Shri Radhashtami Vrat Mahatmy & Shri Radhashtak Stotra in Hindi – श्री राधा अष्टमी व्रत महात्म्य, विधि, लाभ एवं श्री राधाष्टक स्तोत्र
१. प्रस्तावना
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को प्रकट होने वाली श्री राधारानी सम्पूर्ण भक्ति, माधुर्य और कृपा की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। श्री राधा के बिना श्रीकृष्ण का रस, लीला और कृपा अधूरी है। इसीलिए श्री राधा अष्टमी व्रत को समस्त व्रतों में सर्वोपरि और अत्यन्त दुर्लभ फल प्रदान करने वाला माना गया है।
२. शौनकादि ऋषियों का प्रश्न
सौणक ऋषि ने सूत जी से प्रश्न किया –
“हे सूतजी महाराज! जीव के लिए गोलोक धाम की प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है। कृपा कर बताइए कि वह धाम किस उपाय से सरलतापूर्वक प्राप्त हो सकता है?”
३. सूत जी का उत्तर
सूत जी ने कहा –
“हे सौणकादि ऋषियों! यह प्रश्न बहुत उत्तम है। यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद जी ने अपने पिता ब्रह्माजी से किया था।”
४. नारद–ब्रह्मा संवाद
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नारद जी का प्रश्न :“हे पिताश्री! संसार-सागर से पार होने का और नित्य गोलोक प्राप्त कर राधा-कृष्ण की सेवा पाने का सरलतम उपाय क्या है? इस व्रत की विधि, महिमा और इतिहास भी कृपा कर बताइए।”
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ब्रह्माजी का उत्तर :“हे नारद! गोलोक की प्राप्ति का सबसे श्रेष्ठ और सरल साधन है –भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को श्रद्धा और भक्ति से श्री राधा अष्टमी व्रत करना।
परन्तु राधा-तत्व को कोई भी पूर्णतः जान नहीं सकता। यहाँ तक कि मैं भी विस्तार से इसका वर्णन करने में असमर्थ हूँ। क्योंकि श्रीकृष्ण के बिना राधा-तत्त्व अगम्य है।”
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Shri Radhashtami Vrat Mahatmy & Shri Radhashtak Stotra in Hindi – श्री राधा अष्टमी व्रत महात्म्य, विधि, लाभ एवं श्री राधाष्टक स्तोत्र |
५. व्रत का महत्व एवं पुण्यफल
(१) पाप विनाश
- करोड़ों जन्मों के ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी इस व्रत से नष्ट हो जाते हैं।
- यदि कोई पापी भी बिना श्रद्धा यह व्रत कर ले तो भी वह अपने कुल सहित भगवद्धाम का अधिकारी हो जाता है।
(२) एकादशी व्रत से श्रेष्ठ
- यदि कोई सहस्त्र निर्जला एकादशी व्रत करे और उनके पुण्य को सौ गुना किया जाए, तो भी उसका फल एक बार राधा अष्टमी व्रत के फल के बराबर नहीं होता।
(३) दान से श्रेष्ठ
- स्वर्णदान – यदि सुमेरु पर्वत के समान स्वर्ण दान किया जाए, तो भी उसका पुण्य इस व्रत के बराबर नहीं।
- कन्यादान – यदि कोई हजार निर्धन कन्याओं का विवाह कराए, तो भी उतना पुण्य केवल एक बार राधा अष्टमी व्रत से प्राप्त होता है।
(४) तीर्थस्नान से श्रेष्ठ
- गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा आदि सभी पवित्र नदियों में स्नान से जो पुण्य होता है, उससे सैकड़ों गुना पुण्य राधा अष्टमी व्रत करने से प्राप्त होता है।
६. व्रत विधि (संक्षेप में)
- प्रातःकाल स्नान कर पवित्र व्रत का संकल्प लें।
- दिनभर उपवास या फलाहार करें।
- श्री राधा–कृष्ण का पंचोपचार/षोडशोपचार से पूजन करें।
- श्री राधा के नाम का महामंत्र जप करें –“राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे । राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ॥”
- संध्या काल आरती कर, प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारायण करें।
७. श्री राधा का प्राकट्य
- शास्त्रों में वर्णित है कि भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को वृन्दावन के रावल ग्राम में वृषभानु महाराज के यहाँ श्री राधा का प्राकट्य हुआ।
- उस समय वे नेत्र खोलकर नहीं देखती थीं, क्योंकि वे केवल श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए ही अपनी आँखें खोलना चाहती थीं।
- जब गोपों ने श्रीकृष्ण को राधा के सम्मुख लाया, तभी राधारानी ने अपनी चंचल नयनों से पहली बार दर्शन दिया।
🌺 श्री राधा अष्टमी व्रत विधि (पूर्ण विवरण) 🌺
१. व्रत की तैयारी
(१) पूजन सामग्री
- कलश, गंगाजल
- तांबे/पीतल का पात्र
- अक्षत (चावल), रोली, हल्दी, कुमकुम
- पुष्प (विशेषकर गुलाब और कमल)
- तुलसीदल
- धूप, दीप, कपूर
- फल, मिठाई, दूध, दही, घी, मधु
- पान, सुपारी, लौंग, इलायची
- आसन (कुश/कपड़े का)
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल)
२. प्रातःकालीन क्रिया
- प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें।
- स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें –
संकल्प मंत्र (सरल रूप):
"अहं श्रीराधाष्टमीव्रतमहं करिष्ये। श्रीराधाकृष्णप्रीत्यर्थं।"
३. दिनचर्या व्रत नियम
- पूरे दिन उपवास/फलाहार करें।
- जल का अत्यल्प सेवन करें, और यदि समर्थ हों तो निर्जल उपवास रखें।
- दिनभर “राधे कृष्ण” नाम का कीर्तन, जप, ध्यान करते रहें।
४. पूजन विधि (मध्याह्न काल)
- पूजन स्थान को शुद्ध कर आसन बिछाएँ।
- कलश स्थापित कर गंगाजल से छिड़काव करें।
- श्री राधा-कृष्ण की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
- पंचोपचार/षोडशोपचार पूजन करें –
- धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, वस्त्र, आभूषण आदि अर्पण करें।
- तुलसीदल और गुलाब के पुष्प विशेष प्रिय हैं।
मंत्र जाप:
- राधा नाम मंत्र:“ॐ राधायै नमः” (108 बार)
- राधा-कृष्ण महामंत्र:“राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ॥”
५. स्तोत्र एवं पाठ
(१) श्री राधाष्टक पाठ
राधा-कृष्ण भक्ति और कृपा प्राप्ति के लिए अनिवार्य।
(इसमें राधारानी की मधुर महिमा का वर्णन है।)
(२) भागवत/गौड़ीय ग्रंथों में राधा-माहात्म्य
- रासपञ्चाध्यायी (भागवत दशम स्कंध के श्लोक) का पाठ भी किया जा सकता है।
६. आरती
श्री राधा आरती:
"जय जय राधा रानी, वृन्दावन धामनी ।
जय जय श्री राधा रानी ॥"
(दीप प्रज्वलित कर धूप, कपूर से आरती करें।)
७. व्रत पारायण (संध्या काल)
- संध्या समय पुनः नाम-स्मरण और कीर्तन करें।
- रात्रि में कथा-श्रवण करें – श्री राधा जन्म कथा (वृषभानु-गृह, रावल ग्राम में प्राकट्य)।
- अंत में प्रसाद ग्रहण करें और व्रत का पारायण करें।
८. व्रत का फल
- एक बार श्रद्धा से यह व्रत करने से लाखों एकादशी, सहस्त्र दान, और सभी तीर्थयात्राओं से अधिक फल प्राप्त होता है।
- व्रतकर्ता पापमुक्त होकर गोलोक धाम में प्रवेश का अधिकारी बनता है।
९. विशेष नियम
- व्रत में क्रोध, असत्य, परनिन्दा और कामादि विकारों से दूर रहें।
- व्रत के दिन अन्न का त्याग कर फलाहार करें।
- सन्ध्या समय सत्संग या हरिनाम संकीर्तन अवश्य करें।
🌸🙏🏼 श्री राधाष्टकम् 🙏🏼🌸
(श्रीपाद श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी रचित, गोविन्द लीलामृत से उद्धृत)
📖 शुद्ध पाठ
तप्तकाञ्चन-गौराङ्गीं राधे वृन्दावनेश्वरी ।
वृषभानु-सुते देवी प्रणमामि हरिप्रिये ॥१॥
महा-भाव स्वरूपां त्वां कृष्ण-प्रियतमां पराम् ।
वन्दे बृन्दावनेश्वरी राधिकां सुखदां सदा ॥२॥
कृष्ण-प्रिया वरिष्ठा च शक्तिर्-अनन्द-रूपिणी ।
ललिता-सखी-युक्तां ताम् राधिकां प्रणतोऽस्म्यहम् ॥३॥
यां श्रीकृष्णोऽपि सेवेत प्रीणन्यार्थं स्वतन्त्रताम् ।
अराधितानुगां देविं राधिकां प्रणतोऽस्म्यहम् ॥४॥
सर्व-लक्षण-संपन्नां सर्व-शक्ति-मनुत्तमाम् ।
सर्वाश्रया-मयीं राधां प्रणतोऽस्मि सदा अहम् ॥५॥
कृष्ण-वामाङ्ग-संस्थानां लीलाधिष्ठान-कोविदाम् ।
सर्व-रास-रसामृतां राधिकां प्रणतोऽस्म्यहम् ॥६॥
गोपी-गणेश्वरीं वन्दे कृष्ण-वामसुखाश्रयाम् ।
रास-केलि-सुधा-सिन्धुं राधिकां प्रणतोऽस्म्यहम् ॥७॥
सर्वानन्दाकरां श्रीं राधां वन्देऽनुपमां सदा ।
या सदा श्री-हरेर्-अङ्गे रमते प्रेमरूपिणी ॥८॥
🌼 भावार्थ (सरल हिन्दी में)
- मैं उस राधिका को प्रणाम करता हूँ जो तप्त कांचन (गोल्डन) के समान गौरवर्णा हैं, वृन्दावन की अधिष्ठात्री हैं और वृषभानु महाराज की पुत्री हैं।
- जो महाभाव की स्वरूपा हैं, श्रीकृष्ण की प्रियतम हैं और सदैव सुख प्रदान करने वाली वृन्दावन की अधीश्वरी हैं।
- जो कृष्ण की प्रिया में भी श्रेष्ठ हैं, आनन्द की मूर्तिमान शक्ति हैं और ललिता-सखी सहित रमण करती हैं।
- जिनकी आराधना स्वयं श्रीकृष्ण भी करते हैं, जो आराधना के अनुग्रह से सदा तुष्ट होती हैं – उस राधिका को मैं प्रणाम करता हूँ।
- जो समस्त लक्षणों से सम्पन्न हैं, समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं और सभी के आश्रय स्वरूपा हैं।
- जो श्रीकृष्ण के वामाङ्ग (बाईं ओर) में स्थित रहती हैं, समस्त लीलाओं की अधिष्ठात्री हैं और रास-रस की अमृत मूर्ति हैं।
- जो समस्त गोपियों की अधीश्वरी हैं, श्रीकृष्ण के सुख की आधार हैं और रास-केली की अमृत-सागर हैं।
- जो समस्त आनन्द का स्रोत हैं, अनुपम श्री हैं और सदैव प्रेमस्वरूप होकर श्रीहरि के अंग में रमण करती हैं।
🌹 फलश्रुति
जो कोई भक्त श्री राधाष्टक का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उस पर श्री राधा-कृष्ण की अपार कृपा होती है।
उसका जीवन भक्ति-रस में सरस हो जाता है और वह अन्ततः गोलोक वृन्दावन में स्थान पाता है।
निष्कर्ष
- श्री राधा अष्टमी व्रत का पुण्य समस्त व्रतों और दानों से श्रेष्ठ है।
- यह व्रत करने वाला जीव न केवल अपने पापों से मुक्त होता है, बल्कि उसे गोलोक में श्री राधा–कृष्ण की नित्य सेवा का अवसर प्राप्त होता है।
- इसलिए जो कोई इस व्रत को श्रद्धा और प्रेम से करता है, वह जीवनमुक्त और परम भाग्यशाली बन जाता है।
🌹🙏🏼 हमारौ राधा वल्लभ लाल की जय हो 🙏🏼🌹