हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः
✦ २. सूक्तयः (१-५) (अन्वयः भावार्थः च)
✦ ३. सूक्तयः (६-१०) (अन्वयः भावार्थः च)
✦ ४. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings)
✦ ५. अभ्यासः - भाग १ (प्रश्नोत्तराणि १-३)
✦ ६. अभ्यासः - भाग २ (प्रश्नोत्तराणि ४-८)
✦ ७. योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्
१. पाठ-परिचयः
छात्रः: आचार्य! अद्य मम माता माम् एकां सूक्तिं पाठितवती, ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ इति ।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: आचार्य! आज मेरी माता ने मुझे एक सूक्ति पढ़ाई, 'सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो'।
अन्यः छात्रः: महोदय ! सूक्तयः अस्मान् सन्मार्गं प्रति नयन्ति इति अहं श्रुतवान्।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: महोदय! सूक्तियाँ हमें अच्छे मार्ग (सन्मार्ग) की ओर ले जाती हैं, ऐसा मैंने सुना है।
अन्यः छात्रः: आचार्य! ‘सूक्तिः’ इत्युक्ते कः अभिप्रायः ?[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: आचार्य! 'सूक्ति' कहने से क्या अभिप्राय (मतलब) है?
आचार्यः: सूक्तिः इत्युक्ते ‘सुन्दरं वचनम्’। सूक्तिषु जीवनमूल्यानि निहितानि भवन्ति । सत्यम्। सूक्तयः जीवने अस्माकं मार्गदर्शनं कुर्वन्ति । संस्कृतसाहित्ये सूक्तीनां भाण्डागारः अस्ति ।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: सूक्ति का अर्थ है 'सुन्दर वचन'। सूक्तियों में जीवन के मूल्य निहित (छिपे) होते हैं। यह सच है। सूक्तियाँ जीवन में हमारा मार्गदर्शन करती हैं। संस्कृत साहित्य में सूक्तियों का भण्डार (खजाना) है।
छात्राः: आचार्य! अस्मासु कुतूहलं वर्धते । वयम् एताः सूक्तीः पठामः । न केवलं पठामः अपितु स्मरामः, जीवने आचरामः च ।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: आचार्य! हम में उत्सुकता बढ़ रही है। हम इन सूक्तियों को पढ़ेंगे। न केवल पढ़ेंगे बल्कि याद भी करेंगे, और जीवन में उनका आचरण भी करेंगे।
२. सूक्तयः (१-५)
✦ सूक्ति १
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ।।१।।[cite: 8]
पदच्छेदः: माता भूमिः पुत्रः अहम् पृथिव्याः ।[cite: 8]
अन्वयः: भूमिः माता (अस्ति) अहं पृथिव्याः पुत्रः (अस्मि)।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: भूमि (धरती) माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ। पृथ्वी माता के समान हमारा लालन-पालन करती है। अतः यह भूमि हम सब की माता है और हम सब इसकी सन्तान हैं। यह हमेशा पूजनीय है।
✦ सूक्ति २
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत्।।२।।[cite: 8]
पदच्छेदः: न रत्नम् अन्विष्यति मृग्यते हि तत्।[cite: 8]
अन्वयः: रत्नं न अन्विष्यति, तत् मृग्यते हि ।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: रत्न (हीरा आदि) स्वयं किसी को नहीं ढूँढ़ता, बल्कि उसे ढूँढ़ा जाता है। अर्थात, हीरे आदि रत्न ग्राहक को नहीं खोजते, ग्राहक ही उन्हें खोजते हैं। उसी प्रकार यदि हमारे अन्दर गुण हैं, तो गुणों को पहचानने वाले स्वयं हमें ढूँढ़ते हुए आ जाएँगे।
✦ सूक्ति ३
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।।३।।[cite: 8]
पदच्छेदः: शरीरम् आद्यम् खलु धर्मसाधनम्।[cite: 8]
अन्वयः: शरीरं खलु आद्यं धर्मसाधनम्।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: शरीर ही धर्म का (कर्तव्य पालन का) पहला साधन है। यदि हमारा शरीर स्वस्थ है तभी हम अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं। अतः हमें अपने शरीर की रक्षा हमेशा करनी चाहिए क्योंकि शरीर ही सभी धर्मों को पूरा करने का पहला माध्यम है।
✦ सूक्ति ४
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।।४।।[cite: 8]
पदच्छेदः: क्षणशः कणशः च एव विद्याम् अर्थं च साधयेत्।[cite: 8]
अन्वयः: क्षणशः (एव) विद्यां कणशः एव अर्थं च साधयेत्।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: एक-एक क्षण बचाकर विद्या (ज्ञान) प्राप्त करनी चाहिए और एक-एक कण (पैसा) बचाकर धन इकट्ठा करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय का एक पल भी नष्ट नहीं करना चाहिए। कहा भी गया है- क्षण नष्ट करने पर विद्या कहाँ? और कण नष्ट करने पर धन कहाँ?
✦ सूक्ति ५
सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।।५।।[cite: 8]
पदच्छेदः: सुखार्थिनः कुतः विद्या कुतः विद्यार्थिनः सुखम्।[cite: 8]
अन्वयः: सुखार्थिनः विद्या कुतः (भवेत्), विद्यार्थिनः सुखं कुतः (भवेत्)।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ? और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ? जो हमेशा सुख और आराम चाहता है, वह विद्या प्राप्त नहीं कर सकता। जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है उसे आलस्य और सुख का त्याग करके निरन्तर परिश्रम करना चाहिए।
३. सूक्तयः (६-१०)
✦ सूक्ति ६
गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः।।६।।[cite: 8]
पदच्छेदः: गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गम् न च वयः ।[cite: 8]
अन्वयः: गुणिषु गुणाः (एव) पूजास्थानं (भवन्ति) लिङ्गं च न (भवति) वयः च न (भवति)।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: गुणी लोगों में उनके गुण ही पूजा (सम्मान) के योग्य होते हैं, न कि उनका लिंग (स्त्री/पुरुष) और न ही उनकी आयु। सम्मान के लिए व्यक्ति के गुण देखे जाते हैं, उम्र या लिंग नहीं।
✦ सूक्ति ७
मा ब्रूहि दीनं वचः।।७।।[cite: 8]
पदच्छेदः: मा ब्रूहि दीनम् वचः ।[cite: 8]
अन्वयः: (त्वं) दीनं वचः मा ब्रूहि ।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: कभी भी दीन (लाचारी भरे) वचन मत बोलो। समाज में कई तरह के लोग होते हैं, कुछ मदद करते हैं और कुछ केवल झूठी बातें बनाते हैं। इसलिए स्वाभिमानी व्यक्ति को हर किसी के सामने मदद के लिए लाचारी भरे वचन (याचना) नहीं बोलने चाहिए।
✦ सूक्ति ८
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्।।८।।[cite: 8]
पदच्छेदः: यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान्।[cite: 8]
अन्वयः: यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् (भवति)।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: जो पुरुष क्रियावान् (ज्ञान के अनुसार आचरण करने वाला) है, वही सच्चा विद्वान है। केवल पढ़ लेने से कोई विद्वान नहीं होता, बल्कि प्राप्त ज्ञान का जीवन और व्यवहार में प्रयोग करने से ही व्यक्ति विद्वान बनता है। क्रिया (कर्म) के बिना ज्ञान भार के समान है।
✦ सूक्ति ९
शीलं परं भूषणम्।।९।।[cite: 8]
पदच्छेदः: शीलम् परम् भूषणम्।[cite: 8]
अन्वयः: शीलं परं भूषणम् (अस्ति)।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: शील (अच्छा चरित्र या आचरण) ही मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ आभूषण (गहना) है। सदाचार के बिना अन्य सभी गुण बेकार हैं।
✦ सूक्ति १०
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।।१०।।[cite: 8]
पदच्छेदः: हितम् मनोहारि च दुर्लभम् वचः ।[cite: 8]
अन्वयः: हितं मनोहारि च वचः दुर्लभं (भवति)।[cite: 8]
हिन्दी अर्थ: हितकारी (भलाई करने वाले) और मनोहर (मन को अच्छे लगने वाले) वचन एक साथ मिलना दुर्लभ है। कुछ लोग भलाई की बात कहते हैं पर वह कठोर (कड़वी) होती है, और कुछ मीठी बातें कहते हैं पर वे भलाई की नहीं होतीं। जो बात भलाई की भी हो और मीठी भी हो, ऐसा वचन दुर्लभ है।
४. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings)
| संस्कृत शब्दः | संस्कृत-पर्यायः | हिन्दी अर्थः | English Meaning |
|---|---|---|---|
| चर | आचरणं कुरु | आचरण करो | (May you) follow[cite: 8] |
| इत्युक्ते | इति कथने | अर्थात् | It means[cite: 8] |
| कुतूहलम् | कौतुकम् | उत्सुकता | Curiosity[cite: 8] |
| भाण्डागारः | कोषः | भण्डार | Treasure-trove[cite: 8] |
| अन्विष्यति | अन्वेषणं करोति | ढूँढ़ता है | Searches[cite: 8] |
| मृग्यते | अन्विष्यते | ढूँढ़ा जाता है | Searches[cite: 8] |
| आद्यम् | प्रथमम् | पहला | First[cite: 8] |
| धर्मसाधनम् | येन धर्मसिद्धिः भवति | धर्मसिद्धि का साधन | Instrument for performing Dharma[cite: 8] |
| क्षणशः | क्षणे क्षणे | प्रत्येक पल में | Every moment[cite: 8] |
| कणशः | कणे कणे | प्रत्येक कण में | In every object and particle[cite: 8] |
| अर्थम् | वित्तम् | धन को | Wealth[cite: 8] |
| साधयेत् | सम्पादयेत् | अर्जन करना चाहिए | Should accomplish[cite: 8] |
| पणस्य | नाणकस्य | रूपये का | Of rupee[cite: 8] |
| सुखार्थिनः | सुखम् इच्छतः | सुख चाहने वाले का | Of the seekers of enjoyment[cite: 8] |
| पूजास्थानम् | श्रद्धायोग्यम् | वन्दनीय | Worthy of worship[cite: 8] |
| वयः | अवस्था | आयु | Age[cite: 8] |
| मा | न | मत | Do not[cite: 8] |
| ब्रूहि | वद | बोलो | May you tell[cite: 8] |
| दीनम् | दैन्यम् | दयनीय | Helpless[cite: 8] |
| विकत्थनम् | गर्ववाणी | मिथ्या आत्म-प्रशंसा | Boasting[cite: 8] |
| क्रियावान् | क्रियाशीलः | सक्रिय | Action-oriented[cite: 8] |
| शीलम् | आचरणम् | चरित्र | Character[cite: 8] |
५. अभ्यासः - भाग १ (प्रश्नोत्तराणि १-३)
१. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति वदन्तु लिखन्तु च—
(हिन्दी: वाक्यों को पढ़कर 'हाँ' (आम्) या 'नहीं' (न) बताएँ और लिखें—)
• (क) किं वयं पृथिव्याः पुत्राः पुत्र्यः च स्मः? (क्या हम पृथ्वी के पुत्र और पुत्रियाँ हैं?) ➔ आम्[cite: 8]
• (ख) किं रत्नम् अन्विष्यति? (क्या रत्न ढूँढ़ता है?) ➔ न[cite: 8]
• (ग) किं शीलं श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति? (क्या शील (अच्छा चरित्र) श्रेष्ठ आभूषण है?) ➔ आम्[cite: 8]
• (घ) किं शरीरम् आद्यं धर्मसाधनम्? (क्या शरीर पहला धर्मसाधन है?) ➔ आम्[cite: 8]
• (ङ) किं गुणानां सर्वदा एव आदरः भवति? (क्या गुणों का हमेशा आदर होता है?) ➔ आम्[cite: 8]
• (च) किं क्रियाशीलः एव विद्वान् भवति? (क्या क्रियाशील ही विद्वान होता है?) ➔ आम्[cite: 8]
• (छ) किम् अस्माभिः केवलं मनोरञ्जकानि वाक्यानि वक्तव्यानि? (क्या हमें केवल मनोरंजक बातें ही बोलनी चाहिए?) ➔ न[cite: 8]
• (ज) यः सदा सुखम् इच्छति, किं सः विद्यां प्राप्नोति? (जो हमेशा सुख चाहता है, क्या वह विद्या पाता है?) ➔ न[cite: 8]
२. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु—
(हिन्दी: पाठ के आधार पर प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में लिखें—)
• (क) आद्यं धर्मसाधनं किम्? (पहला धर्मसाधन क्या है?) ➔ शरीरम्[cite: 8]
• (ख) कीदृशं वचः मा ब्रूहि? (कैसे वचन नहीं बोलने चाहिए?) ➔ दीनम्[cite: 8]
• (ग) श्रेष्ठम् आभूषणं किम् अस्ति? (श्रेष्ठ आभूषण क्या है?) ➔ शीलम्[cite: 8]
• (घ) सर्वेषां मनुष्याणां माता का अस्ति? (सभी मनुष्यों की माता कौन है?) ➔ भूमिः / पृथ्वी[cite: 8]
• (ङ) रत्नानाम् अन्वेषणं के कुर्वन्ति? (रत्नों की खोज कौन करते हैं?) ➔ ग्राहकाः[cite: 8]
३. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु—
(हिन्दी: पाठ के आधार पर प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्यों में लिखें—)
• (क) कः विद्वान् अस्ति? (विद्वान कौन है?)
➔ यः क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् अस्ति।[cite: 8]
• (ख) गुणिषु पूजास्थानं किम्? (गुणियों में पूजा का स्थान (कारण) क्या है?)
➔ गुणिषु गुणाः पूजास्थानं भवन्ति।[cite: 8]
• (ग) कः विद्यां न प्राप्नोति? (कौन विद्या नहीं पाता है?)
➔ सुखार्थी विद्यां न प्राप्नोति।[cite: 8]
• (घ) मनुष्यः विद्याम् अर्थं च कथं साधयेत्? (मनुष्य विद्या और धन कैसे प्राप्त करे?)
➔ मनुष्यः क्षणशः विद्यां कणशः च अर्थं साधयेत्।[cite: 8]
• (ङ) कीदृशं वचनं दुर्लभम्? (कैसे वचन दुर्लभ हैं?)
➔ हितं मनोहारि च वचनं दुर्लभम्।[cite: 8]
६. अभ्यासः - भाग २ (प्रश्नोत्तराणि ४-८)
४. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु—
(हिन्दी: रेखांकित शब्दों के आधार पर प्रश्न-निर्माण करें—)
• (क) शीलं परं भूषणम्। ➔ किं परं भूषणम्?[cite: 8]
• (ख) मनुष्यः पृथिव्याः सन्तानः अस्ति। ➔ मनुष्यः कस्याः सन्तानः अस्ति?[cite: 8]
• (ग) गुणिषु लिङ्गं वयः च न महत्त्वपूर्णम्। ➔ गुणिषु के न महत्त्वपूर्णम्? / गुणिषु किं किं न महत्त्वपूर्णम्?[cite: 8]
• (घ) हितकारकं मनोहारि च वचः दुर्लभं भवति। ➔ हितकारकं मनोहारि च किं दुर्लभं भवति?[cite: 8]
५. पाठस्य आधारेण उदाहरणानुसारं समुचितं मेलनं कुर्वन्तु—
(हिन्दी: उचित मेल करें—)
(क) क्षणशः कणशः
(ख) सर्वश्रेष्ठम् आभूषणम्
(ग) रत्नं न अन्विष्यति, तत्
(घ) आद्यं धर्मसाधनम्
(ङ) हितकारकं मनोहारि च वचः
(च) पूजास्थानम्
➔ विद्याम् अर्थं च साधयेत्[cite: 8]
➔ शीलम्[cite: 8]
➔ मृग्यते[cite: 8]
➔ शरीरम्[cite: 8]
➔ दुर्लभम्[cite: 8]
➔ गुणाः[cite: 8]
६. पाठात् अधोलिखितानां पदानां समानार्थकपदानि चित्वा लिखन्तु—
(हिन्दी: पाठ से समान अर्थ वाले शब्द चुनकर लिखें—)
• (क) सुतः ➔ पुत्रः[cite: 8]
• (ख) प्रथमम् ➔ आद्यम्[cite: 8]
• (ग) धनम् ➔ अर्थम् / वित्तम्[cite: 8]
• (घ) अवस्था ➔ वयः[cite: 8]
• (ङ) वचनम् ➔ वचः[cite: 8]
• (च) आचरणम् ➔ शीलम्[cite: 8]
७. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितेषु वाक्येषु रेखाङ्कितपदानां विभक्तिं निर्दिशन्तु—
(हिन्दी: रेखांकित पदों की विभक्ति बताएँ—)
• (क) माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः । ➔ षष्ठी विभक्तिः[cite: 8]
• (ख) गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः। ➔ सप्तमी विभक्तिः[cite: 8]
• (ग) शीलं परं भूषणम्। ➔ प्रथमा विभक्तिः[cite: 8]
• (घ) क्षणशः कणशश्चैव विद्याम् अर्थं च साधयेत्। ➔ द्वितीया विभक्तिः[cite: 8]
• (ङ) सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्। ➔ षष्ठी विभक्तिः[cite: 8]
• (च) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः । ➔ प्रथमा विभक्तिः[cite: 8]
८. यत्र अग्रे स्वरः अस्ति तत्र अनुस्वारस्य स्थाने ‘म्’ लिखित्वा वाक्यानि पुनः लिखन्तु—
(हिन्दी: जहाँ आगे स्वर (Vowel) हो, वहाँ अनुस्वार (ं) के स्थान पर 'म्' (हलन्त म्) लिखकर वाक्य फिर से लिखें—)
• (क) न रत्नं अन्विष्यति । ➔ न रत्नम् अन्विष्यति ।[cite: 8]
• (ख) शरीरं आद्यं खलु धर्मसाधनम्। ➔ शरीरम् आद्यं खलु धर्मसाधनम्।[cite: 8]
• (ग) वयं अद्यतनं पाठं पठामः । ➔ वयम् अद्यतनं पाठं पठामः ।[cite: 8]
• (घ) त्वं अस्माकं गृहं आगच्छ। ➔ त्वम् अस्माकं गृहम् आगच्छ।[cite: 8]
• (ङ) अहं एकं प्रश्नं प्रष्टुं इच्छामि । ➔ अहम् एकं प्रश्नं प्रष्टुम् इच्छामि ।[cite: 8]
• (च) गुणं अर्जयितुं अधिकं प्रयत्नं करोतु । ➔ गुणम् अर्जयितुम् अधिकं प्रयत्नं करोतु ।[cite: 8]
७. योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्
✦ मकारलेखनम् (नियमः)
यदा ‘म्’कारात् परं व्यञ्जनवर्णः भवति, तदा ‘म्’कारस्य स्थाने अनुस्वारः (ं) लेखनीयः ।
(हिन्दी: जब 'म्' के बाद व्यञ्जन (Consonant) हो, तो 'म्' के स्थान पर अनुस्वार (ं) लिखना चाहिए।)
यदा ‘म्’कारात् परं स्वरवर्णः भवति, तदा ‘म्’कारः एव लेखनीयः ।
(हिन्दी: जब 'म्' के बाद स्वर (Vowel) हो, तो 'म्' (हलन्त म्) ही लिखना चाहिए।)
यथा – पुस्तकम् पठति = पुस्तकं पठति । (प व्यञ्जन है)[cite: 8]
पुस्तकम् अपठत् = पुस्तकम् अपठत् । (अ स्वर है)[cite: 8]
✦ सूक्तिः (सु + उक्तिः)
सूक्तिः = सु + उक्तिः । शोभना उक्तिः = सूक्तिः इति कथ्यते । एतासु सूक्तिषु जीवनमूल्यानि सन्निहितानि भवन्ति । एताः सूक्तयः अस्मान् जीवने उन्नत्यर्थं प्रेरयन्ति । संस्कृतसाहित्यम् एताभिः सूक्तिभिः परिपूर्णम् अस्ति ।
(हिन्दी: 'सु + उक्ति' = अच्छी उक्ति (बात) को 'सूक्ति' कहा जाता है। इन सूक्तियों में जीवन के मूल्य छिपे होते हैं। ये सूक्तियाँ हमें जीवन में उन्नति के लिए प्रेरित करती हैं। संस्कृत साहित्य इन सूक्तियों से भरा हुआ है।)[cite: 8]
✦ ग्रन्थानां संक्षिप्तः परिचयः
अत्र एताः सूक्तयः विविधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः संगृहीताः । तेषां ग्रन्थानां संक्षिप्तः परिचयः अत्र दीयते –
(हिन्दी: यहाँ दी गई सूक्तियाँ विभिन्न ग्रन्थों से ली गई हैं। उन ग्रन्थों का संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया गया है –)[cite: 8]
- अथर्ववेदः – अथर्ववेदः चतुर्षु वेदेषु अन्यतमः अस्ति । अस्मिन् विविधाः स्तुतयः, अर्थशास्त्रं, चिकित्साशास्त्रं, तन्त्रविद्या, विज्ञानं, दर्शनं च वर्तते ।[cite: 8]
- कुमारसम्भवम् – महाकविः कालिदासः अस्य ग्रन्थस्य रचयिता । कुमारसम्भवे शिवपार्वत्योः विवाहस्य, कुमारस्य कार्तिकेयस्य च जन्मनः कथा वर्तते ।[cite: 8]
- पञ्चतन्त्रम् – अस्य नीतिग्रन्थस्य लेखकः विष्णुशर्मा अस्ति । अस्मिन् ग्रन्थे पञ्च प्रकरणानि सन्ति । यत्र पशुपक्षिणां कथामाध्यमेन नैतिकशिक्षा प्रदत्ता ।[cite: 8]
- उत्तररामचरितम् – संस्कृतनाटकेषु सुप्रसिद्धस्य अस्य नाटकस्य रचयिता महाकविः भवभूतिः अस्ति । अस्मिन् नाटके भगवतः श्रीरामस्य राज्याभिषेकोत्तरस्य जीवनस्य चरितं वर्तते ।[cite: 8]
- नीतिशतकम् – उज्जयिन्याः नृपः भर्तृहरिः संस्कृतस्य महान् कविः आसीत्। सः त्रीणि शतककाव्यानि रचितवान्। तेन रचितं नीतिशतकं नीतिशास्त्रस्य प्रसिद्धः ग्रन्थः अस्ति ।[cite: 8]
- किरातार्जुनीयम् – संस्कृतकाव्यपरम्परायां किरातार्जुनीयम् इति विशिष्टं महाकाव्यम् अस्ति । सुप्रसिद्धः महाकविः भारविः अस्य लेखकः अस्ति । अस्मिन् ग्रन्थे किरातवेशधारिणः शिवस्य अर्जुनस्य च कथा वर्तते ।[cite: 8]
✦ परियोजनाकार्यम् / कार्यकलापः
१. अन्तर्जालस्य (Internet) साहाय्येन एतादृशीनां प्रेरणादायिकानां दशानां सूक्तीनां सङ्ग्रहणं कृत्वा भित्तिपत्रम् एकं रचयन्तु ।
(हिन्दी: इंटरनेट की सहायता से ऐसी ही 10 प्रेरणादायक सूक्तियों को इकट्ठा करके एक चार्ट (पोस्टर) बनाएँ।)[cite: 8]
२. स्वमातृभाषायां प्रसिद्धाः कतिचन सूक्तीः लिखन्तु ।
(हिन्दी: अपनी मातृभाषा (हिन्दी आदि) में कुछ प्रसिद्ध सूक्तियाँ (कहावतें/सुविचार) लिखें।)[cite: 8]
३. एताः सूक्तीः पठित्वा भवतां मनसि कः विचारः उत्पद्यते इति स्वभाषया लिखन्तु ।
(हिन्दी: इन सूक्तियों को पढ़कर आपके मन में क्या विचार आता है, यह अपनी भाषा में लिखें।)[cite: 8]
कार्यकलापः
एताः सूक्तीः कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयन्तु ।
(हिन्दी: इन सूक्तियों को याद करके (कंठस्थ करके) कक्षा में सुनाएँ।)[cite: 8]

