Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 3 – Subhashitarasam Pitva Jeewanam Saphalam Kuru Question Answers

Sooraj Krishna Shastri
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१. पाठ-परिचयः (सुभाषित-महिमा)

पौत्री – पितामहि ! एकां नूतनां कथां कथयतु।

हिन्दी अर्थ: पोती: दादी जी! एक नई कहानी सुनाइए।

पितामही – वत्से ! त्वं प्रतिदिनं कथां शृणोषि, अद्य नीतिश्लोकान् शृणु।

हिन्दी अर्थ: दादी: बेटी! तुम प्रतिदिन कहानी सुनती हो, आज नीतिश्लोक सुनो।

पौत्री – किं नाम सुभाषितानि?

हिन्दी अर्थ: पोती: सुभाषित क्या होते हैं?

पितामही – नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि।

हिन्दी अर्थ: दादी: नीतिश्लोकों को ही सुभाषित कहते हैं।

पौत्री – आम्। नीतिश्लोकाः। सुभाषितपठनेन कः लाभः?

हिन्दी अर्थ: पोती: हाँ। नीतिश्लोक। सुभाषित पढ़ने से क्या लाभ है?

पितामही – सुभाषितपठनेन आदर्श-मानवजीवन-निर्माणाय प्रेरणा प्राप्यते। मानवजीवनस्य सुखाय समृद्धये च सुभाषितानां पठनस्य आवश्यकता अस्ति। यः सुभाषितानि पठित्वा कार्यक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करोति सः बहून् लाभान् प्राप्नोति। सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि अर्थात् शोभनानि वचनानि। तानि सर्वदा जनानां हिताय भवन्ति। सुभाषितानि स्वकर्तव्यस्य अकर्तव्यस्य च विषये स्पष्टतया मार्गदर्शनं कुर्वन्ति। अतः सर्वे अवश्यं सुभाषितानि पठन्तु। तानि पठित्वा सर्वे जीवनस्य रहस्यम् अवगच्छन्तु, जीवनं तु सुखमयं च कुर्वन्तु।

हिन्दी अर्थ: दादी: सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव जीवन के निर्माण के लिए प्रेरणा मिलती है। मानव जीवन के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों को पढ़ने की आवश्यकता है। जो सुभाषितों को पढ़कर कार्यक्षेत्र में उस ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत से लाभ प्राप्त करता है। 'सुष्ठु (सुन्दर) भाषितानि (कहे गए)' ही सुभाषित हैं, अर्थात् सुन्दर वचन। वे हमेशा लोगों के हित के लिए होते हैं। सुभाषित अपने कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में स्पष्ट रूप से मार्गदर्शन करते हैं। अतः सभी को अवश्य सुभाषित पढ़ने चाहिए। उन्हें पढ़कर सभी जीवन का रहस्य समझें, और जीवन को सुखमय बनाएँ।

२. सुभाषितानि (नीतिश्लोकाः)

श्लोकः १

गायन्ति देवाः किल गीतकानि
धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ १ ॥

अन्वयः – भारतभूमिभागे (ये) भवन्ति ते धन्याः इति देवाः गीतकानि गायन्ति किल। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते (भारतभूमिभागे) ते (देवाः) सुरत्वात् भूयः पुरुषाः (भवन्ति)।

हिन्दी भावार्थ: जो मनुष्य इस भारतभूमि पर जन्म प्राप्त करते हैं, वे धन्य हैं—ऐसा भारतभूमि का गुणगान देवता भी करते हैं। अतः हम सभी भारतीय भाग्यशाली हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के मार्गस्वरूप इस भूखण्ड में देवता भी अपना देवत्व छोड़कर मनुष्य रूप में जन्म लेने की इच्छा करते हैं।

श्लोकः २

गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥ २ ॥

अन्वयः – गुणी गुणं वेत्ति। निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। पिकः वसन्तस्य गुणं (वेत्ति) वायसः (वसन्तस्य गुणं) न (वेत्ति)। करी च सिंहस्य बलं (वेत्ति)। मूषकः (सिंहस्य बलं) न वेत्ति।

हिन्दी भावार्थ: गुणवान् व्यक्ति ही दूसरों के सद्गुणों को जानने में समर्थ होता है, गुणहीन नहीं। बलवान् व्यक्ति दूसरों का बल जान सकता है, किन्तु बलरहित नहीं। वसन्त ऋतु आने पर कोयल ही उसका महत्त्व समझकर मधुर गान करती है, कौआ नहीं। पशुराज सिंह का बल हाथी जानता है, चूहा नहीं। अतः योग्य व्यक्ति ही महत्त्व समझने में समर्थ होता है, अयोग्य नहीं।

श्लोकः ३

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः
नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥ ३ ॥

अन्वयः – तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। घनाः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः (भवन्ति)। सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः (भवन्ति)। परोपकारिणाम् एष एव स्वभावः (भवति)।

हिन्दी भावार्थ: समय के अनुसार वृक्षों पर फल आते हैं। फलों के भार से वृक्ष झुक जाते हैं। उसी प्रकार नए जल से परिपूर्ण बादल भी नीचे की ओर झुक जाते हैं और भूमि पर आकर वर्षा करते हैं। संसार में बहुत से परोपकारी लोग हैं। वे अपनी समृद्धि (धन-सम्पत्ति) के समय अहंकार प्रकट नहीं কার্যকলাপकरते। वे सहृदय और विनम्र होकर सदा परोपकार में लगे रहते हैं। परोपकारियों का यही स्वभाव होता है।

श्लोकः ४

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते
निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते
कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥ ४ ॥

अन्वयः – यथा निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः (उपायैः) कनकं परीक्ष्यते। तथा कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते।

हिन्दी भावार्थ: सुनार स्वर्ण की शुद्धता आँकने के लिए सबसे पहले उसे कसौटी पर घिसता है, फिर उसे काटता है, फिर आग में तपाता है और अंत में उस पर प्रहार (ताड़न) करता है। इन चार प्रकारों से परीक्षा करके स्वर्ण की पूर्ण शुद्धता जानी जा सकती है। वैसे ही पुरुष की भी चार उपायों से परीक्षा की जाती है—वह किस परिवार (कुल) का है? उसका स्वभाव (शील) कैसा है? वह किन गुणों से युक्त है? और वह अपने किस कर्म से सर्वत्र आदर पाता है? इन्हीं कसौटियों पर परखकर व्यक्ति का व्यक्तित्व जाना जा सकता है।

श्लोकः ५

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति
प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥ ५ ॥

अन्वयः – प्रज्ञा कौल्यं दमः श्रुतं पराक्रमः अबहुभाषिता च यथाशक्ति दानं कृतज्ञता च (इत्येते) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति।

हिन्दी भावार्थ: इन आठ गुणों से युक्त मनुष्य समाज में हमेशा सम्मान प्राप्त करता है—विशिष्ट बुद्धि (प्रज्ञा), कुलीनता, इन्द्रियसंयम (दम), शास्त्रों का ज्ञान (श्रुत), पराक्रम, कम बोलना (अबहुभाषिता), अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना और कृतज्ञता (किए गए उपकार को मानना)। मनुष्य उत्तम गुणों को धारण करके ही सम्मानित होता है, इसीलिए कहा गया है—'गुणवान् पूज्यते नरः' (गुणवान् व्यक्ति ही पूजा जाता है)।

श्लोकः ६

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति
सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ ६॥

अन्वयः – सा सभा न (अस्ति), यत्र वृद्धाः न सन्ति। ते वृद्धाः न (सन्ति), ये धर्मं न वदन्ति। सः धर्मः न उ (अस्ति), यत्र सत्यं न अस्ति। तत् सत्यं न (अस्ति), यत् छलम् अभ्युपैति।

हिन्दी भावार्थ: इस संसार में अनेक सभाएँ होती हैं जहाँ लोगों का समागम होता है और बहुत भाषणबाजी चलती है, पर उससे सफलता नहीं मिलती। वास्तव में वही सभा सफल है जहाँ आयु और ज्ञान में वृद्ध (अनुभवी) लोग हों। वे वृद्ध भी वही हैं जो धर्म के विषय में बोलते हैं। धर्म से जुड़ी चर्चा में सत्य ही बोलना चाहिए, क्योंकि सत्य वही है जो तथ्यों से युक्त हो, न कि छल-कपट से भरा हुआ।

श्लोकः ७

दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्॥ ७ ॥

अन्वयः – दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं च अपि न कारयेत्। उष्णः अङ्गारः दहति शीतः च करं कृष्णायते।

हिन्दी भावार्थ: दुष्ट व्यक्ति के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दुष्ट व्यक्ति विश्वास के योग्य नहीं होता। उसके साथ बन्धुता या प्रेम नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसके मुँह में तो मधुरता होती है पर हृदय में कपट। अंगारा यदि गर्म होता है, तो वह हाथ को जला देता है, और यदि वह अंगारा ठंडा होता है, तब भी वह हाथ को काला कर देता है। उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति हमेशा अनिष्ट ही करता है या करवाता है। अतः विद्या से अलंकृत होने पर भी दुष्ट व्यक्ति से दूर ही रहना चाहिए।

श्लोकः ८

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ ८ ॥

अन्वयः – यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत् एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।

हिन्दी भावार्थ: रथ की गति दो पहियों से ही भली-भाँति होती है। एक पहिए से रथ का चलना सम्भव नहीं है, उसकी गति रुक जाएगी। उसी प्रकार परिश्रम (पुरुषार्थ) के बिना कोई फल सिद्ध नहीं होता। भाग्य में होने पर भी, उद्यम (परिश्रम) से ही फल प्राप्त होता है। इससे यह अनुभव होता है कि 'प्रयत्न' और 'भाग्य' मानव-रूपी रथ के दो पहिए हैं। कहा भी गया है—'उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः' (परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल इच्छाओं से नहीं)।

३. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings)

संस्कृत शब्दः हिन्दी अर्थः English Meaning
शृङ्खलितम्अनुशासितम् / अनुशासितDisciplined
गायन्तिगानं कुर्वन्ति / गाते हैंSing
किलनिश्चयेन / निश्चय सेWith determination
धन्याःप्रशंसिताः / प्रशंसनीयPraiseworthy
अपवर्गःनिर्वाणम् / मोक्षLiberation
भूयःपुनः पुनः / बार-बारOver and over again
सुरत्वात्देवत्वात् / देवत्व सेFrom divinity
वेत्तिजानाति / जानता हैKnows
निर्गुणःगुणहीनः / गुणरहितWithout virtue
बलीबलवान् / बलशालीPowerful
पिकःकोकिलः / कोयलCuckoo
वायसःकाकः / कौआCrow
करीगजः / हाथीElephant
नम्राःअवनताः / झुके हुएBent
तरवःपादपाः / वृक्षTrees
फलोद्गमैःफलभारैः / फलों के भार सेWith weight of fruits
अम्बुभिःजलैः / जल से भरे हुएFilled with water
घनाःमेघाः / बादलClouds
अनुद्धताःगर्वशून्याः / अभिमान से रहितPolite
कनकम्सुवर्णम् / सोनाGold
निघर्षणम्घर्षणम् / घिसनाRubbing
छेदनम्कर्तनम् / काटनाCutting
ताडनैःप्रहारैः / प्रहार के द्वाराBy hitting
कौल्यम्कुलीनता / अच्छे कुल में जन्मBirth in a good family
दमःइन्द्रियसंयमः / इन्द्रियों का संयमControl over senses
श्रुतम्शास्त्रज्ञानम् / शास्त्रों का ज्ञानKnowledge of scriptures
छलम्कपटता / छलनाCheating
अङ्गारःदग्धकाष्ठः / अङ्गाराCharcoal
दैवम्भाग्यम् / भाग्यLuck

४. अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरणम्)

व्याकरण-बिन्दवः

संस्कृतश्लोकेषु प्रतिपद्यं पादचतुष्टयम् अस्ति। छन्दोबद्ध-सस्वरगानशैली अपि अस्ति। श्लोकेषु सन्धिसमासयुक्तपदानि भवन्ति।

१. सन्धिः
• नम्रास्तरवः = नम्राः + तरवः (विसर्गसन्धिः)
• अभ्युपैति = अभि + उप + एति (यण् सन्धिः / गुण सन्धिः)

२. समासः
• अनुद्धताः = न उद्धताः (नञ् तत्पुरुषसमासः)
• यथाशक्ति = शक्तिम् अनतिक्रम्य (अव्ययीभावः)

५. अभ्यासः

१. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत—

• (क) गीतानि के गायन्ति?
देवाः

• (ख) कः बलं न वेत्ति?
निर्बलः

• (ग) कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति?
पिकः

• (घ) मूषकः कस्य बलं न वेत्ति?
सिंहस्य

• (ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति?
तरवः

• (च) केन समं सख्यं न करणीयम्?
दुर्जनेन

• (छ) केन विना दैवं न सिध्यति?
पुरुषकारेण (परिश्रमेण)

२. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत—

• (क) तरवः कदा नम्राः भवन्ति?
तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति।

• (ख) समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति?
समृद्धिभिः सत्पुरुषाः अनुद्धताः भवन्ति।

• (ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति?
परोपकारिणां (सत्पुरुषाणां) स्वभावः अनुद्धतः (नम्रः) भवति।

• (घ) सत्यं कदा सत्यं न भवति?
यत् छलम् अभ्युपैति तत् सत्यं सत्यं न भवति।

• (ङ) दैवं कदा न सिध्यति?
पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।

३. स्तम्भयोः मेलनं कुरुत—

• (क) गायन्ति देवाः किल गीतकानि ➔ भारतभूमेः माहात्म्यवर्णनम्

• (ख) गुणी गुणं वेत्ति ➔ सज्जनः एव गुणानां मर्मज्ञः

• (ग) भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः ➔ सत्पुरुषाणां स्वाभाविकी नम्रता

• (घ) यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते ➔ सुवर्णं चतुर्भिः प्रकारैः परीक्ष्यते

• (ङ) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति ➔ प्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः

• (च) दुर्जनेन समं सख्यं न कारयेत् ➔ दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः

• (छ) एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः ➔ केवलं दैवंप्रयत्नं विना असिद्धम्

४. अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत—

(फलोद्गमैः, गुणं, कृतज्ञता, सिध्यति, श्रुतं, शीलेन)

• (क) गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः।

• (ख) भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः

• (ग) पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा।

• (घ) गुणाः पुरुषं दीपयन्ति – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतं

• (ङ) दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।

• (च) एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति

५. समुचितं विकल्पं चिनुत—

• (क) “गायन्ति देवाः किल गीतकानि” – इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः?
(ii) भारतभूमेः गौरवम्

• (ख) “गुणी गुणं वेत्ति” – इत्यत्र कः गुणं न जानाति?
(ii) निर्गुणः

• (ग) “पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” – इत्यस्य तात्पर्यं किम्?
(ii) सज्जन एव गुणं जानाति

• (घ) “भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” – इत्यस्य अर्थः कः?
(iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति

• (ङ) “न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” – इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम्?
(iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः

• (च) दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम्?
(iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति

६. योग्यताविस्तरः / परियोजनाकार्यम्

ग्रन्थपरिचयः (योग्यताविस्तरः)

• विष्णुपुराणम् – प्रसिद्धेषु अष्टादशसु पुराणेषु विष्णुपुराणम् अन्यतमम्। अस्मिन् पुराणे प्रायेण सप्तसहस्राधिकश्लोकाः सन्ति। अत्र भगवतः विष्णोः तस्य च अवताराणां विषये वर्णितम्। भारतवर्षस्य गौरवविषये विष्णुपुराणम् अतीव प्रामाणिकं तथ्यं प्रकाशयति।

• महाभारतम् – संस्कृतसाहित्ये महाभारतम् इति इतिहासग्रन्थः पञ्चमवेदरूपेण स्वीकृतः। अस्मिन् ग्रन्थे लक्षाधिकाः श्लोकाः सन्ति। अतः 'शतसाहस्रीसंहिता' इति अस्य अपरं नाम। महाभारते अष्टादश पर्वाणि सन्ति।

• भर्तृहरिः – भर्तृहरिः संस्कृतकाव्यवाङ्मये महान् कविः अस्ति। नीतिशास्त्रविशारदस्य तस्य कृतयः नीतिशतकं, शृङ्गारशतकं, वैराग्यशतकं चेति भारतीयज्ञानपरम्परां पोषयन्ति।

• हितोपदेशः – पण्डितनारायणेन हितोपदेशः कथाग्रन्थः सङ्कलितः। ग्रन्थेऽस्मिन् विविधाः कथाः नीतिश्लोकाः च सन्ति। हितोपदेशः चतुर्धा विभक्तः – मित्रलाभः, सुहृद्भेदः, विग्रहः, सन्धिः।

• चाणक्यनीतिः – चाणक्यस्य नीतिश्लोकाः माणिक्यसदृशाः सन्ति। बालानां चरित्रनिर्माणाय आदर्शमानवजीवनप्रतिष्ठार्थं च आचार्यस्य चाणक्यस्य नीत्युपदेशाः अत्यन्तम् उपयोगिनः सन्ति।

परियोजनाकार्यम्

१. अन्तर्जालात् पुस्तकेभ्यश्च विंशतिसुभाषितानां सङ्ग्रहं कुरुत।
२. किमपि नीतिवाक्यम् अधिकृत्य पञ्चवाक्यानि संस्कृतेन लिखत।
३. पाठे आगतानि सुभाषितानि कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत।

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