अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
✦ २. हितोपदेशस्य कथा (कपोतराजस्य कथा श्लोकाः च)
✦ ३. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings) (संस्कृत, हिन्दी व अंग्रेजी अर्थ)
✦ ४. अवधेयम् (व्याकरणम्) (ल्यप्-प्रत्ययः, विसर्गसन्धिः च)
✦ ५. अभ्यासः (प्रश्नोत्तराणि १-८)
✦ ६. योग्यताविस्तरः / परियोजनाकार्यम् (ग्रन्थपरिचयः भावार्थः च)
१. पाठ-परिचयः (विपत्काले सम्भाषणम्)
कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन्। तदानीं वर्षारम्भकालः आसीत्। सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः।
हिन्दी अर्थ: कुछ मित्र विद्यालय की गर्मी की छुट्टियों में पुण्य तीर्थक्षेत्रों के दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड गए। उस समय वर्षा ऋतु के आरंभ का समय था। सभी गौरीकुण्ड नामक स्थान पर पहुँच गए।
यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा। सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः। नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः। पर्वतस्खलनं सञ्जातम्।
हिन्दी अर्थ: जब वे श्री केदारनाथ क्षेत्र की चढ़ाई कर रहे थे, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज बारिश शुरू हो गई। अचानक सब जगह अंधकार फैल गया। नदी के जल के तीव्र वेग से पुल टूट गया। भूस्खलन (पर्वत स्खलन) हो गया।
सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति। सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायकः सुधीरः सर्वान् सान्त्वयन् प्रेरयन् च अवदत् –
हिन्दी अर्थ: सभी जोर-जोर से रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे 'हे भगवन्! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।' सबका अधैर्य देखकर नायक सुधीर सबको सांत्वना देते हुए और प्रेरित करते हुए बोला –
नायकः – अयि भोः मित्राणि ! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यमवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः ।
हिन्दी अर्थ: नायक: हे मित्रों! इस विपत्ति के समय में हमें धैर्य का सहारा लेकर कोई उपाय सोचना चाहिए।
दिनेशः – (सविषादम्) अरे भ्रातः! किं वदसि? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति। एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः?
हिन्दी अर्थ: दिनेश: (दुख के साथ) अरे भाई! क्या कह रहे हो? हमारी मृत्यु ही बिल्कुल पास आ गई है। ऐसी स्थिति में उपाय कैसे सोचा जा सकता है?
नायकः – मित्र! विषादं मा कुरु। यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।
हिन्दी अर्थ: नायक: मित्र! दुख मत करो। जब बारिश शांत हो जाएगी, और वातावरण स्वच्छ हो जाएगा, तब हम सब मिलकर पुल और रास्ते का निर्माण करके पुनः अपने लक्ष्य की ओर जाएँगे।
सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः?
हिन्दी अर्थ: सुरेश: इस स्थिति में क्या हम यह अत्यन्त कठिन और असम्भव कार्य कर सकते हैं?
नायकः – प्रियमित्राणि ! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः । तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति।
हिन्दी अर्थ: नायक: प्रिय मित्रों! हम अपने आत्मविश्वास के बल पर इस असम्भव कार्य को भी मिलकर अवश्य पूरा कर सकते हैं। इससे हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति होगी और प्राणों की रक्षा भी होगी।
कपिलः – किम् इदं सम्भवति?
हिन्दी अर्थ: कपिल: क्या यह सम्भव है?
नायकः – नूनं सम्भवति मित्र! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि ।
हिन्दी अर्थ: नायक: निश्चय ही सम्भव है मित्र! इस विषय में मैं तुम्हें हितोपदेश की एक कहानी सुनाता हूँ।
सर्वेऽपि – (उत्कण्ठया) का कथा? वद मित्र! वद।
हिन्दी अर्थ: सभी: (उत्सुकता से) कौन सी कहानी? बताओ मित्र! बताओ।
नायकः – सावधानं शृण्वन्तु।
हिन्दी अर्थ: नायक: ध्यान से सुनो।
२. हितोपदेशस्य कथा (कथा-भागः)
✦ नीतिश्लोकाः
"वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥ १ ॥"
हिन्दी अर्थ: विपत्ति आने पर वृद्ध (ज्ञानी) लोगों के वचनों को ग्रहण करना चाहिए। किन्तु, यदि हर बात में अत्यधिक विचार (सन्देह) किया जाए, तो भोजन करने में भी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी।
"विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ, प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ २ ॥"
हिन्दी अर्थ: विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमाभाव, सभा में बोलने की चतुराई, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि, और शास्त्रों के श्रवण (ज्ञान) में व्यसन (लगाव) — ये सभी गुण महात्माओं के स्वभाव में स्वाभाविक रूप से सिद्ध (विद्यमान) होते हैं।
✦ कथा-प्रारम्भः
अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शाल्मलीतरुः। तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म। अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान्विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः ।
हिन्दी अर्थ: गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल सेमल का पेड़ था। वहाँ प्रतिदिन दूर देशों से पक्षी आकर निवास करते थे। एक बार वहाँ कोई शिकारी चावल के दाने बिखेरकर और जाल फैलाकर छिपकर बैठ गया।
तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म। केचन कपोताः वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन्। ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम्। कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत्। सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्।”
हिन्दी अर्थ: उसी समय चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा अपने परिवार के साथ आकाश मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर जंगल के बीच चावल के दानों को देखकर लोभ से आकर्षित हो गए। तब चित्रग्रीव ने चावल के दानों के लोभी कबूतरों से कहा - "इस निर्जन वन में चावल के दाने कहाँ से आ सकते हैं, इस पर विचार करो। यहाँ कोई शिकारी हो सकता है। बिना विचारे कोई भी कार्य बिल्कुल नहीं करना चाहिए।"
एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत् – “आः ! किमर्थम् एवमुच्यते? तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः। अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन्। ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म।
हिन्दी अर्थ: उसकी यह बात सुनकर किसी कबूतर ने घमंड से कहा - "अरे! ऐसा क्यों कह रहे हो?" उसकी बात सुनकर और चित्रग्रीव की आज्ञा की अवहेलना करके सभी कबूतर जमीन पर उतर कर चावल के दाने खाने में लग गए। इसके बाद वे सभी उस जाल में बंध गए। तब जिसके कहने से वे वहाँ बंधे थे, सभी उसका तिरस्कार करने लगे।
इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः अवदत् – “अयम् अस्य दोषो न। अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः। अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन उपायश्चिन्तनीयः । यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्। सत्पुरुषाणां लक्षणं तु — अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमेवावलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम्। प्रियमित्राणि ! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम्। अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।”
हिन्दी अर्थ: यह देखकर चित्रग्रीव बोला - "यह इसका दोष नहीं है। आने वाली विपत्ति को जानने में कौन समर्थ है? इसलिए इस विपत्ति के समय हमें इसका तिरस्कार न करके कोई उपाय सोचना चाहिए। क्योंकि विपत्ति के समय आश्चर्यचकित (हतप्रभ) होना कायरों का लक्षण है। अच्छे पुरुषों का लक्षण तो (धैर्य रखना) है — इसलिए अब हमें धैर्य का सहारा लेकर ही उपाय सोचना चाहिए। प्रिय मित्रों! छोटी-छोटी वस्तुओं का संगठन भी कार्य को सिद्ध करने वाला होता है, यह नीतिवचन संसार में प्रसिद्ध है। अतः हम सभी को एकमत होकर जाल लेकर ही उड़ जाना चाहिए।"
एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः । अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत् परं तस्य दृष्टिपथात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः। अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः – “स्वामिन्! किमिदानीं कर्तुम् उचितम्?”
हिन्दी अर्थ: ऐसा विचार करके सभी पक्षी जाल लेकर उड़ गए। इसके बाद वह शिकारी बहुत दूर से जाल को ले जाने वाले उन पक्षियों को देखकर उनके पीछे दौड़ा, परन्तु जब पक्षी उसकी दृष्टि से बहुत दूर चले गए, तो वह शिकारी लौट गया। शिकारी को लौटता हुआ देखकर कबूतरों ने कहा - "स्वामी! अब क्या करना उचित है?"
चित्रग्रीव उवाच – “प्रियकपोताः! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति। सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति।” एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य विवरसमीपं गताः । हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति। ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः ।
हिन्दी अर्थ: चित्रग्रीव बोला - "प्रिय कबूतरों! हमारा मित्र हिरण्यक नाम का चूहों का राजा गण्डकी नदी के तट पर चित्रवन में रहता है। वह हमारे जालों (बंधनों) को अपने दाँतों के बल से काट देगा।" यह विचार कर सभी हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक हमेशा किसी अनिष्ट की शंका से सौ दरवाजों वाला बिल बनाकर रहता था। तब हिरण्यक कबूतरों के गिरने की आवाज से डरकर चुपचाप स्थित रहा।
चित्रग्रीव उवाच – “सखे हिरण्यक! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे?” ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत् – “आः ! पुण्यवान् अस्मि, मम प्रियसहृत् चित्रग्रीवः समायातः ।” पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविस्मयं क्षणं स्थित्वा अवदत् – “सखे ! किमेतत्?”
हिन्दी अर्थ: चित्रग्रीव ने कहा - "मित्र हिरण्यक! क्या तुम हमसे बात नहीं करोगे?" तब हिरण्यक उसकी आवाज़ पहचानकर खुशी से जल्दी से बाहर निकलकर बोला - "आह! मैं पुण्यवान हूँ कि मेरा प्यारा मित्र चित्रग्रीव आया है।" बंधे हुए कबूतरों को देखकर आश्चर्य से क्षण भर रुककर बोला - "मित्र! यह क्या है?"
चित्रग्रीवोऽवदत् – “सखे ! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम्।” तच्छ्रुत्वा हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति। तदा चित्रग्रीवोऽवदत् – “मित्र! मा मा एवम्। पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम।” एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् – “साधु मित्र! साधु। अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि।”
हिन्दी अर्थ: चित्रग्रीव बोला - "मित्र! यह हमारी विचारहीनता का फल है।" यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव का बंधन काटने के लिए जल्दी से पास गया। तब चित्रग्रीव बोला - "मित्र! ऐसा मत करो। पहले मेरे आश्रित इन लोगों के बंधन काटो, बाद में मेरे।" यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्न मन से रोमांचित होकर बोला - "शाबाश मित्र! शाबाश। अपने आश्रितों के प्रति इस प्रेम के कारण तुम तीनों लोकों का स्वामित्व प्राप्त करने के योग्य हो।"
ततो हिरण्यकः स्वमित्रैः सह सर्वेषां कपोतानां बन्धनानि छिनत्ति स्म। सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन्। सहर्षं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वे कपोताः राजानं चित्रग्रीवं प्रशंसन्ति – “भवतः नीतिशिक्षया नायकधर्मेण च वयं सर्वे सुरक्षिताः । धन्याः वयम्” ।
हिन्दी अर्थ: तब हिरण्यक ने अपने मित्रों के साथ सभी कबूतरों के बंधन काट दिए। सभी कबूतर जाल से मुक्त हो गए। खुशी के साथ पुनः उड़कर आकाश मार्ग से जाते हुए सभी कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करते हैं - "आपकी नीतिशिक्षा और नायक के धर्म के कारण हम सभी सुरक्षित हैं। हम धन्य हैं।"
कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति – “मित्राणि ! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः। तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः?” नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।
हिन्दी अर्थ: कहानी सुनाकर नायक सबको सम्बोधित करता है - "मित्रों! विपत्ति में पड़े हुए कबूतरों ने बुद्धि के बल और संगठन की शक्ति से अपनी रक्षा की। तो हम संगठित होकर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सकते?" नायक के प्रेरणादायक वचनों से उत्साहित होकर सभी डर, शोक और संदेह को छोड़कर पुल बनाने के कार्य में लग गए। भगीरथ (कठोर) प्रयत्नों से पुल का निर्माण करके उन्होंने अपने प्राणों की और दूसरों के प्राणों की रक्षा की।
३. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings)
| संस्कृत शब्दः | हिन्दी अर्थः | English Meaning |
|---|---|---|
| भग्नः | टूट गया | Broke Down |
| अक्रन्दन् | रोये | They cried |
| सविषादम् | विषाद पूर्वक | With sadness |
| सम्भूय | मिलकर | Together |
| तरुः | पेड़ | Tree |
| व्याधः | व्याध / शिकारी | Hunter |
| तण्डुलकणान् | चावल के दानों को | Rice grains |
| विकीर्य | बिखेर कर | Having scattered |
| विस्तीर्य | फैलाकर | Having spread |
| प्रच्छन्नः | छिपा हुआ | Stood Secretly |
| चित्रग्रीवनामा | चित्रग्रीव नाम का | Named Chitragriva |
| प्रतीकारः | उपाय | Remedy |
| अविचारितम् | चिन्तन किये बिना | Not thought of |
| अवतीर्य | उतर कर | Having descended |
| अवलोक्य | देख कर | Having seen |
| अप्रवर्तनम् | न लगना, प्रवृत्त न होना | No inclination |
| प्रवृत्ताः | लगे हुए | Engaged/ engrossed |
| अवलम्ब्य | आश्रित होकर | Having depended on |
| एकचित्तीभूय | एक चित्त होकर | With united mind |
| कापुरुषलक्षणम् | कायर पुरुषों का लक्षण | Signs of a coward |
| तिरस्कुर्वन्ति | तिरस्कार करते हैं | Reject |
| विस्मयः | आश्चर्य | Amazement |
| विक्रमः | अत्यधिक शक्ति युक्त | Valour |
| उत्पतिताः | उड़ गए | Flew away |
| चिन्त्यताम् | चिन्तन करना चाहिए / सोचिए | Should be thought |
| आलोच्य | अच्छी तरह विचार कर | Having analysed |
| पाशान् | बन्धनों को | Captivity |
| प्रत्यभिज्ञाय | जानकार, समझकर | Having recognized |
| त्वरया | शीघ्र | Hurriedly, Quickly |
| निःसृत्य | निकल कर | Coming out |
| मे | मेरा | Mine |
| छिनत्तु | काट दे | (you) Cut |
| आकर्ण्य | सुनकर | Having heard |
| प्रहृष्टमनाः | प्रसन्न मन वाला | Gleeful (person) |
| पुलकितः | प्रफुल्लित होकर | Excited |
| सत्वरम् | अति शीघ्र | Quickly |
| उपसर्पति | निकट आता है | Approaches near |
| आश्रितवात्सल्येन | शरण में आए हुए के प्रति प्रेम से | Affection towards people who have taken shelter |
| आशङ्क्य | शङ्का करके | Having doubted |
| अवज्ञा | निन्दा | Disrespect |
४. अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरणम्)
✦ १. ल्यप्-प्रत्ययः
यत्र एकस्याः क्रियायाः समाप्तेः अनन्तरम् उत्तर-क्रिया भवति तत्र पूर्वकालिके क्रियाव्यवहारे धातोः क्त्वा-प्रत्ययः भवति। तत्रैव यदि धातोः पूर्वं किमपि उपसर्गादिपदं भवति तर्हि क्त्वा-प्रत्ययस्थाने ल्यप् भवति। ल्यप्-प्रत्यये 'य'-मात्रम् अवशिष्यते। क्त्वा-ल्यप्-प्रत्ययान्तानि पदानि अव्ययानि भवन्ति। अस्य वाक्येषु प्रयोगः क्त्वा-प्रत्ययवत् भवति।
यथा – तण्डुलकणान् अवलोक्य (अव + लोक् + ल्यप्) कपोतान् प्रति आह।
धैर्यमेवावलम्ब्य (अव + लम्ब् + ल्यप्) प्रतीकारः चिन्त्यताम्।
| प्रकृति-प्रत्ययविभागः | ल्यबन्तरूपम् | विवरणार्थः |
|---|---|---|
| आ + गम् + ल्यप् | आगत्य / आगम्य | आगमनं कृत्वा |
| आ + नी + ल्यप् | आनीय | आनयनं कृत्वा |
| उत् + स्था + ल्यप् | उत्थाय | उत्थानं कृत्वा |
| प्र + नम् + ल्यप् | प्रणम्य / प्रणत्य | प्रणामं कृत्वा |
| उप + कृ + ल्यप् | उपकृत्य | उपकारं कृत्वा |
| निर् + दिश् + ल्यप् | निर्दिश्य | निर्देशं कृत्वा |
| निस् + चि + ल्यप् | निश्चित्य | निश्चयं कृत्वा |
| वि + स्मृ + ल्यप् | विस्मृत्य | विस्मरणं कृत्वा |
| परि + कृ + ल्यप् | परिष्कृत्य | परिष्कारं कृत्वा |
| आ + रभ् + ल्यप् | आरभ्य | आरम्भं कृत्वा |
| स्वी + कृ + ल्यप् | स्वीकृत्य | स्वीकारं कृत्वा |
| वि + लिख् + ल्यप् | विलिख्य | लेखनं कृत्वा |
| प्र + क्षल् + ल्यप् | प्रक्षाल्य | प्रक्षालनं कृत्वा |
| अप + कृ + ल्यप् | अपकृत्य | अपकारं कृत्वा |
| अव + लोक् + ल्यप् | अवलोक्य | अवलोकनं कृत्वा |
| वि + कॄ + ल्यप् | विकीर्य | विकरणं कृत्वा |
| अव + तॄ + ल्यप् | अवतीर्य | अवतरणं कृत्वा |
| वि + स्तॄ + ल्यप् | विस्तीर्य | विस्तृतं कृत्वा |
| अव + लम्ब् + ल्यप् | अवलम्ब्य | अवलम्बनं कृत्वा |
| निर् + मा + ल्यप् | निर्माय | निर्माणं कृत्वा |
✦ २. विसर्गसन्धिः
• यत्र विसर्गात् परं चकारः अथवा छकारः भवति तत्र विसर्गस्य स्थाने शकारः भवति।
यथा – कः + चित् = कश्चित्। प्रतीकारः + चिन्त्यताम् = प्रतीकारश्चिन्त्यताम्। देवदत्तः + छलेन = देवदत्तश्छलेन।
• यत्र विसर्गात् परं तकारः अथवा थकारः भवति तत्र विसर्गस्य स्थाने सकारः भवति।
यथा – चकितः + तूष्णीम् = चकितस्तूष्णीम्। नीतिः + तावत् = नीतिस्तावत्।
• यदि विसर्गात् पूर्वम् अकारः परं च वर्गस्य तृतीयवर्णः, चतुर्थवर्णः, पञ्चमवर्णः तथा ह य व र ल इत्येतेषु कोऽपि वर्णः भवति तर्हि अकारस्य विसर्गस्य च (अः) स्थाने ओकारो भवति।
यथा – हिरण्यकः + नाम = हिरण्यको नाम । ततः + हिरण्यकः = ततो हिरण्यकः । व्याधः + निवृत्तः = व्याधो निवृत्तः ।
• यदि विसर्गात् पूर्वं पश्चात् च अकारः भवति तत्र पूर्वतनस्य अकारस्य स्थाने विसर्गस्य च (अः) स्थाने ओकारः भवति (पूर्वरूपसन्धि-नियमेन अवग्रहः (ऽ) अपि)।
यथा – कुतः + अत्र = कुतोऽत्र। हितः + अपि = हितोऽपि। सः + अस्माकं = सोऽस्माकम्।
५. अभ्यासः
१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत—
• (क) मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति?
➔ उत्तराखण्डम्
• (ख) सर्वत्र कः प्रसृतः?
➔ अन्धकारः
• (ग) कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत्?
➔ नायकः (सुधीरः)
• (घ) कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति?
➔ नायकः
• (ङ) कपोतराजस्य नाम किम्?
➔ चित्रग्रीवः
• (च) व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान्?
➔ तण्डुलकणान्
• (छ) विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम्?
➔ कापुरुषलक्षणम्
• (ज) चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति?
➔ गण्डकीतीरे
• (झ) चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति?
➔ सखे!
• (ञ) पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति?
➔ मदाश्रितानाम् (एतेषाम्)
२. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत—
• (क) यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत्?
➔ यदा ते केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा।
• (ख) सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त?
➔ सर्वे उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति।
• (ग) असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान्?
➔ असम्भवम् अपि कार्यं वयं सम्भूय (मिलित्वा) अवश्यं साधयितुं शक्नुमः इति नायकः उक्तवान्।
• (घ) निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति?
➔ निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः निरूपयति यत् कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः, कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् इति।
• (ङ) किं नीतिवचनं प्रसिद्धम्?
➔ ‘लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति’ इति नीतिवचनं प्रसिद्धम्।
• (च) व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत्तवान्?
➔ व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः सर्वान् कपोतान् आदेशं दत्तवान् यत् अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् इति।
• (छ) हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः?
➔ हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः।
• (ज) पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति?
➔ पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं प्रशंसति यत् 'अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि।'
• (झ) कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः?
➔ कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः।
• (ञ) नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन्?
➔ नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः।
३. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत—
• (क) छात्रः कक्षां प्रविशति। संस्कृतं पठति। ➔ छात्रः कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति।
• (ख) भक्तः मन्दिरम् आगच्छति। पूजां करोति। ➔ भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति।
• (ग) माता भोजनं निर्माति। पुत्राय ददाति। ➔ माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति।
• (घ) सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति। देवं नमति। ➔ सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति।
• (ङ) रमा पुस्तकं स्वीकरोति। विद्यालयं गच्छति। ➔ रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति।
• (च) अहं गृहम् आगच्छामि। भोजनं करोमि। ➔ अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि।
• (छ) तण्डुलकणान् विकिरति। जालं विस्तारयति। ➔ तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति।
• (ज) व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते। भूमौ अवतरति। ➔ व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति।
४. उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत— (सम्, आ, उप, उत्, वि, प्र)
• (क) छात्रः गृहं गत्वा भोजनं करोति। ➔ छात्रः गृहम् आगत्य भोजनं करोति।
• (ख) माता वस्त्राणि क्षालयित्वा पचति। ➔ माता वस्त्राणि प्रक्षाल्य पचति।
• (ग) शिक्षकः श्लोकं लिखित्वा पाठयति। ➔ शिक्षकः श्लोकं विलिख्य पाठयति।
• (घ) रमा स्थित्वा गीतं गायति। ➔ रमा उत्थाय गीतं गायति।
• (ङ) शिष्यः सर्वदा गुरुं नत्वा पठति। ➔ शिष्यः सर्वदा गुरुं प्रणम्य पठति।
• (च) लेखकः आलोचनं कृत्वा लिखति। ➔ लेखकः समालोच्य लिखति।
५. पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत—
(क) सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।
(ख) जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् अधावत्।
(ग) अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति।
(घ) हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः।
(ङ) यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्。
६. पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत—
• (क) विकीर्य ➔ तण्डुलकणान्
• (ख) विस्तीर्य ➔ जालम्
• (ग) अवतीर्य ➔ भूमौ
• (घ) अवलोक्य ➔ जालापहारकान्
• (ङ) एकचित्तीभूय ➔ उड्डीयताम्
• (च) प्रत्यभिज्ञाय ➔ तद्वचनम्
७. समायुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत—
• (क) गण्डक्याः तीरम् = गण्डकीतीरम् तस्मिन् = गण्डकीतीरे
• (ख) तण्डुलानां कणाः = तण्डुलकणाः तान् = तण्डुलकणान्
• (ग) जालस्य अपहारकाः = जालापहारकाः तान् = जालापहारकान्
• (घ) अवपाताद् भयम् = अवपातभयम् तस्मात् = अवपातभयात्
• (ङ) कापुरुषाणां लक्षणम् = कापुरुषलक्षणम् तस्मिन् = कापुरुषलक्षणे
८. सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत—
• (क) इत्याकर्ण्य = इति + आकर्ण्य
• (ख) चित्रग्रीवोऽवदत् = चित्रग्रीवः + अवदत्
• (ग) बालकोऽत्र = बालकः + अत्र
• (घ) धैर्यमथाभ्युदये = धैर्यम् + अथ + अभ्युदये
• (ङ) भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् = भोजने + अपि + अप्रवर्तनम्
• (च) नमस्ते = नमः + ते
• (छ) उपायश्चिन्तनीयः = उपायः + चिन्तनीयः
• (ज) व्याधस्तत्र = व्याधः + तत्र
• (झ) हिरण्यकोऽप्याह = हिरण्यकः + अपि + आह
• (ञ) मूषकराजो गण्डकीतीरे = मूषकराजः + गण्डकीतीरे
• (ट) अतस्त्वाम् = अतः + त्वाम्
• (ठ) कश्चित् = कः + चित्
६. योग्यताविस्तरः / परियोजनाकार्यम्
✦ ग्रन्थपरिचयः
प्रस्तुतः पाठः हितोपदेशग्रन्थस्य मित्रलाभप्रकरणात् स्वीकृतः। अस्य ग्रन्थस्य लेखकः पण्डितः नारायणशर्मा अस्ति। अस्मिन् ग्रन्थे मूल्ययुक्तानां, नीतियुक्तानां च वचनानां, सुभाषितानां, कथानां च सङ्ग्रहः अस्ति। अतः अयं ग्रन्थः संस्कृतसाहित्ये अत्यन्तं समाद्रियते। अस्मिन् ग्रन्थे चत्वारि प्रकरणानि सन्ति – (१) मित्रलाभः (२) सुहृद्भेदः (३) विग्रहः (४) सन्धिः इति। अस्य अध्ययनेन छात्रः नीतिविद्यायां संस्कृतभाषायां च निपुणो भवति।
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ (हितोपदेशः १.३६)
पदच्छेदः – अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका । तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-दन्तिनः ।
अन्वयः – अल्पानाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्य-साधिका । गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-दन्तिनः बध्यन्ते।
भावार्थः – स्वल्पानां, निर्बलानामपि वस्तूनां संहतिः अर्थात् सङ्घः, समुदायः लक्ष्यसिद्धौ सहायिका भवति। यथा − घाससमूहेन निर्मितरज्जुद्वारा गजेन्द्रा अपि बद्धाः भवन्ति।
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥ (हितोपदेशः १.३२)
पदच्छेदः – विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा सदसि वाक्-पटुता युधि विक्रमः । यशसि च अभिरुचिः व्यसनम् श्रुतौ प्रकृति-सिद्धम् इदम् हि महात्मनाम्।
अन्वयः – अथ विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्-पटुता, युधि विक्रमः, यशसि अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनं च इदं हि महात्मनां प्रकृति-सिद्धं भवति।
भावार्थः – महापुरुषाणाम् एतत् आचरणं स्वभावसिद्धमेव भवति। यत् किमपि भवेत् ते विपत्काले धैर्यमवलम्ब्य समस्यापरिहारविषये प्रयत्नं कुर्वन्ति। सम्पत्तौ उन्नतौ च ते सर्वान् उपकुर्वन्ति। सभायां ते कौशलेन भाषणं कुर्वन्ति। युद्धे ते पराक्रमं शौर्यं च दर्शयन्ति। यशोविषये ते अभिरुचिं प्रदर्शयन्ति। शास्त्रविषये च ते अनुरागं प्रकटयन्ति।
✦ परियोजनाकार्यम्
१. पाठात् अधोलिखितानां क्रियापदानां प्रयोगकौशलं ज्ञात्वा तत्समानानि अन्यानि वाक्यानि रचयत—
(तिरस्कुर्वन्ति, क्रियताम्, निवसति, आह, छेत्स्यति, सम्भाषसे, अब्रवीत्, उपसर्पति, युज्यते)
यथा – तिरस्कुर्वन्ति – दुर्जनाः सज्जनं तिरस्कुर्वन्ति।
• (क) क्रियताम् – सदा सत्कर्म क्रियताम्।
• (ख) निवसति – मुनिः आश्रमे निवसति।
• (ग) आह – गुरुः शिष्यं प्रति आह।
• (घ) छेत्स्यति – काष्ठिकः वृक्षं छेत्स्यति।
• (ङ) सम्भाषसे – त्वं मधुरं सम्भाषसे।
• (च) अब्रवीत् – सः सत्यम् अब्रवीत्।
• (छ) उपसर्पति – छात्रः गुरुम् उपसर्पति।
• (ज) युज्यते – सज्जनस्य एवम् आचरणं न युज्यते।
२. अनया कथया वयं स्वजीवने कां शिक्षां स्वीकर्तुं शक्नुमः इति अधिकृत्य कक्षायां परिचर्चां कुर्वन्तु।

