Mangal Dosh Effects on Marriage: मंगल दोष के शुभ-अशुभ परिणाम

Sooraj Krishna Shastri
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 प्रस्तुत “मंगली विचार” (मंगल दोष का विवेचन) अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसे यहां व्यवस्थित, गूढ़ तथा विस्तृत रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।


Mangal Dosh Effects on Marriage: मंगल दोष के शुभ-अशुभ परिणाम

१. मंगल दोष की परिभाषा

जन्मकुंडली में मंगल ग्रह यदि कुछ विशेष स्थानों पर स्थित हो तो वैवाहिक जीवन में कष्ट, पति-पत्नी के बीच असमझदारी, मानसिक अशांति, अथवा जीवनसाथी के स्वास्थ्य एवं आयु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसे ही मंगली दोष अथवा कुज दोष कहते हैं।


२. मंगल दोष के स्थान

शास्त्रों के अनुसार, यदि मंगल लग्न से अथवा चंद्र से —

  • १ (लग्न)
  • ४ (सुख भाव)
  • ७ (सप्तम भाव – विवाह, पति/पत्नी का भाव)
  • ८ (आयु भाव, पति-पत्नी का दाम्पत्य जीवन)
  • १२ (व्यय भाव – शयन, सुख, हानि का भाव)

में स्थित हो तो इसे मंगली दोष कहा जाता है।

🔹 पुरुष की कुण्डली में मंगल का होना पत्नी के लिए कष्टकारक माना जाता है।
🔹 स्त्री की कुण्डली में मंगल का होना पति के लिए अशुभ फलदायी होता है।

Mangal Dosh Effects on Marriage: मंगल दोष के शुभ-अशुभ परिणाम
Mangal Dosh Effects on Marriage: मंगल दोष के शुभ-अशुभ परिणाम



३. मंगल दृष्टि का प्रभाव

  • लग्न में मंगल → ७वें और ८वें घर को देखता है, जिससे विवाह और आयु पर प्रभाव।
  • ४थे घर में मंगल → ७वें घर (पति/पत्नी) पर दृष्टि डालता है।
  • ७वें घर में मंगल → लग्न और २रे भाव को देखता है।
  • ८वें घर में मंगल → २रे भाव (परिवार, वाणी) को देखता है, पति-पत्नी के आयु संबंधी दोष प्रकट करता है।
  • १२वें घर में मंगल → ७वें भाव को देखता है, जिससे वैवाहिक सुख पर विपरीत असर।

४. पापग्रहों की स्थिति

यदि मंगल के साथ अन्य पापग्रह (शनि, राहु, केतु, सूर्य) भी हों या उनकी दृष्टि पड़ रही हो, तो दोष और अधिक प्रबल हो जाता है।

  • विशेषकर ७वें एवं ८वें भाव में पापग्रहों की स्थिति विवाह को अत्यंत कष्टकारी बना सकती है।
  • दूसरी ओर, यदि शुभग्रह (गुरु, शुक्र, चंद्र) दृष्टि करें, तो दोष का निवारण भी हो सकता है।

५. मंगली दोष के अपवाद (निवारण स्थिति)

कुछ स्थितियाँ ऐसी हैं जब मंगल होने पर भी दोष मान्य नहीं होता, जैसे—

  1. शनि का स्थान

    यदि लग्न से १, ४, ७, ८ या १२ भाव में शनि स्थित हो, तो मंगली दोष का प्रभाव कम हो जाता है।

  2. विशेष राशियों में मंगल

    • मेष लग्न में लग्नस्थ मंगल
    • धनु लग्न में १२वें भाव में मंगल
    • वृश्चिक लग्न में ४थे भाव में मंगल
    • मकर लग्न में सप्तम भाव में मंगल
    • कर्क लग्न में अष्टम भाव में मंगल
      👉 इन स्थितियों में मंगली दोष विशेष रूप से निरस्त माना जाता है।
  3. मंगल का नीच, अस्त, वक्री या शत्रु राशि में होना→ दोष क्षीण हो जाता है।

  4. गुरु या शुक्र की दृष्टि

    यदि गुरु या शुक्र सप्तम पर बलवान दृष्टि डालें, तो मंगल दोष का निवारण होता है।

  5. दोनों कुंडलियों में मंगल

    यदि वर और वधू, दोनों की कुण्डलियों में मंगल समान रूप से हो (दोनो मंगली हों), तो दोष शून्य हो जाता है।


६. अन्य ग्रहों के साथ सम्बंध

  • यदि किसी की कुंडली में मंगल हो, तो दूसरे की कुंडली में शनि या राहु होने से भी दोष कुछ हद तक शान्त हो सकता है।
  • यदि मंगल चंद्र के साथ हो या केन्द्र (१, ४, ७, १०) में हो, तो भी दोष कम हो जाता है।

७. मंगल दोष और गुण मिलान

  • यदि वर-वधू की कुण्डलियों में २७ से अधिक गुण मिलते हों, तो मंगल दोष का भय नहीं माना जाता।
  • परंतु यदि कन्या का मंगल प्रबल हो और वर का साधारण, तो दाम्पत्य जीवन असंतुलित हो सकता है।

८. शुभ परिणाम की स्थितियाँ

मंगल दोष सदैव अशुभ नहीं होता।

  • यदि मंगल उच्च राशि (मकर) में हो या स्वराशि (मेष, वृश्चिक) में हो,
  • या बलवान होकर शुभग्रहों की दृष्टि में हो,
    👉 तो यह सौन्दर्य, ऐश्वर्य, साहस, दाम्पत्य सुख, रूप एवं वैभव प्रदान करता है।

९. निष्कर्ष

  • मंगल दोष का विचार केवल मंगल से ही नहीं, बल्कि लग्नेश, सप्तमेश, चंद्र, गुरु, शुक्र तथा अन्य ग्रहों के बलाबल, दृष्टि एवं स्थान से करना चाहिए।
  • केवल मंगल को देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि बहुत बार दोष स्वतः निरस्त हो जाता है।
  • विवाह निर्णय में मंगल दोष पर इतना ही ध्यान दें जितना आवश्यक है, परन्तु सर्वांगीण कुंडली विश्लेषण और गुण मिलान अधिक महत्त्वपूर्ण है।

👉 संक्षेप में —
मंगली दोष वास्तविकता में तब प्रभावी होता है जब मंगल बलवान हो, पापग्रहों से युक्त हो या अशुभ दृष्ट हो, और दूसरे पक्ष की कुण्डली में संतुलन न हो। अन्यथा, शुभ ग्रहों की दृष्टि, समान दोष की उपस्थिति, अथवा विशेष राशिगत स्थिति से यह दोष समाप्त हो जाता है।

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