदाग्रज (श्रीकृष्ण) ही यहाँ आकर मेरा पाणिग्रहण करें, दूसरे शिशुपालादि न करें।
❓ शंका: तुम्हारे बांधवों (भाई-पिता) ने तो तुमको शिशुपालादि को दे दिया है, भगवान वहाँ आकर क्या करेंगे?
💡 समाधान: रुक्मिणी जी आगे कहती हैं-
💡 समाधान: रुक्मिणी जी आगे कहती हैं-
श्वोभाविनि त्वमजितोद्वहने विदर्भान्
गुप्तः समेत्य पृतनापतिभिः परीतः।
निर्मथ्य चैद्यमगधेन्द्रबलं प्रसह्य
मां राक्षसेन विधिनोद्वह वीर्यशुल्काम्।।
गुप्तः समेत्य पृतनापतिभिः परीतः।
निर्मथ्य चैद्यमगधेन्द्रबलं प्रसह्य
मां राक्षसेन विधिनोद्वह वीर्यशुल्काम्।।
अर्थ: हे अजित! विवाह के एक दिन पहले बिना सेना के गुप्तरूप से आप विदर्भ देश में आकर, फिर अपने सेनापतियों से चारों ओर घिरकर, तदनन्तर शिशुपाल, जरासंध आदि राजाओं की सेना का विध्वंस करके, 'राक्षस विधि' से विवाह करके, अपने पराक्रम रूपी मूल्य (वीर शुल्क) देकर मुझे ले जाइये।
❓ शंका: यदि आप यह कहें कि तुम्हारे बन्धु आदि का वध किये बिना ही अंतःपुर में रहने वाली तुमको मैं कैसे विवाह कर ला सकता हूँ?
💡 समाधान: तो इसका उपाय मैं बतलाती हूँ-
💡 समाधान: तो इसका उपाय मैं बतलाती हूँ-
अन्तःपुरान्तरचरीमनिहत्य बन्धूं-
स्त्वामुद्वहे कथमिति प्रवदाम्युपायम्।
पूर्वेद्युरस्ति महती कुलदेवियात्रा
यस्यां बहिर्नववधूर्गिरिजामुपेयात्।।
स्त्वामुद्वहे कथमिति प्रवदाम्युपायम्।
पूर्वेद्युरस्ति महती कुलदेवियात्रा
यस्यां बहिर्नववधूर्गिरिजामुपेयात्।।
अर्थ: हमारे कुल में यह प्रथा है कि विवाह के पहले दिन कुलदेवी की पूजा की बड़ी यात्रा होती है। उस अवसर पर नववधू माता गिरिजा (पार्वती) की पूजा करने के लिए नगर के बाहर जाती है। आप मुझे वहीं से हरण कर लीजियेगा, इससे मेरे बंधुओं का वध भी नहीं होगा।
❓ शंका: यदि यह शंका हो कि इतना अनर्थोत्पादक आग्रह क्यों? शिशुपाल भी तो गुण-कर्म से प्रख्यात है?
💡 समाधान: तो मैं (रुक्मिणी) कहती हूँ---
💡 समाधान: तो मैं (रुक्मिणी) कहती हूँ---
यस्याङ्घ्रिपंकजरजः स्नपनं महान्तो
वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै।
यर्ह्मम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं
जह्यामसून्व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात्।।
वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै।
यर्ह्मम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं
जह्यामसून्व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात्।।
अर्थ: हे अम्बुजाक्ष! आपके चरण कमल की धूलि में महादेव तथा उनके समान अन्य ब्रह्मादिक भी अपने अज्ञान को दूर करने के लिए स्नान करने की इच्छा करते हैं। यदि मैं आपका प्रसाद न पाऊँगी, तो उपवासादि व्रत से देह को सुखाकर प्राणों को त्याग दूंगी। ऐसा मैं सौ जन्मों तक करती रहूंगी, कभी तो किसी जन्म में आपका प्रसाद मिलेगा ही।
— जय श्री कृष्ण —
Bhagwat Darshan
Bhagwat Darshan
