अपादान कारक (पंचमी विभक्ति)
संस्कृत व्याकरण में अपादान कारक की परिभाषा, पाणिनीय सूत्र, विशेष नियम, उदाहरण और करण कारक से इसके अंतर का विस्तृत विवेचन।
१. कारक संज्ञा विधायक सूत्र
सूत्र: ध्रुवमपायेऽपादानम् (१.४.२४)
(पत्ता वृक्ष से गिरता है। यहाँ वियोग की क्रिया में 'वृक्ष' स्थिर है, इसलिए वृक्ष अपादान है।)
२. पंचमी विभक्ति विधायक सूत्र
सूत्र: अपादाने पंचमी (२.३.२८)
(वह गाँव से आता है। — गाँव से अलग होने के कारण 'ग्राम' में पंचमी विभक्ति है।)
३. अपादान कारक के विशेष प्रयोग (V.V.Imp)
अपादान कारक का प्रयोग केवल वियोग के भाव में ही नहीं, बल्कि भय, रक्षा, उत्पत्ति आदि अन्य विशेष अर्थों में भी होता है —
(क) भय और रक्षा का कारण (Cause of Fear/Protection)
सूत्र: भीत्रार्थानां भयहेतुः (१.४.२५)
राजा चोरेभ्यः त्रायते। (राजा चोरों से रक्षा करता है।)
(ख) उत्पत्ति या उद्गम स्थान (Place of Origin)
सूत्र: भुवः प्रभवश्च (१.४.३१)
(ग) तुलना का आधार (Basis of Comparison)
सूत्र: पंचमी विभक्ते (२.३.४२)
मातुः अधिकं हितकारिणी नास्ति। (माता से अधिक हित करने वाला कोई नहीं।)
(घ) नियमपूर्वक विद्या ग्रहण करना
सूत्र: आख्यातोपयोगे (१.४.२९)
४. अपादान और करण कारक में अंतर
हिन्दी में दोनों ही कारकों का चिह्न ‘से’ होता है, परन्तु भाव में स्पष्ट अंतर है:
अपादान कारक (पंचमी विभक्ति):
इसमें वियोग या अलगाव का भाव होता है। (कोई वस्तु किसी से अलग होती है)।
जैसे: सः विद्यालयात् गृहं गच्छति। (वह विद्यालय से अलग होकर घर जाता है।)
करण कारक (तृतीया विभक्ति):
इसमें साधन या सहायता का भाव होता है। (कोई वस्तु क्रिया करने का माध्यम बनती है)।
जैसे: सः वाहनेन गृहं गच्छति। (वह वाहन से यानी साधन के रूप में घर जाता है।)
- अलगाव: वृक्षात् पत्रं पतति। (वृक्ष से पत्ता गिरता है।)
- भय/रक्षा: सिंहात् बिभेति। (सिंह से डरता है।)
- उत्पत्ति: हिमालयात् गङ्गा प्रभवति। (गंगा हिमालय से उत्पन्न होती है।)
- तुलना: ज्ञानं धनात् श्रेष्ठम्। (ज्ञान धन से श्रेष्ठ है।)
- शिक्षाग्रहण: गुरोः पठति। (गुरु से नियमपूर्वक पढ़ता है।)
अपादान कारक का मुख्य लक्षण "अलगाव या निर्गमन का भाव" है, और इन सभी परिस्थितियों में सदैव स्थिर वस्तु या स्रोत में पंचमी विभक्ति का प्रयोग होता है।
