Ramcharitmanas: मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
अर्थात्, कलयुग में संतों के बारे में हमारे संत शिरोमणि तुलसी दास जी लिखते है कि जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं।
हमारा मानना है कि गेरुआ वस्त्र धारण कर लेना, कंठी माला पहन लेना, यह सब संत के लक्षण नहीं है केवल आडंबर है।
षट विकार जित अनघ अकामा।
अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमित बोध अनीह मितभोगी।
सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
सावधान मानद मदहीना।
धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
देवर्षि नारद के द्वारा श्रीराम से संत पुरुषों के लक्षण पूछे जाने पर उन्होने बताया कि जो लोग काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर इन छ: विकारों से रहित,पाप न करने वाले,कामना रहित,बारबार विचारों को न बदलने वाले,दूसरों के लिए हर समय त्याग की भावना रखने वाले,पवित्र भाव युक्त,दूसरों को सुख देने के लिए तत्पर,विस्तृत ज्ञान रखने वाले,कम खाने वाले,कोमल हृदय,गहरी सूझबूझ रखने वाले,योगी,सतर्क तथा सावधान,सदैव दूसरों को सम्मान देने वाले,अभिमानरहित,धैर्यवान,धर्म के व्यवहारिक रूप को समझकर उसको आचरण में लाने वाले अत्यन्त चतुर हों,उन्हे भारतीय सिद्धांत के अनुसार संत कहा जाता है।
मन, वचन और शरीर से परोपकार करना संतों का सहज स्वभाव होता है, जो स्वयं ही दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित रहते हैं।
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Ramcharitmanas: मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥ |
आश्चर्य है कि इतनी स्पष्ट व खुली पहचान के बाद भी लोग पता नहीं सब कुछ देखते तथा समझते हुए भी किनके पीछे पागल हुए दौडते रहते हैं तथा अपनी ऊर्जा,धन,सुख शांति का ह्रास करते हैं।
अष्ट सात्विक भाव संत की पहचान
हमारा मानना है कि - संतों में अष्ट सात्विक भाव होना चाहिए है। इन्हीं के आधार पर इनकी वर्तमान समय में भी पहचान की जा सकती है।
फिर भी एक प्रश्न है कि इस संसार में हम वास्तविक संत की पहचान करेंगे कैसे? शास्त्रों में वास्तविक संतों की कुछ पहचान बताई गई है कि उनमें कौन-कौन सी बातें होती हैं और कौन-कौन सी नहीं होती?
वास्तविक संत कभी किसी को प्रारब्ध के विपरीत कुछ भी नहीं देते हैं। संत जानते हैं कि थोड़े से ही धन, वैभव, रूप, विद्या के अहंकार से ही जीव ईश्वर विमुख हो जाता है फिर और संसार देने से तो उनका विनाश ही होगा, इसलिए वे कभी संसार नहीं देते। संत कभी किसी को मिथ्या आशीर्वाद भी नहीं देते। आशीर्वाद का अर्थ है दीक्षा,
दीक्षा, पूर्ण अंतःकरण शुद्धि के पश्चात अधिकारी बनने पर ही दी जाती है। दीक्षा देते ही माया निवृत्ति के साथ पंच कोष, पंचक्लेष एवं समस्त दुखों की निवृत्ति होकर भगवान का दिव्यानंद, उनकी सेवा तत्क्षण ही मिल जाती है। संत कभी किसी को शापादि भी नहींं देते हैं, न ही ऋद्धि सिद्धि के चमत्कार दिखाते हैं। संत कृपा करते हैं, कभी कोप कर ही नहीं सकते। संत के सान्निध्य में आते ही मनुष्य का संसार से वैराग्य एवं भगवान में अनुराग सहज ही होने लगता है लेकिन यह प्रत्येक जीव के अंतःकरण की स्थिति के अनुसार कम या अधिक होता है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नवबोधस्य योगो भवति दु:खहा ।।
जो व्यक्ति भोजन और मनोरंजन में संयम रखता है, सभी कार्यों में संयम रखता है, तथा सोने और जागने में संयम रखता है, उसके लिए योग समस्त दुःख और पीड़ा (जन्म और मृत्यु के कारण) को नष्ट कर देता है।
संत सहहिं दु:ख पर हित लागी।
पर दु:ख हेतु असंत अभागी॥
भूर्ज तरू सम संत कृपाला।
पर हित निति सह बिपति बिसाला॥
संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं।
संत की वाणी का हमारे अंतःकरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि वह स्वयं भगवान की ही वाणी होती है।
आज़ कल तो हम संत महात्मा जिन्हें हम अपना आदर्श मानते हैं, वे एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हैं, एक दुसरे से शास्त्रार्थ करने की चेतावनी दे रहे हैं, जबकि शास्त्रार्थ में कोई स्पष्ट अर्थ नही निकलता, बल्कि प्रश्न के उत्तर नहीं, प्रश्न में ही दूसरा प्रश्न खोज कर जटिल किया जाता है, मतलब एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास होता है, समाधान नहीं मिलता –
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्मं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ।।
विज्ञान से संयुक्त यह ज्ञान सभी विद्यायों का राजा है।
विद्या का अर्थ भाषा ज्ञान अथवा शिक्षा नहीं है।
विद्या हि का ब्रह्म गति प्रदाया । सा विद्या या विमुक्तये ।
विद्या उसे कहते हैं कि जिस के पास आये, उसे उठाकर ब्रह्म पथ पर चलाते हुए मोक्ष प्रदान कर दे । यदि रास्ते मे ऋद्धियों- सिद्धियों अथवा प्रकृति मे कहीं उलझ गया तो सिद्ध है कि अविद्या सफल हो गई । वह विद्या नहीं है । यह राजविद्या ऐसी है. जो निश्चित कल्याण करने वाली है। वहीं विद्वान हैं जो अपने मुख्य लक्ष्य भगवान को जान गया हो अर्थात उनके प्रेम में डूब गया हो।
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
लेकिन कौन?
राम चरन जा कर मन राता॥
जिनका मन भगवान के पद पंकज सेवा में लगा हो।
हमारे देश में ऐसे भी महापुरुष हुए हैं जिन्होंने संस्कृति का प्रयोग ही नहीं किया जैसे, सूरदास जी, रसखान, मीराबाई, रैदास, शबरी, ब्रज की गोपियां , ये सब भगवान के चरणों में रहीं हैं ।
संत का अष्टसात्विक भाव जब आता है तब शरीर का रंग बदलना, आवाज बदलना, अट्टहास, रूदन, पसीना आना, जड़ हो जाना, मूर्छित हो जाना आदि अष्ट सात्विक भाव हैं। ये भाव अगर किसी महापुरुष में दिखलाई पड़े तो तत्काल ही उनकी शरण ग्रहण कर लेनी चाहिये।
दैनिक जीवन के कार्यों को करते समय किसी भी रूप में ईश्वर या गुरु के अस्तित्व के बारे में गहन जागरूकता को ईश्वर या गुरु के प्रति भाव कहा जाता है।
अधिकांश साधकों का मानना है कि साधना करने से भाव स्वतः उत्पन्न होता है । यद्यपि यह सैद्धांतिक रूप से गलत नहीं है, फिर भी यह गारंटी नहीं दी जा सकती कि यह प्रक्रिया सभी में सहज रूप से घटित होगी। यह कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे साधना का उद्देश्य , ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र तड़प, अवचेतन मन में ईश्वर के प्रति निर्मित केंद्र, की जाने वाली वास्तविक साधना आदि। ईश्वर के प्रति शीघ्र भाव उत्पन्न करने के लिए , इसे सचेतन रूप से और जिज्ञासा के साथ करना सीखना और तदनुसार अभ्यास में लाना लाभदायक होता है। 'विचार और भावनाएँ आचरण को बदल देती हैं, और इसके विपरीत' इस सिद्धांत के अनुसार, जब व्यक्ति मन और बुद्धि के स्तर पर निरंतर कर्म करता है, तो यह शीघ्र भाव उत्पन्न करने में सहायक होता है।
आध्यात्मिकता में इस अवस्था को "अष्टसात्विक भाव" कहा जाता है। यह एक मील के पत्थर की तरह है जो दर्शाता है कि आप आध्यात्मिक रूप से विकसित हो रहे हैं। यह आपकी आंतरिक ऊर्जा, जिसे कुंडलिनी कहा जाता है, को जागृत करने में मदद करता है, और यह भक्ति योग का एक अच्छा चरण है, जो भक्ति पर आधारित है। जब आप इस अवस्था तक पहुँचते हैं, तो ऐसा लगता है कि आपकी प्रार्थनाएँ वास्तव में शक्तिशाली हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस ने इसे "भाव समाधि" कहा था, और इसे पूर्ण ज्ञानोदय प्राप्त करने से पहले के एक चरण के रूप में देखा जाता है। यह उन पुरानी भावनाओं को साफ़ करने जैसा है जिन्हें आप लंबे समय से दबाए हुए हैं। हममें से प्रत्येक का जीवन में अपना उद्देश्य होता है, और हम तब तक यहाँ हैं जब तक हम उस उद्देश्य को पूरा नहीं कर लेते। जब आप इस प्रक्रिया को पूरा कर लेते हैं, तो आप बेहतर महसूस करते हैं, जैसे आप ठीक हो गए हों।
यदि आप ऐसे व्यक्ति हैं जो बहुत सारी भावनाओं का अनुभव करते हैं या आप अपने जीवन के उद्देश्य की खोज कर रहे हैं, तो आप सीधे ईश्वर से जुड़ सकते हैं। जब आपको यह एहसास होता है कि ईश्वर से बड़ा और आपके करीब कुछ भी नहीं है, तो ऐसा लगता है जैसे आपके कंधों से एक बोझ उतर गया हो और आप चीज़ों को और साफ़ तौर पर देखने लगते हैं। खुशी के आँसू इसलिए आते हैं क्योंकि आप ईश्वर के आपके प्रति गहरे प्रेम को समझते हैं, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि आप ईश्वर से प्रेम करते हैं।
न कष्टे विद्यते देवो न पाषाणे न मृण्मये।
भावे तु विद्यते देवो तस्माद्भावो हि कारणम्।।
भगवान लकड़ी, पत्थर या मिट्टी की मूर्ति में नहीं रहते। वे भाव में रहते हैं , इसलिए भाव महत्वपूर्ण है। संत एकनाथ अपने भजन के एक श्लोक में कहते हैं - मुझे समझाइए कि क्या भगवान वहाँ रहते हैं जहाँ भाव है या भाव वहाँ मौजूद है जहाँ भगवान हैं। आप ही इस पहेली को सुलझाइए। मुझे निश्चित रूप से बताइए कि क्या श्रेष्ठ है - भाव या भगवान। भगवान का स्वरूप या स्वरूप भाव के स्वभाव के अनुसार होगा । जितना अधिक भाव होगा , भगवान का आध्यात्मिक अनुभव भी उतना ही अधिक होगा। यदि भाव नहीं है , तो भगवान की उपस्थिति भी समाप्त हो जाएगी। इसीलिए, संत एकनाथ अपने गुरु जनार्दनस्वामी की कृपा से कहते हैं, कि भगवान वहाँ रहते हैं जहाँ भाव है , वह भाव ही भगवान है। यदि कोई इस पर अविश्वास करता है, तो उसे देखना चाहिए कि इस संबंध में उसे अपने अंतःकरण में क्या आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त होता है ।
संत तुकाराम महाराज अपने एक भजन में कहते हैं, "भक्त का कर्तव्य है ईश्वर के प्रति अनन्य भाव रखना । भक्ति का सच्चा रहस्य यही है कि इस भाव को निरंतर दृढ़ निश्चय के साथ बनाए रखा जाए। भक्तों को ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखना चाहिए, बदले में कुछ भी पाने की आशा नहीं करनी चाहिए। उन्हें किसी और के सहयोग की कामना नहीं करनी चाहिए। ईश्वर ही उनका एकमात्र सहारा हों।" संत तुकाराम कहते हैं कि उन्होंने ऐसे किसी भक्त के बारे में नहीं सुना जिसका ऐसा भाव हो और जिसे ईश्वर ने अनदेखा किया हो।
मंत्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।।
मंत्र , तीर्थस्थान, ब्राह्मण , देवता, ज्योतिषी, औषधि या गुरु से मिलने वाला लाभ उनके प्रति व्यक्ति के भाव पर निर्भर करता है।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथा परे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा: ।।
अपरे नियताहार: प्राणान्प्राणेषु जुहृति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा: ।।
दूसरे कितने ही योगी जन अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राण वायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ।।