कर्म कारक और द्वितीया विभक्ति
संस्कृत व्याकरण में 'कर्म कारक' का विस्तृत व्याकरणिक विश्लेषण, सूत्र, १६ द्विकर्मक धातुएँ और उपपद विभक्तियाँ।
१. कर्म कारक संज्ञा विधायक सूत्र
| सूत्र (Sūtram) | अर्थ (Meaning) | उदाहरण (Example) |
|---|---|---|
| कर्तुरीप्सिततमं कर्म (१.४.४९) |
कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिसे सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, उसकी कर्म संज्ञा होती है। | रामः विद्यालयं गच्छति। (राम जाने की क्रिया से 'विद्यालय' को प्राप्त करना चाहता है, अतः विद्यालय कर्म है।) |
| तथा युक्तं चानीप्सितम् (१.४.५०) |
कर्ता के अनचाहे (अनीप्सित) होने पर भी, यदि वह पदार्थ मुख्य क्रिया से जुड़ जाए, तो उसकी भी कर्म संज्ञा होती है। | सः ओदनं भुञ्जानो विषं भक्षयति। (वह चावल खाता हुआ अनचाहे 'विष' को भी खा लेता है। अतः विष कर्म है।) |
२. द्वितीया विभक्ति विधायक सूत्र
| सूत्र (Sūtram) | अर्थ (Meaning) | उदाहरण (Example) |
|---|---|---|
| कर्मणि द्वितीया (२.३.२) | अनुक्त कर्म (कर्तृवाच्य के कर्म) में द्वितीया विभक्ति होती है। | सः वेदम् पठति। (वह वेद को पढ़ता है।) |
| उक्ते कर्मणि प्रथमा (नियम) |
जब कर्म उक्त (प्रधान) होता है (जैसे कर्मवाच्य में), तो उसमें प्रथमा विभक्ति होती है, द्वितीया नहीं। | रामेण पुस्तकम् पठ्यते। ('पुस्तक' उक्त कर्म है, इसलिए प्रथमा।) |
३. अकथित कर्म (१६ द्विकर्मक धातुएँ) - V.V.Imp
सूत्र: अकथितं च (१.४.५१)
कुछ धातुओं के योग में जो कारक अपादान, सम्प्रदान, अधिकरण आदि कारकों से नहीं कहा जाना चाहता (अविवक्षित होता है), उसकी भी 'कर्म' संज्ञा होती है। ऐसी सोलह (१६) धातुएँ हैं, जिन्हें द्विकर्मक धातुएँ (Verbs with two objects) कहते हैं। इनमें एक मुख्य कर्म होता है और दूसरा गौण कर्म।
कर्मयुक् स्यादकथितं तथा स्यान्नीहृकृष्वहाम् ॥
| धातु (Root) | अर्थ (Meaning) | उदाहरण (गौण कर्म + मुख्य कर्म) |
|---|---|---|
| दुह् | दुहना | सः गां दुग्धं दोग्धि। (वह गाय से दूध दुहता है।) |
| याच् | माँगना | बलिं वसुधां याचते। (वह बलि से पृथ्वी माँगता है।) |
| पच् | पकाना | तण्डुलान् ओदनं पचति। (वह चावलों से भात पकाता है।) |
| दण्ड् | दण्ड देना | गर्गान् शतं दण्डयति। (वह गर्गों को सौ रुपये का दण्ड देता है।) |
| प्रच्छ् | पूछना | माणवकं पन्थानं पृच्छति। (वह बालक से मार्ग पूछता है।) |
| ब्रू / शास् | कहना / उपदेश देना | माणवकं धर्मं ब्रूते/शास्ति। (वह बालक को धर्म बताता है।) |
| नी / हृ / कृष् / वह् | ले जाना / हरना / खींचना / ढोना | ग्रामम् अजां नयति/हरति/कर्षति/वहति। (वह गाँव को बकरी ले जाता है।) |
नोट: उपर्युक्त उदाहरणों में 'गां, बलिं, तण्डुलान्' आदि मूल रूप से अपादान/करण थे, परन्तु इन विशेष धातुओं के कारण ये 'गौण कर्म' बन गए और द्वितीया विभक्ति में आए।
४. अन्य महत्वपूर्ण सूत्र एवं उपपद द्वितीया
(क) णिजन्त (Causative) धातुओं में कर्म:
सूत्र: गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ (१.४.५२)
गति (जाना), बुद्धि (जानना) और प्रत्यवसान (खाना) अर्थ वाली धातुओं का मूल कर्ता, प्रेरणार्थक (णिजन्त) अवस्था में कर्म बन जाता है।
उदाहरण: गुरुः शिष्यं वेदम् पाठयति। (मूल वाक्य: शिष्यः वेदम् पठति।)
(ख) काल और मार्गवाचक शब्दों में:
सूत्र: कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे (२.३.५)
जब कालवाचक (Time) या मार्गवाचक (Distance) शब्द में क्रिया का निरंतर (अत्यन्त) संयोग हो, तो उसमें द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: सः मासम् व्याकरणम् अपठत्। (उसने मास भर लगातार व्याकरण पढ़ा।)
क्रोशं कुटिला नदी। (कोस भर तक नदी लगातार टेढ़ी है।)
(ग) उपपद द्वितीया (अव्ययों के योग में):
निम्नलिखित अव्ययों के योग में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है:
| अव्यय (Word) | अर्थ (Meaning) | उदाहरण (Example) |
|---|---|---|
| अभितः / परितः | दोनों ओर / चारों ओर | ग्रामम् परितः जलमस्ति। (गाँव के चारों ओर जल है।) |
| समया / निकषा | समीप / निकट | नदीम् निकषा देवालयः अस्ति। (नदी के समीप देवालय है।) |
| हा / धिक् | शोक / धिक्कार | कृष्णभक्तं धिक्। (कृष्ण के अभक्त को धिक्कार है।) |
| अन्तरा / अन्तरेण | बीच में / बिना | रामम् अन्तरेण न सुखम्। (राम के बिना सुख नहीं।) |
इस प्रकार कर्म कारक वह है जिसे कर्ता सबसे अधिक चाहता है। संस्कृत व्याकरण में 'अकथितं च' और 'उपपद द्वितीया' के नियम कर्म कारक को अत्यंत विस्तृत और महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। इनमें सदैव द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
