क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्
✦ २. श्लोकान्त्याक्षरी (श्लोकाः १-३) (अन्वयः भावार्थः च)
✦ ३. श्लोकान्त्याक्षरी (श्लोकाः ४-६) (अन्वयः भावार्थः च)
✦ ४. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings)
✦ ५. अभ्यासः - भाग १ (प्रश्नोत्तराणि १-३)
✦ ६. अभ्यासः - भाग २ (प्रश्नोत्तराणि ४-६)
✦ ७. योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्
१. पाठ-परिचयः
दीपिका: अरे भारति ! बहि: वृष्टिः अस्ति, कथं क्रीडाम:?[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: अरे भारती! बाहर बारिश हो रही है, कैसे खेलेंगे?
भारती: सखि दीपिके! वयम् अधुना क्रीडितुम् अभिलषाम: । वृष्टिः अस्तु नाम । इच्छा अस्ति चेत् क्रीडाम: । बहिर्गमनस्य आवश्यकता एव नास्ति । एषा नूतना क्रीडा अस्ति भोः ! ‘अन्त्याक्षरी क्रीडा’ इति ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: सखी दीपिका! हम अभी खेलना चाहते हैं। बारिश होती रहे। इच्छा है तो खेलेंगे। बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं है। अरे! यह एक नया खेल है 'अन्त्याक्षरी खेल'।
दीपिका: किम् अन्त्याक्षरी क्रीडा? अहमपि क्रीडामि ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: क्या अन्त्याक्षरी खेल? मैं भी खेलूँगी।
भारती: अवश्यम्। आगच्छन्तु। वयं सर्वे क्रीडाम: ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: ज़रूर। आ जाओ। हम सब खेलेंगे।
अन्यः: सखि! तर्हि क्रीडाया: नियमान् सूचयतु ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: सखी! तो खेल के नियम बताओ।
भारती: वयं गणद्वयं रचयाम: । प्रथमगणस्य नाम — ‘ज्ञानमाला’ एवं च द्वितीयगणस्य नाम — ‘रत्नमाला’। आदौ प्रथमगणस्य सदस्य: एकं पद्यं गायति । तस्य पद्यस्य अन्तिमेन व्यञ्जनवर्णेन द्वितीयगणस्य सदस्य: सदस्या वा अन्यं श्लोकं गायति, एवं क्रमश: क्रीडा प्रचलति ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: हम दो दल (टीमें) बनाते हैं। पहले दल का नाम - 'ज्ञानमाला' और दूसरे दल का नाम - 'रत्नमाला'। शुरुआत में पहले दल का सदस्य एक पद्य (श्लोक) गाएगा। उस पद्य के अंतिम व्यञ्जन वर्ण (अक्षर) से दूसरे दल का सदस्य या सदस्या कोई अन्य श्लोक गाएगा, इसी क्रम से खेल चलेगा।
सर्वे: अहो ! महान् आनन्द: भविष्यति, तर्हि क्रीडाम: । आदौ ज्ञानमालागण: ‘र’ इति अक्षरात् पद्यं गायति तत: रत्नमालागण: वदति ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: अहो! बहुत आनन्द आएगा, तो खेलते हैं। शुरुआत में ज्ञानमाला दल 'र' अक्षर से पद्य गाएगा, उसके बाद रत्नमाला दल बोलेगा।
२. श्लोकान्त्याक्षरी (श्लोकाः १-३)
✦ ज्ञानमालागण: (श्लोक १)
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवा:।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुका:।।१।। (क्)[cite: 5]
पदच्छेदः: रूप-यौवन-सम्पन्नाः विशाल-कुल-सम्भवा: विद्या-हीना: न शोभन्ते निर्गन्धा: इव किंशुका: ।[cite: 5]
अन्वयः: रूपयौवनसम्पन्ना: विशालकुलसम्भवा: (परन्तु) विद्याहीना: (जनाः) निर्गन्धा: किंशुका: इव न शोभन्ते ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: जिनके पास सुन्दर रूप है, यौवन (जवानी) है, उत्तम कुल में जन्म भी प्राप्त किया है, किन्तु यदि वे विद्या प्राप्त नहीं करते हैं तो उनकी शोभा नहीं होती। जैसे खिले हुए पलाश के पेड़ देखने में बहुत सुन्दर होते हैं, किन्तु उनमें सुगन्ध नहीं होती। लोग उनका उपयोग नहीं करते। अतः रूप, यौवन और उच्च कुल की अपेक्षा विद्या ही श्रेष्ठ है।
✦ रत्नमालागण: (श्लोक २) - 'क्' वर्णात्
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।।२।। (व्)[cite: 5]
पदच्छेदः: काव्य-शास्त्र-विनोदेन काल: गच्छति धीमताम् व्यसनेन च मूर्खाणाम् निद्रया कलहेन वा ।[cite: 5]
अन्वयः: धीमतां काल: काव्यशास्त्रविनोदेन मूर्खाणां च (काल:) व्यसनेन निद्रया कलहेन वा गच्छति ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: बुद्धिमान लोग काव्यों और शास्त्रों के अध्ययन (मनोरंजन) से समय का सदुपयोग करते हैं, परन्तु मूर्ख लोग सोने में, आपस में झगड़ा करने में अथवा बुरी आदतों (नशे आदि) में अमूल्य समय का दुरुपयोग करते हैं। अतः हम नित्य विद्याभ्यास, पढ़ने या लिखने से समय का सदुपयोग करें।
✦ ज्ञानमालागण: (श्लोक ३) - 'व्' वर्णात्
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्ति: परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ।।३।। (य्)[cite: 5]
पदच्छेदः: विद्या विवादाय धनम् मदाय शक्ति: परेषाम् परिपीडनाय खलस्य साधो: विपरीतम् एतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ।[cite: 5]
अन्वयः: खलस्य विद्या विवादाय, धनं मदाय, शक्ति: परेषां परिपीडनाय (च भवति)। (परं) साधो: एतद्-विपरीतं (विद्या) ज्ञानाय (धनं) दानाय (शक्तिः) रक्षणाय च (भवति)।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: दुष्ट व्यक्ति विद्या का उपयोग झगड़ने के लिए करता है। धन का उपयोग घमण्ड (अहंकार) के लिए करता है। शक्ति (सामर्थ्य) का उपयोग दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के लिए करता है। किन्तु सज्जन का स्वभाव इसके विपरीत होता है। वह विद्या का उपयोग दूसरों का ज्ञान बढ़ाने के लिए करता है। धन का उपयोग दान के लिए करता है और शक्ति का उपयोग दुर्बलों की रक्षा के लिए करता है।
३. श्लोकान्त्याक्षरी (श्लोकाः ४-६)
✦ अन्य श्लोकाः (श्लोक ४)
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।।४।। (त्)[cite: 5]
पदच्छेदः: येषाम् न विद्या न तप: न दानम् ज्ञानम् न शीलम् न गुण: न धर्म: ते मर्त्य-लोके भुवि भार-भूता: मनुष्य-रूपेण मृगा: चरन्ति ।[cite: 5]
अन्वयः: येषां (जनानां) विद्या न, तप: न, दानं न, ज्ञानं न, शीलं न, गुण: न, धर्म: (अपि) न (अस्ति), ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता: मृगा: मनुष्यरूपेण चरन्ति ।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: जो लोग विद्या प्राप्त नहीं करते, कठिन तप नहीं करते, दान नहीं करते, ज्ञान अर्जित नहीं करते, अच्छे चरित्र वाले नहीं होते, गुणवान नहीं होते और धर्म का आचरण नहीं करते, वे इस धरती पर भार-स्वरूप होकर पशुओं के समान मनुष्यों के रूप में इधर-उधर घूमते (चरते) हैं।
✦ अन्य श्लोकाः (श्लोक ५)
तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च लक्ष्मीर्वाणी यशस्विनी ।
तत्त्वज्ञानं परा शान्तिर्यदा विद्या भवेत्तव ।।५।। (व्)[cite: 5]
पदच्छेदः: तदा वृत्ति: च कीर्तिः च लक्ष्मीः वाणी यशस्विनी तत्त्वज्ञानम् परा शान्ति: यदा विद्या भवेत् तव ।[cite: 5]
अन्वयः: यदा विद्या भवेत्, तदा तव वृत्ति:, कीर्ति:, लक्ष्मी:, यशस्विनी वाणी, तत्त्वज्ञानं, परा शान्ति: च (भवेत्)।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: यदि तुम विद्या प्राप्त करते हो (जब तुम्हारे पास विद्या होगी), तब तुम्हें रोजगार (आजीविका), यश, धन (लक्ष्मी), कीर्ति देने वाली वाणी, वास्तविक तत्त्वज्ञान और परम शान्ति प्राप्त होगी। अतः निरन्तर विद्या प्राप्त करनी चाहिए।
✦ अन्य श्लोकाः (श्लोक ६, ९ व १० सारांश)
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं
विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरु:।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीन: पशु: ।।६।। (श्)[cite: 5]
अन्वयः (सारांश): विद्या नाम नरस्य अधिकं रूपं प्रच्छन्नगुप्तं धनं (च अस्ति)। विद्या भोगकरी यशःसुखकरी (च अस्ति)। विद्या गुरूणां गुरुः (अस्ति)। विद्या विदेशगमने बन्धुजनः (भवति)। विद्या परा देवता (अस्ति)। विद्या राजसु पूज्यते, धनं न हि (पूज्यते)। विद्याविहीनः (जनः) पशुः (भवति)।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: विद्या मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ सौन्दर्य है, यह छिपा हुआ गुप्त धन है। विद्या सुख-सुविधा, यश और आनन्द देने वाली है। विद्या गुरुओं की भी गुरु है। विदेश जाने पर विद्या भाई (मित्र) के समान होती है। विद्या सबसे बड़ी देवता है। राजाओं के दरबार में विद्या की ही पूजा (सम्मान) होती है, धन की नहीं। अतः विद्या से रहित मनुष्य पशु के समान होता है।
(श्लोक ९): ताराणां भूषणं चन्द्रः लतानां भूषणं सममु्।
पृथिव्याः भूषणं राजा विद्या सर्वस्य भूषणम्॥९॥
हिन्दी अर्थ: तारों का आभूषण (गहना/शोभा) चन्द्रमा है। लताओं की शोभा फूल हैं। पृथ्वी की शोभा राजा है। परन्तु विद्या सब की शोभा (आभूषण) है।[cite: 5]
(श्लोक १०): न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि ।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥१०॥
हिन्दी अर्थ: विद्या रूपी धन को न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है। न भाइयों में इसका बँटवारा हो सकता है और न ही यह भार (वजन) स्वरूप है। खर्च करने (बाँटने) पर यह नित्य बढ़ता ही है। अतः विद्या रूपी धन सभी धनों में प्रधान (सबसे श्रेष्ठ) है।[cite: 5]
४. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings)
| संस्कृत शब्दः | संस्कृत-पर्यायः | हिन्दी अर्थः | English Meaning |
|---|---|---|---|
| ननु | खलु | है न | Isn’t it[cite: 5] |
| रूपयौवनसम्पन्ना: | सौन्दर्येण यौवनेन च युक्ताः | सौन्दर्य और यौवन से सम्पन्न | Handsome & Youthful[cite: 5] |
| विशालकुलसम्भवा: | महति परिवारे जाताः | विशिष्ट परिवार में जन्मे हुए | Born in a privileged family[cite: 5] |
| निर्गन्धा: | गन्धहीना: | गंधहीन | Without fragrance[cite: 5] |
| किंशुका: | पलाशवृक्षाः | ढाक/टेसू का पेड़ | Flame of the forest trees[cite: 5] |
| धीमताम् | बुद्धिमताम् | बुद्धिमान लोगों का | Of Intelligent people[cite: 5] |
| व्यसनेन | भोगविलासेन | भोग-विलास के द्वारा | By the addiction and bad habits[cite: 5] |
| मदाय | गर्वाय | अभिमान के लिए | For arrogance[cite: 5] |
| परिपीडनाय | कष्टदानाय | कष्ट देने के लिए | For troubling[cite: 5] |
| खलः | दुष्टः | दुर्जन | Wicked[cite: 5] |
| शीलम् | वृत्तम् | चरित्र | Character[cite: 5] |
| मर्त्यलोके | पृथिव्याम् | संसार में | In this world[cite: 5] |
| भुवि | भूमौ | धरती पर | On the earth[cite: 5] |
| भारभूता: | भारकराः | भार | Burden[cite: 5] |
| वृत्ति: | उद्योगः | आजीविका | Occupation[cite: 5] |
| लक्ष्मी: | सम्पत् | सम्पत्ति | Wealth[cite: 5] |
| यशस्विनी | कीर्तियुक्ता | कीर्ति से युक्त | Endowed with fame[cite: 5] |
| तत्त्वज्ञानम् | वास्तविकं ज्ञानम् | यथार्थ ज्ञान | Real knowledge[cite: 5] |
| प्रच्छन्नगुप्तम् | आवृत्तं रक्षितं च | ढँका हुआ और सुरक्षित | Covered and concealed[cite: 5] |
| भोगकरी | भोग्यवस्तूनां प्रदात्री | सुख-सुविधाओं को देने वाली | That which gives materialistic pleasure[cite: 5] |
| यशःसुखकरी | या कीर्तिं सुखं च ददाति | ख्याति तथा सुख देने वाली | That which gives fame and happiness[cite: 5] |
| विदेशगमने | अन्यदेशेषु भ्रमणसमये | विदेश जाने पर | While travelling other places[cite: 5] |
| परा | श्रेष्ठा | श्रेष्ठ | Great[cite: 5] |
| विद्याविहीन: | ज्ञानरहितः | विद्या-रहित | Devoid of education[cite: 5] |
| पन्था: | मार्ग: | पथ | The way/Route/Road[cite: 5] |
| कन्था | पुरातनवस्त्रैः निर्मितम् आस्तरणम् | जीर्ण-शीर्ण वस्त्रों से बनी मोटी चादर | Rug made from rags[cite: 5] |
| वित्तम् | धनम् | धन | Money[cite: 5] |
| सौख्यम् | सुखम् | आनन्द | Happiness[cite: 5] |
| ध्रुवम् | स्थिरम् | निश्चित | Certain[cite: 5] |
| ताराणाम् | नक्षत्राणाम् | नक्षत्रों का | Of the stars[cite: 5] |
| चोरहार्यम् | चोरेण हरणयोग्यम् | चोर के द्वारा हरण योग्य | Can be stolen by thieves[cite: 5] |
| राजहार्यम् | शासकेन हरणयोग्यम् | राजा के द्वारा हरण करने योग्य | Able to be grabbled by Kings[cite: 5] |
| भ्रातृभाज्यम् | भ्रातृ-भगिनीषु विभाजनयोग्यम् | भाई-बहनों में बाँटने योग्य | Fit to be distributed amongst siblings[cite: 5] |
| भारकारि | भारभूतम् | भार स्वरूप | Heavy[cite: 5] |
| व्यये कृते | यदि व्ययः क्रियते | खर्च करने पर | By spending[cite: 5] |
| सर्वधनप्रधानम् | सर्वेषु धनेषु मुख्यम् | सभी प्रकार के धनों में प्रमुख | Most important amongst all kinds of wealth[cite: 5] |
५. अभ्यासः - भाग १ (प्रश्नोत्तराणि १-३)
१. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखन्तु—
(हिन्दी: नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में लिखें—)
• (क) विद्याहीना: कीदृशाः किंशुका: इव न शोभन्ते? (विद्याहीन लोग कैसे पलाश के फूलों के समान शोभा नहीं देते?) ➔ निर्गन्धाः[cite: 5]
• (ख) धीमतां कालः कथं गच्छति? (बुद्धिमानों का समय कैसे बीतता है?) ➔ काव्यशास्त्रविनोदेन[cite: 5]
• (ग) केषां कालः निद्रया कलहेन वा गच्छति? (किनका समय सोने या झगड़ने में बीतता है?) ➔ मूर्खाणां[cite: 5]
• (घ) खलस्य विद्या किमर्थम्? (दुष्ट की विद्या किसलिए होती है?) ➔ विवादाय[cite: 5]
• (ङ) सज्जनस्य विद्या किमर्थम्? (सज्जन की विद्या किसलिए होती है?) ➔ ज्ञानाय[cite: 5]
• (च) चन्द्रः केषां भूषणम् अस्ति? (चन्द्रमा किसका आभूषण है?) ➔ ताराणाम्[cite: 5]
• (छ) सर्वधनप्रधानं किम्? (सभी धनों में प्रधान क्या है?) ➔ विद्याधनम्[cite: 5]
२. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु—
(हिन्दी: नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्यों में लिखें—)
• (क) निर्गन्धाः किंशुकाः इव के न शोभन्ते? (गंधहीन पलाश के फूलों के समान कौन शोभा नहीं देते?)
➔ रूपयौवनसम्पन्नाः विशालकुलसम्भवाः अपि विद्याहीनाः जनाः निर्गन्धाः किंशुकाः इव न शोभन्ते ।[cite: 5]
• (ख) मूर्खाणां कालः कथं गच्छति? (मूर्खों का समय कैसे बीतता है?)
➔ मूर्खाणां कालः व्यसनेन, निद्रया, कलहेन वा गच्छति ।[cite: 5]
• (ग) दुर्जनः विद्यायाः धनस्य शक्तेः च उपयोगं कथं करोति? (दुर्जन विद्या, धन और शक्ति का उपयोग कैसे करता है?)
➔ दुर्जनः विद्यायाः उपयोगं विवादाय, धनस्य उपयोगं मदाय, शक्तेः च उपयोगं परेषां परिपीडनाय करोति ।[cite: 5]
• (घ) कीदृशाः मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति? (कैसे मनुष्य धरती पर भार-स्वरूप होते हैं?)
➔ येषां न विद्या, न तपः, न दानं, न ज्ञानं, न शीलं, न गुणः, न धर्मः अस्ति, ते मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति ।[cite: 5]
• (ङ) शनैः शनैः कानि साधनीयानि? (धीरे-धीरे क्या साधना (करना) चाहिए?)
➔ पन्थाः, कन्था, पर्वतलङ्घनम्, विद्या, वित्तं च एतानि पञ्च शनैः शनैः साधनीयानि ।[cite: 5]
३. उचितान् वाक्यांशान् परस्परं संयोजयन्तु—
(हिन्दी: उचित वाक्यांशों का परस्पर मिलान करें—)
• तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च ➔ यदा विद्या भवेत्तव[cite: 5]
• खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ➔ ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय[cite: 5]
• शनैर्विद्या शनैर्वित्तं ➔ पञ्चैतानि शनैः शनैः[cite: 5]
• विद्याहीना न शोभन्ते ➔ निर्गन्धा इव किंशुका:[cite: 5]
• न चोरहार्यं न च राजहार्यम् ➔ न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि[cite: 5]
• विद्या राजसु पूज्यते ➔ न हि धनम्[cite: 5]
• अतो धर्मार्थमोक्षेभ्य: ➔ विद्याभ्यासं समाचरेत्[cite: 5]
६. अभ्यासः - भाग २ (प्रश्नोत्तराणि ४-६)
४. उदाहरणानुसारम् अधः रेखाङ्कितानि पदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु—
(हिन्दी: रेखांकित शब्दों के आधार पर प्रश्न-निर्माण करें—)
यथा – राजा पृथिव्याः भूषणं भवति । ➔ राजा कस्याः भूषणं भवति ?[cite: 5]
• (क) साधो: विद्या ज्ञानाय भवति । ➔ साधो: विद्या कस्मै भवति ?[cite: 5]
• (ख) विद्या गुरूणां गुरु: । ➔ विद्या केषां गुरु: ?[cite: 5]
• (ग) ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता: भवन्ति । ➔ ते कुत्र भुवि भारभूता: भवन्ति ?[cite: 5]
• (घ) विद्याहीना: न शोभन्ते । ➔ के न शोभन्ते ?[cite: 5]
• (ङ) सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् । ➔ सर्वस्य लोचनं किम् ?[cite: 5]
• (च) विद्या राजसु पूज्यते । ➔ विद्या केषु पूज्यते ?[cite: 5]
• (छ) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । ➔ काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति केषाम् ?[cite: 5]
५. मञ्जूषातः समुचितानि पदानि स्वीकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयन्तु—
(मञ्जूषा: रक्षणाय, मदाय, विवादाय, परिपीडनाय, ज्ञानाय, दानाय)[cite: 5]
सज्जनस्य
• शक्तिः ➔ रक्षणाय[cite: 5]
• विद्या ➔ ज्ञानाय[cite: 5]
• धनम् ➔ दानाय[cite: 5]
दुर्जनस्य
• शक्तिः ➔ परिपीडनाय[cite: 5]
• विद्या ➔ विवादाय[cite: 5]
• धनम् ➔ मदाय[cite: 5]
६. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां विभक्तिं वचनं च लिखन्तु—
| पदम् | विभक्तिः | वचनम् |
|---|---|---|
| ताराणाम् | षष्ठी विभक्तिः | बहुवचनम् |
| विद्याम् | द्वितीया विभक्तिः | एकवचनम् |
| धनस्य | षष्ठी विभक्तिः | एकवचनम् |
| कलहेन | तृतीया विभक्तिः | एकवचनम् |
| नराणाम् | षष्ठी विभक्तिः | बहुवचनम् |
| मर्त्यलोके | सप्तमी विभक्तिः | एकवचनम् |
| ज्ञानाय | चतुर्थी विभक्तिः | एकवचनम् |
| राजसु | सप्तमी विभक्तिः | बहुवचनम् |
७. योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्
✦ विद्याया: सन्दर्भे श्लोकाः
नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत्।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम्॥[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: विद्या के समान कोई भाई (बन्धु) नहीं है, विद्या के समान कोई मित्र (सुहृत्) नहीं है। विद्या के समान कोई धन (वित्त) नहीं है, और विद्या के समान कोई सुख नहीं है।
विद्याभ्यासस्तपो ज्ञानमिन्द्रियाणां च संयमः ।
अहिंसा गुरुसेवा च निःश्रेयसकरं परम्॥[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: विद्या का अभ्यास (पढ़ाई), तप, ज्ञान, इन्द्रियों पर नियंत्रण (संयम), अहिंसा और गुरु की सेवा - ये सब परम कल्याण करने वाले हैं।
ज्ञातिभिर्वण्ट्यते नैव चोरेणापि न नीयते।
दाने नैव क्षयं याति विद्यारत्नं महाधनम्।।[cite: 5]
हिन्दी अर्थ: विद्या रूपी रत्न ऐसा महान् धन है जिसे न तो रिश्तेदार (भाई-बन्धु) बाँट सकते हैं, न ही चोर चुरा सकता है, और दान करने (बाँटने) पर यह कभी नष्ट (कम) नहीं होता।
✦ 'विद्या' (आकारान्त स्त्रीलिङ्ग) शब्दस्य रूपाणि
| विभक्ति: | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विद्या | विद्ये | विद्या: |
| द्वितीया | विद्याम् | विद्ये | विद्या: |
| तृतीया | विद्यया | विद्याभ्याम् | विद्याभि: |
| चतुर्थी | विद्यायै | विद्याभ्याम् | विद्याभ्य: |
| पञ्चमी | विद्याया: | विद्याभ्याम् | विद्याभ्य: |
| षष्ठी | विद्याया: | विद्ययो: | विद्यानाम् |
| सप्तमी | विद्यायाम् | विद्ययो: | विद्यासु |
| संबोधनम् | (हे) विद्ये ! | (हे) विद्ये ! | (हे) विद्या:! |
✦ परियोजनाकार्यम् / कार्यकलापः
१. क, त, व, म, य इति पञ्चभि: वर्णै: श्लोकान् सङ्गृह्य स्फोरकपत्रे लिखन्तु, शिक्षकस्य अनुमत्या कक्षाभित्तिषु स्थापयन्तु ।
(हिन्दी: क, त, व, म, य - इन पाँच वर्णों से शुरू होने वाले श्लोकों को इकट्ठा करके चार्ट पेपर पर लिखें और शिक्षक की अनुमति से कक्षा की दीवार पर लगाएँ।)[cite: 5]
२. यथा अस्मिन् पाठे अन्त्याक्षरीश्लोकाः दत्ताः सन्ति तथैव विविधस्रोतोभ्यः सुभाषितानि चित्वा अन्त्याक्षरीक्रमेण लिखन्तु ।
(हिन्दी: जैसे इस पाठ में अन्त्याक्षरी के श्लोक दिए गए हैं, वैसे ही विभिन्न स्रोतों (पुस्तकालय, इंटरनेट आदि) से सुभाषित चुनकर अन्त्याक्षरी के क्रम में लिखें।)[cite: 5]
क्रीडा-नियमाः
पदान्त्याक्षरी क्रीडा: प्रथमः छात्रः – रामः (‘म’कारः अन्तिमवर्णः) ➔ द्वितीयः छात्रः – मानवः (‘व’कारः अन्तिमवर्णः) ➔ तृतीयः छात्रः – वनम् (अत्र ‘न’कारः अन्तिमवर्णः)। यदा पदस्य अन्ते ‘म’-वर्णः, विसर्गः, अनुस्वारः वा भवति तदा पूर्वस्थं व्यञ्जनवर्णं स्वीकृत्य एव अग्रिमं पदं वक्तव्यम्।[cite: 5]
क्रियापदानां स्मरणक्रीडा: प्रथमः छात्रः – गच्छति ➔ द्वितीयः छात्रः – गच्छति पठति ➔ तृतीयः छात्रः – गच्छति पठति लिखति। (पूर्वछात्रैः उक्तानि सर्वाणि पदानि स्मृत्वा नूतनं पदं योजनीयम्)।[cite: 5]

