प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः
✦ २. महामना गोपबन्धुः (कथा-भागः श्लोकाः च)
✦ ३. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings) (संस्कृत, हिन्दी व अंग्रेजी अर्थ)
✦ ४. अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरणम्) (पूर्वरूपसन्धिः)
✦ ५. अभ्यासः (प्रश्नोत्तराणि १-८)
✦ ६. योग्यताविस्तरः / परियोजनाकार्यम् (जीवनपरिचयः)
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| NCERT Class 8 Sanskrit Deepakam Chapter 4 – प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुः महामनाः | Summary, Questions Answers |
१. पाठ-परिचयः (विपत्काले संवादः)
एकदा जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं शिक्षकाः छात्राश्च सभागारे चर्चां कुर्वन्ति।
हिन्दी अर्थ: एक बार बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए शिक्षक और छात्र सभागार में चर्चा करते हैं।
आचार्यः – नमस्ते छात्राः! ह्यस्तनीं वार्तां श्रुतवन्तः किम्?
हिन्दी अर्थ: आचार्य: नमस्ते छात्रो! क्या आपने कल का समाचार सुना?
हिमानी – नमो नमः आचार्य! ओडिशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ्करः जलप्लावः सम्भूतः। जलप्लावेन तत्र महती हानिः सञ्जाता।
हिन्दी अर्थ: हिमानी: प्रणाम आचार्य! ओडिशा राज्य के केन्द्रापडा जिले में महानदी में भयंकर बाढ़ आई है। बाढ़ से वहाँ बहुत हानि हुई है।
आचार्यः – आम्, हिमानि! त्वं सत्यं वदसि। जलप्लावेन वासगृहाणि नष्टानि, केचित् अस्वस्थाः चिकित्सालये मृत्युना सह युध्यन्ते। अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते। बहवः गृहपालिताः पशवोऽपि नदीस्रोतसा प्रवाहिताः मृताश्च।
हिन्दी अर्थ: आचार्य: हाँ, हिमानी! तुम सत्य कह रही हो। बाढ़ से घर नष्ट हो गए हैं, कुछ अस्वस्थ लोग अस्पताल में मृत्यु से जूझ रहे हैं। और अन्य लोग बिना भोजन के कष्ट सह रहे हैं। बहुत से पालतू पशु भी नदी के प्रवाह में बह गए और मर गए।
अशोकः – महोदय! ते सम्प्रति अतिदुःखिताः भवेयुः खलु?
हिन्दी अर्थ: अशोक: महोदय! वे सब इस समय बहुत दुखी होंगे ना?
आचार्यः – सत्यम्, अशोक! ते सर्वे अतिदुःखेन जीवन्ति। अस्माभिः एतादृशानां दुःखितानां सहायता करणीया। यथा उत्कलमणिः गोपबन्धुः जलप्लावपीडितानाम् अकुण्ठं सेवां कृत्वा अद्यापि जनमानसेषु समादृतोऽस्ति।
हिन्दी अर्थ: आचार्य: सत्य है, अशोक! वे सभी बहुत दुःख से जी रहे हैं। हमें ऐसे दुखी लोगों की सहायता करनी चाहिए। जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु ने बाढ़ पीड़ितों की निस्वार्थ (आग्रहपूर्वक) सेवा करके आज भी जनमानस में आदर प्राप्त किया है।
हिमानी – महोदय! एषः गोपबन्धुः कः?
हिन्दी अर्थ: हिमानी: महोदय! यह गोपबन्धु कौन हैं?
आचार्यः – भवन्तः सर्वे एतत् चित्रं पश्यन्तु। एषः अस्ति दीनबन्धुः गोपबन्धुः। सम्प्रति वयं तस्य विषये जानीमः।
हिन्दी अर्थ: आचार्य: आप सभी यह चित्र देखें। यह हैं दीनों के बन्धु गोपबन्धु। अब हम उनके विषय में जानते हैं।
२. महामना गोपबन्धुः (कथा-भागः)
✦ कथा-प्रारम्भः
एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान्। आमन्त्रिताः सर्वे अतिथयः हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः। बहूनि सुस्वादूनि व्यञ्जनानि कदलीपत्रेषु परिवेषितानि।
हिन्दी अर्थ: एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादि वनविद्यालय के सभी अध्यापकों को भोजन के लिए आमन्त्रित किया। आमन्त्रित सभी अतिथियों ने हाथ-पैर धोकर आसनों पर अपना स्थान ग्रहण किया। केले के पत्तों पर बहुत से स्वादिष्ट भोजन (व्यञ्जन) परोसे गए।
हसन् गोपबन्धुरवदत् – अरे!
"भोजनस्यातिदौर्लभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्।
तदर्थं भोजनं कुर्याः मा शरीरे दयां कुरु॥"
हिन्दी अर्थ: हँसते हुए गोपबन्धु बोले – अरे! भोजन बहुत दुर्लभ होता है, जीवन को आगे बढ़ाने के लिए सुखप्रद भोजन करना चाहिए। इसलिए शरीर के कष्ट को सोचकर भोजन के विषय में दया (संकोच/लज्जा) मत करो।
एतच्छ्रुत्वा सर्वे उच्चैः हसितवन्तः। तदानीमेव बहिः कश्चन करुणध्वनिः गोपबन्धोः कर्णयोः अगञु्जत – “मातः, मातः! बुभुक्षितोऽस्मि, कृपया किञ्चित् भोजनं देहि। दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्। भोजनं देहि मातः! भोजनं देहि। आँ आँ . . .” इति क्रन्दनध्वनिं श्रुत्वैव दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्।
हिन्दी अर्थ: यह सुनकर सभी जोर से हँसे। उसी समय बाहर से कोई करुणा भरी आवाज गोपबन्धु के कानों में गूँजी – "माता, माता! मैं भूखा हूँ, कृपया कुछ भोजन दे दो। तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। भोजन दे दो माता! भोजन दे दो। आँ आँ..." यह रोने की आवाज सुनते ही दया से पिघले हुए हृदय वाले गोपबन्धु की आँखें आँसुओं से भर गईं।
किमपि अविचिन्त्य झटिति स्वस्मै परिवेषितं भोजनं हस्ते गृहीत्वा बहिरागतवान्। भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।
हिन्दी अर्थ: बिना कुछ सोचे जल्दी से अपने लिए परोसा गया भोजन हाथ में लेकर वह बाहर आ गए। और उस भिखारी को वह भोजन करा दिया।
असौ महान् समाजसेवकः आसीत् गोपबन्धुदासः। असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य अध्यापकः, प्रसिद्धेषु पञ्चमित्रेषु अन्यतमः स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी चासीत्। ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्। अध्ययनकालादेव स दरिद्राणां रोगिणां च सेवामकरोत्।
हिन्दी अर्थ: वह महान समाजसेवक गोपबन्धु दास थे। वह सत्यवादि-वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध पाँच मित्रों में से एक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। उन्होंने ओडिशा राज्य के पुरी जिले में साक्षीगोपाल के समीप सुआण्डो ग्राम में जन्म लिया था। पढ़ाई के समय से ही वह गरीबों और रोगियों की सेवा करते थे।
सत्यवादि-वनविद्यालये स छात्रान् निःशुल्कम् अपाठयत्। निरक्षरतादूरीकरणाय सः सततं यतते स्म। कार्पासवस्त्रनिर्माणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तुतिमकरोत्। जन्मभूमेः दुर्दशामवलोक्य स सर्वदा चिन्ताकुलो भवति स्म। महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। सः वर्षद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान्।
हिन्दी अर्थ: सत्यवादि-वनविद्यालय में वह छात्रों को निःशुल्क पढ़ाते थे। निरक्षरता दूर करने के लिए वह निरन्तर प्रयास करते थे। सूती वस्त्र (कपास) निर्माण के लिए वह स्वयं ही सूत (धागा) तैयार करते थे। अपनी जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर वह हमेशा चिन्ता से व्याकुल रहते थे। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से गोपबन्धु ने भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया। उन्हें दो वर्ष तक कारावास (जेल) प्राप्त हुआ।
कारागारे निवसन् सः ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ इत्यादीनि बहुप्रेरणादायीनि पुस्तकानि ओडिआभाषया विरचितवान्। सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्। मरणासन्नं स्वपुत्रमपि विहाय जलप्लावपीडितान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् उद्धर्तुं गृहात् बहिः निर्गतः समाजमसेवत च।
हिन्दी अर्थ: जेल में रहते हुए उन्होंने ओडिआ भाषा में ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ आदि बहुत सी प्रेरणादायक पुस्तकों की रचना की। उन्होंने हमेशा स्वदेशी वस्त्रों और वस्तुओं का ही उपयोग किया। अपने मरणासन्न (मरने वाले) पुत्र को भी छोड़कर, बाढ़ से पीड़ित भारतमाता के हजारों पुत्रों का उद्धार करने के लिए वह घर से बाहर निकल गए और समाज की सेवा की।
देशसेवातत्परस्य गोपबन्धुवर्यस्य प्रसिद्धं प्रेरणादायकं वचनमधुनापि जनमानसेषु राष्ट्रभक्तिं जागरयति –
मिशु मोर देह ए देश माटिरे,
देशवासी चालि जाआन्तु पिठिरे,
देशर स्वराज्य पथे जेते गाड़,
पूरु तहिँ पड़ि मोर मांस हाड़॥
"स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः,
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा॥"
भावार्थः: स्वदेशस्य भूमिभागे मम शरीरं विलीनं भवतु। देशवासिनः मम अनुसरण कुर्वन्तु। देशस्य स्वतन्त्रतानिमित्तं यत्र यत्र प्रतिबन्धकाः गर्ताः सन्ति, ते सर्वे गर्ताः मम अस्थिभिः मांसैश्च परिपूर्णाः भवन्तु। (स्वदेश की भूमि में मेरा शरीर विलीन हो जाए। देशवासी मेरा अनुसरण करें/मेरी पीठ पर चलकर जाएँ। देश के स्वराज्य मार्ग में जहाँ-जहाँ गड्ढे/रुकावटें हैं, वे सभी गड्ढे मेरी हड्डियों और मांस से भर जाएँ।)
असौ सत्यवादि-वनविद्यालयस्य, दरिद्रनारायणसेवा-सङ्घस्य, सत्यवादि-मुद्रणालयस्य, समाजः इति दैनिक-वार्तापत्रस्य च प्रतिष्ठाता आसीत्। समाजः इति दिनपत्रिका शताधिकवर्षेभ्यः अधुनापि प्रतिदिनं प्रकाश्यते। समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभूय वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
हिन्दी अर्थ: वह सत्यवादि-वनविद्यालय, दरिद्रनारायणसेवा-संघ, सत्यवादि-मुद्रणालय, और 'समाज' नामक दैनिक समाचारपत्र के संस्थापक थे। 'समाज' नामक समाचार पत्रिका सौ से अधिक वर्षों से आज भी प्रतिदिन प्रकाशित होती है। समाज सेवा और देश सेवा के लिए उनके अपार त्याग को अनुभव करके वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने गोपबन्धु को 'उत्कलमणि' की उपाधि से सम्मानित किया।
"उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः।
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः॥"
३. शब्दार्थ-सारणी (Word Meanings)
| संस्कृत शब्दः | हिन्दी अर्थः | English Meaning |
|---|---|---|
| जलप्लाव-पीडितानाम् | बाढ़ पीड़ितों का | of flood victims |
| नष्टानि | नष्ट हुए / क्षतिग्रस्तानि | Destroyed |
| अनाहारेण | भोजन न करने से (आहारेण विना) | By abstaining from food |
| नदीस्रोतसा | नदी के प्रवाह से | By River currents |
| अकुण्ठम् | आग्रहपूर्वक (कुण्ठं विना) | Generously |
| समादृतः | सम्मानित / आदरप्राप्तः | Honored |
| सुस्वादूनि व्यञ्जनानि | स्वादिष्ट भोजन | Delicious food |
| दौर्लभ्यम् | कष्ट से प्राप्त किया गया | Difficulty in being obtained |
| निःशुल्कम् | निःशुल्क (धनं विना) | Without any fees |
| करुणध्वनिः | करुणा युक्त ध्वनि | Weeping words |
| अगञु्जत् | गूँजा | Echoes |
| बुभुक्षितः | भूखा | Hungry |
| दयाविगलित-हृदयः | दया पूर्ण हृदय वाला / दयालु | Compassionate heart |
| अश्रुपूर्णनयनः | आँसू से भरी हुई आँखों वाला | Eyes filled with tears |
| परिवेषितम् | परोसा गया | Served |
| पञ्चमित्रेषु | पाँच मित्रों में | Among five friends |
| स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामी | स्वतन्त्रता सेनानी | Freedom fighter |
| जन्म लब्धवान् | जन्म लिया | Was born |
| कारावासम् | कारागार में रहना | Living in jail |
| चिन्ताकुलः | चिन्ता से व्याकुल | Worried |
| देशसेवा-तत्परस्य | देश सेवा हेतु तत्पर का | Of the one ready to serve |
| सहस्रशः | हजारों | In thousands |
| लीयताम् | विलीन हो जाएँ | (May it) merge |
| प्रयान्तु | चलें (गच्छन्तु) | (May they) walkover |
| गर्तमालिका | गड्ढों की शृङ्खला | Series of potholes |
| अस्थिमांसैः | हड्डी और मांस से | With the bones and flesh |
| दैनिक-वार्तापत्रस्य | दैनिक समाचारपत्र का | Of the daily newspaper |
| असीमम् | अपार / अतुलनीयम् | Immense / Unparallel |
| उत्कलमणिः | उत्कल की मणि (उपाधिविशेषः) | Gem of Odisha (A title) |
| सम्मानितवान् | सम्मानित किया | Honored |
| लोकसेवकः | समाज सेवक | Social worker |
| महामनाः | उच्च विचार वाला | Broad-minded |
४. अत्र इदम् अवधेयम् (व्याकरणम्)
✦ पूर्वरूपसन्धिः
पदस्य अन्ते यदा "ए"कारः अथवा "ओ"कारः भवति, तदनन्तरम् अग्रिमपदस्य प्रथमवर्णः "अ"कारः भवति तदा पूर्वरूपसन्धिः भवति। तत्र "अ"कारस्य स्थाने "ऽ" इति अवग्रहचिह्नस्य प्रयोगः भवति।
उदाहरणानि:
देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्
सर्वे + अपि = सर्वेऽपि
पशवो + अपि = पशवोऽपि
बुभुक्षितो + अस्मि = बुभुक्षितोऽस्मि
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् = अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्
५. अभ्यासः (अभ्यासात् जायते सिद्धिः)
१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत—
(क) समाज-दिनपत्रिकायाः प्रतिष्ठाता कः?
➔ गोपबन्धुः
(ख) गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान्?
➔ भिक्षुकाय
(ग) मरणासन्नः कः आसीत्?
➔ स्वपुत्रः
(घ) गोपबन्धुः केन उपाधिना सम्मानितः अभवत्?
➔ उत्कलमणिः
(ङ) गोपबन्धुः कति वर्षाणि कारावासं प्राप्तवान्?
➔ वर्षद्वयम्
२. एकवाक्येन उत्तरं लिखत—
(क) गोपबन्धुः किमर्थम् अश्रुपूर्णनयनः अभवत्?
➔ बहिः भिक्षुकस्य करुणध्वनिं श्रुत्वा दयाविगलितहृदयः गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनः अभवत्।
(ख) कीदृशं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत्?
➔ मरणासन्नं स्वपुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत्।
(ग) गोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः किमर्थं प्रदत्तः?
➔ समाजसेवायै देशसेवायै च तस्य असीमं त्यागम् अनुभूय वैज्ञानिकः आचार्यः प्रफुल्लचन्द्ररायः तस्मै उत्कलमणिः इति उपाधिं दत्तवान्।
(घ) गोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान्?
➔ गोपबन्धुः ओडिशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान्।
(ङ) गोपबन्धुः सर्वदा केषाम् उपयोगं कृतवान्?
➔ गोपबन्धुः सर्वदा स्वदेशस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्।
३. कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत—
(सेवाम्, सुस्वादूनि, सहायताम्, स्वदेशवस्त्राणि, अन्यतमः)
(क) सेवाम् – सः दरिद्राणां रोगिणां च सेवाम् अकरोत्।
(ख) सुस्वादूनि – अतिथये सुस्वादूनि व्यञ्जनानि परिवेषितानि।
(ग) सहायताम् – अस्माभिः दुःखितानां सहायताम् अवश्यं करणीया।
(घ) स्वदेशवस्त्राणि – देशभक्ताः सर्वदा स्वदेशवस्त्राणि धारयन्ति।
(ङ) अन्यतमः – गोपबन्धुः पञ्चमित्रेषु अन्यतमः आसीत्।
५. समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत—
(क) स्वदेशभूमौ मम लीयतां तनुः
(ख) उत्कलमणिरित्याख्यः प्रसिद्धो लोकसेवकः
(ग) स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु
(घ) स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका
(ङ) ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा
६. उदाहरणानुसारं क्रियापदं स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत—
यथा – गतवान् ➔ गतवती
(क) प्राप्तवान् ➔ प्राप्तवती
(ख) उपविष्टवान् ➔ उपविष्टवती
(ग) भुक्तवान् ➔ भुक्तवती
(घ) कृतवान् ➔ कृतवती
(ङ) गृहीतवान् ➔ गृहीतवती
७. समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत—
1. समाजः ➔ दिनपत्रिका
2. ममास्थिमांसैः ➔ परिपूरितास्तु
3. उत्कलमणिः ➔ गोपबन्धुः
4. आँ आँ . . इति ➔ क्रन्दनध्वनिः
5. सुस्वादूनि ➔ व्यञ्जनानि
८. घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत—
प्रदत्त-वाक्यानि:
(क) भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।
(ख) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
(ग) गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्।
(घ) अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः।
(ङ) दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्。
क्रमबद्ध-वाक्यानि:
१. अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः। (घ)
२. दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्। (ङ)
३. गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्। (ग)
४. भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्। (क)
५. प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्। (ख)
६. योग्यताविस्तरः / परियोजनाकार्यम्
✦ उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयः
जन्म – ०९/१०/१८७७
जन्मस्थानम् – सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम्
पिता – दैत्यारिदासः
माता – स्वर्णमयी देवी
पत्नी – मोती देवी
एफ़्.ए. उत्तीर्णः – १९००, रेभन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा
बी.एल. उत्तीर्णः – १९०६, कलकत्ता – विश्वविद्यालयः
सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा – १९०९
बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः – १९१७
समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम् – १९१९
भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम् – १९२०
उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम् – १९२४
रचनाः – अवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यान
स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले) – १७.०६.१९२८
सत्यवादि-वनविद्यालयः
भारतस्य प्रथमः मुक्तविद्यालयः। १९०९ ख्रिस्ताब्दे अगस्तमासस्य १२ दिनाङ्के साक्षीगोपाल-नामके स्थाने प्रतिष्ठापितः। पण्डितः गोपबन्धुदासः, पण्डितः नीलकण्ठदासः, पण्डितः डा. गोदावरीशमिश्रः, पण्डितः कृपासिन्धुमिश्रः, पण्डितः लिङ्गराजमिश्रः, आचार्यः हरिहरदासः, पण्डितः नन्दकिशोरदासः च इत्येषां देशभक्तानां मिलितप्रयासेन अयं निःशुल्कवनविद्यालयः तदानीम् आभारतं प्रतिष्ठाम् अलभत। पञ्चसखायः मिलित्वा समाजसेवां कुर्वन्तः शिक्षाविकासं च कारयन्तः स्वाधीनतान्दोलनाय जनान् प्रेरयन्ति स्म।
✦ परियोजनाकार्यम्
१. स्वप्रदेशस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामिणां नामानि सङ्गृह्य तेषु एकस्य सचित्रां संक्षिप्तजीवनीं लिखत।
२. जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं स्वकीयाम् एकां कार्ययोजनां लिखत।

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