सम्प्रदान कारक (Sampradāna Kārakah) – चतुर्थी विभक्ति में प्रयोग, सूत्र, उदाहरण एवं अंतर | Sanskrit Grammar Notes

Sooraj Krishna Shastri
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सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)

संस्कृत व्याकरण में सम्प्रदान कारक की परिभाषा, पाणिनीय सूत्र, विशेष नियम और कर्म कारक से इसके अंतर का विस्तृत विवेचन।

परिभाषा: संस्कृत व्याकरण में सम्प्रदान कारक वह होता है जिसे कर्ता किसी दान, अर्पण, या देने की क्रिया द्वारा संतुष्ट करना चाहता है। इसमें सदैव चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

१. कारक संज्ञा विधायक सूत्र

सूत्र: कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् (१.४.३२)

अर्थ: कर्ता जिस व्यक्ति को दान के कर्म द्वारा प्रसन्न या अभिप्रेत करना चाहता है, वह सम्प्रदान कहलाता है।
उदाहरण: राजा विप्राय धनं ददाति।
(राजा धन देने की क्रिया से ब्राह्मण को संतुष्ट करना चाहता है। अतः ‘विप्र’ सम्प्रदान है।)
विवेचन: यह सूत्र विशेषतः ‘दान’ की क्रिया पर आधारित है। यहाँ दान का अर्थ है वस्तु को त्यागपूर्वक (हमेशा के लिए) देना। यदि वस्तु वापस ली जानी हो, तो वह कर्म कारक कहलाती है, सम्प्रदान नहीं।

२. चतुर्थी विभक्ति विधायक सूत्र

सूत्र: चतुर्थी सम्प्रदाने (२.३.१३)

अर्थ: सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण: सः गुरवे नमः करोति।
(वह गुरु के लिए नमस्कार करता है।)

३. सम्प्रदान कारक के विशेष प्रयोग (V.V.Imp)

(क) रुच्यर्थक धातुओं के योग में

सूत्र: रुच्यर्थानां प्रीयमाणः (१.४.३३)

अर्थ: 'रुच्' (अच्छा लगना) अर्थ वाली धातुओं के योग में जिसे प्रसन्नता होती है, वह सम्प्रदान कहलाता है।
उदाहरण: मह्यं मोदकः रोचते। (मुझे लड्डू अच्छा लगता है।)
बालकाय क्रीडनं रोचते। (बालक को खेलना अच्छा लगता है।)

(ख) क्रोध, ईर्ष्या आदि अर्थ वाली धातुओं के योग में

सूत्र: क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः (१.४.३७)

अर्थ: ‘क्रुध्’ (क्रोध करना), ‘द्रुह्’ (द्रोह करना), ‘ईर्ष्य’ (जलन करना), ‘असूय्’ (निन्दा करना) आदि धातुओं के साथ जिसके प्रति भाव प्रकट होता है, वह सम्प्रदान कहलाता है।
उदाहरण: स्वामी भृत्याय क्रुध्यति। (मालिक नौकर पर क्रोध करता है।)
सः मित्राय द्रुह्यति। (वह मित्र से द्रोह करता है।)

(ग) नमः, स्वस्ति, स्वाहा आदि अव्ययों के योग में

सूत्र: नमः स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च (२.३.१६)

अर्थ: ‘नमः’ (नमस्कार), ‘स्वस्ति’ (कल्याण हो), ‘स्वाहा’ (देवता को आहुति), ‘स्वधा’ (पितरों को अर्पण), ‘अलम्’ (पर्याप्त), और ‘वषट्’ (देवता को आह्वान) जैसे शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण: शिवाय नमः। (शिव को नमस्कार।)
प्रजाभ्यः स्वस्ति। (प्रजा का कल्याण हो।)
इन्द्राय स्वाहा। (इन्द्र के लिए आहुति।)

(घ) तादर्थ्ये चतुर्थी (Purpose or Intention)

नियम: किसी प्रयोजन या उद्देश्य को बताने के लिए (जिसके लिए कोई कार्य किया जा रहा हो) चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण: मुक्तेः हरिं भजति। (मुक्ति के लिए हरि का भजन करता है।)
पठनाय विद्यालयं गच्छति। (पढ़ने के लिए विद्यालय जाता है।)

४. कर्म और सम्प्रदान कारक में अंतर

दोनों में ही कभी-कभी हिन्दी चिह्न ‘को’ आता है, परन्तु भाव के अनुसार इनमें बहुत बड़ा व्याकरणिक अंतर है:

सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति):

इसमें त्यागपूर्वक देने (हमेशा के लिए दान या अर्पण) का भाव होता है।
जैसे: राजा ब्राह्मणाय वस्त्रं ददाति। (राजा ब्राह्मण को वस्त्र दान करता है - हमेशा के लिए।)

कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति):

इसमें देना तो होता है परन्तु वापसी अपेक्षित होती है (सेवा या उपयोग हेतु देना)।
जैसे: सः रजकं वस्त्रं ददाति। (वह धोबी को कपड़े देता है, जो वह धुलने के बाद लौटाएगा।)

🌿 सारांश (Summary)
  • सम्प्रदान कारक: जिसे कर्ता देने की क्रिया से संतुष्ट करना चाहता है।
  • मुख्य सूत्र: कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् (१.४.३२)
  • इसमें सदैव चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
  • विशेष प्रयोग: रुच्यर्थक धातु, क्रोधार्थ धातु, नमः/स्वाहा/स्वस्ति अव्यय, तथा प्रयोजनवाचक शब्दों के साथ।
  • कर्म कारक से मुख्य अंतर "दान का स्थायित्व" है।
Keywords: सम्प्रदान कारक, चतुर्थी विभक्ति, Sampradana Karaka, Chaturthi Vibhakti Rules, Sanskrit Grammar TGT PGT, नमः स्वस्ति स्वाहा, रुच्यर्थानां प्रीयमाणः.

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