करण कारक (तृतीया विभक्ति)
संस्कृत व्याकरण में करण कारक की परिभाषा, पाणिनीय सूत्र, विशेष नियम और उदाहरणों का विस्तृत विवेचन।
परिभाषा: संस्कृत व्याकरण में करण कारक उस साधन या माध्यम को कहते हैं जो क्रिया की सिद्धि (पूरा होने) में सबसे अधिक सहायक होता है। इसमें सदैव तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।
१. कारक संज्ञा विधायक सूत्र
सूत्र: साधकतमं करणम् (१.४.४२)
अर्थ: क्रिया की सिद्धि में कर्ता का जो सबसे उत्कृष्ट सहायक (साधकतम) होता है, वही करण कहलाता है।
उदाहरण: सः कलमेन लिखति।
(वह कलम से लिखता है। — यहाँ लिखने की क्रिया में 'कलम' सबसे बड़ा साधन है, अतः यह करण है।)
(वह कलम से लिखता है। — यहाँ लिखने की क्रिया में 'कलम' सबसे बड़ा साधन है, अतः यह करण है।)
विवेचन: 'साधकतमम्' शब्द यह दर्शाता है कि क्रिया के कई साधन हो सकते हैं, परंतु जिसके बिना क्रिया संभव नहीं, वही मुख्य करण कहलाता है।
२. तृतीया विभक्ति विधायक सूत्र
सूत्र: कर्तृकरणयोस्तृतीया (२.३.१८)
अर्थ: अनुक्त (अप्रधान) कर्ता और करण में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: रामेण बाणेन वाली हतः।
(राम के द्वारा बाण से वाली मारा गया। — यहाँ राम अनुक्त कर्ता है और बाण करण है, अतः दोनों में तृतीया है।)
(राम के द्वारा बाण से वाली मारा गया। — यहाँ राम अनुक्त कर्ता है और बाण करण है, अतः दोनों में तृतीया है।)
नोट (अनुक्त कर्ता): कर्मवाच्य (Passive Voice) वाक्य में कर्ता प्रायः अनुक्त (अप्रधान) होता है, अतः उसमें तृतीया विभक्ति आती है। जैसे: मया लेखः पठ्यते। (मेरे द्वारा लेख पढ़ा जाता है।)
३. करण कारक के विशेष प्रयोग (उपपद तृतीया)
(क) सहार्थक शब्दों के साथ
सूत्र: सहयुक्तेऽप्रधाने (२.३.१९)
अर्थ: ‘सह’, ‘साकम्’, ‘समम्’, ‘सार्धम्’ (साथ) जैसे सहार्थक शब्दों के योग में जो अप्रधान (गौण) हो, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: पिता पुत्रेण सह गच्छति। (पिता पुत्र के साथ जाता है।)
(ख) अंगविकार (Defect in a Limb)
सूत्र: येनाङ्गविकारः (२.३.२०)
अर्थ: जिस अंग के विकार से शरीर का विकार (दोष) लक्षित हो, उस अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: सः नेत्रेण काणः। (वह आँख से काना है।)
सः पादेन खञ्जः। (वह पैर से लंगड़ा है।)
सः पादेन खञ्जः। (वह पैर से लंगड़ा है।)
(ग) हेतु (Reason or Cause)
सूत्र: हेतौ (२.३.२३)
अर्थ: किसी कार्य के कारण (हेतु) या प्रयोजन को व्यक्त करने वाले शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: सः पुण्येन हरिं पश्यति। (वह पुण्य के कारण हरि को देखता है।)
सः अध्ययनेन वसति। (वह अध्ययन के हेतु/लिए रहता है।)
सः अध्ययनेन वसति। (वह अध्ययन के हेतु/लिए रहता है।)
(घ) प्रकृति, जाति, नाम आदि के साथ
नियम: ‘प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्’ वार्तिक के अनुसार प्रकृति (स्वभाव), जाति, नाम, गोत्र आदि वाचक शब्दों के साथ तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण: सः प्रकृत्या साधुः अस्ति। (वह स्वभाव से सीधा है।)
सः जात्या ब्राह्मणः। (वह जाति से ब्राह्मण है।)
सः जात्या ब्राह्मणः। (वह जाति से ब्राह्मण है।)
४. करण और अपादान कारक में अंतर
करण कारक (तृतीया विभक्ति):
इसमें साधन या सहायता का भाव होता है। (कर्ता की मदद करता है)।
जैसे: सः हस्तेन खादति। (वह हाथ से खाता है।)
अपादान कारक (पञ्चमी विभक्ति):
इसमें अलग होने या पृथकता का भाव होता है।
जैसे: सः ग्रामात् आगच्छति। (वह गाँव से आता है।)
🌿 सारांश (Summary)
- करण कारक क्रिया के साधन को व्यक्त करता है।
- इसका प्रमुख संज्ञा सूत्र: साधकतमं करणम् है।
- इसमें सदैव तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
- सहार्थक (साथ), अंगविकार और हेतु के प्रसंग में इसका विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है।
