सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)
संस्कृत व्याकरण में सम्प्रदान कारक की परिभाषा, पाणिनीय सूत्र, विशेष नियम और कर्म कारक से इसके अंतर का विस्तृत विवेचन।
१. कारक संज्ञा विधायक सूत्र
सूत्र: कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् (१.४.३२)
(राजा धन देने की क्रिया से ब्राह्मण को संतुष्ट करना चाहता है। अतः ‘विप्र’ सम्प्रदान है।)
२. चतुर्थी विभक्ति विधायक सूत्र
सूत्र: चतुर्थी सम्प्रदाने (२.३.१३)
(वह गुरु के लिए नमस्कार करता है।)
३. सम्प्रदान कारक के विशेष प्रयोग (V.V.Imp)
(क) रुच्यर्थक धातुओं के योग में
सूत्र: रुच्यर्थानां प्रीयमाणः (१.४.३३)
बालकाय क्रीडनं रोचते। (बालक को खेलना अच्छा लगता है।)
(ख) क्रोध, ईर्ष्या आदि अर्थ वाली धातुओं के योग में
सूत्र: क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः (१.४.३७)
सः मित्राय द्रुह्यति। (वह मित्र से द्रोह करता है।)
(ग) नमः, स्वस्ति, स्वाहा आदि अव्ययों के योग में
सूत्र: नमः स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च (२.३.१६)
प्रजाभ्यः स्वस्ति। (प्रजा का कल्याण हो।)
इन्द्राय स्वाहा। (इन्द्र के लिए आहुति।)
(घ) तादर्थ्ये चतुर्थी (Purpose or Intention)
पठनाय विद्यालयं गच्छति। (पढ़ने के लिए विद्यालय जाता है।)
४. कर्म और सम्प्रदान कारक में अंतर
दोनों में ही कभी-कभी हिन्दी चिह्न ‘को’ आता है, परन्तु भाव के अनुसार इनमें बहुत बड़ा व्याकरणिक अंतर है:
सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति):
इसमें त्यागपूर्वक देने (हमेशा के लिए दान या अर्पण) का भाव होता है।
जैसे: राजा ब्राह्मणाय वस्त्रं ददाति। (राजा ब्राह्मण को वस्त्र दान करता है - हमेशा के लिए।)
कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति):
इसमें देना तो होता है परन्तु वापसी अपेक्षित होती है (सेवा या उपयोग हेतु देना)।
जैसे: सः रजकं वस्त्रं ददाति। (वह धोबी को कपड़े देता है, जो वह धुलने के बाद लौटाएगा।)
- सम्प्रदान कारक: जिसे कर्ता देने की क्रिया से संतुष्ट करना चाहता है।
- मुख्य सूत्र: कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् (१.४.३२)
- इसमें सदैव चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
- विशेष प्रयोग: रुच्यर्थक धातु, क्रोधार्थ धातु, नमः/स्वाहा/स्वस्ति अव्यय, तथा प्रयोजनवाचक शब्दों के साथ।
- कर्म कारक से मुख्य अंतर "दान का स्थायित्व" है।
